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रविवार, 23 अप्रैल 2023

अभिनेत्री शम्मी

फ़िल्म अभिनेत्री शम्मी के जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धांजलि
नरगिस रबादी (24 अप्रैल 1929 - 6 मार्च 2018), जिन्हें उनके मंच नाम शम्मी से बेहतर जाना जाता है , एक भारतीय अभिनेत्री थीं, जो दो सौ से अधिक हिंदी फिल्मों में दिखाई दीं।
शम्मी भारतीय फ़िल्म अभिनेत्री हैं, जो दो सौ से अधिक हिंदी फ़िल्मों में अभिनय कर चुकी हैं। क़रीब साढ़े छह दशक पहले उन्होंने अभिनय की दुनिया में कदम रखा था। शुरुआती दौर में कई फ़िल्मों में नायिका और सहनायिका के तौर पर नज़र आने के बाद उन्होंने चरित्र भूमिकाओं की ओर रुख किया। इस लम्बे अंतराल में उनकी अभिनय यात्रा बिना किसी विराम के लगातार जारी रही। ये उनके जादुई व्यक्तित्व और मधुर व्यवहार का ही असर है कि आज समूचा सिने जगत उन्हें प्यार और सम्मान से 'शम्मी आंटी' कहकर बुलाता है।

शम्मी का जन्म 24 अप्रैल, 1929 को गुजरात के नारगोल संजान में अपने नाना के घर हुआ था। पारसी माता-पिता की संतान शम्मी आंटी कुछ ही महिनों की थीं जब उनके पिता परिवार को साथ लेकर मुम्बई चले आए थे। बकौल शम्मी आंटी, फ़िल्मी दुनिया से उनके परिवार का दूर-दूर तक का सम्बन्ध नहीं था। घर में पारसी-पुरोहित पिता और गृहिणी मां के अलावा एक बड़ी बहन मणि रबाड़ी थीं जिन्होंने आगे चलकर न सिर्फ़ फ़ैशन डिज़ाईनिंग की दुनिया में नाम कमाया, बल्कि अपनी कला के दम पर उस ज़माने में राष्ट्रपति-पुरस्कार भी हासिल किया था।

फ़िल्मों में शम्मी आंटी का आना सिर्फ़ एक संयोग था, हालांकि रिश्तेदारी-बिरादरी में उनके इस क़दम का उस वक़्त विरोध भी बहुत हुआ था। जब वो सिर्फ़ तीन साल की थीं तभी उनके पिता का देहांत हो गया। आय का कोई साधन था नहीं, इसलिए दोनों बेटियों के पालन-पोषण के लिए उनकी मां को बहुत तक़लीफ़ें सहनी पड़ीं। जब वो दोनों थोड़ी बड़ी हुईं तो उन्हें अपनी पढ़ाई का ख़र्च ख़ुद उठाने के लिए टाटा की खिलौना फैक्ट्री में काम करना पड़ा। बड़ी बहन पीपुल्स थिएटर की सक्रिय सदस्या थीं इसलिए उनके साथ नाटकों की रिहर्सल में शम्मी आंटी का भी अक्सर आना-जाना होता था, जहां उनकी मुलाक़ात महबूब ख़ान के सहायक चिमनकांत गांधी से हुई थी।

आशा पारेख के साथ मिलकर शम्मी आंटी ने ‘बाजे पायल’, ‘कोरा क़ागज़’, ‘कंगन’ और ‘कुछ पल साथ तुम्हारा’ जैसे धारावाहिकों का निर्माण भी किया और आज भी दोनों अभिनेत्रियां बहुत अच्छी दोस्त हैं। अपने अब तक के कॅरियर में क़रीब दो सौ फ़िल्मों में छोटी-बड़ी भूमिकाएं निभाने के साथ ही उन्हें ‘देख भाई देख’, ‘श्रीमान श्रीमती’, ‘कभी ये कभी वो’ जैसे कई टी. वी. धारावाहिकों में भी अभिनय किया। ‘सहारा वन’ चैनल के धारावाहिक ‘घर एक सपना’ में वो आलोक नाथ की मां की भूमिका में नज़र आयी थीं।

1950 के दशक में शम्मी आंटी ने ‘बाग़ी’, ‘आग का दरिया’, ‘मुन्ना’, ‘रुखसाना’, ‘पहली झलक’, ‘लगन’, ‘बंदिश’, 'मुसाफ़िरखाना', ‘आज़ाद’ और 'दिल अपना और प्रीत परायी' जैसी कई फ़िल्मों में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभायीं। अब तक की उनकी अन्तिम फ़िल्म ‘शिरीन फ़रहाद की तो निकल पड़ी’ है जो साल 2012 में प्रदर्शित हुई थी।

मैक_मोहन


*🎂जन्म 24 अप्रैल 1938 💐*
*🕯️मृत्यु 10 मई🕯️*
अभिनेता मैक मोहन के जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धांजलि

फिल्म 'शोले' में 'सांभा' का किरदार निभाने वाले मैक मोहन का जन्म 24 अप्रैल 1938 को कराची में हुआ था 

मैक मोहन का असली नाम था मोहन माखीजानी फिल्म 'शोले' में सांभा का किरदार निभाकर मैक मोहन ने प्रसिद्धि हासिल की थी। गौरतलब है कि वह जानी मानी एक्ट्रेस रवीना टंडन के मामा थे। मैक मोहन का असली नाम मोहन माखीजानी है। उनके पिता भारत में ब्रिटिश आर्मी में कर्नल थे। मैक मोहन को बचपन से ही क्रिकेट का शौक था और वह क्रिकेटर बनना चाहते थे। साल 1940 में उनके पिता का ट्रांसफर कराची से लखनऊ हो गया, फिर मैक मोहन की शुरुआती पढ़ाई लखनऊ में ही हुई।

