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मंगलवार, 25 अप्रैल 2023

नितिन बोस

'गंगा-जमुना', 'दीदार', 'डाकू मंसूर', 'चंडीदास', 'धूपछाँव', 'जीवन मरण', 'दुश्मन', 'धरतीमाता' और 'मुजरिम' आदि जैसी फिल्मों के निर्देशक लेखक नितिन बोस के जन्मदिन पर हार्दिक श्रधांजलि
नितिन बोस भारतीय सिनेमा के प्रारंभिक समर्थकों में से एक, प्रसिद्ध फ़िल्म निर्देशक, छायाकार और लेखक थे। वे कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) के प्रसिद्ध 'न्यू थियेटर्स' के पीछे की ताकत थे। वर्ष 1935 में उनकी बंगाली फ़िल्म 'भाग्य चक्र' में उन्होंने फ़िल्मों का पार्श्वगायन से परिचय करवाया था। बाद में यह फ़िल्म हिन्दी में 'धूप छाँव' नाम से बनाई गई। नितिन बोस ने अपने सिने कैरियर में छह मूक फ़िल्मों सहित 50 से भी अधिक फ़िल्मों का निर्देशन और छायांकन किया। उन्हे के. एल. सहगल और उत्तम कुमार के कैरियर को शुरू करने का श्रेय दिया जाता है। बाद में नितिन जी मुंबई आ गये थे और यहाँ फ़िल्म निर्देशन किया। उनकी सर्वश्रेष्ठ फ़िल्मों में से एक 'गंगा जमुना' को हिन्दी सिनेमा की सबसे बड़ी फ़िल्मों में से एक माना जाता है। उनके विशिष्ट योगदान के लिए उन्हें वर्ष 1977 में 'दादा साहब फाल्के पुरस्कार' से सम्मानित किया गया था। नितिन बोस की फ़िल्म 'गंगा जमुना' का प्रसिद्ध गीत "इंसाफ की डगर पे, बच्चो दिखाओ चलके" ऐसा ही एक गीत था, जिसने नई पीढ़ी को उसके दायित्वों का अहसास कराया

भारतीय सिनेमा में स्टूडियो युग के महान निर्देशक नितिन बोस का जन्म 26 अप्रैल, 1897 को कोलकाता में हुआ था। इनके पिता का नाम 'हेमेन्द्र मोहन बोस' तथा माता 'मृणालिनी' थीं। नितिन बोस की माताजी मशहूर लेखक उपेन्द्रकिशोर रायचौधरी की बहन थीं। उपेन्द्रकिशोर प्रसिद्ध कवि सुकुमार राय के पिता और ख्याति प्राप्त फ़िल्म निर्माता-निर्देशक सत्यजीत राय के दादा थे। नितिन बोस के भाई मुकुल बोस का भी फ़िल्मी दुनिया से बहुत गहरा रिश्ता रहा, वे साउंड रिकॉर्डिस्ट के रूप में मशहूर थे। नितिन बोस का विवाह शांति बोस से हुआ था। वे दो पुत्रियों रीना और नीता के पिता भी बने।

नितिन बोस अपनी किशोरावस्था से ही अपने दोस्तों और घर परिवार के लोगों के बीच बेहद प्रतिभाशाली गिने जाते थे। शुरू में वह सिनेमैटोग्राफ़र थे, लेकिन सन 1934 में उन्होंने जब एक बार फ़िल्म निर्देशन पर अपना हाथ आजमाया तो फिर कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। उनके मन में निर्देशन की पहली बार इच्छा उस समय जोर मारने लगी, जब उन्होंने देवकी बोस के मुँह से 'चंडीदास' फ़िल्म की पटकथा सुनी। उन्होंने सही मायनों में देवकी बोस के साथ मिल कर भारतीय रोमांटिक सिने युग की नींव डाली। जब उन्होंने 'चंडीदास' की पटकथा सुनी तो अपने आपको 'न्यू थियेटर्स' के मालिक बीरेंद्रनाथ सरकार से यह कहने से नहीं रोक पाए कि मैं भी फ़िल्म निर्देशन करूँगा। उन्हें हिन्दी में 'चंडीदास' को निर्देशित करने का दायित्व सौंपा गया, इस पर वह पूरी तरह से खरे उतरे। उन्होंने अपनी प्रतिभा के बल पर फ़िल्म 'चंडीदास' को भावनात्मक और तकनीकी दृष्टि से एक महान शाहकार बना दिया था

भारतीय हिन्दी सिनेमा की कालजयी फ़िल्मों की सूची जब भी बनायी जायेगी, उसमें 'गंगा जमुना' को ज़रूर रखा जाएगा। फ़िल्म 'गंगा जमुना' न सिर्फ़ भारतीय समाज का महाकाव्यीय चित्रण करती है बल्कि समाज के भौतिकवादी विचारबोध को भी सुसंगत क्रम देती है। 'गंगा-जमुना' का ही शहरी रीमेक बाद में फ़िल्म 'दीवार' के रूप में सामने आया। क्योंकि वक्त बदलने से जीवन शैली का ढंग भले बदल गया हो, उपभोग में आने वाली वस्तुओं की गुणवत्ता और उपभोग का ढंग भले नफासत से परिपूर्ण हो गया हो, मगर नतीजा वही रहता है। इसीलिए दौर कोई भी हो 'गंगा-जमुना' भव्य ही लगती है और आकर्षक भी। दिलीप कुमार और वैजयंती माला ने इस फ़िल्म में अद्भुत अभिनय किया है, लेकिन असली श्रेय तो निर्देशक नितिन बोस को ही जायेगा, क्योंकि 'गंगा-जमुना' को प्रस्तुत करने की कल्पनाशीलता तो उन्हीं की थी।

नितिन बोस भारतीय सिनेमा की वह शख्सियत थे, जिन्होंने सिनेमा के माध्यम से इंसान की सूक्ष्मतम अनुभूतियों को पकड़ने और उनको उभारने का काम किया। 'चंडीदास' फ़िल्म की अपनी सफलता के बाद उन्होंने 1934 में अपनी अगली फ़िल्म 'डाकू मंसूर' का निर्देशन किया। यह एक सामाजिक फ़िल्म थी और अप्रत्यक्ष रूप से हिन्दू-मुस्लिम भाईचारे पर आधारित थी, लेकिन तत्कालीन अंग्रेज़ सरकार ने इस पर साम्प्रदायिकता का ठप्पा लगाते हुए इसे प्रतिबंधित कर दिया था।
जनवरी, 1936 में नितिन बोस द्वारा निर्देशित एक फ़िल्म रिलीज हुई 'धूपछाँव', जिसमें के.सी. डे., उमाशीश तथा पहाड़ी सान्याल जैसे गायक-अभिनेताओं ने काम किया था और उनके द्वारा गाए गए इस फ़िल्म के सभी गीत लोकप्रिय हुए थे, किंतु दो गीत, 'अंधे की लाठी तू ही है, तू ही जीवन-उजियारा है' तथा 'जीवन का सुख आज प्रभु मोहे' ख़ासतौर पर चर्चित हुए। फ़िल्म में ये गीत के.सी. डे द्वारा गाये गए थे और उन्हीं पर इनका फ़िल्मांकन भी हुआ था। मगर बाद में ग्रामोफ़ोन रिकॉर्ड पर जारी करने के लिए इन्हें कुंदनलाल सहगल से गवाया गया और यही इन गीतों की विशेष चर्चा का कारण बना। इन पर कुंदनलाल सहगल की छाप लग गई। हालांकि फ़िल्म में सहगल की कोई भूमिका नहीं थी और न ही कोई गाना उन पर फ़िल्माया गया था, फिर भी उनके स्वर में इन गानों की लोकप्रियता के चलते लोगों ने उनका संबंध इस फ़िल्म के साथ जोड़ लिया और सहगल द्वारा अभिनीत फ़िल्मों की सूची में इस फ़िल्म का नाम शुमार किया जाने लगा

फ़िल्म 'धूपछाँव' की एक और ख़ास बात यह थी कि इसमें निर्देशक नितिन बोस ने संगीतकार आर.सी. बोराल व पंकज मलिक तथा साउंड रिकॉर्डिस्ट मुकुल बोस की सहायता से पारुल घोष, सुप्रभा सरकार एवं हरिमती के स्वरों में एक गीत रिकॉर्ड करके पार्श्वगायन का पहला प्रयोग किया था। मगर नितिन बोस के मन में यह कल्पना कैसे उत्पन्न हुई, इसकी भी एक कहानी है-

