10 मई लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
10 मई लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 11 मई 2023

ताराचंद बड़जात्या

ताराचंद बड़जात्या
*🎂जन्म10 मई 1914*
राजश्री भवन, कुचामन सिटी , जोधपुर राज्य , ब्रिटिश भारत
*🕯️मृत21 सितंबर 1992*

*व्यवसाय राजश्री प्रोडक्शंस के निर्माता निदेशक*

उनका जन्म 1914 में राजस्थान के कुचामन शहर में एक मारवाड़ी जैन परिवार में हुआ था। उन्होंने कलकत्ता के विद्यासागर कॉलेज में पढ़ाई की । उन्होंने 1947 में राजश्री पिक्चर्स (पी) लिमिटेड की स्थापना की।  उनके द्वारा निर्मित कुछ उल्लेखनीय फिल्में हैं दोस्ती , जीवन मृत्यु , उपहार , पिया का घर , सौदागर , गीत गाता चल , तपस्या , चितचोर , दुल्हन वही जो पिया मन भये , अंखियों के झरोखों से , सावन को आने दो , तराना , नदिया के पार , और सारांश । 1992 में उनका निधन हो गया। उनके पोते सूरज आर. बड़जात्या एक सफल फिल्म निर्माता और निर्देशक हैं और उनकी पोती कविता के. बड़जात्या हैं ।


इन्होंने रखी थी राजश्री पिक्चर्स की नींव, 3 बेटों काे छोड़ बेटी के नाम शुरू की थी कंपनी
5 वर्ष पहले

जयपुर.  15 अगस्त, 1947 काे ताराचंद बड़जात्या ने 'राजश्री पिक्चर्स' की नींव रखी थी। उन्होंने फिल्म प्रोडक्शन हाउस के तौर पर हिंदी सिनेमा का एक ऐसा एम्पायर खड़ा किया, जिसमें पिछले 70 साल से लगातार पारिवारिक और सामाजिक फिल्में आज भी बनाई जा रही हैं। राजश्री उनकी बेटी का नाम है, जो आज भी जयपुर में रहती है। राजस्थान के कुचामन सिटी में 14 मई, 1914 में जन्मे ताराचंद बड़जात्या ने 1933 में फिल्मों में प्रवेश किया, जब वे महज 19 साल के थे। उन्होंने 'मोती महल थियेटर्स' से अपना काम शुरू किया।

ऐसे पड़ा 'राजश्री' नाम

- ताराचंद बड़जात्या ने पहले अपने फिल्म प्रोडक्शन हाउस का नाम अपने बेटों 'राज' और 'कमल' के नामों को मिलाकर राजकमल रखा था, लेकिन तभी वी. शांताराम ने इस नाम से प्रोडक्शन हाउस खोल लिया। तब उन्होंने बेटी राजश्री के नाम पर संस्थान का नाम रखा।

- जयपुर रहीं ताराचंद बड़जात्या की बेटी राजश्री ने बताया कि जब भी नई फिल्म बनती तो पहले परिवार के सदस्यों और घर के ड्राइवर तक को दिखाया जाता था। उनसे फिल्म के बारे में राय ली जाती थी और जरूरी हुआ तो फिर संशोधन के बाद ही फिल्म रिलीज होती थी। परिवार के बच्चे भी इस रायशुमारी में शामिल होते थे। उनकी फिल्में हमेशा ऐसी होती थीं, जिन्हें लोग परिवार के साथ बैठकर देख सकें। 

ऐसे शुरू किया था करियर

- ताराचंद बड़जात्या ने चेन्नई, हैदराबाद से अपना करियर शुरू किया और दक्षिण भारत से अनेक फिल्म निर्माताओं को बॉलीवुड में हिंदी फिल्मों की मुख्यधारा में लाने का श्रेय उन्हीं को जाता है।
- उन्होंने सबसे पहले फिल्म डिस्ट्रीब्यूशन का काम शुरू किया और पहली बार इसके उत्तर और दक्षिण भारत में जालंधर से लेकर विशाखापट्‌टनम तक लगभग 20 प्रमुख शहरों में अपने कार्यालय खोले।