बनना चाहते थे प्रोफेशनल क्रिकेटर एक इंटरव्यू में मैकमोहन ने बताया था कि उन्होंने उत्तर प्रदेश की क्रिकेट टीम के लिए भी खेला था। फिर एक वक्त ऐसा भी आया जब उन्होंने तय कर लिया कि अब उन्हें क्रिकेटर बनना ही है। उन दिनों क्रिकेट की अच्छी ट्रेनिंग सिर्फ मुंबई में दी जाती थी जिसके बाद वह साल 1952 में मुंबई आ गए लेकिन मुंबई आने के बाद उन्होंने जब रंगमंच को देखा तो इस तरफ उनका ध्यान गया।

शोले के सांभा के रूप में हुए थे मशहूर मैक मोहन ने साल 1964 में फिल्म 'हकीकत' से अपने कॅरियर की शुरुआत की थी। अपने 46 साल के करियर में 175 फिल्मों में उन्होंने काम किया। उन्हें अपने दौर के सभी बड़े फिल्म डायरेक्टर्स ने काम दिया। 'डॉन', 'कर्ज', 'सत्ते पे सत्ता', 'काला पत्थर', 'रफू चक्कर', 'शान' और 'शोले' जैसी फिल्मों में उनका काम बेहद सराहा गया। उन्होंने अमिताभ बच्चन के साथ काफी फिल्मों में काम किया। नवंबर 2010 में जब मैक मोहन 'अतिथि तुम कब जाओगे' की शूटिंग कर रहे थे तो उनकी तबियत खराब हुई। तभी उन्हें मुंबई के कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी अस्पताल में दाखिल किया गया। जहां डॉक्टरों ने बताया कि उनके फेफड़ों में ट्यूमर है। इसके बाद उनका लंबा इलाज चला लेकिन उनकी तबियत लगातार बिगड़ती चली गई। एक साल बाद ही 10 मई 2010 को मैक मोहन हमेशा के लिए दुनिया को अलविदा कह गए।

महान पण्डवानी गायिका तीजन बाई के जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाये

महान पण्डवानी गायिका तीजन बाई के जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाये

तीजनबाई  छत्तीसगढ़ राज्य की पहली महिला कलाकार हैं जो पण्डवानी की कापालिक शैली की गायिका है। तीजनबाई ने अपनी कला का प्रदर्शन अपने देश में ही बल्कि विदेश में भी किया है, जिसके के लिए उन्हें भारत सरकार द्वारा पद्म भूषण और पद्मश्री की
उपाधि से सम्मानित किया गया है।

तीजनबाई का जन्म 24 अप्रैल , 1956 में छत्तीसगढ़ राज्य के भिलाई ज़िले के गिनियार गाँव में हुआ था। बृजलाल पारधी तीजनबाई के नाना थे, जो खुद भी एक अच्छे पण्डवानी गायक थे और तीजनबाई का पालन पोषण भी बृजलाल पारधी ने ही किया था। तीजनबाई के
पिता का नाम हुनुकलाल परधा और माता का नाम सुखवती था। तीजनबाई का बचपन बहुत संघर्षों से भरा हुआ था।

तीजनबाई का विवाह 12 साल की उम्र में हो गया था। उसके बाद तीजनबाई ने तीन विवाह और किए, अब वह अपने चौथे पति तुक्का राम के साथ जीवन व्यतीत कर रही हैं। तीजनबाई का अपना पहला विवाह पारधी जनजाति में हुआ था जहाँ पर महिलाओं को पण्डवानी गाने की अनुमति दी जाती थी और तीजनबाई जिस जनजाति की थी उसमें में सिर्फ पुरुष पण्डवानी गाते थे और महिलाएँ सुनती थी।

तीजनबाई ने अपना जीवन का पहला कार्यक्रम सिर्फ 13 साल की उम्र में दुर्ग ज़िले के चंदखुरी गाँव में किया था। बचपन में तीजनबाई अपने नाना ब्रजलाल को महाभारत की कहानियाँ गाते हुए सुनती और देखतीं थी और धीरे धीरे उन्हें ये कहानियाँ याद होने लगीं। उनकी अद्भुत लगन और प्रतिभा को देखकर उमेद सिंह देशमुख ने तीजनबाई को अनौपचारिक प्रशिक्षण भी दिया, बाद में उनका परिचय हबीब तनवीर से हुआ। प्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर ने उन्हें सुना और उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के सामने प्रदर्शन करने के लिए निमंत्रित किया।उस दिन के बाद से उन्होंने अनेक अतिविशिष्ट
लोगों के सामने देश-विदेश में अपनी कला का प्रदर्शन किया और उसके बाद उनकी प्रसिद्धि आसमान छूने लगी। अनेक पुरस्कारों द्वारा पुरस्कृत तीजनबाई मंच पर सम्मोहित करने वाले अद्भुत नृत्य नाट्य का प्रदर्शन करती हैं। नाट्य का प्रारम्भ होते ही पात्र के अनुसार उनका सज्जित तानपूरा भिन्न भिन्न रूपों का अवतार ले लेता है। उनका तानपूरा कभी महाभारत के पात्र दुःशासन की
बाँह, कभी अर्जुन का रथ, कभी भीम की गदा और कभी द्रौपदी के बालों का रूप धरकर दर्शकों को इतिहास के उस काल में पहुँचा देता है और दर्शक तीजनबाई के साथ पात्र के मनोभावों और ऐतिहासिक पात्रों और घटनाओं की संवेदना को जीवंतता के साथ अनुभव करते हैं। तीजनबाई की विशेष प्रभावशाली लोकनाट्य के अनुरूप आवाज़, अभिनय, नृत्य और संवाद उनकी कला के विशेष अंग हैं।

सन् 1980 में उन्होंने सांस्कृतिक राजदूत के रूप में इंग्लैंड , फ्रांस, स्विट्ज़रलैंड, जर्मनी , टर्की,माल्टा, साइप्रस, रोमानिया और मारिशस की यात्रा की और वहाँ पर प्रस्तुतियाँ दीं।