एक दिन नितिन बोस सुबह के वक्त पंकज मलिक से मिलने उनके घर गए, तो पंकज बाबू नहा रहे थे। नितिन बोस बाहर कमरे में बैठकर उनका इंतज़ार करने लगे। वहाँ रेडियो चालू था और उस पर एक गीत प्रसारित हो रहा था। उधर बाथरूम से पंकज बाबू के गाने के स्वर आ रहे थे। अचानक नितिन बोस ने लक्ष्य किया कि पंकज बाबू वही गाना गा रहे हैं, जो रेडियो पर प्रसारित हो रहा था। वे रेडियो के स्वर में स्वर मिलाकर गा रहे थे। बस फिर क्या था, नितिन बोस के मानस पटल पर पलक झपकते ही एक तकनीकी क्रांति का ख़ाका स्पष्ट हो गया। जैसे ही पंकज बाबू नहाकर बाहर निकले, नितिन बोस एक बच्चे की तरह अधीर होकर बोले- "दादा, आप रेडियो के स्वर में स्वर मिलाकर गा रहे थे?" पंकज मलिक ने कहा- "हाँ, मैं गा रहा था"। "क्या वह प्रयोग फ़िल्मों में नहीं किया जा सकता?" उत्साह के अतिरेक में उत्तेजित होकर नितिन बोस ने सवाल किया। पंकज बाबू एकदम समझ नहीं पाए कि नितिन बोस क्या कहना चाहते हैं। उन्होंने कहा- "मतलब"? इस पर नितिन बोस ने उनसे कहा कि "मतलब यह कि गाने की रिकॉर्डिंग पहले कर ली जाए और फ़िल्मांकन के समय अभिनेता उस रिकॉर्डिंग को सुनकर उसके अनुसार होंठ हिलाते हुए अभिनय करे।" पंकज बाबू ने कहा- "अद्भुत कल्पना है नितिन। इसे साकार करने के लिए हम प्रयोग करेंगे... हर कीमत पर करेंगे।" और इस तरह फ़िल्मों में पार्श्वगायन की पद्धति का सूत्रपात हुआ, जिसने विश्व सिनेमा का चेहरा ही बदल दिया

1940 में 'न्यू थियेटर्स' में भयानक आग लग गई, जिससे काफ़ी क्षति हुई। जिस कारण नितिन बोस का कैरियर भी थोड़े बहुत प्रभावित हुआ, लेकिन जहाँ 1940 आते-आते 'न्यू थियेटर्स' के तमाम नामचीन निर्देशक, जैसे- देवकी बोस, प्रमथेश बरुआ और फणी मजूमदार इसे छोड़ कर चले गये, वहीं उस दौरान भी नितिन बोस ने फ़िल्म 'काशीनाथ' बनायी, जिसके फ़िल्मांकन पर उन्हें काफ़ी परेशानी का सामना करना पड़ा

फ़िल्म 'काशीनाथ' के बाद नितिन बोस 'न्यू थियेटर्स' और कोलकाता छोड़ कर 'बंबई' (वर्तमान मुम्बई) चले आये, जहाँ उन्होंने 1944-1945 के बीच तीन फ़िल्में 'पराया धन', 'मुजरिम' व 'मज़दूर' बनायी। वर्ष 1946 में बंबई टॉकीज के भागीदारों ने नितिन बोस से अपने लिए फ़िल्म बनाने का अनुरोध किया और नितिन बोस ने बंबई टॉकीज के लिए पहली फ़िल्म रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कहानी पर बनायी, जिसका नाम 'मिलन' था। फ़िल्म 'मिलन' के नायक अपने समय के मशहूर दिलीप कुमार थे और इस फ़िल्म के छायाकार बॉलीवुड के महान छायाकारों में से एक राधू कर्मकार थे। सन 1949 में नितिन बोस ने 'मशाल' और 1950 में अशोक कुमार और दिलीप कुमार के अभिनय से सजी फ़िल्म 'दीदार' का निर्देशन किया। तीन वर्षों बाद उन्होंने 'वारिस' का भी निर्देशन किया, मगर शायद अभी उनकी क्लासिकी का नमूना आना बाकी था। इसलिए उन्होंने 1961 में 'गंगा-जमुना' बनायी, जो न सिर्फ़ सर्वकालिक महान बॉलीवुड फ़िल्मों में से एक है, बल्कि सर्वकालिक सुपरहिट फ़िल्मों में से भी एक है।

नितिन बोस का निधन 14 अप्रैल, 1986 को कोलकाता में हुआ। इस महान हस्ती को भारतीय सिनेकारों की उच्च श्रेणी में गिना जाता है। उन्होंने अपनी मेहनत, लगन, प्रतिभा और जिज्ञासा व प्रयोगों से बॉलीवुड को समृद्ध किया। यदि नितिन बोस जैसे महान फ़िल्मकार 40 के दशक में न हुए होते तो शायद 80 के दशक में भारत में प्रायोगिक सिनेमा का जो उभार आया था, वह कभी न आता। मृणाल सेन, गौतम घोष, बालू महेन्द्रन, श्याम बेनेगल और गिरीश कसरावल्ली जैसे प्रयोगिक और मौलिक फ़िल्मकारों ने हमेशा उनसे प्रेरणा हासिल की है।

शनिवार, 22 अप्रैल 2023

शमशाद बेगम

गुज़रे ज़माने की महान पार्श्व गायिका शमशाद बेगम की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रधांजलि

शमशाद बेगम भारतीय सिनेमा में हिन्दी फ़िल्मों की शुरुआती पार्श्वगायिकाओं में से एक थीं। हिन्दी सिनेमा के प्रारम्भिक दौर में उनकी खनखती और सुरीली आवाज़ ने एक बहुत बड़ी संख्या में उनके प्रशसकों की भीड़ तैयार कर दी थी। हिन्दी फ़िल्मों के कई सुपरहिट गीत, जैसे- 'कभी आर कभी पार', 'कजरा मोहब्बत वाला', 'लेके पहला-पहला प्यार', 'बूझ मेरा क्या नाम रे' शमशाद बेगम के नाम पर दर्ज हैं। इन गीतों की लोकप्रियता ने शमशाद बेगम को प्रसिद्धि की बुलन्दियों पर पहुँचा दिया था। वर्ष 2009 में भारत सरकार ने शमशाद बेगम को कला के क्षेत्र में उनके विशिष्ट योगदान के लिए ' पद्मभूषण' से सम्मानित किया था।

शमशाद बेगम का जन्म 14 अप्रैल, सन 1919 को पंजाब राज्य के अमृतसर में हुआ था। वे अपनी युवावस्था से ही के. एल. सहगल की बहुत बड़ी प्रशंसक थीं। फ़िल्में देखना और गीत सुनना उन्हें बहुत पसन्द था। फ़िल्में देखने का शौक़ शमशाद बेगम को इस कदर था कि उन्होंने फ़िल्म ' देवदास' चौदह बार देखी थी। शमशाद बेगम का विवाह गणपतलाल बट्टो के साथ हुआ था। वर्ष 1955 में पति की मृत्यु के बाद वे मुम्बई आ गई थीं और बेटी उषा रात्रा और दामाद के साथ रहने लगी थीं।

पहली बार शमशाद बेगम की आवाज़ लाहौर के पेशावर रेडियो के माध्यम से 16 दिसम्बर, 1947 को लोगों के सामने आई। उनकी आवाज़ के जादू ने लोगों को उनका प्रशंसक बना दिया। तत्कालीन समय में शमशाद बेगम को प्रत्येक गीत गाने पर पन्द्रह रुपये पारिश्रमिक मिलता था। उस समय की प्रसिद्ध कम्पनी जेनोफ़ोन, जो कि संगीत रिकॉर्ड करती थी, उससे अनुबन्ध पूरा होने पर शमशाद बेगम को 5000 रुपये से सम्मानित किया गया था।

शमशाद बेगम की सम्मोहक आवाज़ ने महान संगीतकार नौशाद और ओ. पी. नैय्यर का ध्यान अपनी ओर खींच लिया था और इन्होंने फ़िल्मों में पार्श्वगायिका के रूप में इन्हें गायन का मौका दिया। इसके बाद तो शमशाद बेगम की सुरीली आवाज़ ने लोगों को इनका दीवाना बना दिया। पचास, आठ और सत्तर के दशक में शमशाद बेगम संगीत निर्देशकों की पहली पसंद बनी रहीं। शमशाद बेगम ने 'ऑल इंडिया रेडियो' के लिए भी गाया। इन्होंने अपना म्यूज़िकल ग्रुप 'द क्राउन थिएट्रिकल कंपनी ऑफ़ परफॉर्मिंग आर्ट' बनाया और इसके माध्यम से पूरे देश
में अनेकों प्रस्तुतियाँ दीं। इन्होंने कुछ म्यूज़िक कंपनियों के लिए भक्ति के गीत भी गाए। मशहूर संगीतकार ओ. पी.
नैयर ने उनकी आवाज़ को 'मंदिर की घंटी' बताया था। शमशाद बेगम ने उस समय के सभी मशहूर संगीतकारों के साथ काम किया।

