24 जुलाई लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
24 जुलाई लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 23 जुलाई 2023

महमूद

महान हास्य अभिनेता महमूद की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि
🎂29 सितम्बर,1932

⚰️23 जुलाई, 2004
महमूद  फ़िल्म जगत के प्रसिद्ध हास्य अभिनेता थे। उनका पूरा नाम महमूद अली था। तीन दशक लम्बे चले उनके कैरियर में उन्होंने 300 से ज़्यादा हिन्दी फ़िल्मों में काम किया। अपने बहुरंगीय किरदारों से दर्शकों को हँसाने और गंभीर भूमिका कर रुलाने वाले महमूद अभिनय के प्रति समर्पित थे। अपने बहुमुखी अभिनय और कला के प्रति समर्पण ने उन्हें बुलंदियाँ दी और उनको फ़िल्मफ़ेयर सहित कई पुरस्कारों का सम्मान मिला। उन्होंने कई फ़िल्मों में गीत ही नहीं गाये बल्कि फ़िल्मों का निर्माण और निर्देशन भी किया।

#जन्म_और_परिवार

महमूद का जन्म 29 सितंबर, 1932, मुम्बई, भारत में हुआ था। महमूद मशहूर नृतक मुमताज़ अली के बेटे और चरित्र अभिनेत्री मिन्नो मुमताज़ अली के भाई थे। महमूद ने अभिनेत्री मीना कुमारी की बहन मधु से विवाह किया था। आठ संतानों के पिता महमूद के दूसरे बेटे मक़सूद लकी अली जाने-माने गायक और अभिनेता हैं। निर्देशक के रूप में महमूद की अंतिम फ़िल्म थी 'दुश्मन दुनिया का'। 1996 में बनी इस फ़िल्म में उन्होंने अपने बेटे मंज़ूर अली को पर्दे पर उतारा था।

#पहली_फ़िल्म

महमूद को पहला ब्रेक 1958 की फ़िल्म 'परवरिश' में मिला था, जिसमें उन्होंने राज कपूर के भाई की भूमिका निभाई थी। 1961 की "ससुराल" उनके कैरियर की अहम फ़िल्म थी, जिसके जरिए बतौर हास्य कलाकार स्थापित होने में उन्हें मदद मिली। 60 के दशक के हास्य कलाकारों की टीम की सफल शुरुआत के लिए भी "ससुराल" को अहम माना जाता है, क्योंकि इस फ़िल्म में महमूद के साथ-साथ शुभा खोटे जैसी हास्य अभिनेत्री ने भी अपनी कला के जौहर दिखाए।

#प्रमुख_भूमिका

1965 की फ़िल्म "जौहर महमूद इन गोवा" में उन्हें कॉमेडियन के साथ-साथ प्रमुख भूमिका निभाने का भी मौक़ा मिला। "प्यार किए जा" (1966) और "पड़ोसन" (1968) महमूद की दो सर्वाधिक यादगार भूमिकाओं वाली फ़िल्में हैं। "प्यार किए जा" में महमूद ने एक ऐसे युवक का किरदार निभाया, जो फ़िल्म निर्देशक बनना चाहता है और अपने बैनर 'वाह वाह प्रोडक्शन' के लिए वह अपने पिता (ओम प्रकाश) से आर्थिक मदद की उम्मीद रखता है। वहीं "पड़ोसन" में दक्षिण भारतीय गायक के किरदार में भी महमूद ने दर्शकों को खूब लुभाया।

#प्रतिभाशाली_व्यक्तित्व

अपनी बहुरंगीय किरदारों से दर्शकों को हँसाने और गंभीर भूमिका कर रूलाने वाले महमूद अभिनय के प्रति समर्पित थे। अपने बहुमुखी अभिनय और कला के प्रति समर्पण ने उन्हें बुलंदियाँ दी और उनको फ़िल्मफ़ेयर सहित कई पुरस्कारों का सम्मान मिला। उन्होंने कई फ़िल्मों में गीत ही नहीं गाये बल्कि फ़िल्मों का निर्माण और निर्देशन भी किया। जिसमें "छोटे नवाब", "भूतबंगला", "पड़ोसन", "बांबे टू गोवा", "दुश्मन दुनिया का", "सबसे बड़ा रुपैया" आदि शामिल है। जबकि विकलांगों पर बनी फ़िल्म "कुँवारा बाप" में किया गया उनका अभिनय आज भी उनकी यादों को ताजा करता है।[3] महमूद के व्यक्तित्व में तमाम रंग थे। इनमें से एक था, नए लोगों को मौक़ा देना। उन्होंने 'छोटे नवाब' फ़िल्म में संगीतकार राहुल देव बर्मन को पहली बार मौक़ा देकर फ़िल्म उद्योग को एक बेहतरीन तोहफा दिया था। इसी प्रकार महमूद ने सुपर स्टार अमिताभ बच्चन की उस समय मदद की थी, जब वह संघर्ष के दौर से गुजर रहे थे। उनके कैरियर को बल देने के लिए महमूद ने 'बांबे टु गोवा' फ़िल्म बनाई थी।