पुरस्कार

1988 पद्मश्री
1995 संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार
2003 बिलासपुर विश्वविद्यालय के द्वारा
डी. लिट. की मानद उपाधि
2003 पद्म भूषण

मुराद रजा मुराद के पिता


अभिनेता मुराद की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि

हामिद अली मुराद (1910- 24 अप्रैल, 1997  जिसे बस मुराद के नाम से जाना जाता है, वह एक भारतीय चरित्र अभिनेता थे जो 1940 के दशक की शुरुआत में 1980  के दशक के अंत तक एक पिता की चरित्र भूमिकाएं पुलिस अधिकारी, न्यायाधीश और एक सम्राट की चरित्र भूमिकायें निभाते हुए 100 से अधिक हिंदी फिल्मों में काम किया  उनके बेटे रजा मुराद भी हिंदी फिल्म उद्योग में एक अभिनेता हैं, जिन्हें ज्यादातर खलनायक भूमिकाएं निभाने के लिए जाना जाता है।  उनकी भतीजी अभिनेत्री ज़ीनGत अमान हैं और उनकी पोतियां अभिनेत्री सोनम और सनोबर कबीर हैं।

उनका कैरियर 1940 के दशक की शुरुआत में शुरू हुआ जब उन्होंने 1943 की फिल्म नजमा में अपने अभिनय की शुरुआत की, जिसे महबूब खान ने निर्देशित किया था।  फिल्म में उन्होने अशोक कुमार के पिता की भूमिका निभाई थी, जो उनसे केवल एक साल बड़े थे।  वह निर्देशक महबूब खान की फ़िल्मों जैसे अनमोल घड़ी (1946), अंदाज़ (1949), आन (1952) और अमर (1954) में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई उनकी अन्य उल्लेखनीय फ़िल्मी भूमिकाओं में दो बीघा ज़मीन (1953) में एक क्रूर ज़मींदार फ़िल्म देवदास (1955) में  देवदास के पिता के रूप में पिता के रूप में फ़िल्म टार्ज़न गोज़ टू इंडिया में महाराज की भूमिका  (1962) भी शामिल है।  1960 के दशक से 1980 के दशक के अंत तक वह ज्यादातर न्यायाधीश या पुलिस आयुक्त के रूप में दिखाई दिए।  उनका जन्म रामपुर, उत्तर प्रदेश में हुआ था और 24 अप्रैल 1997 में मुंबई में उनका निधन हो गया। उन्होंने मिंटो सर्कल (एसटीएस हाई स्कूल), अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से पढ़ाई की।

श्याम कपूर

प्रसिद्ध असिस्टेंट डायरेक्टर, प्रोडक्शन मैनेजर एवं अभिनेता श्याम कपूर के जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धांजलि

फ़िल्म ‘सी.आई.डी’ के मशहूर गीत ‘लेके पहला पहला प्यार’ में देवआनंद और शकीला के साथ नज़र आ रहे बाक़ी दो कलाकार शीला वाज़ और श्याम कपूर है  शीला वाज़ तो अपने दौर की एक जानी-पहचानी डांसर थीं लेकिन हारमोनियमवादक कलाकार का चेहरा बिल्कुल ही अजनबी था वो हारमोनियनवादक थे श्याम कपूर जो गुरूदत्त के असिस्टेण्ट थे।

24 अप्रैल 1928 को लाहौर की चूनियां तहसील में जन्मे श्याम कपूर बहुत छोटे थे जब उनकी मां गुज़र गयी थीं। पिता क्वेटा में पोस्ट मास्टर थे। श्याम कपूर और उनसे क़रीब ढाई साल बड़े उनके भाई बनारसीदास ने दादा-दादी के पास चूनियां में रहकर 8वीं तक की पढ़ाई की और फिर आगे की पढ़ाई के लिए लाहौर जाकर हॉस्टल में रहने लगे। देश का बंटवारा हुआ तो उस वक़्त बनारसीदास बी.ए. (फ़ाईनल) और श्याम कपूर 12वीं में पढ़ रहे थे। पढ़ाई बीच ही में छोड़कर वो दादा-दादी के साथ लुधियाना चले आए। उधर क्वेटा से उनके पिता का ट्रांसफर देहरादून हो गया।

उन्हीं दिनों अख़बारों में विज्ञापन छपा, अगर कोई छात्र कुरूक्षेत्र में बनाए गए शरणार्थी कैम्प में तीन महिने सोशल सर्विस करेगा तो उसे बिना इम्तहान के ही पास मान लिया जाएगा। विज्ञापन देखकर श्याम कपूर और उनके बड़े भाई बनारसीदास कपूर कुरूक्षेत्र चले गए। तीन महिने की सोशल सर्विस के बदले बनारसीदास को बी.ए. की डिग्री और श्याम कपूर को 12वीं पास का सर्टिफ़िकेट मिल गया। साथ ही सरकार की तरफ़ से उन्हें नौकरी का प्रस्ताव भी दिया गया जिसे दोनों भाईयों ने स्वीकार कर लिया। कुछ महीने कुरूक्षेत्र और अलवर में बिताने के बाद श्याम कपूर नौकरी छोड़कर अपने मामा के पास अम्बाला चले गए| बनारसीदास भी तब तक नौकरी छोड़कर पिता के पास देहरादून चले गए थे। उधर दादा-दादी लुधियाना छोड़कर फ़िरोज़पुर में जा बसे थे।

मामा महज़ ढाई-तीन साल बड़े थे। उनका चीनी का कारोबार था। उनके साथ पार्टनरशिप में काम शुरू किया और मोगा मंडी वाला ऑफ़िस सम्भालने लगे। फिर किसी बात पर अनबन हुई तो श्याम कपूर ने मामा से अलग होने का फ़ैसला कर लिया।