आवाज़ ने सारंगी के उस्ताद हुसैन बख्शवाले साहेब का ध्यान भी अपनी ओर खींचा और उन्होंने इन्हें अपनी
शिष्या बना लिया। लाहौर के संगीतकार ग़ुलाम हैदर ने इनकी जादुई आवाज़ का इस्तेमाल फ़िल्म 'खजांची' ( 1941 ) और 'खानदान' ( 1942 ) में किया। वर्ष 1944 में शमशाद बेगम ग़ुलाम हैदर की टीम के साथ मुंबई आ गई थीं। यहाँ इन्होंने कई फ़िल्मों के लिए गाया। इन्होंने पाश्चात्य से प्रभावित पहला गीत 'मेरी जान मेरी जान सनडे के सनडे' गाकर धूम मचा दी थी। इनकी गायन शैली पूरी तरह मौलिक थी। इन्हें लता मंगेशकर, आशा भोंसले, गीता दत्त और अमीरबाई कर्नाटकी से जरा भी कम नहीं आंका गया।

भारत के प्रमुख त्योहारों में से एक होली पर यूँ तो हिन्दी फ़िल्मों में असंख्य गाने लिखे और गाये गए हैं, किंतु होली का सबसे लोकप्रिय गीत शकील बदायूँनी ने लिखा था। इस गीत को अपने समय के ख्यातिप्राप्त संगीतकार नौशाद ने संगीतबद्ध किया। शमशाद बेगम ने इस
गीत को अपनी सुरीली आवाज़ से सजाकर अमर बना दिया। फ़िल्म 'मदर इंडिया' का यह गीत अभिनेत्री नर्गिस पर फ़िल्माया गया था और गीत के बोल थे- "होली आई रे
कन्हाई रंग छलके, सुना दे ज़रा बाँसूरी"। इस गीत में गोपियाँ नटखट कृष्ण से गुज़ारिश कर रही हैं कि वे होली के मौके पर अपनी जादूई बाँसुरी बजाना बंद न करें। यह गीत अपने समय के सबसे सफल गीतों में से एक था, जो लोगों के हृदय पर छा गया था।

प्रमुख गीत

'छोड़ बाबुल का घर' मदर इंडिया
'होली आई रे कन्हाई' मदर इंडिया ( 1957 
'ओ गाड़ी वाले गाड़ी धीरे हाँक रे' मदर इंडिया
'तेरी महफ़िल में क़िस्मत आज़मा कर हम भी देखेंगे' मुग़ल-ए-आज़म
'मेरे पिया गए रंगून' पतंगा
'कभी आर कभी पार' आर पार
'लेके पहला पहला प्यार' सी.आई.डी. ( 1956 )
'कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना' सी.आई.डी. ( 1956 )
'बूझ मेरा क्या नाम रे, नदी किनारे गाँव रे' सी.आई.डी. ( 1956 ) 
'मिलते ही आंखें दिल हुआ दीवाना किसी का। बाबुल
'बचपन के दिन भुला न देना' दीदार
'दूर कोई गाए' बैजू बावरा
'सैया दिल में आना रे' बहार
'मोहन की मुरलिया बाजे' मेला ( 1948 )
'कजरा मुहब्बत वाला' क़िस्मत ( 1968)

अपनी सुरीली आवाज़ से हिन्दी फ़िल्म संगीत की सुनहरी हस्ताक्षर शमशाद बेगम के गानों में अल्हड़ झरने की लापरवाह रवानी, जीवन की सच्चाई जैसा खुरदरापन और बहुत दिन पहले चुभे किसी काँटे की रह रहकर उठने वाली टीस का सा एहसास समझ में आता है। उनकी आवाज़ की यह अदाएँ सुनने वालों को बरबस ही अपनी ओर आकर्षित करती है और उनके गानों की लोकप्रियता का आलम यह है कि आज भी उन पर रीमिक्स बन रहे हैं।

'प्रेस्टिजियस ओ.पी. नैयर अवार्ड'
- 2009' पद्म भूषण - 2009

भारतीय सिनेमा में अपनी सुरीली आवाज़ से लोगों का दिल जीत लेने वाली मशहूर पार्श्वगायिका शमशाद बेगम का निधन 23 अप्रैल , 2013 को मुम्बई में हो गया। शमशान बेगम ने हिन्दी फ़िल्म जगत से भले ही कई वर्ष पहले दूरियाँ बना ली थीं, किंतु अपने पूरे कैरियर में बेशुमार और प्रसिद्ध गानों को अपनी आवाज़ दी। उन्होंने न जाने कितने ही अनगिनत गानों को अपनी आवाज़ से सजाकर हमेशा-हमेशा के लिए ज़िंदा कर दिया। उनकी
बेटी उषा का कहना था कि- "मेरी माँ हमेशा यही कहती थीं की मेरी मौत के बाद मेरे अंतिम संस्कार के बाद ही किसी को बताना कि मैं अब इस दुनिया से जा चुकी हूँ, और मैं कहीं नहीं जाउँगी जहाँ से आई थी, वहीं वापस जा रही हूँ, मैं सदा सबके साथ हूँ। ये खनकी आवाज़ अब अपनी जुबान से गाये गए गानों से ही सबके दिलों को सुकून देगी।"

मंगलवार, 18 अप्रैल 2023

खुर्शीद बेगम

पुराने जमाने की प्रसिद्ध अभिनेत्री गायिका खुर्शीद बेगम की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि

खुर्शीद बानो  (14 अप्रैल 1914 - 18 अप्रैल 2001), जिन्हें अक्सर खुर्शीद के नाम से जाना जाता था, भारतीय सिनेमा की अग्रणी  गायिका और अभिनेत्री थी और  1930 से 1940  के दशक में उनका करियर खूब चला 1948 में वह पाकिस्तान चली गयीं  लैला मजनू (1931) के साथ अपने कैरियर की शुरुआत करते हुए, उन्होंने भारत में तीस से अधिक फिल्मों में अभिनय किया।   अभिनेता-गायक केएल सहगल के साथ, उन्होंने कई यादगार फिल्में की और गाने गाये

खुर्शीद बानो का जन्म अविभाजित भारत के लाहौर में   कसूर नामक गाँव में हुआ था उनका असली नाम इरशाद बेगम  था।  बचपन में, वह महान शायर अल्लामा इकबाल के घर के बगल में भट्टी गेट इलाके में रहती थी। 

खुर्शीद बानो ने अपने फ़िल्मी करियर की शुरुआत स्क्रीन नाम शेहला के साथ साइलेंट फ़िल्म आई फॉर एन आई (1931) से की थी जब उपमहाद्वीप की पहली टॉकी फ़िल्म (आलम आरा) रिलीज़ हुई थी।  इस दौरान उनकी रिलीज़ हुई कुछ फ़िल्में थी लैला मजनू (1931), मुफ़्लिस आशिक (1932), नक़ली डॉक्टर (1933), बम शैल और मिर्ज़ा साहिबान (1935), किमियागर (1936), इमान फ़रोश (1937), मधुर मिलन (  1938) और सितार (1939)

1931 और 1942 के दौरान, उन्होंने कलकत्ता और लाहौर में स्टूडियो द्वारा बनाई गई फिल्मों में अभिनय किया, लेकिन एक गायिका अभिनेत्री के रूप में पहचानी जाने वाली फिल्मों ने प्रभाव नहीं डाला।  1940 के दशक में उनकी कुछ फ़िल्में मुसाफ़िर (1940), होली (1940) ("भीगोइ मोरीसाड़ी रे"), शादी (1941) ("हरी के गुन प्रभु के गुन गाऊँ मैं" और "घिर घिर आए बदरिया") थीं।  परदेसी (1941) ("पहले जो मोहब्बत से इंकार किया होता " और "मोरी अटरिया  है सूनी")।  भक्त सूरदास (1942) में, "पंछी बावरा", जिसके संगीतकार थे ज्ञान दत्त थे 1940 के दशक का बहुत प्रसिद्ध गीत बन गया।  उसी फ़िल्म के अन्य लोकप्रिय गीत "मधुर मधुर गा रे मनवा", "झोली भर तारे लाये रे ', और के एल सहगल के साथ एक युगल गीत" चांदनी रात और तारे खिल गए "हैं। काफी लोकप्रिय हुआ

उसका चरम काल आया जब वह के एल सैगल और मोतीलाल जैसे अभिनेताओं के साथ रंजीत मूवीटोन फिल्मों में अभिनय करने के लिए बॉम्बे चली गई।  उन्होंने के एल सहगल के साथ  चातुर्भुज दोशी निर्देशित फ़िल्म भुक्त सूरदास (1942) में अभिनय किया यह फ़िल्म जबरदस्त हिट रही उसके बाद तानसेन (1943)भी काफी लोकप्रिय फ़िल्म बनी उन्होंने  अन्य दो मुख्य कलाकार जयराज, और ईश्वरलाल के साथ भी काफी अभिनय किया

