*हिंदी फिल्मो के प्रसिद्ध अभिनेता निर्माता निर्देशक फ़िरोज़ खान की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रधांजलि*
हिन्दी फ़िल्मों के प्रसिद्ध अभिनेता एवं फ़िल्म निर्माता-निर्देशक थे। फ़िरोज़ ख़ान अपनी ख़ास शैली, अलग अंदाज़ और किरदारों के लिए जाने जाते रहे।फ़िल्मों में कहीं वो एक सुंदर हीरो की भूमिका में हैं तो कहीं खूंखार विलेन के रोल में दोनों ही चरित्रों में फ़िरोज़ ख़ान जान डाल देते थे।
फ़िरोज़ ख़ान का *जन्म 25 सितंबर,1939 को बेंगलूर में हुआ था*।अफ़ग़ानी पिता और ईरानी माँ के बेटे फ़िरोज़ बेंगलूर से हीरो बनने का सपना लेकर मुंबई पहुंचे। उनके तीन भाई संजय ख़ान(अभिनेता-निर्माता), अकबर ख़ान और समीर ख़ान हैं। उनकी एक बहन हैं,जिनका नाम दिलशाद बीबी है। फ़िरोज़ ख़ान ने सुंदरी के साथ जिंदगी का सफर 1965 में शुरू किया। दोनों 20 साल तक साथ रहे। 1985 में उनके बीच तलाक हो गया। फ़िरोज़ ख़ान के पुत्र फ़रदीन ख़ान भी अभिनेता हैं।
बॉलीवुड में फ़िरोज़ ख़ान ने अपने कैरियर की शुरूआत 1960 में बनी फ़िल्म 'दीदी' से की। शुरुआती कुछ फ़िल्मों में अभिनेता का किरदार निभाने के बाद उन्होंने कुछ समय के लिए खलनायकों की भी भूमिका अदा की ख़ास तौर पर गांव के गुंडों की। वर्ष 1962 में फ़िरोज़ ने अंग्रेज़ी भाषा की एक फ़िल्म 'टार्जन गोज टू इंडिया' में काम किया। इस फ़िल्म में नायिका सिमी ग्रेवाल थीं। 1965 में उनकी पहली हिट फ़िल्म 'ऊंचे लोग' आई जिसने उन्हें सफलता का स्वाद चखाया।अभिनय के लिहाज से फ़िरोज़ ख़ान के लिए 70 का दशक ख़ास रहा।फ़िल्म 'आदमी और इंसान' (1970) में अभिनय के लिए फ़िरोज़ को फ़िल्म फेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक कलाकार का पुरस्कार मिला। 70 के दशक में उन्होंने आदमी और इंसान, मेला, धर्मात्मा जैसी बेहतरीन फ़िल्में दीं। इसी दशक में उन्होंने निर्माता-निर्देशक के रूप में अपना सफर शुरू किया। उनके इस सफर की शुरुआत फ़िल्म धर्मात्मा से हुई। वर्ष 1980 की फ़िल्म क़ुर्बानी से उन्होंने एक सफल निर्माता-निर्देशक के रूप में सभी को अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। क़ुर्बानी उनके कैरियर की सबसे सफल फ़िल्म रही। इसमें उनके साथ विनोद खन्ना भी प्रमुख भूमिका में थे। क़ुर्बानी ने हिंदी सिनेमा को एक नया रूप दिया। क़ुर्बानी ने ही हिंदी सिनेमा में अभिनेत्रियों को भी हॉट एंड बोल्ड होने का अवसर दिया। फ़िल्म में फ़िरोज़ और जीनत अमान की बिंदास जोड़ी को दर्शकों ने खूब पसंद किया।
फ़िल्मों से अभिनय के बाद उन्होंने निर्देशन की तरफ रुख किया। उन्होंने लीक से हट कर फ़िल्में बनाई। 70 से 80 के दशक के बीच उनके निर्देशन में बनी फ़िल्में धर्मात्मा, क़ुर्बानी, जांबाज और दयावान बॉक्स ऑफिस पर हिट हुई। वर्ष 1975 में बनी धर्मात्मा पहली भारतीय फ़िल्म थी जिसकी शूटिंग अफ़ग़ानिस्तान में की गई। यह एक निर्माता निर्देशक के रूप में फ़िरोज़ की पहली हिट फ़िल्म भी थी। यह फ़िल्म हॉलीवुड की फ़िल्म गॉडफादर पर आधारित थी। 1998 में फ़िल्म प्रेम अगन से उन्होंने अपने बेटे को फ़िल्मों में लाने का काम किया पर उनके बेटे फ़रदीन ख़ान उनकी तरह शोहरत बटोरने में विफल रहे। 