पड़ोस के ही एक हलवाई से श्याम कपूर की अच्छी पहचान हो गयी थी। उसका लड़का मुम्बई में नेवी का अफ़सर था जो कुछ दिनों की छुट्टी पर घर आया हुआ था। उसे अपने साथ एक सहायक का भी पास मिलता था। छुट्टियां ख़त्म हुईं तो उसने श्याम कपूर को अपने साथ मुम्बई चलने का न्यौता दिया। श्याम कपूर ने मामा से पैसे लिए और उस नेवी के अफ़सर के सहायक बनकर वो उसके साथ मुम्बई चले आए। मुम्बई में श्याम कपूर के ठहरने का इंतज़ाम भी उसी अफ़सर ने कराया। उस वक़्त श्याम कपूर की उम्र क़रीब 21 साल थी।

श्याम कपूर सिर्फ़ घूमने-फिरने के मक़सद से मुम्बई आए थे। उन्होंने एहतियातन सौ रूपए उस अफ़सर के पास वापसी के किराए के लिए रख दिए थे। सोचा था, जब जेब के पैसे ख़त्म होने लगेंगे तो उससे सौ रूपए लेकर वापस पंजाब लौट जाऊंगा। उन दिनों कोलाबा से किंग्स सर्किल तक ट्राम चलती थी। श्याम कपूर रोज़ाना ट्राम में बैठते थे, किंग्स सर्किल जाते थे और उसी ट्राम से वापस आ जाते थे। एक रोज़ किंग्स सर्किल में किसी फ़िल्म की शूटिंग चल रही थी। सीन के मुताबिक़ ट्रक में बैठे कुछ लड़कों को कार में बैठी लड़कियों का पीछा करते हुए उन पर फ़ब्तियां कसनी थीं। उनमें से एक लड़के का डायलॉग था, ‘ईस्ट मीट्स वेस्ट’, जिसे वो ठीक से बोल नहीं पा रहा था।

श्याम कपूर के मुताबिक़ डायरेक्टर अपने असिस्टेंट को और असिस्टेंट उस जूनियर आर्टिस्ट सप्लायर को गालियां दे रहा था जो उस लड़के को लेकर आया था। ऐसे में श्याम कपूर ने सप्लायर से पूछा, मैं बोलूं? सप्लायर ने तो उनकी बात पर ध्यान नहीं दिया लेकिन असिस्टेंट ने श्याम कपूर को बुलाकर पूछा, बोल लोगे? उनके हां कहने पर उस लड़के की जगह श्याम कपूर को कैमरे के सामने खड़ा कर दिया गया। और शॉट पहले ही टेक में ओके हो गया। श्याम कपूर के मुताबिक़ उन दिनों आम जूनियर आर्टिस्ट का रेट 6 रूपए 6 आने रोज़ होता था जबकि अंग्रेज़ी डायलॉग बोलने वाले को 25 रूपए मिलते थे। सप्लायर ने उन्हें पैसे लेने के लिए अगले दिन दादर नाका पर बुलाया जहां उनकी मुलाक़ात कई और जूनियर आर्टिस्टों से हुई।

जेब के सारे पैसे ख़त्म हो चुके थे। उधर जहां ठहरने का इंतज़ाम था, वहां से भी उन्हें ख़ाली करने को कह दिया गया था। श्याम कपूर पंजाब वापस लौटने का फ़ैसला करके अपने सौ रूपए लेने पहुंचे तो पता चला उनके जानने वाले उस नेवी अफ़सर को जहाज़ पर विशाखापट्टनम भेज दिया गया है। अब श्याम कपूर के पास न तो वापस लौटने का किराया था और न ही रहने की जगह। ऐसे में जूनियर आर्टिस्टों ने उनकी बहुत मदद की। श्याम कपूर को उन्होंने अपने ग्रुप में शामिल कर लिया और श्याम कपूर को भी इस शहर में पैसा कमाने का एक ज़रिया मिल गया। अगले कुछ सालों तक वो फ़िल्मों में लगातार जूनियर आर्टिस्ट का काम करते रहे। और काम के दौरान ही एक रोज़ उनकी मुलाक़ात गुरूदत्त से हुई।

गुरूदत्त की फ़िल्म ‘आरपार’ के क्लब सांग ‘बाबूजी धीरे चलना, प्यार में ज़रा सम्भलना’ की शूटिंग चल रही थी। इसके एक शॉट में श्याम कपूर को अपनी टेबल से उठकर शकीला के क़रीब आना था और गुरूदत्त पर नज़र पड़ते ही ग़ुस्से से वापस अपनी टेबल की तरफ़ चले जाना था। गुरूदत्त को श्याम कपूर का काम बेहद पसंद आया। उन्होंने श्याम कपूर को मेकअप रूम में बुलाकर पूछा, डायलॉग बोल सकते हो? श्याम कपूर के ‘हां’ कहने पर उन्होंने श्याम कपूर से मिलते रहने को कहा।

गुरूदत्त का ऑफ़िस उन दिनों महालक्ष्मी के फ़ेमस स्टूडियो में था। अब जैसे ही समय मिलता, श्याम कपूर गुरूदत्त के ऑफ़िस पहुंच जाते। श्याम कपूर के मुताबिक़ गुरूदत्त को अक्सर अपनी ही शूट की हुई चीज़ें पसन्द नहीं आती थीं और वो उन्हें दोबारा शूट करते थे। ‘बाबूजी धीरे चलना, प्यार में ज़रा सम्भलना’ गीत को भी रीशूट किया गया था। उन दिनों इस गीत की एडिटिंग चल रही थी। पहले वाले वर्शन में श्याम कपूर नहीं थे। गुरूदत्त ने श्याम कपूर को दोनों वर्शन दिखाकर पूछा कौन सा बेहतर है? श्याम कपूर ने रीशूट किए गए वर्शन को बेहतर बताते हुए साथ में ये भी कह दिया कि आप ये मत सोचना कि पहले वाले वर्शन में मैं नहीं हूं इसलिए उसे रिजेक्ट कर रहा हूं। बुरा वो भी नहीं है, लेकिन रीशूट किया हुआ वर्शन बेहतर है। गुरूदत्त श्याम कपूर के इस जवाब से बेहद ख़ुश हुए।