उन्होंने 1943 में नर्स ("कोयलिया काहे बोले रे") में अभिनय किया। खेमचंद प्रकाश द्वारा संगीतबद्ध तानसेन (1943), उनके अभिनय करियर का चरम बिंदु था।  उनके प्रसिद्ध गीतों में के एल सहगल के साथ "बरसो रे", "घता घन घोर घोर", "दुखिया जियरा", "अब राजा भये मोरे बालम" और एक युगल गीत, "मोरे बालापन के साथी " शामिल थे।

उनकी अन्य प्रसिद्ध फ़िल्में हैं: मुमताज़ महल (1940) ("जो हम पे गुजरती है", "दिल की धडकन बना लिया",) शहंशाह बाबर (1944) ("मोहब्बत में सारा जहान जल रहा है", "बाबुल आ तू भी गा "), प्रभु का घर और मूर्ति (1945) (" अंबवा पे कोयल बोले "," बदेरिया बरस गयी उस पार "") संगीतकार बुलो सी  रानी के साथ ​​मिट्टी (1947) ("छायी काली घटा मोरे बालम")  1947 में और आप बीती (1948) ("मेरी बिनती सुनो भगवान")

भारत में उनकी आखिरी फिल्म पपीहा रे (1948) थी, जो कि एक बहुत बड़ी हिट थी, भारतीय फिल्म उद्योग में अपनी छाप छोड़ने के बारे वह पाकिस्तान चली गई थी।  खुर्शीद ने अपने पति के साथ, आज़ादी के बाद 1948 में पाकिस्तान चली गयी  और कराची, सिंध, पाकिस्तान में बस गयी

उन्होंने 1956, फनकार और मंडी  दो फिल्मों में काम किया।  खुर्शीद और संगीतकार रफीक गजनवी की फ़िल्म मंडी उल्लेखनीय फ़िल्म थी, लेकिन फिल्म के खराब संचालन के कारण, फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं हो पायी दूसरी फिल्म फनकार, जिसे रॉबर्ट मलिक द्वारा निर्मित किया गया था, जो कि कराची के सेंट पॉल इंग्लिश हाई स्कूल में भौतिकी के शिक्षक थे।

खुर्शीद ने अपने मैनेजर लाला याकूब (प्रसिद्ध भारतीय अभिनेता याकूब  नहीं ) से शादी की, जो कि कारदार प्रोडक्शंस में छोटे छोटे रोल करते थे  और भाटी गेट ग्रुप, लाहौर, पाकिस्तान के सदस्य थे  व्यक्तिगत समस्याओं के कारण, खुर्शीद ने 1956 में याकूब से तलाक ले  लिया उन्होंने 1956 में यूसुफ भाई मियां से शादी की, जो शिपिंग व्यवसाय में थे।  उनके तीन बच्चे थे और उन्होंने 1956 में अपनी आखिरी फिल्म के बाद फिल्मों में काम करना बंद कर दिया था। 

खुर्शीद बानो का 18 अप्रैल 2001 को कराची, पाकिस्तान में उनके 87 वें जन्मदिन के चार दिन बाद निधन हो गया।

गुरुवार, 13 अप्रैल 2023

शमशाद बेगम

*गुज़रे ज़माने की महान पार्श्व गायिका शमशाद बेगम के जन्मदिन पर हार्दिक श्रधांजलि*

शमशाद बेगम भारतीय सिनेमा में हिन्दी फ़िल्मों की शुरुआती पार्श्वगायिकाओं में से एक थीं। हिन्दी सिनेमा के प्रारम्भिक दौर में उनकी खनखती और सुरीली आवाज़ ने एक बहुत बड़ी संख्या में उनके प्रशसकों की भीड़ तैयार कर दी थी। हिन्दी फ़िल्मों के कई सुपरहिट गीत, जैसे- 'कभी आर कभी पार', 'कजरा मोहब्बत वाला', 'लेके पहला-पहला प्यार', 'बूझ मेरा क्या नाम रे' शमशाद बेगम के नाम पर दर्ज हैं। इन गीतों की लोकप्रियता ने शमशाद बेगम को प्रसिद्धि की बुलन्दियों पर पहुँचा दिया था। वर्ष 2009 में भारत सरकार ने शमशाद बेगम को कला के क्षेत्र में उनके विशिष्ट योगदान के लिए ' पद्मभूषण' से सम्मानित किया था।

शमशाद बेगम का जन्म 14 अप्रैल, सन 1919 को पंजाब राज्य के अमृतसर में हुआ था। वे अपनी युवावस्था से ही के. एल. सहगल की बहुत बड़ी प्रशंसक थीं। फ़िल्में देखना और गीत सुनना उन्हें बहुत पसन्द था। फ़िल्में देखने का शौक़ शमशाद बेगम को इस कदर था कि उन्होंने फ़िल्म ' देवदास' चौदह बार देखी थी। शमशाद बेगम का विवाह गणपतलाल बट्टो के साथ हुआ था। वर्ष 1955 में पति की मृत्यु के बाद वे मुम्बई आ गई थीं और बेटी उषा रात्रा और दामाद के साथ रहने लगी थीं।

पहली बार शमशाद बेगम की आवाज़ लाहौर के पेशावर रेडियो के माध्यम से 16 दिसम्बर, 1947 को लोगों के सामने आई। उनकी आवाज़ के जादू ने लोगों को उनका प्रशंसक बना दिया। तत्कालीन समय में शमशाद बेगम को प्रत्येक गीत गाने पर पन्द्रह रुपये पारिश्रमिक मिलता था। उस समय की प्रसिद्ध कम्पनी जेनोफ़ोन, जो कि संगीत रिकॉर्ड करती थी, उससे अनुबन्ध पूरा होने पर शमशाद बेगम को 5000 रुपये से सम्मानित किया गया था।

शमशाद बेगम की सम्मोहक आवाज़ ने महान संगीतकार नौशाद और ओ. पी. नैय्यर का ध्यान अपनी ओर खींच लिया था और इन्होंने फ़िल्मों में पार्श्वगायिका के रूप में इन्हें गायन का मौका दिया। इसके बाद तो शमशाद बेगम की सुरीली आवाज़ ने लोगों को इनका दीवाना बना दिया। पचास, आठ और सत्तर के दशक में शमशाद बेगम संगीत निर्देशकों की पहली पसंद बनी रहीं। शमशाद बेगम ने 'ऑल इंडिया रेडियो' के लिए भी गाया। इन्होंने अपना म्यूज़िकल ग्रुप 'द क्राउन थिएट्रिकल कंपनी ऑफ़ परफॉर्मिंग आर्ट' बनाया और इसके माध्यम से पूरे देश
में अनेकों प्रस्तुतियाँ दीं। इन्होंने कुछ म्यूज़िक कंपनियों के लिए भक्ति के गीत भी गाए। मशहूर संगीतकार ओ. पी.
नैयर ने उनकी आवाज़ को 'मंदिर की घंटी' बताया था। शमशाद बेगम ने उस समय के सभी मशहूर संगीतकारों के साथ काम किया।

आवाज़ ने सारंगी के उस्ताद हुसैन बख्शवाले साहेब का ध्यान भी अपनी ओर खींचा और उन्होंने इन्हें अपनी
शिष्या बना लिया। लाहौर के संगीतकार ग़ुलाम हैदर ने इनकी जादुई आवाज़ का इस्तेमाल फ़िल्म 'खजांची' ( 1941 ) और 'खानदान' ( 1942 ) में किया। वर्ष 1944 में शमशाद बेगम ग़ुलाम हैदर की टीम के साथ मुंबई आ गई थीं। यहाँ इन्होंने कई फ़िल्मों के लिए गाया। इन्होंने पाश्चात्य से प्रभावित पहला गीत 'मेरी जान मेरी जान सनडे के सनडे' गाकर धूम मचा दी थी। इनकी गायन शैली पूरी तरह मौलिक थी। इन्हें लता मंगेशकर, आशा भोंसले, गीता दत्त और अमीरबाई कर्नाटकी से जरा भी कम नहीं आंका गया।

भारत के प्रमुख त्योहारों में से एक होली पर यूँ तो हिन्दी फ़िल्मों में असंख्य गाने लिखे और गाये गए हैं, किंतु होली का सबसे लोकप्रिय गीत शकील बदायूँनी ने लिखा था। इस गीत को अपने समय के ख्यातिप्राप्त संगीतकार नौशाद ने संगीतबद्ध किया। शमशाद बेगम ने इस
गीत को अपनी सुरीली आवाज़ से सजाकर अमर बना दिया। फ़िल्म 'मदर इंडिया' का यह गीत अभिनेत्री नर्गिस पर फ़िल्माया गया था और गीत के बोल थे- "होली आई रे
कन्हाई रंग छलके, सुना दे ज़रा बाँसूरी"। इस गीत में गोपियाँ नटखट कृष्ण से गुज़ारिश कर रही हैं कि वे होली के मौके पर अपनी जादूई बाँसुरी बजाना बंद न करें। यह गीत अपने समय के सबसे सफल गीतों में से एक था, जो लोगों के हृदय पर छा गया था।