- उन्होंने अनेक ब्लॉक बस्टर फिल्मों का डिस्ट्रीब्यूशन किया जिनमें 'शोले', 'धर्मवीर', 'अमर-अकबर-एंथनी', 'विक्टोरिया नं. 203', 'रोटी कपड़ा और मकान', 'कुली', 'खिलौना', 'बैजू बावरा', 'आनंद', 'गुड्‌डी', 'कभी खुशी कभी गम', 'देवदास' और 'मुन्नाभाई एमबीबीएस' जैसी अपने समय की सुपरहिट फिल्में शामिल हैं। बाद में, 1960 में ताराचंद बड़जात्या ने 'राजश्री प्रोडक्शन्स' की स्थापना की और हिंदी सिनेमा को एक से एक नायाब फिल्में दीं। उनकी पहली फिल्म 'आरती' ही सुपरहिट साबित हुई।

- इसके बाद 1964 में आई दूसरी फिल्म 'दोस्ती' ने तो धूम मचा दी। अपने समय की यह ब्लॉक बस्टर फिल्म थी, जिसे 6 फिल्म फेयर पुरस्कार मिले। इसके बाद फिल्मों की फेहरिस्त बहुत लंबी है।

- भारत सरकार ने ताराचंद को उस फिल्म समिति का सदस्य भी बनाया, जिसकी अध्यक्ष तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री इंदिरा गांधी होती थीं। 21 सितम्बर, 1992 को मुंबई में उनका निधन हो गया।  

जब 'राजश्री' में चमका 'सूरज'

- 'राजश्री' में ताराचंद बड़जात्या और उनकी 3 बेटों- राजकुमार, कमल कुमार और अजित कुमार फिल्म निर्माण और डिस्ट्रीब्यूशन का ही काम संभालते थे, लेकिन फिल्म निर्देशन के क्षेत्र में किसी ने कदम नहीं रखा था।

- एक बार जब राज कुमार के बेटे सूरज आर. बड़जात्या ने फिल्म निर्देशन की इच्छा जताई तो परिवार के लोगों को इसमें हिचकिचाहट हुई। तब ताराचंद बड़जात्या ही उन्हें प्रोत्साहित किया और सूरज आर. बड़जात्या के निर्देशन में पहली फिल्म आई - 'मैंने प्यार किया'। यह ब्लॉक बस्टर फिल्म साबित हुई और इसे 6 फिल्म फेयर अवार्ड मिले।

- इसका अंग्रेजी वर्जन 'व्हेन लव कॉल्स' भी गुयाना, त्रिनिडाड जैसे कैरेबियन मार्केट में खूब चला। 'ते अमो' नाम से पहली बार स्पैनिश में भी यह फिल्म बनाई गई।

- सूरज आर. बड़जात्या के निर्देशन में दूसरी फिल्म आई - 'हम आपके हैं कौन' (1994)। यह वो दौर था जब सिनेमाघरों से दर्शक छिटक रहे थे। यह फिल्म फिर से दर्शकों को सिनेमा घरों तक लाई और 150 सिनेमाघरों में 25 सप्ताह तक चली। कई सिनेमाघरों में 50 और 100 सप्ताह तक भी चली।

राजश्री प्रोडक्शन्स की चर्चित फिल्में

- ताराचंद बड़जात्या की राजश्री प्रोडक्शन्स ने कई टीवी सीरियल भी बनाए हैं, जिनमें 'पेइंग गेस्ट' (दूरदर्शन-1985), 'वो रहने वाली महलों की' (सहारा वन-2005), और 'प्यार के दो नाम- एक राधा एक श्याम' (स्टार प्लस- 2006) हैं। 1998 में 'राजश्री म्यूजिक' की भी नींव रखी गई, जिससे कई प्राइवेट अल्बम आ चुके हैं।

