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बुधवार, 31 मई 2023

आनंद मिलंद

प्रसिद्ध संगीतकार जोड़ी आनंद मिलिंद के मिलिंद श्रीवास्तव के जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनाएं

आनंद और मिलिंद एक भारतीय संगीत निर्देशक-जोड़ी हैं जिसमें आनंद श्रीवास्तव और उनके छोटे भाई मिलिंद शामिल हैं।  उन्होंने 200 से अधिक बॉलीवुड फिल्मों के लिए संगीत तैयार किया है और वे 60 के दशक के संगीत निर्देशक चित्रगुप्त के बेटे हैं।  उन्होंने `अब आएगा मजा` (1984) में शुरुआत की और `कयामत से कयामत तक` (1988) की सफलता के बाद उनकी प्रसिद्धि काफी बढ़ गयी  उसी वर्ष हॉरर फ्लिक `वो फिर आएगी` की मध्यम सफलता भी देखी गई।  'लाल दुपट्टा मलमल का' ने 1989 में म्यूजिक स्टैंड पर धूम मचा दी।

 दोनों ने सलमान खान की फिल्म 'बागी: ए रिबेल फॉर लव' के लिए गाने तैयार किए, इसके बाद बॉक्स ऑफिस पर 'दिल', 'बेटा' (1992) और 'लव' (1991) जैसी हिट फिल्में दीं।  1994 में उन्होंने राहुल रवैल की `अंजाम` के लिए भी संगीत तैयार किया, जिसमें माधुरी दीक्षित और शाहरुख खान ने अभिनय किया।  `सुहाग` (1994), अजय देवगन, अक्षय कुमार करिश्मा कपूर और नगमा अभिनीत, एक और फिल्म है जिसने उस वर्ष काफी सफ़लताये हासिल की  1994 में उनके सबसे अच्छे एल्बमों में से एक विक्रम भट्ट निर्देशित रोमांटिक फिल्म `मदहोश` थी, जिसने आमिर खान के भाई फैसल खान को लॉन्च किया था।  90 के दशक के अंत में उन्होंने मिथुन चक्रवर्ती की कई फिल्मों के लिए संगीत तैयार किया मगर वह संगीत ज़्यादा लोकप्रिय नही हुआ

उन्होंने कुछ भोजपुरी फिल्मों के लिए संगीत भी तैयार किया है।  आनंद-मिलिंद ने `कयामत से कयामत तक` में आमिर खान और जूही चावला सहित कई बॉलीवुड सितारों को लॉन्च करने में भूमिका निभाई;  बागी में सलमान खान और नगमा;  सौगंध में अक्षय कुमार और प्रेम कैदी में करिश्मा कपूर  उन्होंने गायकों उदित नारायण, अभिजीत, पूर्णिमा, गायत्री अय्यर और परवेज के गॉड-फादर की भूमिका निभाई।

पेशा:संगीत

जन्म:1 जनवरी, 1900

जन्म स्थान:भारत

आनंद श्रीवास्तव और उनके छोटे भाई, मिलिंद श्रीवास्तव की संगीतकार जोड़ी, 200 से अधिक बॉलीवुड फिल्मों के लिए संगीत रचना के लिए प्रसिद्ध है । वे 1960 के दशक के पूर्व संगीत निर्देशक चित्रगुप्त के पुत्र हैं। 1984 में अब आएगा मज़ा के साथ अपनी शुरुआत करने के बाद, यह जोड़ी ब्लॉकबस्टर कयामत से कयामत तक (1988) से प्रसिद्ध हुई, जिसके लिए उन्होंने फिल्मफेयर पुरस्कार जीता। उनके उल्लेखनीय फिल्म क्रेडिट में बेटा (1992), जिगर (1992), राजा बाबू (1993), क्रांतिवीर (1994), अजय (1996) और दिल्लगी (1999) शामिल हैं।

प्रमुख फ़िल्में आनंद मिलंद

आई मिलन की रात १९९१,
आज़माइश १९९५,
अधर्म १९९२,
अनाड़ी १९९३,
अंजाम १९९४,
आर्मी १९९६,
बागी - ए रेबेल फॉर लव १९९०,
बेताज बादशाह १९९४,
बोल राधा बोल १९९२,
छुपा रुस्तम २००१,
छोटे सरकार १९९६,
दीदार १९९२,
दीवाना मुझ सा नहीं १९९०,
दिल १९९०,
दिल आशना है १९९२,
एक लड़का एक लड़की १९९२,
गेम १९९३,
घर जमाई १९९२,
हीरो नं॰ 1 १९९७,
होगी प्यार की जीत १९९९,
इन्साफ १९९७,
जान १९९६,
जानी दुश्मन २००२,
जानवर १९९९,
लाड़ला १९९४,
लाल दुपट्टा मलमल का १९८९,
लोफर १९९६,
लुटेरे १९९३,
प्लेटफॉर्म १९९२,
क़यामत से क़यामत तक १९८८,
राजा बाबू १९९४,
रक्षक १९९६,
सनम १९९७,
गोपी किशन १९९४,
सौतन २००६,
सुहाग १९९४,
तीसरा कौन १९९४,
तुम मेरे हो १९९०,
वंश १९९२,
ये तेरा घर ये मेरा घर २००१
गैर १९९९
कुली नं॰ 1 १९९५