प्रमुख गीत

'छोड़ बाबुल का घर' मदर इंडिया
'होली आई रे कन्हाई' मदर इंडिया ( 1957 
'ओ गाड़ी वाले गाड़ी धीरे हाँक रे' मदर इंडिया
'तेरी महफ़िल में क़िस्मत आज़मा कर हम भी देखेंगे' मुग़ल-ए-आज़म
'मेरे पिया गए रंगून' पतंगा
'कभी आर कभी पार' आर पार
'लेके पहला पहला प्यार' सी.आई.डी. ( 1956 )
'कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना' सी.आई.डी. ( 1956 )
'बूझ मेरा क्या नाम रे, नदी किनारे गाँव रे'सी.आई.डी. ( 1956 ) 
'मिलते ही आंखें दिल हुआ दीवाना किसी का। बाबुल
'बचपन के दिन भुला न देना' दीदार
'दूर कोई गाए' बैजू बावरा
'सैया दिल में आना रे' बहार
'मोहन की मुरलिया बाजे' मेला ( 1948 )
'कजरा मुहब्बत वाला' क़िस्मत ( 1968)

अपनी सुरीली आवाज़ से हिन्दी फ़िल्म संगीत की सुनहरी हस्ताक्षर शमशाद बेगम के गानों में अल्हड़ झरने की लापरवाह रवानी, जीवन की सच्चाई जैसा खुरदरापन और बहुत दिन पहले चुभे किसी काँटे की रह रहकर उठने वाली टीस का सा एहसास समझ में आता है।उनकी आवाज़ की यह अदाएँ सुनने वालों को बरबस ही अपनी ओर आकर्षित करती है और उनके गानों की लोकप्रियता का आलम यह है कि आज भी उन पर रीमिक्स बन रहे हैं।

'प्रेस्टिजियस ओ.पी. नैयर अवार्ड'
- 2009' पद्म भूषण - 2009

भारतीय सिनेमा में अपनी सुरीली आवाज़ से लोगों का दिल जीत लेने वाली मशहूर पार्श्वगायिका शमशाद बेगम का निधन 23 अप्रैल , 2013 को मुम्बई में हो गया। शमशान बेगम ने हिन्दी फ़िल्म जगत से भले ही कई वर्ष पहले दूरियाँ बना ली थीं, किंतु अपने पूरे कैरियर में बेशुमार और प्रसिद्ध गानों को अपनी आवाज़ दी। उन्होंने न जाने कितने ही अनगिनत गानों को अपनी आवाज़ से सजाकर हमेशा-हमेशा के लिए ज़िंदा कर दिया। उनकी
बेटी उषा का कहना था कि- "मेरी माँ हमेशा यही कहती थीं की मेरी मौत के बाद मेरे अंतिम संस्कार के बाद ही किसी को बताना कि मैं अब इस दुनिया से जा चुकी हूँ, और मैं कहीं नहीं जाउँगी जहाँ से आई थी, वहीं वापस जा रही हूँ, मैं सदा सबके साथ हूँ। ये खनकी आवाज़ अब अपनी जुबान से गाये गए गानों से ही सबके दिलों को सुकून देगी।"

नितिन बोस

'गंगा-जमुना', 'दीदार', 'डाकू मंसूर', 'चंडीदास', 'धूपछाँव', 'जीवन मरण', 'दुश्मन', 'धरतीमाता' और 'मुजरिम' आदि जैसी फिल्मों के निर्देशक लेखक *नितिन बोस की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रधांजलि*

नितिन बोस भारतीय सिनेमा के प्रारंभिक समर्थकों में से एक, प्रसिद्ध फ़िल्म निर्देशक, छायाकार और लेखक थे। वे कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) के प्रसिद्ध 'न्यू थियेटर्स' के पीछे की ताकत थे। वर्ष 1935 में उनकी बंगाली फ़िल्म 'भाग्य चक्र' में उन्होंने फ़िल्मों का पार्श्वगायन से परिचय करवाया था। बाद में यह फ़िल्म हिन्दी में 'धूप छाँव' नाम से बनाई गई। नितिन बोस ने अपने सिने कैरियर में छह मूक फ़िल्मों सहित 50 से भी अधिक फ़िल्मों का निर्देशन और छायांकन किया। उन्हे के. एल. सहगल और उत्तम कुमार के कैरियर को शुरू करने का श्रेय दिया जाता है। बाद में नितिन जी मुंबई आ गये थे और यहाँ फ़िल्म निर्देशन किया। उनकी सर्वश्रेष्ठ फ़िल्मों में से एक 'गंगा जमुना' को हिन्दी सिनेमा की सबसे बड़ी फ़िल्मों में से एक माना जाता है। उनके विशिष्ट योगदान के लिए उन्हें वर्ष 1977 में 'दादा साहब फाल्के पुरस्कार' से सम्मानित किया गया था। नितिन बोस की फ़िल्म 'गंगा जमुना' का प्रसिद्ध गीत "इंसाफ की डगर पे, बच्चो दिखाओ चलके" ऐसा ही एक गीत था, जिसने नई पीढ़ी को उसके दायित्वों का अहसास कराया

भारतीय सिनेमा में स्टूडियो युग के महान निर्देशक नितिन बोस का जन्म 26 अप्रैल, 1897 को कोलकाता में हुआ था। इनके पिता का नाम 'हेमेन्द्र मोहन बोस' तथा माता 'मृणालिनी' थीं। नितिन बोस की माताजी मशहूर लेखक उपेन्द्रकिशोर रायचौधरी की बहन थीं। उपेन्द्रकिशोर प्रसिद्ध कवि सुकुमार राय के पिता और ख्याति प्राप्त फ़िल्म निर्माता-निर्देशक सत्यजीत राय के दादा थे। नितिन बोस के भाई मुकुल बोस का भी फ़िल्मी दुनिया से बहुत गहरा रिश्ता रहा, वे साउंड रिकॉर्डिस्ट के रूप में मशहूर थे। नितिन बोस का विवाह शांति बोस से हुआ था। वे दो पुत्रियों रीना और नीता के पिता भी बने।

नितिन बोस अपनी किशोरावस्था से ही अपने दोस्तों और घर परिवार के लोगों के बीच बेहद प्रतिभाशाली गिने जाते थे। शुरू में वह सिनेमैटोग्राफ़र थे, लेकिन सन 1934 में उन्होंने जब एक बार फ़िल्म निर्देशन पर अपना हाथ आजमाया तो फिर कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। उनके मन में निर्देशन की पहली बार इच्छा उस समय जोर मारने लगी, जब उन्होंने देवकी बोस के मुँह से 'चंडीदास' फ़िल्म की पटकथा सुनी। उन्होंने सही मायनों में देवकी बोस के साथ मिल कर भारतीय रोमांटिक सिने युग की नींव डाली। जब उन्होंने 'चंडीदास' की पटकथा सुनी तो अपने आपको 'न्यू थियेटर्स' के मालिक बीरेंद्रनाथ सरकार से यह कहने से नहीं रोक पाए कि मैं भी फ़िल्म निर्देशन करूँगा। उन्हें हिन्दी में 'चंडीदास' को निर्देशित करने का दायित्व सौंपा गया, इस पर वह पूरी तरह से खरे उतरे। उन्होंने अपनी प्रतिभा के बल पर फ़िल्म 'चंडीदास' को भावनात्मक और तकनीकी दृष्टि से एक महान शाहकार बना दिया था

भारतीय हिन्दी सिनेमा की कालजयी फ़िल्मों की सूची जब भी बनायी जायेगी, उसमें 'गंगा जमुना' को ज़रूर रखा जाएगा। फ़िल्म 'गंगा जमुना' न सिर्फ़ भारतीय समाज का महाकाव्यीय चित्रण करती है बल्कि समाज के भौतिकवादी विचारबोध को भी सुसंगत क्रम देती है। 'गंगा-जमुना' का ही शहरी रीमेक बाद में फ़िल्म 'दीवार' के रूप में सामने आया। क्योंकि वक्त बदलने से जीवन शैली का ढंग भले बदल गया हो, उपभोग में आने वाली वस्तुओं की गुणवत्ता और उपभोग का ढंग भले नफासत से परिपूर्ण हो गया हो, मगर नतीजा वही रहता है। इसीलिए दौर कोई भी हो 'गंगा-जमुना' भव्य ही लगती है और आकर्षक भी। दिलीप कुमार और वैजयंती माला ने इस फ़िल्म में अद्भुत अभिनय किया है, लेकिन असली श्रेय तो निर्देशक नितिन बोस को ही जायेगा, क्योंकि 'गंगा-जमुना' को प्रस्तुत करने की कल्पनाशीलता तो उन्हीं की थी।