-राजश्री प्रोडक्शन्स ने कोई 60 से ज्यादा फिल्मों का निर्माण किया और यह सिलसिला आज भी जारी है। इनमें 'जीवन-मृत्यु', 'गीत गाता चल', 'तपस्या', 'उपहार', 'पिया का घर', 'दुल्हन वही जो पिया मन भाए', 'सावन को आने दो', 'अंखियों के झरोखे से', 'नदिया के पार', 'सारांश', 'मैंने प्यार किया', 'हम आपके हैं कौन', 'हम साथ-साथ हैं' और 'प्रेम रतन धन पायो' (2015) जैसी चर्चित फिल्में शामिल हैं। 

मंगलवार, 9 मई 2023

पंकज मलिक


*🎂जन्म 10मई 1905🎂*
*मृत्यु🕯️ 19 फ़रवरी , 1978 🕯️*

🎻महान संगीतकार, 🎙️गायक और 📽️अभिनेता पंकज मलिक के जन्मदिन पर हार्दिक श्रधांजलि

पंकज मलिक बांग्ला संगीत और फ़िल्मों में सफलता के साथ-साथ हिन्दी फ़िल्मों में भी अपनी कामयाबी का परचम लहराने वाले शास्त्रीय संगीत के विशेषज्ञ थे।
उनका पूरा नाम 'पंकज कुमार मलिक' था। वे ऐसे संगीतकार व गायक थे, जिनकी आवाज़ के जादू ने आज भी उनके लाखों प्रशंसकों को बांध रखा है। बहुमखी प्रतिभा के धनी पंकज मलिक को संगीत और गायन के अलावा अभिनय में भी कुशलता हासिल थी। वह जब भी परदे पर अवतरित हुए कामयाब रहे। उनकी ऐसी हिन्दी फ़िल्मों में 'डाक्टर', 'आंधी', और 'नर्तकी' आदि विशेष चर्चित हैं। जाति प्रथा की समस्या के ख़िलाफ़ संदेश देने वाली फ़िल्म 'डाक्टर' में पंकज मलिक ने कई गाने खुद गाए थे, जो काफ़ी हिट हुए। पंकज मलिक की अपनी विशिष्ट गायन शैली थी, जिसकी बदौलत उन्होंने हज़ारों लोगों को अपना प्रशंसक बनाया। उन्हें हिन्दी फ़िल्मों के सर्वोच्च सम्मान ' दादा साहब फाल्के पुरस्कार ' से भी नवाजा गया।

पंकज मलिक का जन्म 10 मई, 1905 को कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) में हुआ था। उनके पिता का नाम मनीमोहन मलिक और माता का नाम मनमोहिनी था। उनके पिता पारम्परिक बंगाली संगीत में विशेष रुचि रखते थे। पंकज मलिक ने दुर्गादास बन्धोपाध्याय के संरक्षण में 'भारतीय शास्त्रीय संगीत' की अपनी प्रारम्भिक शिक्षा पाई थी। कम उम्र में ही उन्होंने ख्याल, ध्रुपद , टप्पा और अन्य शास्त्रीय संगीत का ज्ञान हासिल कर लिया था। उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय के 'स्कॉटिश चर्च कॉलेज' में अध्ययन किया। शिक्षा समाप्त करने के बाद ही उनके जीवन में एक अहम मोड़ आया। उनका सम्पर्क दीनेन्द्रनाथ टैगोर से हुआ, जो रवीन्द्रनाथ टैगोर के भतीजे थे। उन्होंने दीनेन्द्रनाथ टैगोर से रवीन्द्र संगीत सीखा। बांग्ला भाषियों में रवीन्द्रनाथ टैगोर की कविताओं को लोकप्रिय बनाने में मलिक के गाए गीतों का बड़ा योगदान माना जाता है