गुरूदत्त के चीफ़ असिस्टेंट राज खोसला को उन्हीं दिनों बतौर निर्देशक पहली फ़िल्म (मिलाप / 1954) मिली। राज खोसला की खाली जगह पर निरंजन शर्मा को असिस्टेंट से पदोन्नत करके चीफ़ असिस्टेंट बना दिया गया। उधर श्याम कपूर की इच्छा को देखते हुए गुरूदत्त ने उन्हें असिस्टेंट की ख़ाली जगह पर रख लिया। बकौल श्याम कपूर, उन्होंने फ़िल्म ‘मिस्टर एंड मिसेज़ 55’ के गीत ‘उधर तुम हसीं हो इधर दिल जवां है’ की ‘महबूब स्टूडियो’ में चल रही शूटिंग में हिस्सा लेकर 17 सितम्बर 1954 को बतौर असिस्टेंट डायरेक्टर करियर शुरू किया था। उस दिन से गुरूदत्त के आख़िरी समय तक वो उनके साथ काम करते रहे।
ओ.पी.नैयर को याद करते हुए श्याम कपूर कहते हैं, “वो बेहद गुणी संगीतकार थे। लेकिन कब किसको क्या कह दें, ये कोई नहीं बता सकता था। फ़िल्म ‘सी.आई.डी.’ के लिए साऊथ से नयी नयी आयीं सीधी-सादी वहीदा रहमान को देखकर ओ.पी.नैयर ने गुरूदत्त से कहा था, ‘नयी आया रखी है क्या’? इस पर गुरूदत्त ने सिर्फ़ इतना ही कह पाए थे, ‘वक़्त बताएगा, इंतज़ार करो’।“

श्याम कपूर बताते हैं, गुरूदत्त फ़िल्म्स की ‘सी.आई.डी.’ और ‘प्यासा’ एक साथ शुरू हुई थीं। गुरूदत्त ‘प्यासा’ के हीरो भी थे और निर्देशक भी। गुरूदत्त का असिस्टेंट होने के नाते श्याम कपूर फ़िल्म ‘प्यासा’ की यूनिट में थे। उधर ‘सी.आई.डी.’ का निर्देशन राज खोसला कर रहे थे। उन के असिस्टेंट प्रमोद चक्रवर्ती और भप्पी सोनी से श्याम कपूर की दोस्ती थी इसलिए अक्सर श्याम कपूर ‘सी.आई.डी.’ के सेट पर भी आतेजाते रहते थे।

 रोज़ गुरूदत्त ने श्याम कपूर से कहा, ‘सी.आई.डी.’ के गाने में तुम काम करोगे। श्याम कपूर मानसिक तौर पर अभिनय के लिए तैयार ही नहीं थे। लेकिन गुरूदत्त के दबाव के आगे झुककर उन्हें फ़िल्म ‘सी.आई.डी.’ के उस गीत ‘लेके पहला पहला प्यार भरके आंखों में ख़ुमार’ में काम करना ही पड़ा। ये गीत वर्ली सी-फ़ेस पर तीन दिन में शूट हुआ था।

फ़िल्म ‘सी.आई.डी.’ के ही गीतादत्त के गाए गीत ‘जाता कहां है दीवाने सब कुछ यहां है सनम’ के बारे में श्याम कपूर कहते हैं, “ये धारणा बिल्कुल ग़लत है कि गीत की एक पंक्ति में ‘फ़िफ़्टी’ शब्द के इस्तेमाल पर सेंसर की आपत्ति की वजह से इस गीत को फ़िल्म से निकाला गया था। इसे फ़िल्म से निकाले जाने की वजह थी फ़िल्म की लम्बाई। दरअसल उस ज़माने में फ़िल्म के 13 हज़ार फ़ीट से ज़्यादा लम्बा होने पर फ़िल्म पर टैक्स बहुत ज़्यादा बढ़ जाते थे और फ़िल्म ‘सी.आई.डी.’ भी तय सीमा से ज़्यादा लम्बी हो गयी थी”।

‘प्यासा’ 12-13 रील बन चुकी थी। ‘प्यासा’ और ‘सी.आई.डी.’ का ट्रायल हुआ। गुरूदत्त को ‘प्यासा’ पसन्द नहीं आयी। उन्होंने कम्पनी के डायरेक्टर और प्रोडक्शन कण्ट्रोलर एस.गुरूमूर्ति से ‘प्यासा’ को रोककर पहले ‘सी.आई.डी.’ को पूरा करने को कहा। ‘सी.आई.डी.’ रिलीज़ हुई और ज़बर्दस्त हिट हुई। उसके बाद गुरूदत्त ने एक बार फिर से ‘प्यासा’ की स्क्रिप्ट पर काम शुरू किया। स्क्रिप्ट में जॉनीवॉक़र का रोल जोड़ा गया। इसके अलावा हीरो को धोखा देने वाले उसके दोस्त का भी रोल जोड़ा गया। दोस्त का ये निगेटिव रोल श्याम कपूर को दिया गया। सिर्फ़ 2-3 गानों को छोड़कर पूरी फ़िल्म दोबारा शूट की गयी।
उधर राज खोसला और ओ.पी.नैयर को ‘प्यासा’ का रीशूट किया जाना पसंद नहीं आया। एक पार्टी में उन्होंने खुल्लमखुल्ला कह भी दिया कि गुरूदत्त को (‘सी.आई.डी.’ से) पैसा कमाकर हमने दिया और वो उसे ‘प्यासा’ पर बरबाद कर रहा है। गुरूदत्त तक ये बात पहुंची तो उन्हें बहुत बुरा लगा, हालांकि आगे चलकर ‘प्यासा’ भी ज़बर्दस्त हिट हुई। श्याम कपूर के मुताबिक़ ओ.पी.नैयर फ़िल्म ‘प्यासा’ में एस.डी.बर्मन को लिए जाने से भी बेहद नाराज़ थे। उन्होंने बाहर कई लोगों से कहा भी था, गुरूदत्त एक बार मुझसे बात तो करते, क्या मैं सिर्फ़ मारधाड़ की ही फ़िल्मों के लायक हूं?