2003 में उन्होंने अपने बेटे और स्पोर्ट्स प्यार के लिए फ़िल्म 'जानशीं' बनाई पर फ़िल्म में अभिनय करने के बाद भी वह अपने बेटे को हिट नहीं करवा सके। फ़िरोज़ ख़ान ने आखिरी बार फ़िल्म वेलकम में काम किया। फ़िल्म वेलकम में भी उनका वही बिंदास स्टाइल नजर आया जिसके लिए वह जाने जाते हैं। फ़िरोज़ ख़ान को बालीवुड की ऐसी शख्सियत के रूप में याद किया जाता है जिन्होंने फ़िल्म निर्माण की अपनी विशेष शैली बनाई थी। फ़िरोज़ ख़ान की निर्मित फ़िल्मों पर नजर डालें तो उनकी फ़िल्में बड़े बजट की हुआ करती थीं। जिनमें बड़े-बड़े सितारे, आकर्षक और भव्य सेट, खूबसूरत लोकेशन, दिल को छू लेने वाला गीत, संगीत और उम्दा तकनीक देखने को मिलती थी। अभिनेता के रूप में भी फ़िरोज़ ख़ान ने बालीवुड के नायक की परम्परागत छवि के विपरीत अपनी एक विशेष शैली गढ़ी जो आकर्षक और तड़क-भड़क वाली छवि थी। उनकी अकड़कर चलने की अदा और काउब्वाय वाली इमेज दर्शकों के मन में आज भी बसी हुई है। फ़िल्म निर्माण और निर्देशन के क्रम में फ़िरोज़ ख़ान ने हिन्दी फ़िल्मों में कुछ नई बातों का आगाज किया। अपराध फ़िल्म में भारत की पहली फ़िल्म थी जिसमें जर्मनी में कार रेस दिखाई गई थी।धर्मात्मा की शूटिंग के लिए वह अफ़ग़ानिस्तान के खूबसूरत लोकेशनों पर गए। इससे पहले भारत की किसी भी फ़िल्म का वहां फ़िल्मांकन नहीं किया गया था। अपने कैरियर की सबसे हिट फ़िल्म क़ुर्बानी से फीरोज ख़ान ने पाकिस्तान की पॉप गायिका नाजिया हसन के संगीत कैरियर की शुरुआत कराई। वर्ष 2003 में फ़िरोज़ ख़ान ने अपने पुत्र फ़रदीन ख़ान को लांच करने के लिये जानशीं का निर्माण किया।बॉलीवुड में लेडी किलर के नाम से मशहूर फ़िरोज़ ख़ान ने चार दशक लंबे सिने कैरियर में लगभग 60 फ़िल्मों में अभिनय किया। उनकी उल्लेखनीय फ़िल्मों में कुछ हैं आग, प्यासी शाम, सफर, मेला, खोटे सिक्के, गीता मेरा नाम, इंटरनेशनल क्रुक, काला सोना, शंकर शंभु,नागिन, चुनौती, क़ुर्बानी वेलकम आदि।
ख़ुद को किसी दायरे में बांध कर नहीं रखने वाले ही एक दिन दुनिया को अपने सम्मोहन से बांध देते हैं। बॉलीवुड की दुनिया में जहां अभिनेता फ़िल्में खो देने के डर से अपनी छवि में बंधे रहते हैं वहां एक अभिनेता ऐसा भी था जिसने कभी ख़ुद को किसी छवि में बंधने नहीं दिया।अभिनेता फ़िरोज़ ख़ान ने बॉलीवुड में स्टाइलिश और बिंदास होने के जो पैमाने रखे उस तक आज भी कोई नहीं पहुंच पाया है। राजसी अंदाज़ में उन्होंने एक अर्से तक दर्शकों के दिलों पर राज किया है। फ़िल्म इंडस्ट्री में ऐसे कई प्रसंग और किस्से हैं, जिनमें फ़िरोज़ ख़ान ने बेधड़क दिल की बात रखी।अपने इस बिंदास और बेख़ौफ़ मिज़ाज के कारण वे आलोचना के शिकार हुए और कई बेहतरीन फ़िल्में उनके हाथों से निकल गई। कहते हैं कि संगम के निर्माण के समय राज कपूर ने राजेंद्र कुमार के पहले उनके नाम पर विचार किया था। पुरानी और नयी पीढ़ी के अभिनेताओं के बीच फ़िरोज़ एक योजक की तरह रहे। उन्हें अपने मुखर, खुले, आक्रामक और एक हद तक अहंकारी स्वभाव के कारण बदनामी झेलनी पड़ी। इसके बावजूद उन्होंने छवि सुधारने की कोशिश नहीं की।अपने लापरवाह अंदाज़ में जीते रहे। फ़िरोज़ एक मंझे हुए अभिनेता के साथ ही अपनी स्पष्ट राय रखने के लिए जाने जाते थे। कुछ वर्ष पहले उन्होंने पाकिस्तान की स्थिति को लेकर बयान दिया तो वहां के शासकों की नज़र में वह चुभ गए। यही वजह रही कि उन्हें पाकिस्तान का वीजा न देने का फैसला हुआ। इसके बावजूद वह अपनी बेबाक राय पर अडिग रहे। हालांकि फ़िरोज़ ख़ान ने असल जिंदगी में काफ़ी संघर्ष भी किया है।