कल्पना लाजमी

कल्पना लाजमी
*🎂जन्म की तारीख और समय: 31 मई 1954*
*🕯️मृत्यु की जगह और तारीख: 23 सितंबर* 

फ़िल्म मेकर कल्पना लाजमी के जन्मदिन पर हार्दिक श्रधांजलि

समझने के लिए, वे हिंदी सिनेमा की सबसे ज़रूरी महिला डायरेक्टर्स में से एक थीं. वैसे कल्पना लाजमी को पसंद नहीं था कि उनको ‘महिला फिल्ममेकर’ कहा जाए. वे बस फिल्ममेकर थीं. जीवन में उन्होंने सिर्फ 6 फीचर फिल्में डायरेक्ट कीं. लोग ‘रुदाली’ और ‘दमन’ से आगे नहीं जा पाते मगर उनकी पहली ही फिल्म ऐसी औरत की कहानी थी जो शादी के बाहर एक पुरुष से संबंध बनाती है और उसे पाप नहीं मानती. कल्पना ने ख़ुद का जीवन भी ऐसे ही जिया. 17 की उमर में जब ज़ेवियर्स जैसे ग्लैमरस कॉलेज पढ़ रही थीं, तब वामपंथी विचारों वाले एक क्षेत्रीय गायक और कलाकार को देखकर सम्मोहित हो गईं. और अगले 40 बरस उनका रिश्ता चला. दोनों ने जीवनपर्यन्त विवाह नहीं किया. सहूलियत की जिंदगी जीने वाली इस लड़की को कई तकलीफें आईं, लेकिन उन्होंने जीवन का सारा ज़हर पिया. सदा किया वही जो उनको करना था. रविवार, 23 सितंबर 2018 के भोर अंधेरे वे चली गईं
 जो उन्हें नहीं जानते उनके लिए कुछ बातें और कल्पना की याद.

पेंटर ललिता लाजमी की बेटी थीं. वही जो ‘तारे जमीं पर’ (2007) में बच्चों की पेंटिंग प्रतियोगिता की जज बनकर आती हैं.

कागज़ के फूल’ (1959) और ‘प्यासा’ (1957) जैसी महान फिल्में बनाने वाले गुरु दत्त उनके सगे मामा थे.

वे 31 मई 1954 को पैदा हुईं. बंबई में बड़ी हुई. घर में उनके अलावा उनका भाई देवदास था. सभ्रांत वर्ग से थीं. परिवार प्रगतिशील था. लेकिन कल्पना का कहना था कि उनका बचपन पीड़ा भरा रहा. उनके पिता शराब बहुत पीते थे और इससे वे बहुत परेशान होती थीं.

उनके जीवन में दो ही पुरुष थे जिनसे वो सबसे ज्यादा प्रभावित हुई. पहले थे उनके पिता गोपी लाजमी जो नेवी में कैप्टन थे. और दूसरे सिंगर, गीतकार और आर्टिस्ट भूपेन हजारिका.

शुरू से कल्पना बाग़ी और आक्रामक नहीं थीं. वे मासूम और अवाक आंखों वाली थीं. मिल्स एंड बून रोमैंस नॉवेल पढ़कर जवानी में कदम रखे. लेकिन बाद में उन्होंने अपनी फिल्मों में ठोस, ज़मीनी और मुश्किल महिला पात्र रचे.

कल्पना ने 1971 में बंबई के सेंट ज़ेवियर्स कॉलेज से साइकोलॉजी की पढ़ाई की. वहां उनकी मुलाकात भूपेन हज़ारिका से हुई जो कल्पना के ही अंकल आत्मा राम की फिल्म ‘आरोप’ के लिए म्यूजिक बना रहे थे. तब कल्पना सिर्फ 17 साल की थीं. वे भूपेन की रचनात्मकता, आवारगी, बाग़ीपन और बेतरतीब व्यक्तित्व से बहुत आकृष्ट हो गईं. पांच साल रिश्ते में रहने के बाद वे सबकुछ छोड़ कलकत्ता में भूपेन के फ्लैट में रहने लगीं. शुरू में उनके पिता को लगा कि ये आकर्षण जल्द ही खत्म हो जाएगा. लेकिन ऐसा नहीं हो पाया और उनका-भूपेन का रिश्ता 40 साल चला. उन दोनों ने कभी शादी नहीं की. लंबे समय तक असम के पारंपरिक समाज ने इस रिश्ते को स्वीकार नहीं किया. दोनों को दिक्कतें आईं. कल्पना की मां ललिता भी कभी उनके इस रिश्ते के पक्ष में नहीं थीं.

फिल्मों में उनकी शुरुआत श्याम बेनेगल को असिस्ट करने से हुई. उनकी फिल्म ‘भूमिका’ (1977) में वे कॉस्ट्यूम असिस्टेंट थीं. बाद में बेनेगल की फिल्म ‘मंडी’ (1983) में वो असिस्टेंट डायरेक्टर बन गईं. उन दिनों में देव बेनेगल (इंडियन ऑगस्ट, रोड़ मूवी) भी उनके साथ ही असिस्टेंट थे. देव याद करते हैं कि “वो ऊर्जा का भंडार थीं. वो अपने आस-पास के पुरुषों को असहज करती थीं क्योंकि अपने अधिकारों, अपने नजरिए और कहानी को अपने ढंग से कहने के लिए आक्रामक तरीके से खड़ी रहती थीं. वो दोस्तों की दोस्त थीं. सेंस ऑफ ह्यूमर था. खाने से प्यार था. फिल्मों का पैशन था.”