पंकज मलिक आकाशवाणी से जुड़ने वाले शुरुआती कलाकारों में थे। पंकज मलिक का फ़िल्मी सफर मूक फ़िल्मों के दौर में ही शुरू हो गया था, किंतु उन्हें सही पहचान 1930 के दशक में बोलती फ़िल्मों की शुरूआत के साथ मिली। हिन्दी और बांग्ला दोनों भाषाओं को मिलाकर उन्होंने एक सौ से अधिक फ़िल्मों में संगीत दिया और कई में अभिनय भी किया। उनकी उल्लेखनीय संगीत रचनाओं में 'महिषासुरमर्दिनी' भी शामिल है। आकाशवाणी के लिए बनाए गए बांग्ला और संस्कृत मिश्रित इस कार्यक्रम में हेमंत कुमार सहित उस दौर के सभी प्रसिद्ध गायकों ने अपनी आवाज़ दी। इस कार्यक्रम को आज भी प्रतिवर्ष चैत्र मास के नवरात्र से ठीक पहले महालय के अवसर पर आकाशवाणी द्वारा प्रसारित किया जाता है और लोग इसे बेहद रुचि से सुनते हैं।

पंकज मलिक के संगीत निर्देशन वाली शुरूआती हिन्दी फ़िल्मों में से एक 'धरती माता' काफ़ी चर्चित हुई। ग्रामीण भारत के जीवन पर आधारित इस फ़िल्म में किसानों की समस्याएँ और उन्हें मुसीबतों से जूझने का रास्ता दिखाने का प्रयास किया गया था। पंकज मलिक ने इस फ़िल्म में बेहतरीन संगीत दिया और उनकी धुनों के कारण पूरी फ़िल्म में ग्रामीण परिवेश जीवंत होता दिखाई दिया। 'धरती माता' फ़िल्म में के. एल. सहगल ने आदर्शवादी युवक की भूमिका निभायी थी। इस फ़िल्म के गीत 'प्रभु मोहे बुला गांव में दुनिया रंगरंगीली बाबा दुनिया रंगरंगीली' आदि बेहद कामयाब रहे। 'धरती माता' के बाद पंकज मलिक की कई फ़िल्में प्रदर्शित हुईं, जिन्हें समीक्षकों के अलावा दर्शकों ने काफ़ी पसंद किया। ऐसी फ़िल्मों में 'दुश्मन', 'काशीनाथ', 'ज़िंदगी', 'नर्तकी' और
'मेरी बहन' आदि शामिल हैं। 'नर्तकी' संगीत की दृष्टि से एक अहम फ़िल्म थी। देवकी बोस निर्देशित इस फ़िल्म में पंकज मलिक ने एक कवि की भूमिका निभायी और कई गीत भी गाए थे। इन गानों में 'ये कौन आया सबेरे सबेरे कौन तुझे समझाए मूरख' विशेष तौर पर याद किए जाते हैं।

न्यू थियेटर्स की फ़िल्म 'यात्रिक' पंकज मलिक को विशेष रूप से प्रिय थी। इसमें उन्होंने अमर संगीत दिया है। कैलाश, केदारनाथ , और बद्रीनाथ की यात्रा पर आधारित इस फ़िल्म में पंकज मलिक ने संस्कृति की कई मशहूर रचनाओं को अपना स्वर दिया और अपने विशेष संगीत को फ़िल्म का एक ख़ूबसूरत पक्ष बना दिया। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान 1940 के दशक की शुरुआत में न्यू थियेटर्स से जुड़े अधिकतर बड़े नामों ने 'बंबई' (वर्तमान मुम्बई ) की राह पकड़ ली, किंतु पंकज मलिक को अधिक रकम का प्रस्ताव आकर्षित नहीं कर पाया और उन्होंने बंबई जाने से साफ़ इंकार कर दिया।

प्रमुख_फ़िल्में

पंकज मलिक की कुछ प्रमुख फ़िल्मों के नाम निम्नलिखित हैं-

यांत्रिक - 1952
मंजूर - 1949
मेरी बहन - 1944
नर्तकी - 1940
जिन्दगी - 1940
डाक्टर - 1940
धरती माता - 1938
देवदास - 1936
यहूदी की लड़की - 1933