फ़िल्म ‘काग़ज़ के फूल’ में निरंजन शर्मा और श्याम कपूर के अलावा गुरूदत्त ने गोबिन्द नाम के एक और असिस्टेंट को साथ में रखा था। ये फ़िल्म सामान्य से चार गुना ज़्यादा शूट हुई थी। फ़िल्म नहीं चली और इसमें ‘सी.आई.डी.’ और ‘प्यासा’ से कमाया हुआ पैसा भी डूब गया। ‘सी.आई.डी.’ 1956 में, ‘प्यासा’ 1957 में और ‘कागज़ के फूल’ 1959 में रिलीज़ हुई थीं। श्याम कपूर के मुताबिक़ फ़िल्म ‘काग़ज़ के फूल’ की नाकामी ने गुरूदत्त के आत्मविश्वास को हिलाकर रख दिया था। आर्थिक संकट से उबरने के लिए उन्हें ‘सौतेला भाई’, ‘भरोसा’, ‘बहूरानी’, ‘सुहागन’, ‘सांझ और सवेरा’ जैसी बाहर की कुछ फ़िल्में बतौर हीरो करनी पड़ीं थीं। लेकिन ‘कागज़ के फूल’ के बाद उन्होंने आधिकारिक तौर पर किसी भी फ़िल्म का निर्देशन नहीं किया।
साल 1960 में गुरूदत्त ने मुस्लिम पृष्ठभूमि पर फ़िल्म ‘चौदहवीं का चांद’ का निर्माण किया जिसके निर्देशन की ज़िम्मेदारी उन्होंने एम.सादिक़ को दी। गुरूदत्त चाहते थे कि इस फ़िल्म के गीत साहिर लुधियानवी लिखें। इसका सीधा मतलब यही था कि ‘चौदहवीं का चांद’ में एस.डी.बर्मन और ओ.पी.नैयर नहीं होंगे क्योंकि साहिर के साथ उन दोनों की टीम टूट चुकी थी। गुरूदत्त के ज़हन में साल 1958 की, मुस्लिम पृष्ठभूमि पर बनी फ़िल्म ‘मेहंदी’ का संगीत ताज़ा था जिसके संगीतकार रवि थे। गुरूदत्त ने फ़िल्म ‘चौदहवीं का चांद’ के लिए रवि को साईन कर लिया। साहिर के साथ काम करने में रवि को कोई आपत्ति नहीं थी लेकिन उन्होंने गुरूदत्त से अपने साथी गीतकार शकील बदायुंनी की सिफ़ारिश ज़रूर की। गुरूदत्त को शकील बदायुंनी का लिखा पसन्द आया और इस तरह फ़िल्म ‘चौदहवीं का चांद’ में साहिर की जगह शकील आ गए।

श्याम कपूर बताते हैं, “गुरूदत्त फ़िल्म्स की अगली फ़िल्म ‘साहब बीबी और ग़ुलाम’ के निर्देशन की ज़िम्मेदारी लेखक अबरार अल्वी को दी गयी। ‘काग़ज़ के फूल’ के फ़्लॉप होने के बाद से गुरूदत्त निर्देशन में अपना नाम देना ही नहीं चाहते थे। लेकिन अबरार अल्वी का नाम सुनकर मीना कुमारी ने फ़िल्म करने से इंकार कर दिया। वो इस शर्त पर तैयार हुईं कि गुरूदत्त सेट पर ज़रूर मौजूद रहेंगे। फ़िल्म ‘साहब बीबी और ग़ुलाम’ में भले ही बतौर निर्देशक ‘अबरार अल्वी’ का नाम दिया गया लेकिन इसका 90 प्रतिशत हिस्सा गुरूदत्त ने निर्देशित किया था। ये फ़िल्म 1962 में रिलीज़ हुई थी”।

फ़िल्म ‘बहारें फिर भी आएंगी’ 14 रील बन चुकी थी। लेकिन 10 अक्टूबर 1964 को अचानक ही गुरूदत्त गुज़र गए। उनकी मौत के बारे में आज भी तमाम तरह की अफ़वाहें सुनने को मिलती हैं। लोग कहते हैं कि गुरूदत्त ने आत्महत्या की थी। लेकिन मैं इस बात को नहीं मानता। दरअसल जिस रात वो गुज़रे थे, उस रोज़ हमने ‘गुरूदत्त स्टूडियो’ में ‘बहारें फिर भी आएंगी’ के क्लाईमेक्स का, माला सिन्हा की मौत का सीन शूट किया था। गुरूदत्त फ़िल्म के हीरो थे और निर्देशक थे, शाहिद लतीफ़। ‘गुरूदत्त स्टूडियो’ अंधेरी (पूर्व) में ‘नटराज स्टूडियो’ के पीछे था। आज उस जगह पर मुम्बई-अहमदाबाद हाईवे बन गया है।

शाम को पैकअप के बाद माला सिन्हा ने गुरूदत्त से अगले दिन की छुट्टी मांगी क्योंकि उन्हें किसी फ़िल्म के प्रीमियर के लिए कोलकाता जाना था। माला सिन्हा अपने मेकअप रूम में चली गयीं और गुरूदत्त पहली मंज़िल पर बने अपने ऑफ़िस की सीढ़ियां चढ़ने लगे। तनुजा उनके साथ थीं। अचानक गुरूदत्त रूककर अपना सीना सहलाने लगे। तनुजा के पूछने पर उन्होंने कहा, “तबीयत कुछ गड़बड़ है, हार्ट की प्रॉब्लम लग रही है”। फिर फीकी हंसी हंसते हुए कहने लगे, “माला को देखो, कल छुट्टी ले रही है...आर्टिस्ट प्रोड्यूसर को हार्ट प्रॉब्लम ही तो देते हैं”। दरअसल गुरूदत्त की तबीयत दिन से ही ख़राब थी। मेरा मानना है कि रात को अगर उन्होंने वाकई शराब पी होगी या नींद की गोलियां खाई होंगी तो उनका बीमार शरीर उस नशे को बर्दाश्त नहीं कर पाया होगा। लेकिन इसे आत्महत्या कहना ग़लत है”।

