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गुरुवार, 6 अप्रैल 2023

पंडित रविशंकर

महान सितारवादक  पंडित रविशंकर के जन्मदिन पर हार्दिक श्रधांजलि
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पं रवि शंकर का जन्म संस्कृति-संपन्न काशी में 7 अप्रैल सन् 1920 को हुआ था। आपका आरंभिक जीवन काशी के पुनीत घाटों के पर ही बीता। पंडित रविशंकर का बचपन बहुत ही सुखद रहा।उनके पिता प्रतिष्ठित बैरिस्टर थे और राजघराने में उच्च पद पर कार्यरत थे। रविशंकर जब केवल दस वर्ष के थे तभी संगीत के प्रति उनका लगाव शुरू हुआ। पंडित रविशंकर ने बचपन में
कला जगत में प्रवेश एक नर्तक के रूप में किया। उन्होंने अपने बड़े भाई उदय शंकर के साथ कई नृत्य कार्यक्रम किये। उन दिनों को याद करते हुए वह कहते हैं- मैं बनारस में रहता था। संगीत से मेरा कोई सीधा संबंध नहीं था, लेकिन मेरे दूसरे भाइयों की इसमें पूरी रुचि थी।
कोई बांसुरी बजाता था तो कोई सितार। मेरे बडे भाई पंडित उदय शंकर जी नृत्य करते थे। वह मुझे अपने साथ
पेरिस ले गए। उनके दल में अच्छे-अच्छे संगीतज्ञ और कलाकार थे। वहीं से मुझमें संगीत का शौक़ पैदा हुआ। पहले तो मैंने नृत्य सीखना शुरू किया, पर अधिक
दिनों तक इस क्षेत्र में नहीं रहा। वजह यह थी कि मेरी रुचि संगीत में बढ़ने लगी
थी

इनकी आरंभिक संगीत शिक्षा घर पर ही हुई। उस समय के प्रसिद्ध संगीतकार और गुरु उस्ताद अलाउद्दीन ख़ां को इन्होंने अपना गुरु बनाय यहीं से आपकी संगीत यात्रा विधिवत आरंभ हुई। अलाउद्दीन ख़ां जैसे अनुभवी गुरु की आँखों ने आप के भीतर छिपे संगीत प्रेम को पहचान लिया था। उन्होंने आपको विधिवत अपना शिष्य बनाया। वह लंबे समय तक तबला वादक उस्ताद अल्ला रक्खा ख़ाँ , किशन महाराज और सरोद वादक उस्ताद अली अकबर ख़ान के साथ जुड़े रहे। अठारह वर्ष की उम्र में उन्होंने नृत्य छोड़कर सितार सीखना शुरू किया

शिक्षा

इनकी आरंभिक संगीत शिक्षा घर पर ही हुई। उस समय के प्रसिद्ध संगीतकार और गुरु उस्ताद अलाउद्दीन ख़ां को इन्होंने अपना गुरु बनाया। यहीं से आपकी संगीत यात्रा विधिवत आरंभ हुई। अलाउद्दीन ख़ां जैसे अनुभवी गुरु की आँखों ने आप के भीतर छिपे संगीत प्रेम को पहचान लिया था। उन्होंने आपको विधिवत अपना शिष्य बनाया। वह लंबे समय तक तबला वादक उस्ताद अल्ला रक्खा ख़ाँ, किशन महाराज और सरोद वादक उस्ताद अली अकबर ख़ान के साथ जुड़े रहे। अठारह वर्ष की उम्र में उन्होंने नृत्य छोड़कर सितार सीखना शुरू किया।

परम्परागत भारतीय शैली

रविशंकर संगीत की परम्परागत भारतीय शैली के अनुयायी थे। उनकी अंगुलियाँ जब भी सितार पर गतिशील होती थी, सारा वातावरण झंकृत हो उठता था। अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर भारतीय संगीत को ससम्मान प्रतिष्ठित करने में उनका उल्लेखनीय योगदान है। उन्होंने कई नई-पुरानी संगीत रचनाओं को भी अपनी विशिष्ट शैली से सशक्त अभिव्यक्ति पदान की।