पुरस्कार

भारत सरकार ने संगीत के क्षेत्र में पंकज मलिक के विशेष योगदान को देखते हुए उन्हें 'पद्मश्री ' ( 1970 ) से सम्मानित किया था। फ़िल्म जगत के सर्वोच्च ' दादा साहब फाल्के पुरस्कार' ( 1972 ) से नवाजे गए पंकज मलिक को दर्जनों पुरस्कार मिले। इसके साथ ही उन्हें
लोगों का भरपूर प्यार भी मिला।

निधन

न्यू थियेटर्स से अपार प्रेम करने वाले पंकज मलिक इसके बंद होने तक इससे जुड़े रहे। 'जलजला' और 'कस्तूरी' उनकी आखिरी फ़िल्मों में थी, जिनका संगीत निर्देशन उन्होंने विशेष अनुरोध करने पर ही स्वीकर किया था। इसके बाद वह फ़िल्मों से अलग हो गए और संगीत की शिक्षा के क्षेत्र में विशेष तौर पर सक्रिय रहे और अंतत 19 फ़रवरी , 1978 को वह इस दुनिया को अलविदा कह गए। पंकज मलिक को अपने जीवन काल में वह सब मिला, जिसकी हसरत किसी कलाकार को होती है।
:::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::

वर्ष 1915 के आसपास का वक्त। कलकत्ते के एक मध्यमवर्गीय परिवार में पैदा हुए पंकज को संगीत का जुनून था। बालक हारमोनियम के साथ सुर साधना चाहता था। उसने अपने पिता से हारमोनियम मांगा, मगर पिता ने हंसकर हारमोनियम की मांग टाल दी। उधर पंकज को तो जैसे संगीत का सुरूर चढ़ा हुआ था। उसके पड़ोस में शैलेंद्रनाथ घोष रहते थे। घोष बाबू भी संगीत के शौकीन थे, पर नौकरी का चक्कर उनसे उनका घर छुड़वाकर उन्हें इराक ले गया था।

इराक जाने से पहले घोष बाबू अपने घर की चाबी पंकज के पिता को दे गए थे। एक दिन पंकज घोष बाबू के घर पहुंचा, तो उसे वहां हारमोनियम दिखा। हारमोनियम देखते ही उसकी बाछें खिल गईं, पर साथ में पिता थे तो उस वक्त वह शांत रहा। उसके बाद तो जब भी पंकज के पिता घर से बाहर होते, या उसे डांट पड़ने का डर न होता, वह चुपके से घोष बाबू के घर की चाबी उठाता, ताला खोलता, अंदर से सिटकनी लगाता और जब तक उसे दिल को तसल्ली ना हो जाती, वह उल्टा-सीधा, कैसे भी करके हारमोनियम बजाता रहता। इस तरह से चोरी-चोरी पंकज का रियाज तब तक चलता रहा, जब तक कि घोष बाबू इराक से वापस नहीं लौट आए।

घोष बाबू आए तो पंकज ने अपनी चोरी उनके सामने रखी। घोष बाबू ने उसे हारमोनियम बजाकर सुनाने के लिए कहा। पंकज ने हारमोनियम बजाया। इतने पक्के सुर सुनकर घोष बाबू हक्के-बक्के रह गए। खुश होकर उन्होंने हारमोनियम पंकज को दे दिया, और भविष्यवाणी की कि यह बालक आगे चलकर महान संगीतकार बनेगा। घोष बाबू की भविष्यवाणी सही निकली। यह बालक था पंकज मलिक, जो आगे चलकर हिंदुस्तानी फिल्मों के शुरुआती दौर का सबसे विख्यात संगीतकार बने। किसी ने सच ही कहा है कि पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं।