गुरूदत्त और वहीदा रहमान के रिश्तों के बारे में श्याम कपूर बताते हैं, “वहीदा चाहती थीं कि गुरूदत्त इस्लाम धर्म अपनाकर उनसे शादी कर लें, हालांकि एम.सादिक़ और जॉनी वॉकर धर्मपरिवर्तन की वहीदा की शर्त से सहमत नहीं थे। उनका कहना था कि किसी पर धर्मपरिवर्तन के लिए दबाव डालना गलत बात है। उधर गुरूदत्त का कहना था कि गीता दत्त किसी भी हालत में तलाक़ के लिए तैयार नहीं होंगी। एक शाम मैं अपने ससुराल में था कि वहां मेरे एक जानने वाले उजागर सिंह आए जिनका फ़िल्मी लोगों के बीच काफ़ी उठना बैठना था। उन्होंने बताया कि वहीदा रहमान के बहनोई बेहद ग़ुस्से में हैं और कह रहे हैं कि मैं इसी वक़्त गुरूदत्त को उठाकर लाता हूं, देखता हूं वो कैसे इस्लाम क़ुबूल नहीं करता। उजागर सिंह की बात सुनकर मैं और मेरे ससुर जी उसी समय गुरूदत्त के घर के लिए निकल पड़े। मैंने वो रात गुरूदत्त के घर पर बितायी, हालांकि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ जिसका हमें डर था”। श्याम कपूर के ससुर रवि खन्ना अपने ज़माने के मशहूर फ़ाईट मास्टर थे। श्याम कपूर की शादी साल 1961 में रवि खन्ना की बेटी शारदा से हुई थी।      

उधर गुरूदत्त के गुज़र जाने के बाद ‘गुरूदत्त फ़िल्म्स’ की ज़िम्मेदारी उनके भाई आत्माराम जी ने सम्भाल ली थी। फ़िल्म ‘बहारें फिर भी आएंगी’ में गुरूदत्त की जगह धर्मेन्द्र को लिया गया। लेकिन इधर फ़िल्म के डिस्ट्रीब्यूटर ने एक नयी शर्त रख दी कि फ़िल्म को रीशूट अबरार अल्वी करें। आत्माराम जी को शर्त माननी पड़ी, हालांकि मूल कांट्रेक्ट के मुताबिक़ फ़िल्म में बतौर निर्देशक शाहिद लतीफ़ का ही नाम दिया गया। फ़िल्म के हिट गीत ‘आप के हसीन रूख़ पे आज नया नूर है’ समेत गुरूदत्त पर फ़िल्माए जा चुके तमाम हिस्सों को रीशूट किया गया। अबरार अल्वी बेहद ढीले-ढाले इंसान थे। शाहिद लतीफ़ ने फ़िल्म ‘बहारें फिर भी आएंगी’ की 14 रीलें सिर्फ़ 60 दिनों में शूट कर ली थीं। वहीं अबरार अल्वी ने सिर्फ़ गुरूदत्त वाले हिस्से रीशूट करने में 288 शिफ़्टें लेकर ‘गुरूदत्त फ़िल्म्स’ का खाता खाली कर दिया। ये फ़िल्म क़रीब दो साल बाद 1966 में रिलीज़ हुई।

1968 में आत्माराम जी ने ‘गुरूदत्त फ़िल्म्स’ के बैनर में फ़िल्म ‘शिकार’ बनाई जो जुबली हिट हुई। इस ख़ुशी में ‘गुरूदत्त फ़िल्म्स’ के पूरे स्टाफ़ को बोनस दिया गया। आत्माराम जी ने वादा किया कि वो गुरूदत्त की याद में कम्पनी के स्थायी स्टाफ़ के रहने के लिए एक बिल्डिंग बनाएंगे। वर्सोवा-अंधेरी के इलाक़े में ज़मीन ख़रीदी गयी। इस बीच आत्माराम जी ने अपने निजी बैनर ‘गुरूदत्त फ़िल्म्स कम्बाईन’ की स्थापना करके ‘चन्दा और बिजली’, ‘उमंग’, ‘मेमसाब’ और ‘ये गुलिस्तां हमारा’ जैसी फ़िल्में बनाईं लेकिन ये फ़िल्में चल नहीं पायी। उधर बिल्डिंग का काम शुरू हो चुका था। आत्माराम जी ने कहा पैसे की तंगी है इसलिए मजबूरन उन्हें फ़्लैट बेचने पड़ेंगे, लेकिन स्टाफ़ को प्राथमिकता दी जाएगी। 1970 के दशक की शुरूआत में वर्सोवा की फ़िशरीज़ रोड पर स्थित पुलिस कॉलोनी में ‘गुरूदत्त अपार्टमेण्ट्स’ नाम की बिल्डिंग बनकर तैयार हुई। श्याम कपूर ने इस बिल्डिंग में फ़्लैट ख़रीदा और पिछले 40 सालों से वो इसी जगह रहते आ रहे हैं।

श्याम कपूर के बगल वाले फ़्लैट में मूर्तिकार प्रदीप शर्मा रहते थे जो कई साल पहले मुम्बई छोड़कर देहरादून चले गए थे। ‘गुरूदत्त अपार्टमेण्ट्स’ के प्रवेशद्वार पर लगी, प्रदीप शर्मा की बनाई हुई गुरूदत्त की मूर्ति आज भी उस महान फ़िल्मकार की यादों को ताज़ा करती है।