प्रथम प्रस्तुति

पंडित रविशंकर ने पहला कार्यक्रम 10 साल की उम्र में दिया था।
भारत में पंडित रविशंकर ने पहला कार्यक्रम 1939 में दिया था।
देश के बाहर पहला कार्यक्रम उन्होंने 1954 में तत्कालीन सोवियत संघ में दिया था और यूरोप में पहला कार्यक्रम 1956 में दिया था।
1944 में औपचारिक शिक्षा समाप्त करने के बाद वह मुंबई चले गए और उन्होंने फ़िल्मों के लिए संगीत दिया।
1960 के दशक के मध्य में उन्होंने तीन यादगार प्रस्तुतियां मॉनटेरी पॉप फेस्टिवल, कंसर्ट फॉर बांग्लादेश, वुडस्टॉक फेस्टिवल दीं।

संगीत निर्देशन

रवि शंकर ने भारत, कनाडा, यूरोप तथा अमेरिका में बैले तथा फ़िल्मों के लिए भी संगीत कम्पोज किया। इन फ़िल्मों में 'चार्ली', 'गांधी' और 'अपू त्रिलोगी' भी शामिल हैं। इसके अतिरिक्त आपने अनेक फ़िल्मों में भी अपने संगीत का जादू जगाया है।

सत्यजीत राय की बंगाली फ़िल्म 'अपू त्रिलोगी' एक बहुचर्चित फ़िल्म थी।
हिन्दी फ़िल्म अनुराधा में भी आपने ही संगीत दिया।
पंडित रविशंकर ने अपने लंबे संगीत जीवन में कई फ़िल्मों के लिए भी संगीत निर्देशन किया जिसमें प्रख्यात फ़िल्मकार सत्यजीत राय की फ़िल्में और गुलज़ार द्वारा निर्देशित "मीरा" भी शामिल है।
रिचर्ड एटिनबरा की फ़िल्म 'गांधी' में भी आपका ही सुरीला संगीत था।
आपने कई पाश्चात्य फ़िल्मों में भी संगीत दिया।

सहृदय रवि शंकर

रवि शंकर ने वर्ष 1971 में 'बांग्लादेश मुक्ति संग्राम' के समय वहां से भारत आ गए लाखों शरणार्थियों की मदद के लिए कार्यक्रम करके धन एकत्र किया था। हिन्दुस्तानी संगीत को रविशंकर ने रागों के मामले में भी बड़ा समृद्ध बनाया है। यों तो उन्होंने परमेश्वरी, कामेश्वरी, गंगेश्वरी, जोगेश्वरी, वैरागी तोड़ी, कौशिकतोड़ी, मोहनकौंस, रसिया, मनमंजरी, पंचम आदि अनेक नये राग बनाए हैं, पर वैरागी और नटभैरव रागों का उनका सृजन सबसे ज्यादा लोकप्रिय हुआ। शायद ही कोई दिन ऐसा जाता हो, जब रेडियो पर कोई न कोई कलाकार इनके बनाए इन दो रागों का न गाता-बजाता हो।

जुगलबन्दी

प्रारम्भ में पंडित जी ने अमेरिका के प्रसिद्ध वायलिन वादक येहुदी मेन्युहिन के साथ जुगलबन्दियों में भी विश्व-भर का दौरा किया। तबला के महान् उस्ताद अल्ला रक्खा भी पंडित जी के साथ जुगलबन्दी कर चुके हैं। वास्तव में इस प्रकार की जुगलबन्दियों में ही उन्होंने भारतीय वाद्य संगीत को एक नया आयाम दिया। पंडित जी ने अपनी लम्बी संगीत-यात्रा में अपने और अपने सम्बन्ध में कुछ महत्त्वपूर्ण पुस्तकें भी लिखी हैं। ‘माई म्यूजिक माई लाइफ’ के अतिरिक्त उनकी ‘रागमाला’ नामक पुस्तक विदेश के एक सुप्रसिद्ध प्रकाशक ने प्रकाशित की है।