#निधन

अपने जीवन के आख़िरी दिनों में महमूद का स्वास्थ्य ख़राब हो गया। वह इलाज के लिए अमेरिका गए, जहाँ 23 जुलाई, 2004 को उनका निधन हो गया। दुनिया को हंसाकर लोट-पोट करने वाला यह महान् कलाकार नींद के आगोश में बड़ी खामोशी से इस दुनिया से विदा हो गया।

उत्तम कुमार

हिंदी फिल्मो के अभिनेता एवम् बंगला फिल्मो के महानायक उत्तम कुमार की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रधांजलि
🎂जन्म 03 सितम्बर, 1926
जन्म भूमि कोलकाता, बंगाल
⚰️मृत्यु 24 जुलाई, 1980
मृत्यु स्थान पश्चिम बंगाल
उत्तम कुमार  भारतीय सिनेमा में हिन्दी और बांग्ला फ़िल्मों के प्रसिद्ध अभिनेता थे। उनका मूल नाम 'अरुण कुमार चटर्जी' था। मुख्य रूप से बंगाली सिनेमा में काम करने वाले उत्तम कुमार एक अभिनेता होने के साथ-साथ फ़िल्म निर्देशक, निर्माता, गायक और संगीतकार भी
थे। जिस तरह हिन्दी सिनेमा में राज कपूर और नरगिस की जोड़ी याद की जाती है, उसी तरह बंगाली सिनेमा में उत्तम कुमार और सुचित्रा सेन का कोई मुकाबला नहीं था। बंगाली सिनेमा में उत्तम कुमार को 'महानायक' की पदवी दी गई है।

बंगाली फ़िल्मों के महानायक उत्तम कुमार का जन्म ब्रिटिश कालीन भारत में 3 सितम्बर , 1926 को भवानीपुर, कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता ) में उनके गिरीश मुखर्जी मार्ग स्थित पुश्तैनी मकान में हुआ था। उन्होंने कोलकाता के ही 'साउथ सबर्बन स्कूल (मेन)' से स्कूली शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद उच्च शिक्षा के लिए 'कोलकाता विश्वविद्यालय ' से सम्बद्ध'गोयेनका कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स एंड बिजनेस ऐडमिनिस्ट्रेशन' में दाखिला ले लिया। लेकिन उत्तम कुमार अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर पाए और उन्होंने'कलकत्ता पोर्ट ट्रस्ट' में एक लिपिक की
नौकरी प्राप्त कर ली।

अभिनेता उत्तम कुमार की बतौर नायक पहली फ़िल्म 'दृष्टिदान' थी, जिसे मशहूर निर्देशक नितिन बोस ने निर्देशित किया था। सुचित्रा सेन के साथ उनकी जोड़ी खूब पसंद की गई। सुचित्रा के साथ उनकी 'सप्तपदी', 'पौथे होलो देरी', 'हारानो सुर', 'चावा पावा', 'बिपाशा', 'जीवन तृष्णा' और 'सागरिका' जैसी फ़िल्में बेहद लोकप्रिय रहीं। बंगाली के साथ-साथ उन्होंने कई हिन्दी फ़िल्मों में भी अभिनय किया, जैसे- 'छोटी सी मुलाक़ात' - 1967 (स्वयं निर्माता)
'अमानुष' - 1975
'आनंद आश्रम' - 1977
'क़िताब' - 1979
'दूरियां' - 1979