नितिन बोस भारतीय सिनेमा की वह शख्सियत थे, जिन्होंने सिनेमा के माध्यम से इंसान की सूक्ष्मतम अनुभूतियों को पकड़ने और उनको उभारने का काम किया। 'चंडीदास' फ़िल्म की अपनी सफलता के बाद उन्होंने 1934 में अपनी अगली फ़िल्म 'डाकू मंसूर' का निर्देशन किया। यह एक सामाजिक फ़िल्म थी और अप्रत्यक्ष रूप से हिन्दू-मुस्लिम भाईचारे पर आधारित थी, लेकिन तत्कालीन अंग्रेज़ सरकार ने इस पर साम्प्रदायिकता का ठप्पा लगाते हुए इसे प्रतिबंधित कर दिया था।
जनवरी, 1936 में नितिन बोस द्वारा निर्देशित एक फ़िल्म रिलीज हुई 'धूपछाँव', जिसमें के.सी. डे., उमाशीश तथा पहाड़ी सान्याल जैसे गायक-अभिनेताओं ने काम किया था और उनके द्वारा गाए गए इस फ़िल्म के सभी गीत लोकप्रिय हुए थे, किंतु दो गीत, 'अंधे की लाठी तू ही है, तू ही जीवन-उजियारा है' तथा 'जीवन का सुख आज प्रभु मोहे' ख़ासतौर पर चर्चित हुए। फ़िल्म में ये गीत के.सी. डे द्वारा गाये गए थे और उन्हीं पर इनका फ़िल्मांकन भी हुआ था। मगर बाद में ग्रामोफ़ोन रिकॉर्ड पर जारी करने के लिए इन्हें कुंदनलाल सहगल से गवाया गया और यही इन गीतों की विशेष चर्चा का कारण बना। इन पर कुंदनलाल सहगल की छाप लग गई। हालांकि फ़िल्म में सहगल की कोई भूमिका नहीं थी और न ही कोई गाना उन पर फ़िल्माया गया था, फिर भी उनके स्वर में इन गानों की लोकप्रियता के चलते लोगों ने उनका संबंध इस फ़िल्म के साथ जोड़ लिया और सहगल द्वारा अभिनीत फ़िल्मों की सूची में इस फ़िल्म का नाम शुमार किया जाने लगा

फ़िल्म 'धूपछाँव' की एक और ख़ास बात यह थी कि इसमें निर्देशक नितिन बोस ने संगीतकार आर.सी. बोराल व पंकज मलिक तथा साउंड रिकॉर्डिस्ट मुकुल बोस की सहायता से पारुल घोष, सुप्रभा सरकार एवं हरिमती के स्वरों में एक गीत रिकॉर्ड करके पार्श्वगायन का पहला प्रयोग किया था। मगर नितिन बोस के मन में यह कल्पना कैसे उत्पन्न हुई, इसकी भी एक कहानी है-

एक दिन नितिन बोस सुबह के वक्त पंकज मलिक से मिलने उनके घर गए, तो पंकज बाबू नहा रहे थे। नितिन बोस बाहर कमरे में बैठकर उनका इंतज़ार करने लगे। वहाँ रेडियो चालू था और उस पर एक गीत प्रसारित हो रहा था। उधर बाथरूम से पंकज बाबू के गाने के स्वर आ रहे थे। अचानक नितिन बोस ने लक्ष्य किया कि पंकज बाबू वही गाना गा रहे हैं, जो रेडियो पर प्रसारित हो रहा था। वे रेडियो के स्वर में स्वर मिलाकर गा रहे थे। बस फिर क्या था, नितिन बोस के मानस पटल पर पलक झपकते ही एक तकनीकी क्रांति का ख़ाका स्पष्ट हो गया। जैसे ही पंकज बाबू नहाकर बाहर निकले, नितिन बोस एक बच्चे की तरह अधीर होकर बोले- "दादा, आप रेडियो के स्वर में स्वर मिलाकर गा रहे थे?" पंकज मलिक ने कहा- "हाँ, मैं गा रहा था"। "क्या वह प्रयोग फ़िल्मों में नहीं किया जा सकता?" उत्साह के अतिरेक में उत्तेजित होकर नितिन बोस ने सवाल किया। पंकज बाबू एकदम समझ नहीं पाए कि नितिन बोस क्या कहना चाहते हैं। उन्होंने कहा- "मतलब"? इस पर नितिन बोस ने उनसे कहा कि "मतलब यह कि गाने की रिकॉर्डिंग पहले कर ली जाए और फ़िल्मांकन के समय अभिनेता उस रिकॉर्डिंग को सुनकर उसके अनुसार होंठ हिलाते हुए अभिनय करे।" पंकज बाबू ने कहा- "अद्भुत कल्पना है नितिन। इसे साकार करने के लिए हम प्रयोग करेंगे... हर कीमत पर करेंगे।" और इस तरह फ़िल्मों में पार्श्वगायन की पद्धति का सूत्रपात हुआ, जिसने विश्व सिनेमा का चेहरा ही बदल दिया

1940 में 'न्यू थियेटर्स' में भयानक आग लग गई, जिससे काफ़ी क्षति हुई। जिस कारण नितिन बोस का कैरियर भी थोड़े बहुत प्रभावित हुआ, लेकिन जहाँ 1940 आते-आते 'न्यू थियेटर्स' के तमाम नामचीन निर्देशक, जैसे- देवकी बोस, प्रमथेश बरुआ और फणी मजूमदार इसे छोड़ कर चले गये, वहीं उस दौरान भी नितिन बोस ने फ़िल्म 'काशीनाथ' बनायी, जिसके फ़िल्मांकन पर उन्हें काफ़ी परेशानी का सामना करना पड़ा

फ़िल्म 'काशीनाथ' के बाद नितिन बोस 'न्यू थियेटर्स' और कोलकाता छोड़ कर 'बंबई' (वर्तमान मुम्बई) चले आये, जहाँ उन्होंने 1944-1945 के बीच तीन फ़िल्में 'पराया धन', 'मुजरिम' व 'मज़दूर' बनायी। वर्ष 1946 में बंबई टॉकीज के भागीदारों ने नितिन बोस से अपने लिए फ़िल्म बनाने का अनुरोध किया और नितिन बोस ने बंबई टॉकीज के लिए पहली फ़िल्म रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कहानी पर बनायी, जिसका नाम 'मिलन' था। फ़िल्म 'मिलन' के नायक अपने समय के मशहूर दिलीप कुमार थे और इस फ़िल्म के छायाकार बॉलीवुड के महान छायाकारों में से एक राधू कर्मकार थे। सन 1949 में नितिन बोस ने 'मशाल' और 1950 में अशोक कुमार और दिलीप कुमार के अभिनय से सजी फ़िल्म 'दीदार' का निर्देशन किया। तीन वर्षों बाद उन्होंने 'वारिस' का भी निर्देशन किया, मगर शायद अभी उनकी क्लासिकी का नमूना आना बाकी था। इसलिए उन्होंने 1961 में 'गंगा-जमुना' बनायी, जो न सिर्फ़ सर्वकालिक महान बॉलीवुड फ़िल्मों में से एक है, बल्कि सर्वकालिक सुपरहिट फ़िल्मों में से भी एक है।

नितिन बोस का निधन 14 अप्रैल, 1986 को कोलकाता में हुआ। इस महान हस्ती को भारतीय सिनेकारों की उच्च श्रेणी में गिना जाता है। उन्होंने अपनी मेहनत, लगन, प्रतिभा और जिज्ञासा व प्रयोगों से बॉलीवुड को समृद्ध किया। यदि नितिन बोस जैसे महान फ़िल्मकार 40 के दशक में न हुए होते तो शायद 80 के दशक में भारत में प्रायोगिक सिनेमा का जो उभार आया था, वह कभी न आता। मृणाल सेन, गौतम घोष, बालू महेन्द्रन, श्याम बेनेगल और गिरीश कसरावल्ली जैसे प्रयोगिक और मौलिक फ़िल्मकारों ने हमेशा उनसे प्रेरणा हासिल की है।

खुर्शीद बेगम

*पुराने जमाने की प्रसिद्ध अभिनेत्री गायिका खुर्शीद बेगम के जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धांजलि*