उन्हें वर्ष 1970 में फ़िल्म 'आदमी और इंसान' के लिए फ़िल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेता का पुरस्कार दिया।
वर्ष 2000 में फ़िरोज़ को लाइफटाइम अचीवमेंट का फ़िल्मफेयर पुरस्कार दिया गया।
अपने बेटे फ़रदीन के करियर को चमकाने की उन्होंने कोशिश की, लेकिन बात नहीं बनी। कुछ फ़िल्मों में फ़िरोज़ ने चरित्र रोल भी निभाए, लेकिन 'शेर भले ही बूढ़ा हो जाए, वह घास नहीं खाता' अंदाज में फ़िरोज़ ने अपनी आन-बान-शान हमेशा कायम रखी।फ़िरोज़ ख़ान कैंसर से पीड़ित थे और मुंबई में उनका लंबे समय तक इलाज चला। *27 अप्रैल ,2009 को उन्होंने बेंगलूर स्थित अपने फार्म हाउस में अंतिम सांस ली।*
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नाम :- फिरोज खान
जन्म नाम :- जुल्फिकार अली शाह खान
जन्म तिथि :- 25 सितंबर 1939
जन्म स्थान :- बैंगलोर, कर्नाटक, भारत
ऊंचाई :- 1.83 मी
मिनी बायो:- फ़िरोज़ का जन्म 25 सितंबर, 1939 को बैंगलोर में एक पठान पिता, सादिक और एक ईरानी माँ, फातिमा के यहाँ हुआ था। उनके तीन भाई हैं, अब्बास उर्फ संजय, अकबर और समीर। संजय और अकबर दोनों अपने-अपने अधिकारों के भीतर अभिनेता हैं, जबकि समीर एक फिल्म-निर्माता हैं और बैंगलोर में स्थित उनके गोल्डन पाम्स स्पा में सहायता करते हैं। उन्होंने 1960 में बैंगलोर के एक अंग्रेजी माध्यम स्कूल से लौटने के बाद सिल्वर स्क्रीन पर अपनी एंट्री की। . उनका करियर शुरू में 'दीदी' में एक नायक के रूप में शुरू हुआ, फिर उन्होंने खलनायक की भूमिकाओं के लिए साइन अप किया, और फिर एक नायक के रूप में वापसी की। धर्मात्मा, कुर्बानी, जांबाज़ और दयावान की रिलीज़ के बाद वह और भी लोकप्रिय हो गए। उन्हें आदमी और इंसान में उनकी भूमिका के लिए एक पुरस्कार मिला। 27 अप्रैल, 2009 को उनके बंगलौर फार्म हाउस में कैंसर से उनकी मृत्यु हो गई। उन्हें स्पोर्ट्स-कार रेस पसंद है और उन्होंने इस खेल को अपराध और फिर जानशीन में शामिल किया है। वह अपने चरित्र का नाम राजेश या राकेश रखना पसंद करते हैं। वह भगवान श्री साईं बाबा के उपासक हैं और हमेशा अपनी उंगली पर सोने की अंगूठी पहनते हैं और उनके पास एक तस्वीर है। साईं बाबा भारत में मुसलमानों, ईसाइयों, सिखों और हिंदुओं द्वारा पूजनीय और पूजे जाते हैं। उन्होंने 1965 में सुंदरी से शादी की और वे लैला और फरदीन के माता-पिता बन गए। एक इस्लामी मौलवी द्वारा आपत्ति जताए जाने के बावजूद, फ़िरोज़ और संजय ने अपने बच्चों की शादी गैर-इस्लामी परिवारों से कर दी। लैला की शादी राजपाल से हुई थी, जबकि फरदीन ने मयूर और पूर्व बॉलीवुड आकर्षक मुमताज की बेटी नताशा माधवानी से शादी की थी। सुंदरी और फ़िरोज़ का 1985 से तलाक हो गया है। फ़िरोज़ विवादों से दूर रहे हैं, हालाँकि उन्होंने खुद को रूढ़िवादी पाकिस्तानी सरकार द्वारा प्रतिबंधित कर लिया था। अभिनय के अलावा इस प्रतिभाशाली कलाकार ने फिल्मों का संपादन, निर्माण, लेखन और निर्देशन भी किया है।
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