देव आनंद ने कल्पना को अपनी फिल्म ‘हीरा पन्ना’ (1973) में ज़ीनत अमान वाला रोल ऑफर किया था. पर उन्होंने मना कर दिया.

साल 1978 में कल्पना ने भूपेन ह़ज़ारिका के साथ मिलकर अपनी कंपनी शुरू की. उसी के अंतर्गत अपनी पहली डॉक्यूमेंट्री ‘डी. जी. मूवी पायोनियर’ (1978) डायरेक्ट की. ये फिल्म बंगाली फिल्ममेकर धीरेन गांगुली की लाइफ पर बेस्ड थी.

उन्होंने 1986 में अपनी पहली फीचर फिल्म ‘एक पल’ डायरेक्ट की. इसमें शबाना आज़मी, नसीरुद्दीन शाह, फारुख़ शेख़, दीना पाठक और श्रीराम लागू लीड रोल में थे. कल्पना और गुलज़ार ने इसकी स्क्रिप्ट लिखी थी. हज़ारिका ने म्यूजिक कंपोज किया था. ये अपने समय से काफी आगे की फिल्म थी. एक ऐसी औरत की कहानी थी जो शादीशुदा होने के बाद भी किसी दूसरे पुरुष के साथ संबंध बनाना स्वीकार करती है. और इसे लेकर उसे कोई पछतावा नहीं होता है. वो नतीजे भुगतने के लिए पूरी तरह तैयार होती है.

कल्पना ने 1988 में दूरदर्शन के लिए ‘लोहित किनारे’ नाम का सीरियल डायरेक्ट किया. इसमें तनवी आज़मी लीड रोल में थीं. इन्हीं तनवी ने ‘बाजीराव मस्तानी’ में पेशवा बाजीराव बने रणवीर सिंह की मां राधाबाई का रोल किया था.

वे और बॉलीवुड एक्ट्रेस दीपिका पादुकोण दूर के रिश्तेदार थे, लेकिन दीपिका को शायद ये पता नहीं था. कल्पना का कहना था – “दीपिका और मैं सारस्वत ब्राह्मण हैं. उनकी और मेरी फैमिली की जड़ें कश्मीर में हैं. हम कश्मीरी पंडित हैं जो वहां से बैंगलोर आकर बस गए थे. मेरे मामा गुरु दत्त बैंगलोर में रहते थे और दीपिका के पिता प्रकाश पादुकोण भी. दीपिका पक्का मेरी रिश्तेदार हैं, हालांकि उनको ये पता नहीं होगा.”

उनकी सबसे यादगार और अमर कर देने वाली फिल्म ‘रुदाली’ (1993) है जिसे बेस्ट एक्ट्रेस का नेशनल अवॉर्ड मिला था. इस साल फिल्म की रिलीज को 25 साल हो गए है. ये बंगाली लेखिका महाश्वेता देवी की लिखी लघु-कथा पर आधारित थी. फिल्म राजस्थान में बेस्ड ऐसी औरतों के बारे में थी जिनको किसी के मरने पर पैसा देकर रोने के लिए बुलाया जाता है. उन्हें रुदालियां (रुदन करने वाली) कहा जाता है. डिंपल कपाड़िया ने ऐसी ही ग्रामीण औरत शनीचरी का रोल किया था. शूटिंग के दौरान वे सख़्त हालात में रहीं. राजस्थान में शूटिंग के दौरान उनको निमोनिया हो गया था. उनके अलावा अभिनेत्री राखी फिल्म में बिनकी नाम की रुदाली बनी थीं. दुनिया जहान में इस फिल्म को सराहा गया, अवॉर्ड मिले. लेकिन राखी नाराज हो गई थीं. उनका कहना था कि डायरेक्टर कल्पना ने उनके सीन काट दिए और डिंपल कपाड़िया का रोल मजबूत कर दिया. जबकि ये दो हीरोइन वाली फिल्म थी और उनका रोल भी बराबरी का होना था. ख़ैर, इस फिल्म की विरासत ऐसी है कि लंबे समय तक बनी रहेगी. इसके गीत कभी भुलाए न जा सकेंगे.

उसके बाद कल्पना ने ‘दरमियान’ (1997) डायरेक्ट की. इसमें किरण खेर, आरिफ ज़कारिया, तबु और सयाजी शिंदे जैसे एक्टर्स थे. ये 1940 और 50 के हिंदी फिल्म उद्योग में सेट कहानी है. इसमें एक एक्ट्रेस है जिसका करियर उतार पर है. उसे एक बेटा पैदा होता है. जिसे हर्माफ्रोडाइट (hermaphrodite) नाम की मेडिकल कंडीशन है. वो पुरुष और स्त्री दोनों के सम्मिलित, अविकसित जननांगों के साथ पैदा होता है. इस स्थिति वालों को समाज मोटे तौर पर हिजड़ा कहने लगता है लेकिन दोनों अलग-अलग होते हैं. कहानी में आगे मां और बेटे का एक जटिल रिश्ता नजर आता है. ये भी कि तब का फिल्म उद्योग कैसा था और तब हिजड़ों की स्थिति कैसी थी. पहले इस रोल में शाहरुख खान को लिया गया था. लेकिन बाद में उन्होंने मना कर दिया. तब दूसरे एक्टर्स को ट्राई किया गया. अंत में आरिफ ज़कारिया ने ये रोल किया.