खुर्शीद बानो  (14 अप्रैल 1914 - 18 अप्रैल 2001), जिन्हें अक्सर खुर्शीद के नाम से जाना जाता था, भारतीय सिनेमा की अग्रणी  गायिका और अभिनेत्री थी और  1930 से 1940  के दशक में उनका करियर खूब चला 1948 में वह पाकिस्तान चली गयीं  लैला मजनू (1931) के साथ अपने कैरियर की शुरुआत करते हुए, उन्होंने भारत में तीस से अधिक फिल्मों में अभिनय किया।   अभिनेता-गायक केएल सहगल के साथ, उन्होंने कई यादगार फिल्में की और गाने गाये

खुर्शीद बानो का जन्म अविभाजित भारत के लाहौर में   कसूर नामक गाँव में हुआ था उनका असली नाम इरशाद बेगम  था।  बचपन में, वह महान शायर अल्लामा इकबाल के घर के बगल में भट्टी गेट इलाके में रहती थी। 

खुर्शीद बानो ने अपने फ़िल्मी करियर की शुरुआत स्क्रीन नाम शेहला के साथ साइलेंट फ़िल्म आई फॉर एन आई (1931) से की थी जब उपमहाद्वीप की पहली टॉकी फ़िल्म (आलम आरा) रिलीज़ हुई थी।  इस दौरान उनकी रिलीज़ हुई कुछ फ़िल्में थी लैला मजनू (1931), मुफ़्लिस आशिक (1932), नक़ली डॉक्टर (1933), बम शैल और मिर्ज़ा साहिबान (1935), किमियागर (1936), इमान फ़रोश (1937), मधुर मिलन (  1938) और सितार (1939)

1931 और 1942 के दौरान, उन्होंने कलकत्ता और लाहौर में स्टूडियो द्वारा बनाई गई फिल्मों में अभिनय किया, लेकिन एक गायिका अभिनेत्री के रूप में पहचानी जाने वाली फिल्मों ने प्रभाव नहीं डाला।  1940 के दशक में उनकी कुछ फ़िल्में मुसाफ़िर (1940), होली (1940) ("भीगोइ मोरीसाड़ी रे"), शादी (1941) ("हरी के गुन प्रभु के गुन गाऊँ मैं" और "घिर घिर आए बदरिया") थीं।  परदेसी (1941) ("पहले जो मोहब्बत से इंकार किया होता " और "मोरी अटरिया  है सूनी")।  भक्त सूरदास (1942) में, "पंछी बावरा", जिसके संगीतकार थे ज्ञान दत्त थे 1940 के दशक का बहुत प्रसिद्ध गीत बन गया।  उसी फ़िल्म के अन्य लोकप्रिय गीत "मधुर मधुर गा रे मनवा", "झोली भर तारे लाये रे ', और के एल सहगल के साथ एक युगल गीत" चांदनी रात और तारे खिल गए "हैं। काफी लोकप्रिय हुआ

उसका चरम काल आया जब वह के एल सैगल और मोतीलाल जैसे अभिनेताओं के साथ रंजीत मूवीटोन फिल्मों में अभिनय करने के लिए बॉम्बे चली गई।  उन्होंने के एल सहगल के साथ  चातुर्भुज दोशी निर्देशित फ़िल्म भुक्त सूरदास (1942) में अभिनय किया यह फ़िल्म जबरदस्त हिट रही उसके बाद तानसेन (1943)भी काफी लोकप्रिय फ़िल्म बनी उन्होंने  अन्य दो मुख्य कलाकार जयराज, और ईश्वरलाल के साथ भी काफी अभिनय किया

उन्होंने 1943 में नर्स ("कोयलिया काहे बोले रे") में अभिनय किया। खेमचंद प्रकाश द्वारा संगीतबद्ध तानसेन (1943), उनके अभिनय करियर का चरम बिंदु था।  उनके प्रसिद्ध गीतों में के एल सहगल के साथ "बरसो रे", "घता घन घोर घोर", "दुखिया जियरा", "अब राजा भये मोरे बालम" और एक युगल गीत, "मोरे बालापन के साथी " शामिल थे।

उनकी अन्य प्रसिद्ध फ़िल्में हैं: मुमताज़ महल (1940) ("जो हम पे गुजरती है", "दिल की धडकन बना लिया",) शहंशाह बाबर (1944) ("मोहब्बत में सारा जहान जल रहा है", "बाबुल आ तू भी गा "), प्रभु का घर और मूर्ति (1945) (" अंबवा पे कोयल बोले "," बदेरिया बरस गयी उस पार "") संगीतकार बुलो सी  रानी के साथ ​​मिट्टी (1947) ("छायी काली घटा मोरे बालम")  1947 में और आप बीती (1948) ("मेरी बिनती सुनो भगवान")

भारत में उनकी आखिरी फिल्म पपीहा रे (1948) थी, जो कि एक बहुत बड़ी हिट थी, भारतीय फिल्म उद्योग में अपनी छाप छोड़ने के बारे वह पाकिस्तान चली गई थी।  खुर्शीद ने अपने पति के साथ, आज़ादी के बाद 1948 में पाकिस्तान चली गयी  और कराची, सिंध, पाकिस्तान में बस गयी

उन्होंने 1956, फनकार और मंडी  दो फिल्मों में काम किया।  खुर्शीद और संगीतकार रफीक गजनवी की फ़िल्म मंडी उल्लेखनीय फ़िल्म थी, लेकिन फिल्म के खराब संचालन के कारण, फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं हो पायी दूसरी फिल्म फनकार, जिसे रॉबर्ट मलिक द्वारा निर्मित किया गया था, जो कि कराची के सेंट पॉल इंग्लिश हाई स्कूल में भौतिकी के शिक्षक थे।

खुर्शीद ने अपने मैनेजर लाला याकूब (प्रसिद्ध भारतीय अभिनेता याकूब  नहीं ) से शादी की, जो कि कारदार प्रोडक्शंस में छोटे छोटे रोल करते थे  और भाटी गेट ग्रुप, लाहौर, पाकिस्तान के सदस्य थे  व्यक्तिगत समस्याओं के कारण, खुर्शीद ने 1956 में याकूब से तलाक ले  लिया उन्होंने 1956 में यूसुफ भाई मियां से शादी की, जो शिपिंग व्यवसाय में थे।  उनके तीन बच्चे थे और उन्होंने 1956 में अपनी आखिरी फिल्म के बाद फिल्मों में काम करना बंद कर दिया था। 

खुर्शीद बानो का 18 अप्रैल 2001 को कराची, पाकिस्तान में उनके 87 वें जन्मदिन के चार दिन बाद निधन हो गया।

महान से सरोद वादक संगीतकार उस्ताद अली अकबर खान के जन्मदिन पर हार्दिक श्रधांजलि


*महान से सरोद वादक संगीतकार उस्ताद अली अकबर खान के जन्मदिन पर हार्दिक श्रधांजलि*

उस्ताद अली अकबर ख़ाँ संगीतकार और सरोद वादक थे। उस्ताद ख़ाँ पश्चिमी श्रोताओं के समक्ष भारतीय संगीत प्रस्तुत करने में सक्रिय रहे। इनके संगीत की जड़ें भारतीय संगीत की हिंदुस्तानी (उत्तरी) परंपरा में जमी थीं। उन्हें भारत सरकार द्वारा 1971 में पद्म भूषण और 1988 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था और पिछले पाँच दशकों से उन्होंने दुनिया में भारतीय शास्त्रीय संगीत का झंडा बुलंद रखा था। भारतीय शास्त्रीय संगीत को पश्चिम में प्रतिष्ठित करने के क्षेत्र में उनका महान् योगदान था।

जीवन_परिचय

अली अक़बर ख़ाँ का जन्म 14 अप्रैल 1922 को वर्तमान बांग्लादेश में स्थित कोमिला ज़िले के शिबपुर गाँव में "बाबा" अलाउद्दीन खाँ और मदीना बेगम के घर हुआ। इन्होंने अपनी गायन तथा वादन की शिक्षा अपने पिता से दो वर्ष की आयु में प्रारम्भ की। इन्होंने अपने चाचा, फ़कीर अफ़्ताबुद्दीन से तबला भी सीखा। उस्ताद अल्लाउद्दीन खाँ ने इन्हें कई अन्य वाद्यों मे भी पारंगत किया, पर अन्तत: निश्चय किया कि इन्हें सरोद पर ही ध्यान देना चाहिए। कई वर्षों के कठिन प्रशिक्षण के बाद इन्होंने अपनी पहली प्रस्तुति लगभग 13 वर्ष की आयु में दी। 22 वर्ष की आयु में वे जोधपुर राज्य के दरबारी संगीतकार बन गए।