रवि बहल

जन्म की तारीख और समय: 10 मई 1966 , मुम्बई
माता-पिता: शाम बहल
बहन: गीता बहल

वह फिल्म निर्माता श्याम बहल के बेटे हैं। उनकी बहन गीता बहल एक अभिनेत्री हैं, जिन्होंने मैं तुलसी तेरे आंगन की (1968), मेरा दोस्त मेरा दुश्मन (1984), दो प्रेमी (1980) और ज़माने जैसी फिल्मों में भूमिकाएँ कीं। को दिखाना है (1981)। रवि के पिता ने देव आनंद और वैजयंतीमाला अभिनीत दुनिया (1968) और जितेंद्र , राखी गुलज़ार और शत्रुघ्न सिन्हा अभिनीत द गोल्ड मेडल (1969) जैसी फिल्मों का निर्माण किया ।

अविवाहित रहने वाले बहल ने एक साक्षात्कार में कहा था, "बहुत से लोग हैरान हैं कि मैं अभी भी अविवाहित हूं। ऐसा नहीं है कि मैंने कोशिश नहीं की। मैं लंबे समय से एक लड़की को देख रहा था लेकिन दुर्भाग्य से, हमारा रिश्ता टूट गया। शादी में नहीं खिले। हमारे बीच मतभेद थे।" 

🔴रवि ने 1984 में फिल्म इंतेहा में राज बब्बर के साथ अभिनय की शुरुआत की। उन्होंने सनी देओल और उर्मिला मातोंडकर के साथ नरसिम्हा (1991), मिथुन चक्रवर्ती और आयशा झुल्का के साथ दलाल (1993) जैसी लोकप्रिय फिल्मों में काम किया ; जैकी श्रॉफ , नाना पाटेकर और मनीषा कोइराला के साथ अग्नि साक्षी (1996) ; और गुलाम-ए-मुस्तफा (1997) नाना पाटेकर और रवीना टंडन के साथ । [3] [5] उन्होंने उपन्यास द फार पवेलियन्स पर आधारित एक ब्रिटिश टीवी मिनी श्रृंखला में भी अभिनय किया । 

फिल्मों में अपने करियर के फीका पड़ने के बाद वह एक भारतीय टेलीविजन डांस शो बूगी वूगी (1996-2014) के सह-निर्माता और होस्ट बन गए। रवि, ​​जो कभी वित्तीय संकट में थे, टेलीचक्कर ने टेलीविजन में अपने काम के माध्यम से वित्तीय सुरक्षा पाई। 

♥️मोर्चा (1980), अभिनय की शुरुआत
इंतेहा (1984)
अविनाश (1986)
नरसिम्हा (1991), रवि रस्तोगी ने मुख्य जोड़ी के रूप में पहला ब्रेक लिया
बॉय फ्रेंड (1993)
दलाल (1993)
प्यार का रोग (1994)
सुदूर मंडप ब्रिटिश टीवी मिनी श्रृंखला (1994)
मेरी मोहब्बत मेरा नसीबा (1995)
अग्नि साक्षी (1996)
गुलाम-ए-मुस्तफा (1997)
बूगी वूगी (टीवी श्रृंखला) (1997-2014)
सरफरोश-ए-हिंद (1999)
सलाम बच्चे (2007)

✍️बूगी वूगी के अलावा रवि बहल अपने प्रशंसकों के बीच कोई खास चेहरा नहीं बना सके लेकिन फिर भी अपनी छोटे लेकिन बेहतरीन काम के चलते फैंस उन्हें आज भी याद करते हैं। उनकी सालगिरह के मौके पर देश वासियों  तरफ से उन्हें बधाई।

कैफ आजमी


जन्म की तारीख और समय: 14 जनवरी आजमगढ़
मृत्यु की जगह और तारीख: 10 मई 2002, मुंबई
पत्नी: शौकत आजमी
बच्चे:बाबा आजमी शबाना आजमी
इनाम: उर्दू लेखकों के लिए साहित्य अकादमी पुरुस्कार

अगर ग़ज़ल का गुलिस्तां होगा तो कैफ़ी आज़मी के बगीचे से हर फूल की ख़ुशबू आएगी। वह उन चुनिंदा शायरों में से हैं जिन्होंने रूमानियत के साथ-साथ समाज को भी अपने अशआरों में लिखा। उनके लफ़्ज़ बेहद आसानी से समझ आ कर दिल में उतर जाते हैं। उन्होंने वही कहा जिससे लोगों के ज़हन को आवाज़ मिल सके। आइए पढ़ते हैं कैफ़ी साहब के कहे कुछ शेर