उसके बाद ‘दमन’ (2001) आई. शादी के बाद पति द्वारा पत्नी का रेप यानी मैरिटल रेप इसका विषय था. ये एक तरह की घरेलू हिंसा और रेप है जिससे न जाने कितनी पत्नियां उत्पीड़ित होती हैं. लेकिन ज्यादातर इसे लेकर जागरूक नहीं होतीं और होती हैं तो चुप रहती हैं. भारत सरकार के परिवार कल्याण विभाग ने इस सामाजिक विषय पर कुछ करने के लिए कल्पना लाजमी से संपर्क किया था. उन्होंने ‘दमन’ की कहानी लिखी. कहानी परिवार कल्याण विभाग को पसंद आई और उन्होंने इसमें पैसा लगाया. रवीना टंडन ने इसमें दुर्गा नाम की युवती का रोल किया जिसका हिंसक पति (सयाजी शिंदे) उसके साथ मैरिटल रेप करता है. कल्पना की इस फिल्म से रवीना को बेस्ट एक्ट्रेस का नेशनल अवॉर्ड मिला था.

उन्होंने ‘सिंहासन’ नाम से एक स्क्रिप्ट लिखी हुई थी. ये एक पोलिटिकल ड्रामा होनी थी. कल्पना इसमें ऐश्वर्या राय को लीड रोल में लेना चाहती थीं. अगर ऐसा हो पाता तो ऐश्वर्या के करियर की पहली फिल्म होती जिसमें वे किसी राजनेता का रोल करतीं.

बतौर डायरेक्टर उनकी अंतिम दो फिल्में ‘क्यों’ (2003) और ‘चिंगारी’ (2006) थीं. ‘चिंगारी’ में सुष्मिता सेन ने एक गांव की वेश्या बसंती का रोल किया था जिसके साथ गांव का मुख्य पुजारी (मिथुन चक्रवर्ती) रेप करता है. गांव में नया आया डाकिया चंदन (अनुज साहनी) बसंती से प्यार करने लगता है. उनकी शादी होने वाली होती है लेकिन पुजारी उसकी हत्या कर देता है. अंत में बसंती उसका संहार करती है. कल्पना की इन दो फिल्मों को छोड़ दें तो बाकी सब प्रशंसनीय थीं.

काफी वर्षों से वे किडनी के कैंसर का इलाज करवा रही थीं. इस कठिन समय में उनकी पक्की दोस्त सोनी राजदान उनके साथ खड़ी थीं. जो लाखों रुपये का खर्चा आता रहा, उसमें मदद करती रहीं. उनके अलावा आलिया भट्ट, रोहित शेट्टी, आमिर खान, सलमान खान, जावेद अख़्तर, शबाना आज़मी, नीना गुप्ता और उनके पुराने दोस्तों ने भी वित्तीय मदद की. उनकी दोनों किडनी निकाली जा चुकी थी और वे डायलसिस पर थीं इसके बावजूद उनको यकीन था कि वे ठीक हो जाएंगी. कल्पना ने याद किया था कि इस वक्त में उनकी मां ललिता लाजमी उनके लिए सबसे बड़ा सपोर्ट रहीं.

उन्होंने कहा था कि वे फिर से फिल्में बनाने के लिए बेचैन हो रही हैं. जैसे ही पैरों पर खड़ी होंगी, लौटेंगी. उन्होंने अपने जीवनसाथी भूपेन हजारिका पर बुक भी लिखी – Bhupen Hazarika – The Way I Knew Him. वे भूपेन के जीवन पर ‘द टेम्पेस्ट’ नाम से फिल्म बनाने की प्लानिंग भी कर चुकी थी, कास्टिंग भी चल रही थी. उनसे पहले पूजा भट्ट ये फिल्म बनाना चाहती थीं.

अपने जीवन को लेकर उनका कहना था कि तमाम कष्टों के बीच उन्होंने जो भी जीवन जिया उसे उसकी संपूर्णता में जिया और हरेक दिन को आनंद लेकर जिया. बीमारी ने जब उनको पूरी तरह तोड़ दिया था तो भी उनका कहना था – “मेरी किडनीज़ फेल हुई हैं, मैं नहीं.”


मंगलवार, 30 मई 2023

अनिल विश्वास



🔛अनिल कृष्ण विश्वास

*🎂7 जुलाई 1914*
* 🕯️31 मई 2003*

जिन्हें पेशेवर रूप से अनिल विश्वास के नाम से जाना जाता है , 1935 से 1965 तक एक भारतीय फिल्म संगीत निर्देशक और पार्श्व गायक थे, जो पार्श्व गायन के अग्रदूतों में से एक होने के अलावा , पहले के लिए भी श्रेय दिया जाता है। भारतीय सिनेमा में बारह टुकड़ों का भारतीय ऑर्केस्ट्रा और आर्केस्ट्रा संगीत और पूर्ण-रक्त वाले कोरल प्रभाव पेश करना ।  पश्चिमी स्वर संगीत में एक मास्टर भारतीय शास्त्रीय या लोक तत्वों, विशेष रूप से अपने संगीत में बाउल और भटियाली के लिए जाना जाता था ।उनकी 90 से अधिक फिल्मों में से सबसे यादगार फिल्में थीं, रोटी (1942), किस्मत (1943), अनोखा प्यार (1948), तराना (1951), वारिस (1954), परदेसी (1957) और चार दिल चार राहेन (1959)।