सम्मान और पुरस्कार

पंडित रवि शंकर को विभिन्न विश्वविद्यालयों से डाक्टरेट की 14 मानद उपाधियां मिल चुकी हैं।
संयुक्त राष्ट्र संघ के अंतर्गत संगीतज्ञों की एक संस्था के सदस्य रहे।
रवि शंकर को तीन ग्रेमी पुरस्कार मिले हैं।
रेमन मैग्सेसे पुरस्कार, पद्म भूषण, पद्म विभूषण तथा भारत का सर्वोच्च सम्मान भारत रत्‍न भी मिल चुका है।
रवि शंकर को भारतीय संगीत ख़ासकर सितार वादन को पश्चिमी दुनिया के देशों तक पहुंचाने का श्रेय भी दिया जाता है।
1968 में उनकी 'यहूदी मेनुहिन' के साथ उनकी एल्बम 'ईस्ट मीट्स वेस्ट' को पहला ग्रैमी पुरस्कार मिला था। फिर 1972 में 'जॉर्ज हैरिसन' के साथ उनके 'कॉनसर्ट फॉर बांग्लादेश' को ग्रैमी दिया गया। संगीत जगत् का ऑस्कर माने जाने वाले ग्रैमी पुरस्कार की विश्व संगीत श्रेणी में पंडित रविशंकर के साथ स्पर्धा में ब्रिटेन के प्रख्यात संगीतकार जॉन मेक्लॉलिन और ब्राज़ील के गिलबर्टो गिल और मिल्टन नेसिमेल्टो भी शामिल थे।

राज्यसभा मानद सदस्य

1986 में राज्यसभा के मानद सदस्य चुनकर भी उन्हें सम्मानित किया गया। 1986 से 1992 तक राज्य सभा के सदस्य रहे। सितार वादक पंडित रविशंकर भारत के उन गिने चुने संगीतज्ञों में से थे जो पश्चिम में भी लोकप्रिय रहे। रवि शंकर अनेक दशकों से अपनी प्रतिभा दर्शाते रहे। 1982 के दिल्ली एशियाड (एशियाई खेल समारोह) के 'स्वागत गीत' को उन्होंने कई स्वर प्रदान किये थे। उनको देश-विदेश में कई बार सम्मानित किया जा चुका है।

निधन

पंडित रविशंकर का 92 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। अमेरिका में सैन डिएगो के एक अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली। पंडित रविशंकर को सांस लेने में तकलीफ की शिकायत के बाद ला जोल्ला के स्किप्स मेमोरियल अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उन्होंने स्थानीय समयानुसार मंगलवार 11 दिसम्बर, 2012 को शाम 4.30 बजे अंतिम सांस ली

राहुल रवैल

प्रसिद्ध फ़िल्म निर्देशक राहुल रवैल के जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनाएं

राहुल रवैल बॉलीवुड में एक भारतीय फिल्म निर्देशक और संपादक हैं, जिन्हें उनकी लव स्टोरी (1981), बेताब (1983), अर्जुन (1985), डकैत (1987), अंजाम (1994), अर्जुन पंडित (1999) जो बोले सो निहाल (2005) जैसी फिल्मों के लिये जाना जाता है उन्हें दो बार सर्वश्रेष्ठ निर्देशक के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया था।  रवैल ने बॉलीवुड के कुछ अभिनेताओं जैसे कुमार गौरव और विजया पंडित की लव स्टोरी, सनी देओल और अमृता सिंह के साथ बेताब, काजोल को बेखुदी (1992), और ऐश्वर्या राय (और प्यार हो गया (1997) जैसी फिल्मों में लॉन्च किया 

राहुल रवैल  महान फिल्म निर्देशक एच एस रवैल उर्फ हरनाम सिंह रवैल  के पुत्र है एच एस रवैल ने मेरे महबूब (1963) संघर्ष (1968) मेहबूब की मेंहदी (1971) लैला मजनू (1976) जैसी फिल्में बनाई  राहुल रवैल ने  एक फ़िल्म जीवन एक संघर्ष (1990)अपने पिता को श्रद्धांजलि देने के लिए बनाई   राहुल के बेटे भरत रवैल एक  निर्देशक हैं, जिन्होंने यश चोपड़ा की फिल्म जब तक है जान (2012) में सहायक निर्देशक थे

राहुल रवैल ने राज कपूर के सहायक के रूप में अपना करियर शुरू किया और 1980 में बॉलीवुड फिल्म गुनाहगार में परवीन बाबी, ऋषि कपूर, राजेंद्र कुमार और आशा पारिख अभिनीत फ़िल्म से उन्होंने निर्देशक के रूप में शुरुआत की।  उनकी पहली दो फ़िल्में सफल नहीं थीं, लेकिन उनकी तीसरी फ़िल्म लव स्टोरी (1981) सुपरहिट रही इस फ़िल्म से  कुमार गौरव और विजेयता पंडित ने अपने करियर की शुरूआत की फिल्म एक संगीतमय प्रेम कहानी थी  तब से, राहुल रवैल ने सत्रह फिल्मों और दो टेलीविजन श्रृंखलाओं का निर्देशन किया है।  उन्होंने ज़्यादातर अभिनेता सनी देओल के साथ काम किया उन्होंने  अपनी छह फिल्मों में सनी देवल  के साथ काम किया था, जिसमें उनकी पहली फिल्म बेताब (1983) थी यह फ़िल्म अमृता सिंह और सनी देवल की डेब्यू फिल्म थी यह फ़िल्म भी सुपरहिट रही राहुल रवैल ने काजोल को अपनी फिल्म बेखुदी (1992) और ऐश्वर्या राय बच्चन को और प्यार हो गया के जरिये लांच किया  दोनों फिल्में व्यावसायिक रूप से अच्छी नहीं रहीं।  उन्हें फ़िल्मफ़ेयर के सर्वश्रेष्ठ निर्देशक के पुरस्कार के लिए फ़िल्म बेताब(1983) और अर्जुन (1985) के लिए नामांकित किया गया।

