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बुधवार, 10 मई 2023

साहू मोदक


 *जन्म 🎂25 अप्रैल 1918 
 *मृत्यु11 मई 1993*
*गुजरे जमाने के अभिनेता शाहू मोदक की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि*

शाहू मोदक (25 अप्रैल 1918 - 11 मई 1993) एक भारतीय अभिनेता थे जिन्होंने कई हिंदी के साथ-साथ मराठी फिल्मों में भी अभिनय किया था।  शाहू मोदक ज्यादातर उन पौराणिक पात्रों के लिए प्रसिद्ध थे जो उन्होंने निभाए थे।  उन्होंने ज्यादातर कृष्ण और जनेश्वर की भूमिकाएँ निभाईं।

शाहू मोदक का जन्म 25 अप्रैल 1918 को अहमदनगर के एक मराठी ईसाई परिवार में हुआ था। 

11 मई 1993 को शाहू मोदक का निधन हो गया।

मंगलवार, 25 अप्रैल 2023

कर्ण राजदान

अभिनेता लेखक फ़िल्म निर्देशक करण राजदान के जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनाएं
करण राज़दान या करण राजदान (जन्म 1961) एक भारतीय अभिनेता, लेखक और निर्देशक हैं, जो मुख्यत: बॉलीवुड में काम करते हैं। उनका विवाह दूरदर्शन की लोकप्रिय शृंखला रजनी की अभिनेत्री, प्रिया तेंदुलकर से हुआ था, लेकिन 1995 में दोनों अलग हो गए। बाद में उन्होंने 2002 में आरती भट्टी से शादी की जो अब आरती राजदान के नाम से जानी जाती हैं
उन्होंने अपने लेखन करियर की शुरुआत ' रजनी ' नामक एक अविस्मरणीय टेलीविजन शो के साथ की और फिर एक हिट टेलीविजन शो तहकीकात के साथ निर्मित और निर्देशक के रूप में अपनी शुरुआत की । वह दिलवाले , दिलजले , दीवाने और कयामत (पटकथा सलाहकार) जैसी हिट फिल्में लिखने के लिए प्रसिद्ध हैं । उन्होंने प्रेमिका (2004), हवास (2004), सौतेन: द अदर वुमन और मित्तल बनाम मित्तल जैसी विवादास्पद विषयों वाली कुछ फिल्मों का लेखन और निर्देशन किया है । उमर (2006) इंग्लैंड में सेवानिवृत्त भारतीय बूढ़े लोगों के बारे में एक भावनात्मक फिल्म है। उन्होंने छुट्टी पर मिस्टर भट्टी को लिखा और निर्देशित किया है, एक कॉमेडी। वर्तमान में उन्होंने हिंदुत्व नाम की एक फिल्म पूरी की है ।
उन्होंने 80 के दशक के मध्य की हिट टीवी श्रृंखला, रजनी में भी लिखा और अभिनय किया और उन्होंने विजय आनंद और सौरभ शुक्ला अभिनीत जासूसी टीवी धारावाहिक तहकीकात का लेखन और निर्देशन किया।
उन्होंने रजनी सीरीज की अभिनेत्री, प्रिया तेंदुलकर से शादी की थी , लेकिन 1995 में दोनों अलग हो गए।  बाद में उन्होंने 2002 में आरती भट्टी से शादी की, जिन्हें अब आरती राजदान के नाम से जाना जाता है।

सोमवार, 24 अप्रैल 2023

महान हिन्दुस्तानी शास्त्रीय गायक बड़े गुलाम अली खान साहब की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रधांजलि

महान हिन्दुस्तानी शास्त्रीय गायक बड़े गुलाम अली खान साहब की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रधांजलि

उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ की गणना भारत के महानतम गायकों व संगीतज्ञों में की जाती है। वे विलक्षण मधुर स्वर के स्वामी थे। इनके गायन को सुनकर श्रोता अपनी सुध-बुध खोकर कुछ समय के लिए स्वयं को खो देते थे। भारत के कोने-कोने से संगीत के पारखी लोग ख़ाँ साहब को गायन के लिए न्यौता भेजते थे। क्या राजघराने क्या मामूली स्कूल के विद्यार्थी, ख़ाँ साहब की मखमली आवाज़ सभी को मंत्रमुग्ध कर देती थी दिल को छू जाने वाली आवाज़ के मालिक उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ ने नवेली शैली के ज़रिए ठुमरी को नई आब और ताब दी।
जानकारों के मुताबिक उस्ताद ने अपने प्रयोगधर्मी संगीत की बदौलत ठुमरी को जानी-पहचानी शैली की सीमाओं से बाहर निकाला। 

बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ साहब का जन्म 2 अप्रॅल ,1902 को पाकिस्तानी पंजाब के मशहूर शहर लाहौर के पास स्थित गाँव केसुर में हुआ था। बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ ने मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक शक्ति संगीत से ही प्राप्त की थी और यही कारण था कि उनके बोलचाल और हावभाव से यह ज़ाहिर हो जाता था कि यह शख़्सियत संगीत के प्रचार-प्रसार के लिए धरती पर अवतरित हुई है। 
इनका परिवार संगीतज्ञों का परिवार था। इनके पिताजी का नाम अली बख्श ख़ाँ है। दिलचस्प है कि संगीत की दुनिया में उनकी शुरुआत सारंगी वादक के रूप
में हुई। उन्होंने अपने पिता अली बख्श ख़ाँ और चाचा काले ख़ाँ से संगीत की बारीकियाँ सीखीं। इनके पिता महाराजा कश्मीर के दरबारी गायक थे और वह घराना "कश्मीरी घराना" कहलाता था। जब ये लोग पटियाला जाकर रहने लगे तो यह घराना " पटियाला घराना " के नाम से जाना जाने लगा। दिखने में बेहद कड़क मिज़ाज और मज़बूत डील-डौल वाले बड़े ग़ुलाम अली ने सबरंग नाम से कई बंदिशें रचीं। उनकी सरगम का अंदाज़ बिल्कुल निराला था। साल 1947 में भारत के विभाजन के बाद बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ पाकिस्तान चले गए थे लेकिन संगीत के इस उपासक को पाकिस्तान का माहौल क़तई पसंद नहीं आया। नतीजतन वह जल्द ही भारत लौट आए।  अपने सधे हुए कंठ के कारण बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ ने बहुत प्रसिद्धि पाई। 1919 में लाहौर के संगीत सम्मेलन में इन्होंने अपनी कला का पहली बार सार्वजनिक प्रदर्शन किया। फिर कोलकाता और इलाहाबाद के संगीत सम्मेलनों में इन्हें देशव्यापी ख्याति प्रदान की।भारतीय संगीत के फलक पर 1930 के दशक में सितारे की तरह चमके इस गायक ने साल 1938 में तत्कालीन कलकत्ता में हुए एक कार्यक्रम में दुनिया के सामने पहली बार अपनी आवाज़ का जादू बिखेरा था। उसके बाद वह संगीत को आगे बढ़ाने और उसे समृद्ध करने की मुहिम में रम गए। ख़ाँ साहब किंवदंती गायक थे। गायन से ऐसा मोहजाल बुनते कि आपको उसमें उलझना ही है। मुग़ले आजम फ़िल्म में गाने के लिए उन्होंने एक गाने के 25 हज़ार रुपए माँग लिए थे क्योंकि वे फ़िल्म में गाना नहीं चाहते थे। निर्देशक के. आसिफ ने 25 हज़ार रुपए देना स्वीकार कर लिया जबकि उस जमाने में लता मंगेशकर और मुहम्मद रफ़ी को एक गाने के पाँच सौ रुपए से भी कम मिलते थे। बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ के मुंह से एक बार ‘राधेकृष्ण बोल’भजन सुनकर महात्मा गांधी बहुत प्रभावित हुए थे।

ख़ाँ साहब को भारत सरकार के पद्म भूषण और संगीत नाटक अकादमी सम्मान से भी नवाज़ा गया है।

हैदराबाद के नवाब जहीरयारजंग के बशीरबाग़ महल में चाँदनी और रेशम की शोभा वाली उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ की आवाज़ 25 अप्रैल , 1968 को सो गई और बीते युग के पटियाला घराने का एक सुरीला एपिसोड समाप्त हो गया।

सोफा बेड

हवा भर कर बनाए जाने वाले सोफे और गद्दे (Inflatable Sofas & Air Mattresses) छोटे घरों, मेहमानों के आने पर अतिरिक्त जगह बनाने,...