*फिल्मोग्राफी*

धरम की देवी (1935)
फ़िदा-ए-वतन (उर्फ तस्वीर-ए-वफ़ा ) (1935, झंडे खान के साथ सह-संगीतकार )
पिया की जोगन (उर्फ खरीदी हुई दुल्हन )
प्रतिमा (उर्फ प्रेम मूर्ति )
प्रेम बंधन (उर्फ विक्टिम्स ऑफ लव ) (1936, झंडे खान के साथ सह-संगीतकार )
संगदिल समाज
शेर का पंजा
शोख दिलरुबा (1936, सुंदर दास के साथ)
बुलडॉग (1936)
दुखियारी (उर्फ ए टेल ऑफ़ सेल्फलेस लव ) (1936, मधुलाल दामोदर मास्टर के साथ)
जेंटलमैन डाकू (1937)
जागीरदार (1937)
कोकिला (1937)
महागीत (1937)
वतन (1938)
तीन सौ दिन के बाद (1938)
हम तुम और वो (1938)
ग्रामोफोन सिंगर (1938)
डायनामाइट (1938)
अभिलाषा (1938)
जीवन साथी (1939)
एक ही रास्ता (1939)
पूजा (1940)
औरत (1940)
अलीबाबा (1940/आई)
बहन (1941)
आसरा (1941)
विजय (1942)
जवानी (1942)
किस्मत (1943)
हमारी बात (1943)
ज्वार भाटा (1944)
पहली नज़र (1945)
भूख (1947)
मांझधर (1947)
वीना (1948)
गजरे (1948)
अनोखा प्यार (1948)
लाडली (1949)
जीत (1949)
लड़कियों का स्कूल (1949)
बेकसूर (1950)
आरजू (1950)
लाजवाब (1950)
तराना (1951)
दो सितारे (1951)
आराम (1951)
दो राह (1952)
राही (1952)
मेहमान (1953)
जलियांवाला बाग की ज्योति (1953)
फरेब (1953)
आकाश (1953)
वारिस (1954)
नाज़ (1954)
महात्मा कबीर (1954)
मान (1954)
जासूस (1957)
जलती निशानी (1955)
फरार (1955)
दू-जने (1955)
पैसा ही पैसा (1956)
हीर (1956)
परदेसी (1957 फ़िल्म) (1957)
अभिमान (1957)
संस्कार (1958)
चार दिल चार राहें (1959)
मिस्टर सुपरमैन की वापसी (उर्फ मिस्टर सुपरमैन की वापसी ) (1960)
अंगुलिमाल (1960)
सौतेला भाई (1962)
छोटी छोटी बातें (1965)
📌वह फिल्म के स्कोर में काउंटर मेलोडी का उपयोग करने में भी अग्रणी थे, पश्चिमी संगीत की तकनीक, 'कंटाला' को नियोजित करते थे, जहां एक पंक्ति दूसरे को कॉन्ट्रा-मेलोडी में ओवरलैप करती थी, रोटी (1942) के रूप में गद्य गीत, इसके अलावा वह पहले थे एक रागमाला का बड़े पैमाने पर उपयोग शुरू करने के लिए । एक अन्य महत्वपूर्ण तत्व जो उन्होंने पेश किया, वह पश्चिमी आर्केस्ट्रा था, जिसमें गीतों के साथ-साथ उनके मधुर अंतर्संबंधों में स्वदेशी वाद्ययंत्रों का उपयोग किया गया था, एक प्रवृत्ति जो आज भारतीय सिनेमा के संगीत के लिए जल्द ही पकड़ी और मार्ग प्रशस्त किया। 

उन्हें 1986 में संगीत नाटक अकादमी , भारत की संगीत, नृत्य और नाटक की राष्ट्रीय अकादमी द्वारा दिए गए संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। 

वनराज भाटिया


वनराज भाटिया

*🎂जन्म- 31 मई, 1927;*

*🕯️मृत्यु- 7 मई, 2021*

*भारतीय हिन्दी फ़िल्मों के प्रसिद्ध संगीतकार थे। उन्होंने अमिताभ बच्चन और ऋषि कपूर के अअभिनय से सजी फ़िल्म 'अजूबा' का संगीत दिया था। 'तमस', 'अंकुर', 'मंथन', 'मंडी', 'जुनून' और 'कलयुग' जैसी फिल्मों में भी वनराज भाटिया ने संगीत दिया।*

*भाटिया टेलीविजन फिल्म तमस (1988) के लिए सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशन के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार , रचनात्मक और प्रायोगिक संगीत के लिए संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1989) और भारत के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान, पद्म श्री (2012) के प्राप्तकर्ता थे ।*

🔛प्रारंभिक जीवन और शिक्षा



कच्छी व्यवसायियों के परिवार में जन्मे, भाटिया ने बॉम्बे में न्यू एरा स्कूल में पढ़ाई की और देवधर स्कूल ऑफ़ म्यूज़िक में एक छात्र के रूप में हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत सीखा। एक किशोर के रूप में त्चैकोव्स्की के पियानो कॉन्सर्टो नंबर 1 को सुनने पर , उन्हें पश्चिमी शास्त्रीय संगीत में दिलचस्पी हो गई और उन्होंने चार साल तक डॉ मानेक भगत के साथ पियानो का अध्ययन किया।