2010 में, राहुल रवैल ने न्यूयॉर्क शहर के स्टेला एडलर स्टूडियो ऑफ़ एक्टिंग के साथ मिलकर एक एक्टिंग स्कूल शुरू किया सनी देओल जैसी प्रसिद्ध बॉलीवुड हस्तियों ने अपने बच्चों को अकादमी में दाखिला दिलवाया इसके बावजूद, 2012 में 2 साल बाद ही इसे बंद कर दिया था।
जन्म की तारीख और समय: 7 अप्रैल 1951 (आयु 72 वर्ष), मुम्बई
पत्नी: रीटा रावल
बच्चे: रजत रवैल, शिव रवैल, भारत रवैल
माता-पिता: हरनाम सिंह रवैल

कश्मीरी लाल जाकिर





उर्दू कवि, उपन्यासकार और लघुकथा लेखक कश्मीरी लाल ज़ाकिर की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि

कश्मीरी लाल ज़ाकिर  प्रख्यात उर्दू कवि, उपन्यासकार और लघुकथा लेखक थे। कश्मीरी लाल ज़ाकिर हरियाणा उर्दू अकादमी के निदेशक भी थे। भारत ही नहीं पाकिस्तान में भी उनकी रचनाएं लोकप्रिय हुई। हरियाणा के विभिन्न क्षेत्रों अम्बाला, करनाल, पंचकूला, चंडीगढ़, पटियाला आदि की अखिल भारतीय उर्दू मुशायरों की परम्परा के सूत्रधार कश्मीरी लाल ज़ाकिर ही हुआ करते थे।

जीवन_परिचय

कश्मीरी लाल ज़ाकिर का जन्म 7 अप्रैल 1919 को पाकिस्तान में हुआ। वह अंग्रेज़ी और शिक्षा में स्नातकोत्तर थे। उन्होंने उर्दू, हिंदी, पंजाबी और अंग्रेज़ी में 100 से ज़्यादा किताबें लिखीं। उनकी रचनाएं उर्दू और हिंदी दोनों भाषाओं में प्रकाशित हुईं। उन्होंने 8 दशक तक उर्दू और हिंदी साहित्य को अपना योगदान दिया। 1940 के दशक में उन्होंने लिखना शुरू किया था। वह लगभग तीन दशक तक हरियाणा उर्दू अकादमी के निदेशक पद पर रहे। ज़ाकिर लम्बी अवधि तक हरियाणा के शिक्षा विभाग और बाद में चंडीगढ़ प्रशासन के शिक्षा विभाग में सेवारत भी रहे। ब्रिटिश इंडिया के समय पंजाब एजुकेशन डिपार्टमेंट में नौकरी की। उनके उपन्यास ‘करमांवाली’ पर नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा ने 100 से ज्यादा नाटक खेले। बाद में इसी पर दूरदर्शन ने भी धारावाहिक बनाया। उनके लेख पहली बार लाहौर की एक मैगजीन में छपे थे।

सम्मान_एवं_पुरस्कार

साहित्य के क्षेत्र में कश्मीरी लाल ज़ाकिर को पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। ज़ाकिर को पद्मश्री के अलावा राष्ट्रीय ग़ालिब पुरस्कार, शिरोमणि साहित्यकार सम्मान, एनएलएम यूनेस्को, साहिर लुधियानवी और फख्र-ए-हरियाणा जैसे कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।