जिस प्रकार हिन्दी सिनेमा में राज कपूर और नरगिस की जोड़ी याद की जाती है, उसी तरह बंगाली सिनेमा में उत्तम कुमार और सुचित्रा सेन का कोई मुकाबला नहीं था। प्रेम को इस तीव्रता से वे अपने अभिनय में व्यक्त करते थे कि दर्शक दंग रह जाते थे। यही वजह रही कि दर्शक इस जोड़ी से कभी बोर नहीं हुए। दो दशक तक तीस फ़िल्मों में दोनों ने अपने अभिनय के रंग बिखेरे और इनमें से ज्यादातर फिल्में बॉक्स ऑफिस पर सफल रहीं। उत्तम कुमार और सुचित्रा सेन बंगाली सिनेमा के व्यवसाय को एक बार फिर ऊपर की ओर ले गए, क्योंकि जब उन्होंने बंगाली सिनेमा में कदम रखा था, तब वहां के फ़िल्म उद्योग की हालत खस्ता थी। ऐसे में उत्तम कुमार और सुचित्रा सेन के स्टारडम ने दर्शकों के बीच पहचान बनाई और बंगाली फ़िल्में फिर सफल होने लगीं।फ़िल्म 'अग्निपरीक्षा' से उत्तम कुमार और सुचित्रा सेन की जोड़ी सफल हुई थी। दोनों ने फ़िल्म में इस कदर डूब कर रोमांस किया कि कई लोग उन्हें पति-पत्नी मानने लगे।फ़िल्मी पर्दे पर जिस तरह से वे रोमांस करते थे, उस कारण आज भी कई लोग मानते हैं कि उत्तम कुमार और सुचित्रा सेन में प्रेम था। पर्दे पर दर्शक दोनों को खुशहाल जोड़ी के रूप में देखना पसंद करते थे। फ़िल्म 'शिल्पी' में उत्तम कुमार के किरदार की आखिर में मौत दिखाई गई और इस कारण फ़िल्म फ्लॉप हो गई थी। सुचित्रा और उत्तम कुमार बेहतरीन कलाकार थे। दोनों साथ काम करते तो उनका अभिनय और निखर जाता था। उन्होंने कई अलग-अलग भूमिकाएं अभिनीत कीं और अपने बेहतरीन अभिनय से यादगार बनाया। बिना कहे दोनों बहुत कुछ कह जाते थे और दोनों के रोमांटिक सीन में पर्दा जगमगाने लगता था। उन पर फ़िल्माए गए गीत सुपरहिट रहे। 

उत्तम कुमार का निधन 24 जुलाई , 1980 को पश्चिम बंगाल में हुआ। कोलकाता में हाजरा अंचल में उनके नाम पर 'उत्तम थियेटर' है तथा टालीगंज ट्रामडिपो के समक्ष उनका विशाल पुतला सड़क के चौक पर लगाया गया है। वर्ष 2009 में टालीगंज मेट्रो स्टेशन का नामकरण
'महानायक उत्तम कुमार' हो गया है। उत्तम कुमार के एकमात्र पुत्र गौतम कुमार चटर्जी (दिवंगत) एक व्यवसायी थे। फ़िल्मों में उनकी रुचि नहीं थी, लेकिन उत्तम के पौत्र गौरव ने बांग्ला फ़िल्मों में अभिनय किया। उनकी ख़्वाहिश थी कि अभिनय करते हुए उनका दम निकले और हुआ भी ऐसा ही।1980 में 'ओ गो बोधु शुंदरी' की शूटिंग के दौरान हृदयाघात से उनका निधन हो गया।

अमन धालीवाल (मानसा)

*●▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬●
  ꧁

*Ş₳ŦเŞ𝓱👸🏻◣🍁💜⃝🇱♥︎2*
अमन सिंह धालीवाल
 जन्म 24 जुलाई 1986
 एक अंतरराष्ट्रीय मॉडल से अभिनेता बने हैं, जो पंजाबी सिनेमा में काम करते हैं, जहां उन्हें एक्शन हीरो के रूप में जाना जाता है।
वह पंजाब के एक छोटे से ग्रामीण शहर, मनसा से ताल्लुक रखते हैं।
प्रत्येक भूमिका के साथ अपने बदलते लुक के लिए जाने जाने वाले, उन्होंने बिग ब्रदर (बॉलीवुड, 2007) जोधा अकबर
 (बॉलीवुड, 2008), कॉफी हाउस
 (बॉलीवुड, 2009), विरसा 
(पाकिस्तानी, 2010), इक कुड़ी पंजाब दी
 (पंजाबी सिनेमा, 2010), खलेजा 
(तेलुगु, 2010), इंडियन पुलिस 
(तेलुगु, 2011) और अज दे सहित बॉलीवुड, पॉलीवुड, पाकिस्तानी और तेलुगु फिल्मों में काम किया है। 
रांझे (रिलायंस प्रोडक्शन पंजाबी सिनेमा, 2012) लेदर लाइफ (पंजाबी हिंदी, अंग्रेजी)जट्ट बॉयज पुट्ट जट्टां दे "(पंजाबी) साका (शहीद) (पंजाबी, अंग्रेजी)
●▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬●
  ꧁
पंजाबी अभिनेता अमन धालीवाल अमेरिका में चाकू से हुए हमले में गंभीर रूप से घायल हुए थे. यह हमला उस समय हुआ जब वह जिम में थे. इस घटना का सीसीटीवी फुटेज भी सामने आया है. हमले का कारण अभी तक पता नहीं चल सका है.