1949 में एल्फिंस्टन कॉलेज , बॉम्बे विश्वविद्यालय से अपना एमए (अंग्रेजी ऑनर्स) अर्जित करने के बाद , भाटिया ने रॉयल एकेडमी ऑफ म्यूजिक , लंदन में हावर्ड फर्ग्यूसन , एलन बुश और विलियम अल्विन के साथ रचना का अध्ययन किया , जहां वे सर माइकल कोस्टा छात्रवृत्ति के प्राप्तकर्ता थे। (1951-54)। 1954 में स्वर्ण पदक के साथ स्नातक होने के बाद, भाटिया ने एक रॉकफेलर छात्रवृत्ति (1954-58) और साथ ही एक फ्रांसीसी सरकार छात्रवृत्ति (1957-58) जीती, जिसने उन्हें पांच साल के लिए कंसर्वेटोएरे डे पेरिस में नादिया बूलैंगर के साथ अध्ययन करने की अनुमति दी। .

🔛आजीविका

1959 में भारत लौटने पर, भाटिया भारत में एक विज्ञापन फिल्म (शक्ति सिल्क साड़ियों के लिए) के लिए संगीत बनाने वाले पहले व्यक्ति बने, और लिरिल ,  गार्डन वरेली और 7,000 से अधिक जिंगल्स की रचना की। डुलक्स । इस दौरान वे 1960 से 1965 तक दिल्ली विश्वविद्यालय में पश्चिमी संगीतशास्त्र के रीडर भी रहे।

भाटिया की पहली फीचर फिल्म स्कोर श्याम बेनेगल के निर्देशन में बनी अंकुर (1974) के लिए थी, और उन्होंने बेनेगल के लगभग सभी कामों को स्कोर किया, जिसमें फिल्म मंथन (1976) का गीत "मेरो गाम कथा पारे" भी शामिल था। भाटिया ने मुख्य रूप से भारतीय न्यू वेव आंदोलन में फिल्म निर्माताओं के साथ काम किया , जैसे गोविंद निहलानी ( तमस , जिसने भाटिया को सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशन के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीता ), कुंदन शाह ( जाने भी दो यारो ), अपर्णा सेन ( 36 चौरंगी लेन ), सईद अख्तर मिर्जा ( मोहन जोशी हाजिर हो! ),कुमार शाहनी ( तरंग ), विधु विनोद चोपड़ा ( खामोश ), विजया मेहता ( पेस्टोंजी ) और प्रकाश झा ( हिप हिप हुर्रे )।

भाटिया ने जवाहरलाल नेहरू की द डिस्कवरी ऑफ इंडिया पर आधारित खानदान , यात्रा , वागले की दुनिया , बनेगी अपनी बात और 53-एपिसोड भारत एक खोज जैसे टेलीविज़न शो के साथ-साथ कई वृत्तचित्र बनाए हैं। उन्होंने म्यूजिक टुडे लेबल पर आध्यात्मिक संगीत के एल्बम भी जारी किए हैं, और एक्सपो '70, ओसाका और एशिया 1972, नई दिल्ली जैसे व्यापार मेलों के लिए संगीत तैयार किया है।

भाटिया भारत में पश्चिमी शास्त्रीय संगीत के सबसे प्रसिद्ध संगीतकार हैं। पियानो के लिए फंतासिया और फ्यूग्यू इन सी , स्ट्रिंग्स के लिए सिनफ़ोनिया कॉन्सर्टेंटे और गीत चक्र सिक्स सीज़न उनकी सबसे अधिक बार की जाने वाली रचनाएँ हैं । उनका रेवेरी जनवरी 2019 में मुंबई में एक संगीत कार्यक्रम में यो-यो मा द्वारा प्रदर्शित किया गया था , और गिरीश कर्नाड के इसी नाम के नाटक पर आधारित उनके ओपेरा अग्नि वर्षा के पहले दो कृत्यों का न्यूयॉर्क शहर में प्रीमियर हुआ था। 2012 में सोप्रानो जूडिथ केलॉक द्वारा प्रोडक्शन में।

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मौत


भाटिया का 7 मई, 2021 को वृद्धावस्था के कारण मुंबई में उनके घर पर निधन हो गया।

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🔛एकल पियानो के लिए संगीत

राग बहार में टोकाटा नंबर 1 (सी। 1950)
सोनाटा (1952)
परिचय और प्रतिगामी (1959)
फंटासिया और फ्यूग्यू इन सी (1999)
"अग्नि वर्षा" पर रैप्सोडी (2007)
गुजराती नर्सरी (2010

🔛टेलीविजन स्कोर
संपादन करना
खानदान (1985)
कथा सागर (1986) - चयनित एपिसोड
यात्रा (1986)
तमस (1987)
भारत एक खोज (1988)
नकाब (1988)
वागले की दुनिया (1988)
लाइफलाइन (1991)
बैंगन राजा (सी. 1990 के दशक)
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रविवार, 21 मई 2023