साल 1976 तक श्याम कपूर ‘गुरूदत्त फ़िल्म्स कम्बाईन’ के साथ जुड़े रहे। उसके बाद उन्होंने स्वतंत्र रूप से फ़िल्में बनाने की कोशिश की लेकिन उनकी तीनों की फ़िल्में किसी न किसी वजह से बीच ही में अटक गयीं। मजबूरन उन्हें निर्देशन छोड़कर प्रोडक्शन का काम सम्भालना पड़ा। बतौर प्रोडक्शन कण्ट्रोलर उन्होंने ‘दरिंदा’, ‘प्रोफ़ेसर प्यारेलाल’, ‘सोहनी महिवाल’ जैसी कई फ़िल्में कीं, जिसके बाद वो टी.वी. सीरियलों के निर्माता-निर्देशक अजय सिन्हा की कम्पनी से जुड़ गए। अजय सिन्हा के ‘हसरतें’, ‘अस्तित्व’, ‘घर एक सपना’, ‘गुदगुदी’, ‘केसरिया बालमा’ जैसे कई सीरियलों का प्रोडक्शन सम्भाला

उनकी एक ,🇨🇦बेटी कनाडा में और एक बेटा और एक बेटी अमेरिका में रहते हैं। दो बेटे मुम्बई में हैं जिनमें से एक फ़िल्मों में स्टंटमैन है और सबसे छोटे बेटे का कम्प्यूटर का बिज़नेस है।  

श्याम कपूर का निधन 4 अक्टूबर 2018 को मुम्बई में, 90 साल की उम्र में हुआ|

दीनानाथ मंगेशकर

*दीनानाथ मंगेशकर' (29 दिसंबर 1900 -24 अप्रैल 1942) एक प्रसिद्ध मराठी थिएटर अभिनेता, प्रसिद्ध नाट्य संगीत संगीतकार और हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीतज्ञ एवं गायक थे। वे जाने-माने गायकों लता मंगेशकर, आशा भोसले ,मीणा खड़ीकर ,उषा मंगेशकर और संगीतकार हृदयनाथ मंगेशकर के पिता भी थे।*
दीनानाथ मंगेशकर पांच साल की उम्र में श्री बाबा माशेलकर से गायन और संगीत की शिक्षा लेने लगे थे तथा ग्वालियर संगीत विद्यालय के छात्र भी रहे। वे ज्ञानाचार्य पंडित रामकृष्ण बुआ वझे की विविधता पूर्ण और आक्रामक गायन शैली से मोहित हुए और उनके शागिर्द बन गए। अपनी जवानी में उन्होंने बीकानेर की यात्रा की और किराना घराना के पंडित सुखदेव प्रसाद,पंडित मणि प्रसादके पिता ,से शास्त्रीय संगीत में औपचारिक प्रशिक्षण लिया। व वे 11 साल की उम्र में किर्लोस्कर संगीत मंडली और किर्लोस्कर नाटक मंडली में शामिल हो गए थे कालांतर में उन्होंने किर्लोस्कर मंडली छोड़ दी और अपने दोस्तों ,चिंतामन राव कोल्हटकर और कृष्णराव कोल्हापुरे के साथ बलवंत मंडली का गठन किया। इस नए समूह था गडकरी का आशीर्वाद प्राप्त था , लेकिन समूह के गठन के कुछ ही समय बाद गडकरी की मृत्यु (जनवरी 1919) हो गई।

दीनानाथ अपने सौंदर्य और मधुर आवाज से मराठी रंगमंच में लोकप्रियता के शिखर तक पहुचे। उनकी लोकप्रियता इतनी थी की तब के विशाल मराठी मंच, बाल गंधर्व ने सार्वजनिक रूप से घोषणा की कि वह अपने संगठन में प्रवेश के समय दीनानाथ का स्वागत "उनके पैरों के नीचे रुपया व सिक्कों के एक कालीन से" करेंगे 1935 की अवधि के दौरान उन्होंने 3 फिल्मों का निर्माण किया , उनमें से एक कृष्णार्जुन युद्ध भी थी। यह दोनों ,हिन्दी और मराठी,भाषा में बनाई गई थी और इसका एक गीत दीनानाथ द्वारा गाया और उन्ही पर फिल्माया गया था। दीनानाथ ने पंडित रामकृष्ण वझे के सानिध्य में भारतीय शास्त्रीय संगीत का अध्ययन किया। उन्होंने ज्योतिष का भी अध्ययन किया।

अपने ज्योतिष और अंक ज्योतिष ज्ञानानुसार उनका मानना था कि ५ अक्षर का नाम एवं तीसरे अक्षर पर अनुस्वार वाला नाटक उन के लिए भाग्यशाली था। उदाहरण: Ranadundubhi (रणदुंदुभी), Rajsanyas (राजसंन्यास), Deshkantak (देशकंटक)।

वे पहले संगीतकार थे जिन्होंने शिमला में ब्रिटिश वायसराय की उपस्थिति में ,खुले तौर पर विनायक दामोदर सावरकर द्वारा लिखे गीत का गायन और प्रदर्शन किया जो ब्रिटिश साम्राज्य की अवहेलना करने के लिए किया गया था।

दीनानाथ द्वारा निर्देशित एवं वझे बुआ की देशभक्ति सामग्री द्वारा रचित गीत एवं नाटक ,अपनी विलक्षण प्रस्तुति के कारण जनता के बीच बेहद लोकप्रिय थे।

दीनानाथ 1930 के दशक में ,वित्तीय कठिनाई के दिनों के दौरान ,शराब का सेवन करने लगे थे। कुछ हफ्तों के लिए बीमार रहने के बाद, वह अप्रैल 1942 में पुणे में उनका निधन हो गया। उनकी मृत्यु के समय उनकी उम्र केवल 41 थी। उनके परिवार द्वारा , पुणे में उनके नाम पर दीनानाथ मंगेशकर अस्पताल एवं अनुसंधान केंद्र बनवाया गया है।

सोफा बेड

हवा भर कर बनाए जाने वाले सोफे और गद्दे (Inflatable Sofas & Air Mattresses) छोटे घरों, मेहमानों के आने पर अतिरिक्त जगह बनाने,...