संगीत_प्रशिक्षण

अली अकबर को उनके पिता संगीतकार अलाउद्दीन ख़ाँ ने प्रशिक्षित किया और 14 वर्ष की उम्र में उन्होंने कार्यक्रम देना शुरू कर दिया। वह शीघ्र ही जोधपुर के महाराजा के दरबारी संगीतकार बन गए। 1955 के बाद वायलिन वादक यहूदी मेनुहिन द्वारा उन्हें न्यूयॉर्क के मॉडर्न आर्ट म्यूज़ियम में सरोद वादन का निमंत्रण दिए जाने के उपरांत उन्होंने पश्चिम में कई कार्यक्रम प्रस्तुत किए, जिनमें बहुधा वह अपने संगीतकार और सितार वादक बहनोई पं. रविशंकर के साथ जुगलबंदी करते थे। संगीतकार के रूप में अली अकबर को उनके फ़िल्म संगीत और कई रागों के रचयिता के रूप में जाना जाता है। उन्होंने कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) (1956) और मरीन काउंटी, कैलिफ़ोर्निया (1967) में संगीत विद्यालय स्थापित किए। इस सरोद वादक का परिवार अपनी वंशावली को मियां तानसेन से जोड़ता है, जो 16वीं सदी के महान् संगीतकार और शहंशाह अकबर के दरबारी संगीतज्ञ थे।

प्रसिद्धि

अली अक़बर ख़ाँ ने पूरे भारत में प्रस्तुतियां दीं, सराहे गये और भारतीय शास्त्रीय संगीत को व्यापक बनाने के लिये कई विश्व यात्रायें कीं। अमेरिका में टेलीविजन प्रस्तुति देने वाले पहले भारतीय शास्त्रीय संगीतज्ञ थे। भारतीय शास्त्रीय संगीत के अध्यापन और प्रसार के लिये, 1956 में इन्होंने कोलकाता में अली अकबर संगीत महाविद्यालय की स्थापना की। दो साल बाद, बर्कले, कैलिफोर्निया (अमेरिका), में इसी नाम से एक और विद्यालय की नींव रखी, 1968 में यह विद्यालय अपने वर्तमान स्थान सान रफ़ेल, कैलिफोर्निया, कैलिफोर्निया आ गए। सान रफ़ेल स्कूल की स्थापना के साथ ही अली अकबर खां, संयुक्त राष्ट्र अमेरिका में ही बस गए थे, यद्यपि यात्राएं करते रहे। फिर भी अस्वस्थता के कारण कम हो गया था। 1985 में, इन्होंने अली अकबर महाविद्यालय की एक और शाखा बेसिल, स्विट्ज़रलैंड में स्थापित की थी। वे अल्प समय में ही एक राग का स्वरूप प्रस्तुत करने में सिद्धहस्त थे, जिसके कारण पिछले दशक में 78 आरपीएम के छोटे रिकार्डों पर वे छाए रहे। उनकी लंबी मंच प्रस्तुतियाँ सामान्यत: शांत एवं सरल संगीत के आलाप और जोड़ से शुरु होकर द्रुत गत और झाले की तरफ जाती हैं, जो सीनिया बीनकार शैली का विशेषता थी। साथ ही वे दो वाद्य यंत्रों के बीच होने वाले "सवाल जवाब" को प्रस्तुत करने वाले संगीतज्ञों का बेहतरीन उदाहरण हैं।

जुगलबंदी

खाँ साहब ने कई शास्त्रीय जुगलबंदियों में भाग लिया। उसमें सबसे प्रसिद्ध जुगलबंदी उनके समकालीन विद्यार्थी एवं बहनोई सितार वादक रवि शंकर एवं निखिल बैनर्जी के साथ तथा वायलन वादक एल सुब्रह्मण्यम भारती जी के साथ है। विलायत ख़ान के साथ भी उनकी कुछ रिकार्डिंग उपलब्ध हैं। साथ ही उन्होंने कई पाश्चात्य संगीतकारों के साथ भी काम किया।

सम्मान_और_पुरस्कार

अली अकबर ख़ां को 1988 में भारत का दूसरा सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। उनको इसके अलावा भी कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है। 1997 में संयुक्त राज्य अमेरिका का कला के क्षेत्र में सबसे ऊँचा सम्मान नेशनल हैरिटेज फ़ेलोशिप दी गई। 1991 में उन्हें मैकआर्थर जीनियस ग्रांट से सम्मानित किया गया। अली अकबर ख़ां को 1971 में पद्म भूषण से भी सम्मानित किया गया था।

निधन

अली अकबर ख़ां का 87 वर्ष की उम्र में 18 जून 2009 को सेन फ्रांसिस्को, संयुक्त राज्य अमेरिका में निधन हो गया। वे लम्बे समय से किडनी (गुर्दा) की बीमारी से जूझ रहे थे।

मंजू सिंह

*फ़िल्म अभिनेत्री मंजू सिंह की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि*
मंजू सिंह (जन्म- 1948; मृत्यु- 14 अप्रॅल, 2022) भारतीय हिन्दी सिनेमा की जानी-मानी अभिनेत्री और एक अच्छी प्रोड्यूसर भी थीं। उन्होंने कई सारे शोज प्रोड्यूस किए थे जिनके लिए उनकी खूब सराहना भी हुई। मंजू सिंह ने 1980 के दशक के शुरुआती दिनों में छोटे पर्दे पर पहला प्रायोजित कार्यक्रम 'शो थीम' के साथ शुरूआत की। गौरतलब है कि मंजू सिंह को खासतौर पर ऋषिकेश मुखर्जी की 1979 में रिलीज हुई फिल्म 'गोलमाल' के लिए जाना जाता था। उन्होंने इस फिल्म में 'रत्ना' नाम की लड़की का किरदार निभाया था। इसके अलावा वह टीवी इंडस्ट्री का भी जाना माना नाम थीं।

परिचय

अभिनेता अमोल पालेकर की फिल्म 'गोलमाल' समेत कई बॉलीवुड फ़िल्मों का हिस्सा मंजू सिंह रही थीं। वे टीवी इंडस्ट्री का भी हिस्सा रही थीं। मंजू सिंह ने ही स्वानंद किरकिरे को मौका दिया था।
साल 1980 में आई ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्म 'गोलमाल' को भला कौन भूल सकता है। फिल्म में अमोल पालेकर और उत्पल दत्त की शानदार कॉमिक टाइमिंग ने सभी का दिल जीत लिया था। इस फिल्म में मंजू सिंह ने अमोल पालेकर की छोटी बहन 'रत्ना' का रोल प्ले किया था। उनका रोल सादगी से भरा था। फिल्म के गाने और डायलॉग्स गुलजार साहब ने लिखे थे। आज भी जब ये फ़िल्म आती है तो फैंस अपनी नजर नहीं हटा पाते हैं। फिल्म का गाना 'आने वाला पल जाने वाला है' बहुत पॉपुलर हुआ था। फिल्म में बिंदिया गोस्वामी, देवेन वर्मा और दीना पाठक भी अहम रोल में थे। अमिताभ बच्चन का इसमें केमियो रोल था।

सामाजिक मुद्दों पर सीरियल्स

मंजू सिंह के कॅरियर की तरफ रुख करें तो उन्होंने दूरदर्शन के लिए कुछ अच्छे शोज बनाए। इसके अलावा उनके काम की सराहना हमेशा अच्छे कंटेंट की वजह से हुई। इसमें स्वराज, एक कहानी, शो टाइम और आधिकार समेत कई सारे सीरियल्स शामिल हैं। वे बच्चों के शो 'खेल खिलौना' में एंकर के तौर पर नजर आई थीं। ये शो 7 सालों तक चला था। उन्होंने अपने शोज के जरिए सामाजिक और सांस्कृतिक मुद्दों पर बात करने की कोशिश की थी।

मंजू सिंह ने अपने शोज में ज्यादातर राष्ट्रीय, सांस्कृतिक और सामाजिक मुद्दों को उठाया था। उन्होंने 1983 में 'शो टाइम' से निर्माता के तौर अपने कॅरियर की शुरुआत की थी। इसमें कई क्षेत्रिय भाषाओं की साहित्यिक लघु कथाओं पर चर्चा की जाती थी। इसके अलावा उन्होंने अपनी डॉक्यूमेंट्री-ड्रामा सीरीज 'अधिकार' में महिलाओं के कानूनी अधिकारों को दुनिया के सामने रखा था।

मृत्यु

अभिनेत्री मंजू सिंह का निधन 14 अप्रॅल, 2022 गुरुवार को मुंबई में हुआ। बताया गया कि 72 साल की उम्र में हार्ट अटैक के कारण उन्होंने आखिरी सांस ली। मंजू सिंह ने एक सुंदर और प्रेरक जीवन जिया। उन्हें 'मंजू दीदी' से 'मंजू नानी' तक के सफर के लिए याद किया जाएगा।"

आशा भोसले

आशा भोसले 🎂08 सितंबर 1933 ⚰️12 अप्रैल 2026 जन्म की तारीख और समय: 8 सितंबर 1933, सांगली मृत्यु की जगह और तारीख: 12 अप्रैल 2026 ब...