निधन

कश्मीरी लाल ज़ाकिर का 97 वर्ष की अवस्था में 31 अगस्त, 2016 को चंडीगढ़ के अस्पताल में निधन हुआ। उनका निधन उर्दू और हिंदी साहित्य के लिए बड़ी क्षति है। हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने ज़ाकिर के निधन पर गहरा दु:ख व्यक्त किया। खट्टर ने कहा, "पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित डाक्टर के. एल. ज़ाकिर के निधन से उर्दू और हिंदी साहित्य जगह ने एक दिग्गज हस्ती खो दी।"

बुधवार, 5 अप्रैल 2023

Jatandir जतिंद्र

 *जितेंद्र*

जन्म नाम :- रवि कपूर
निक नेम :- जंपिन जैक
🎂जन्म तिथि :- 7 अप्रैल 1942
ऊंचाई :- 1.75 मी
जीवनसाथी :- अर्रे
मिनी बायो:- रवि कपूर का जन्म एक व्यवसायी परिवार में हुआ था जो नकली आभूषणों का कारोबार करता था और एक चॉल में रहता था। वी. शांताराम को गहनों की आपूर्ति करते हुए, उन्हें 1959 की फिल्म 'नवरंग' में संध्या के डबल के रूप में लिया गया। बॉलीवुड के प्रमुख व्यक्ति के रूप में उनका पहला ब्रेक 'गीत गया पत्थरों ने' में आया। हालांकि रवि कपूर का जन्म 7 अप्रैल, 1942 को हुआ था, जीतेंद्र का जन्म 1964 में हुआ था। जब उन्हें ऑडिशन के लिए जाना था, तो वे अपने बचपन के दोस्त राजेश खन्ना से संवाद रटने और भाव देने के लिए मार्गदर्शन प्राप्त करने के लिए मदद लेते थे। गीत गया पत्थरोंने उनकी पहली हिट थी, लेकिन इससे उन्हें मुख्य नायक के रूप में प्रस्ताव नहीं मिले। यह 1967 में रिलीज़ हुई फ़र्ज़ थी, जो उनकी चौथी फिल्म थी और पुरुष प्रधान के रूप में तीसरी थी, जिसने उन्हें जनता में एक जाना माना चेहरा बना दिया था। रवि अपनी वर्तमान पत्नी शोभा से मिले थे, जब वह केवल 14 वर्ष की थी। उसने स्कूल पूरा किया, कॉलेज गए, और ब्रिटिश एयरवेज के साथ एक एयर होस्टेस के रूप में कार्यरत थे। शोभा ने एक बेटी, एकता और बाद में एक बेटे तुषार को जन्म दिया। जबकि एकता ज्यादातर 'के' से शुरू होने वाले टीवी धारावाहिकों की निर्माता बन गईं, तुषार ने अपने पिता के नक्शेकदम पर चलते हुए। एकता और जीतू बालाजी फिल्म्स के नाम से एक प्रोडक्शन कंपनी चलाते हैं, और उन्होंने बॉलीवुड फिल्मों का निर्माण किया है। उनके टीवी प्रोडक्शंस आमतौर पर हिंदी और तमिल भाषाओं में हैं। जितेंद्र ने राजश्री शांताराम, मुमताज़, सायरा बानो, माला सिन्हा, नंदा, शर्मिला टैगोर, आशा पारेख, बबीता, हेमा मालिनी, मौसमी चटर्जी, रीना रॉय, जया प्रधा, श्रीदेवी के साथ काम किया है। कोमल, रेखा, परवीन बाबी, नीतू सिंह, शबाना आजमी, पद्मनी कोल्हापुरी, भानुप्रिया, माधवी, अनीता राज, संगीता बिजलानी, अश्विनी भावे। वारिस और गेहरी चाल जैसी फिल्मों में काम करने के बाद, जीतेंद्र और हेमा मालिनी के बीच दोस्ती बढ़ी और दुल्हन की शूटिंग के दौरान दोनों ने एक-दूसरे के लिए प्यार का इजहार किया और जल्दी शादी करने का फैसला किया। लेकिन जल्द ही यह जानकारी शोभा और धर्मेंद्र तक पहुंच गई। शोभा ने पूछा हेमा के मन को बदलने के लिए धर्मेंद्र क्योंकि वह कई सालों से जीतेंद्र से प्यार करती थी। जल्द ही शोभा और धर्मेंद्र दोनों हेलीकॉप्टर से आए और जीतेंद्र और हेमा को शादी न करने के लिए मना लिया। जितेंद्र ने शोभा से वादा किया कि अगर बिदाई हिट हो जाती है, तो वह 1974 में उससे शादी कर लेंगे। 