बुधवार, 19 अप्रैल 2023

*शास्त्रीय बांसुरी के जन्मदाता महान बांसुरी वादक पन्ना लाल घोष की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रधांजलि*

*शास्त्रीय बांसुरी के जन्मदाता महान बांसुरी वादक पन्ना लाल घोष की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रधांजलि*

पन्नालाल घोष भारत के प्रसिद्ध बाँसुरी वादक थे। पंडित पन्नालाल घोष बांसुरी के मसीहा नयी बांसुरी के जन्मदाता और भारतीय शास्त्रीय संगीत का युगपुरुष जिसने लोक वाद्य बाँसुरी को शास्त्रीय के रंग में ढालकर शास्त्रीय वाद्य यंत्र बना दिया।

अमल ज्योति घोष के नाम से जाने जाने वाले पंडित पन्नालाल घोष का जन्म 24 जुलाई , 1911 में पूर्वी बंगाल के बारीसाल में हुआ था। शुरू में उनका परिवार अमरनाथगंज के गांव में रहता था जो बाद में फतेहपुर आ गया। उनका जन्म संगीत सुधी परिवार में हुआ था। उनके पिता अक्षय कुमार घोष सितार वादक थे और उनकी मां सुकुमारी गायक थीं।

हारमोनियम उस्ताद खुशी मोहम्मद ख़ान उनके पहले गुरु थे और ख्याल गायक पंडित गिरजा शंकर चक्रवर्ती एवं उस्ताद अलाउद्दीन ख़ान साहब से भी उन्होंने शिक्षा हासिल की थी। 1940 में पन्नाबाबू ने संगीत निर्देशक अनिल विश्वास की बहन और जानी मानी पार्श्व गायिका पारुल घोष से विवाह कर लिया। इसके पहले 1938 में पन्नालाल घोष ने यूरोप का दौरा किया और वे उन आरंभिक शास्त्रीय संगीतकारों में से एक थे जिन्होंने विदेश में कार्यक्रम पेश किया। बांसुरी के जन्मदाता पन्नाबाबू शास्त्रीय बांसुरी के जन्मदाता हैं और उन्हें बांसुरी का मसीहा कहना समीचीन होगा। जिन्हें बांसुरी को लोक वाद्य से शास्त्रीय वाद्य यंत्र के रूप में स्थापित करने का श्रेय जाता हैं। उनके अथक प्रयासों का ही परिणाम था कि 1930 में उनका पहला एलपी जारी हुआ। आने वाली सदियां पन्ना बाबू के काम को कभी भूल नहीं सकती हैं। उन्हीं का प्रयास है कि कृष्ण कन्हैया की बांसुरी का आज के फ्यूजन संगीत में भी अहम स्थान है। बांसुरी को शास्त्रीय वाद्य के रूप में लोगों के दिलों में बसाने का काम पन्ना बाबू ने शुरू किया था और पंडित हरिप्रसाद
चौरसिया जैसे बांसुरी वादकों ने इस वाद्य यंत्र को विदेशों में लोकप्रिय कर दिया। पन्नालाल जी ने कई फ़िल्मों में भी बांसुरी बजाई थी, जो आज भी अद्वितीय है। जिनमें मुग़ले आज़म , बसंत बहार, बसंत, दुहाई, अंजान और आंदोलन जैसी कई प्रसिद्ध फ़िल्में प्रमुख हैं जिसके संगीत के साथ पंडित पन्नालाल घोष का नाम जुड़ा रहा।

पारंपरिक भारतीय वाद्य यंत्र बांसुरी की अतुल्य विरासत अपने शिष्य और प्रशंसकों के हाथों में सौंप कर 20 अप्रैल 1960 में पन्नाबाबू हमेशा के लिए इस दुनिया से कूच कर गये। पन्नालाल जी की बांसुरी जब आज भी सुनते हैं तो उनकी मिठास तथा विविधता का कोई जोड़ नज़र नहीं आता। उनका बजाया हुआ राग मारवा तथा अन्य राग जब आज सुनते हैं तो अध्यात्मिक अहसास
होने लगता है।

आशा भोसले

आशा भोसले 🎂08 सितंबर 1933 ⚰️12 अप्रैल 2026 जन्म की तारीख और समय: 8 सितंबर 1933, सांगली मृत्यु की जगह और तारीख: 12 अप्रैल 2026 ब...