उज्जरा भट



जन्म तिथि: 22 मई-1917

जन्म स्थान: रामपुर, उत्तर प्रदेश, भारत

मृत्यु तिथि: 31-मई-2010

पेशा: नर्तकी

राष्ट्रीयता: पाकिस्तान

  • उज़रा बट नी मुमताज़ (22 मई 1917 - 31 मई 2010) भारतीय उपमहाद्वीप की एक थिएटर हस्ती थीं, जो 1964 में पाकिस्तान चली गईं।
  • वह थिएटर और बॉलीवुड फिल्म अभिनेत्री ज़ोहरा सहगल की बहन थीं, जो उनके विपरीत भारत में रहती थीं। 1937 में शुरू होकर, पारंपरिक बाधाओं को तोड़ते हुए, वह और उनकी बहन उदय शंकर बैले कंपनी में अभिनेताओं और नर्तकियों के रूप में शामिल हुईं और यूरोप और संयुक्त राज्य अमेरिका का दौरा किया।
  • जब द्वितीय विश्व युद्ध ने उनका दौरा समाप्त किया, तो वह इप्टा में शामिल हो गईं और बाद में 1940 और 1950 के दशक में पृथ्वी थिएटर की अग्रणी महिला बनी रहीं।

एक नज़र में अगर उन्हे कोई देखता तो यही कहता, ये तो ज़ोहरा सहगल हैं. लेकिन वो थीं उज़रा बट्ट.

बहनों की शक्ल मिलना कोई अनहोनी बात नहीं है और दोनों अपने मिलने वालों की इस उलझन का ख़ासा मज़ा लूटती थीं.

उनके चाहने वाले उन्हे दक्षिण एशिया की ग्रैंड ओल्ड लेडीज़ या भारतीय उपमहाद्वीप की दो नानियां भी कहते थे. लेकिन एक नानी भारत में और एक पाकिस्तान में.

पाकिस्तान में बसी नानी उज़रा बट्ट अब हमारे बीच नहीं है.

उज़रा बट्ट का 93 साल की उम्र में लाहौर में इंतकाल हो गया है.

उज़रा बट्ट का जन्म 1915 में रामपुर में हुआ था.

उज़रा बट् 1941 में पृथ्वी राज कपूर के संपर्क में आईं और क़रीब दो दशक तक पृथ्वी थियेटर की लोकप्रिय नायिका रहीं. उन्होंने ‘ग़द्दार’,’शकुंतला’,’आहुति’ और ‘कलाकार’ जैसे मशहूर नाटक किये.

ख़्वाजा अहमद अब्बास के नाटक ‘ज़ुबैदा’ में उन्होंने प्रमुख भूमिका निभाई जिसे ख़ूब सराहा गया.

उज़रा बट्ट ने पहली बार अपनी बहन ज़ोहरा सहगल के साथ ‘एक थी नानी’ नाटक किया जो भारत, पाकिस्तान और ब्रिटेन में खूब लोकप्रिय हुआ.

देहरादून में बच्पन

अक्तूबर 2006 में अजोका थियेटर ग्रुप की मादीहा गौहर के साथ उन्होने देहरादून में ‘दुख का दरिया’ नाटक किया था. उस समय उनकी उम्र 90 के क़रीब पहुंच रही थी.

इसी दौरान मुझे उनसे मिलने और बातचीत करने का अवसर मिला.

अपने बच्पन के दिन याद करते हुए उज़रा ने कहा था, “आह वे दिन....मेरे वालिद सिखाते थे कि डिसिप्लिन बड़ी चीज है इसे अपनी तबियत में लाओ.”

उन्होने आगे की पढ़ाई दिल्ली के लेडी इरविन कॉलेज में की. उन दिनों वो जमकर टेनिस खेला करती थीं और उस दौर के टेनिस चैम्पियन ग़ौस मोहम्मद ने उनसे मिक्स्ड डबल्स खेलने की पेशकश की थी.

उन्होने बताया कि अगर वो रंगमंच की तरफ़ न जातीं तो टेनिस खिलाड़ी होतीं.

रंगमंच से नाता

रंगमंच से उनका नाता उदय शंकर बैले कम्पनी के माध्यम से जुड़ा. उनकी बहन ज़ोहरा सहगल कम्पनी में एक नर्तकी के रूप में काम करती थीं. लेकिन जब वो बीमार पड़ गईं तो उन्होने उज़रा को बुला भेजा.

फिर 1944 में उज़रा इंडियन पीपल्स थियेटर एसोसिएशन या इप्टा में शामिल हो गईं. और तभी वो पृथ्वी थियेटर के सम्पर्क में आईं.

उन दिनों को याद करते हुए उन्होने कहा था, “मेरे उस्ताद पृथ्वीराज कहते थे, जब तुम्हें कोई रोल मिलता है तो पहले उसे चबाओ, फिर उसे निगल लो और निगलकर भूल जाओ. डायलॉग ख़ुद ब ख़ुद एक रोल की शक्ल अख़्तियार कर लेता है.”

उज़रा बट्ट 1964 में पाकिस्तान चली गईं और वहां भी रंगमंच और टेलिविज़न में अभिनय करती रहीं.

उन्होने 'चक चक्कर', 'दुखिनी', 'दिल दरिया' और 'ताके दा तमाशा' जैसे कई नाटक किए.

पाकिस्तान जाने के बावजूद उज़रा देहरादून आती रहती थीं. आख़िर वहां उनका बचपन बीता था ब्याह हुआ था.

उज़रा को 1995 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार भी दिया गया.