18 अक्टूबर, 1974 को 'बिदाई' (लीना चंदावरकर के विपरीत) के रिलीज होने तक ऐसा नहीं था कि जितेंद्र और शोभा ने शादी करने का फैसला किया, जो उन्होंने किया जानकी कुटीर में एक साधारण समारोह में केवल कुछ ही परिवार और दोस्त मौजूद थे (गुलज़ार, प्रसिद्ध हस्तियों में राजेश खन्ना और संजीव कुमार)। शादी जल्दबाजी में तय की गई, क्योंकि शोभा की माँ भी, जो उस समय जापान में थीं, शामिल नहीं हो सकीं। इस घटना के बाद दोनों अभिनेताओं धर्मेंद्र, हेमा मालिनी के साथ जितेंद्र की दोस्ती कभी प्रभावित नहीं हुई। तीनों दोस्त बने रहे। जितेंद्र ने धर्मेंद्र के साथ काम किया और धरमवीर, जानी दोस्त, इंसाफ की पुकार, नफरत की आंधी जैसी हिट फिल्में दीं और द बर्निंग ट्रेन, सम्राट, द गोल्ड मेडल, जान हथेली पे, पापी देवता, धर्म कर्म जैसी फ्लॉप फिल्में दीं। बचपन के स्कूल और कॉलेज के दोस्त राजेश खन्ना और जीतेंद्र ने एक साथ काम किया और 1980 के दशक में 3 ब्लॉकबस्टर दिए- धरम कांता (1982), निशान (1983) और मकसूद (1984)। वास्तव में सभी 3 फिल्मों के राजस्व में वृद्धि का रुझान दिखा। मक़साद वर्ष 1984 में बॉक्स ऑफिस पर सबसे अधिक कमाई करने वाली फिल्म थी। जितेंद्र ने रोटी में अतिथि भूमिका निभाई, पलकों की चाँव में और बेगुनाह - तीनों फिल्में जिनमें राजेश खन्ना सोलो लीड हीरो थे। जितेंद्र-रेखा को 26 फिल्मों में रोमांटिक रूप से जोड़ा गया था और 1972-1998 से शुरू होने वाली मुख्य जोड़ी के रूप में 26 फिल्मों में से 16 हिट रहीं और केवल 10 फ्लॉप रहीं। इसके अलावा रेखा और जितेंद्र ने अन्य 5 फिल्मों में काम किया, जहां उनकी जोड़ी एक-दूसरे के साथ नहीं थी। जितेंद्र-श्रीदेवी ने 1983-88 के बीच एक साथ 16 फिल्में कीं और उनमें से 13 हिट रहीं और 3 फ्लॉप रहीं। जीतेंद्र और जया प्रदा को 24 फिल्मों में एक-दूसरे के साथ रोमांटिक रूप से जोड़ा गया था और उनमें से 18 बॉक्स ऑफिस पर हिट रहीं और 6 फ्लॉप रहीं। इसके अलावा 2 और फिल्में उन्होंने एक साथ कीं जिनमें वे एक-दूसरे के विपरीत नहीं थे। जितेंद्र ने बॉक्स ऑफिस पर 113 हिट फिल्में दीं (नवरंग, खिलोना, रोटी, उमर क़ैद, रानी और लालपरी, नया बकरा, अनोखा बंधन जैसी हिट फ़िल्मों में अतिथि भूमिकाओं को छोड़कर) बेगुनाह और ओम शांति ओम) 1964-1997 तक मुख्य नायक के रूप में, 198 फिल्मों में से वह 2007 तक मुख्य नायक के रूप में दिखाई दिए। वह 1959 से 2007 तक 26 अन्य फिल्मों में अतिथि भूमिका में दिखाई दिए और 2000 के बाद सहायक भूमिका में 2 और फिल्में दिखाई दीं। 1980-89 तक जितेंद्र दूसरे सबसे अधिक भुगतान पाने वाले हिंदी अभिनेता थे। उन्होंने एक टीवी धारावाहिक 'कहानी घर घर की' में अतिथि भूमिका निभाई। इसलिए उनकी कुल फिल्म उपस्थिति 226 फिल्मों में थी और उनमें से 121 बॉक्स ऑफिस पर हिट रहीं और 102 फ्लॉप रहीं।
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सोफा बेड

हवा भर कर बनाए जाने वाले सोफे और गद्दे (Inflatable Sofas & Air Mattresses) छोटे घरों, मेहमानों के आने पर अतिरिक्त जगह बनाने,...