जो वो मिरे न रहे मैं भी कब किसी का रहा
बिछड़ के उनसे सलीक़ा न ज़िन्दगी का रहा  


इन्साँ की ख़्वाहिशों की कोई इन्तिहा नहीं
दो गज़ ज़मीं भी चाहिए, दो गज़ कफ़न के बाद
मेरा बचपन भी साथ ले आया
गाँव से जब भी आ गया कोई


पाया भी उनको खो भी दिया चुप भी हो रहे
इक मुख़्तसर सी रात में सदियाँ गुज़र गईं

जो इक ख़ुदा नहीं मिलत तो इतना मातम क्यों
मुझे ख़ुद अपने क़दम का निशाँ नहीं मिलता


आज फिर टूटेंगी तेरे घर नाज़ुक खिड़कियाँ
आज फिर देखा गया दीवाना तेरे शहर में

ख़ार-ओ-ख़स तो उठें, रास्ता तो चले
मैं अगर थक गया, क़ाफ़िला तो चले


दिल की नाज़ुक रगें टूटती हैं
याद इतना भी कोई न आए

जिस तरह हँस रहा हूँ मैं पी पी के गर्म अश्क
यूँ दूसरा हँसे तो कलेजा निकल पड़े


तू अपने दिल की जवाँ धड़कनों को गिन के बता
मिरी तरह तिरा दिल बे-क़रार है कि नहीं

गर डूबना ही अपना मुक़द्दर है तो सुनो
डूबेंगे हम ज़रूर मगर नाख़ुदा के साथ


दीवाना पूछता है ये लहरों से बार बार
कुछ बस्तियाँ यहाँ थीं बताओ किधर गईं

मैं ढूँढ़ता हूँ जिसे वो जहाँ नहीं मिलता
नई ज़मीन नया आसमाँ नहीं मिलता


नई ज़मीन नया आसमाँ भी मिल जाए
नए बशर का कहीं कुछ निशाँ नहीं मिलता

पेड़ के काटने वालों को ये मालूम तो था
जिस्म जल जाएँगे जब सर पे न साया होगा


बहार आए तो मेरा सलाम कह देना
मुझे तो आज तलब कर लिया है सहरा ने

तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो
क्या ग़म है जिस को छुपा रहे हो


जिन ज़ख़्मों को वक़्त भर चला है
तुम क्यूँ उन्हें छेड़े जा रहे हो

दीवाना-वार चाँद से आगे निकल गए
ठहरा न दिल कहीं भी तिरी अंजुमन के बाद


ग़ुर्बत की ठंडी छाँव में याद आई उस की धूप
क़द्र-ए-वतन हुई हमें तर्क-ए-वतन के बाद

कैफ़ी आज़मी उर्दू के प्रसिद्ध प्रगतिवादी शायर और गीतकार हैं। उनका असल नाम सैयद अतहर हुसैन रिज़वी था। कैफ़ी तख़ल्लुस करते थे। उनकी पैदाइश मौज़ा मजवाँ ज़िला आज़मगढ़ में हुई। कैफ़ी का ख़ानदान एक ज़मींदार ख़ुशहाल ख़ानदान था। घर में शिक्षा व साहित्य और शे’र-ओ-शायरी का माहौल था। ऐसे माहौल में जब उन्होंने आंखें खोलीं तो आरम्भ से ही उन्हें शे’र-ओ-अदब से दिलचस्पी हो गयी। अपने समय के रिवाज के अनुसार अरबी फ़ारसी की शिक्षा प्राप्त की और शे’र कहने लगे।