शनिवार, 6 मई 2023

प्रसिद्ध संगीतकार वनराज भाटिया की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रधांजलि

31 मई जन्म
07 मई मृत्यु
प्रसिद्ध संगीतकार वनराज भाटिया की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रधांजलि

वनराज भाटिया भारतीय हिन्दी फ़िल्मों के प्रसिद्ध संगीतकार थे। उन्होंने अमिताभ बच्चन और ऋषि कपूर के अअभिनय से सजी फ़िल्म 'अजूबा' का संगीत दिया था। 'तमस', 'अंकुर', 'मंथन', 'मंडी', 'जुनून' और 'कलयुग' जैसी फिल्मों में भी वनराज भाटिया ने संगीत दिया। वनराज भाटिया को 1988 में गोविंद निहलानी की फिल्म 'तमस' में सर्वश्रेष्ठ संगीत के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला और 2012 में उन्हें पद्मश्री से नवाजा गया। उन्होंने 60 के दशक में कई मशहूर ऐड फिल्मों का संगीत देते हुए अपने संगीतमय कॅरियर की शुरुआत की थी।

संगीत निर्देशक वनराज भाटिया का जन्म 31 मई, 1927 को बॉम्बे, ब्रिटिश भारत में हुआ था। उन्हें सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशन का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिल चुका है। इसके अलावा 2012 में उन्हें पद्मश्री से भी नवाजा जा चुका है। सन 1989 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित वनराज भाटिया ने लंदन स्थित रॉयल एकेडमी ऑफ म्यूजिक से वेस्टर्न क्लासिकल म्यूजिक की शिक्षा ली थी।

कॅरियर

70 और 80 के दशक की समानांतर फिल्मों में सुमधुर संगीत देने के लिए वनराज भाटिया मशहूर रहे। एक समय सिनेमा जगत में उनका ऊंचा नाम था और उनके द्वारा संगीतबद्ध किए गए गाने खूब पसंद किए जाते हैं। कॅरियर की ऊंचाइयों को छूने वाले वनराज भाटिया ने जीवन के अंतिम वर्ष आर्थिक संकट भी देखा। गायकों, गीतकारों और संगीतकार के हितों का ख्याल रखने वाली 'इंडियन परफॉर्मिंग राइट्स सोसायटी' (आईपीआरेस) की‌ ओर से भी उनकी आर्थिक मदद की गई थी।

साल 1974 में रिलीज हुई श्याम बेनेगल निर्देशित फिल्म 'अंकुर' बतौर संगीतकार वनराज भाटिया की पहली फिल्म थी। इसके बाद उन्होंने 'मंथन', '36 चौरंगीलेन', 'निशांत', 'भूमिका', 'कलयुग', 'जुनून', 'मंडी', 'हिप हिप हुर्रे', 'आघात' 'मोहन जोशी हाजिर हो' 'पेस्टनजी', 'खामोश', 'जाने भी दो यारों' जैसी फिल्मों में बतौर संगीतकार काम किया। कई फिल्मों में वनराज भाटिया ने पार्श्व संगीत दिया भी था। 'अजूबा', 'दामिनी' और 'परदेस' जैसी मुख्यधाराओं की फिल्मों से भी वह जुड़े रहे।

पुरस्कार व सम्मान

वनराज भाटिया को फ‍िल्‍म 'तमस' (1988) के लिए बेस्‍ट म्‍यूजिक डायरेक्‍शन का नेशनल अवॉर्ड भी मिला था।
इसके बाद उन्‍हें 1989 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्‍मानित किया गया।
साल 2012 में भारत सरकार ने उन्‍हें चौथे सबसे प्रतिष्ठित नागर‍िक सम्‍मान 'पद्मश्री' से सम्‍मानित किया था।

आर्थिक तंगी

वनराज भाटिया अपने जीवन के अंत समय में आर्थिक तंगी से गुजरे। हिंदी फ़िल्मों के प्रसिद्ध अभिनेता आमिर ख़ान ने अपने ट्विटर अकाउंट पर लिखा था कि "यह बताते हुए खुशी हो रही है कि म्यूजिक कंपोजर वनराज भाटिया की जिंदगी पर किताब लिखी जाएगी। किताब को खालिद मोहम्मद लिखेंगे। यह किताब मेरे दोस्त दलीप ताहिल की पहल पर लिखी जा रही है"। वनराज भाटिया घुटने में तकलीफ की समस्या से ग्रस्त थे। सुनने की क्षमता कम हो रही थी और धीरे-धीरे उनकी याददाश्त भी कमजोर होती जा रही थी। आमिर ख़ान से पहले वनराज भाटिया की मदद के लिए अभिनेता कबीर बेदी ने लोगों से अपील की थी कि वे वनराज की मदद करें। वहीं निर्देशक श्याम बेनेगल भी यह अपील कर चुके थे। वनराज भाटिया अपनी ज़िंदगीभर की कमाई साल 2000की शुरुआत में स्टॉक ट्रेडिंग में गंवा बैठे थे।

मृत्यु

हिन्दी सिनेमा के जाने माने संगीतकार वनराज भाटिया का निधन 7 मई, 2021 को हुआ। वह काफी समय से बीमार चल रहे थे और 94 साल की उम्र में मुंबई के नेपियनसी रोड स्थित घर में उन्‍होंने तकरीबन 8.30 बजे अंतिम सांस ली।


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