कैफ़ी के पिता उन्हें मज़हबी तालीम दिलाना चाहते थे, इस उद्देश्य से उन्होंने कैफ़ी को लखनऊ में सुल्तान-उल-मदारिस में दाख़िल करा दिया। लेकिन कैफ़ी की इन्क़लाबी और प्रतिरोध स्वभाव की मंज़िलें ही कुछ और थीं। कैफ़ी ने मदरसे की स्थूल और दक़ियानूसी व्यवस्था के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई और विद्यार्थियों की कुछ मांगों को लेकर प्रबंधन का सामना किया। इस तरह के माहौल ने कैफ़ी के स्वभाव को और ज़्यादा इन्क़लाबी बनाया। वह ऐसी नज़्में कहने लगे जो उस वक़्त के सामाजिक व्यवस्था को निशाना बनाती थीं। लखनऊ के इस आवास  के दौरान ही प्रगतिशील साहित्यकारों के साथ कैफ़ी की मुलाक़ातें होने लगीं। लखनऊ उस वक़्त प्रगतिशील लेखकों का एक प्रमुख् केन्द्र बना हुआ था।

1921 में कैफ़ी लखनऊ छोड़  कर कानपुर आ गये। यहाँ उस वक़्त मज़दूरों का आन्दोलन ज़ोरों पर था, कैफ़ी उस आन्दोलन से सम्बद्ध हो गये। कैफ़ी को कानपुर की फ़िज़ा बहुत रास आयी। यहाँ रहकर उन्होंने मार्कसी साहित्य का बहुत गहराई से अध्ययन किया। 1923 में कैफ़ी सरदार जाफ़री और सज्जाद ज़हीर के कहने पर बम्बई आ गये और विधिवत रूप से आन्दोलन और उसके कामों से सम्बद्ध हो गये।

आर्थिक परेशानियों के कारण कैफ़ी ने फ़िल्मों के लिए गीत भी लिखे। सबसे पहले कैफ़ी को शाहिद लतीफ़ की फ़िल्म ‘बुज़दिल’ में दो गाने लिखने का मौक़ा मिला। धीरे-धीरे कैफ़ी की फ़िल्मों से सम्बद्धता बढ़ती गयी। उन्होंने गानों के अलावा कहानी, संवाद और स्क्रिप्ट भी लिखे। ‘काग़ज़ के फूल’, ‘गर्म हवा’, ‘हक़ीक़त’, ‘हीर राँझा’, जैसी फ़िल्मों के नाम आज भी कैफ़ी के नाम के साथ लिये जाते हैं। फ़िल्मी दुनिया में कैफ़ी को बहुत से सम्मानों से भी नवाज़ा गया।

सज्जाद ज़हीर ने कैफ़ी के पहले ही संग्रह की शायरी के बारे में लिखा था, “आधुनकि उर्दू शायरी के बाग़ में नया फूल खिला है। एक सुर्ख़ फूल।” उस वक़्त तक कैफ़ी प्रगतिशील आंदोलन से सम्बद्ध नहीं हुए थे, लेकिन उनकी शायरी आरम्भ ही से प्रगतिवादी विचार धारा और सोच को आम करने में लगी थी। कैफ़ी ज्ञान और सृजनात्मक दोनों स्तरों पर आजीवन आन्दोलन और उसके उद्देशों से सम्बद्ध रहे। उनकी पूरी शायरी समान की विकृत व्यवस्था, शोषण की स्थितियों और मानसिक दासता के अधीन जन्म लेने वाली बुराइयों के ख़िलाफ़ एक ज़बरदस्त प्रतिरोध है। 

काव्य संग्रहः ‘झंकार’, ‘आख़िर-ए-शब’, ‘आवारा सजदे’, ‘मेरी आवाज़ सुनो’(फिल्मी गीत), ‘इबलीस की मजलिसे शूरा’ (दूसरा इजलास)।

आशा भोसले

आशा भोसले 🎂08 सितंबर 1933 ⚰️12 अप्रैल 2026 जन्म की तारीख और समय: 8 सितंबर 1933, सांगली मृत्यु की जगह और तारीख: 12 अप्रैल 2026 ब...