*🎂जन्म 10मई 1905🎂*
*मृत्यु🕯️ 19 फ़रवरी , 1978 🕯️*
🎻महान संगीतकार, 🎙️गायक और 📽️अभिनेता पंकज मलिक के जन्मदिन पर हार्दिक श्रधांजलि
पंकज मलिक बांग्ला संगीत और फ़िल्मों में सफलता के साथ-साथ हिन्दी फ़िल्मों में भी अपनी कामयाबी का परचम लहराने वाले शास्त्रीय संगीत के विशेषज्ञ थे।
उनका पूरा नाम 'पंकज कुमार मलिक' था। वे ऐसे संगीतकार व गायक थे, जिनकी आवाज़ के जादू ने आज भी उनके लाखों प्रशंसकों को बांध रखा है। बहुमखी प्रतिभा के धनी पंकज मलिक को संगीत और गायन के अलावा अभिनय में भी कुशलता हासिल थी। वह जब भी परदे पर अवतरित हुए कामयाब रहे। उनकी ऐसी हिन्दी फ़िल्मों में 'डाक्टर', 'आंधी', और 'नर्तकी' आदि विशेष चर्चित हैं। जाति प्रथा की समस्या के ख़िलाफ़ संदेश देने वाली फ़िल्म 'डाक्टर' में पंकज मलिक ने कई गाने खुद गाए थे, जो काफ़ी हिट हुए। पंकज मलिक की अपनी विशिष्ट गायन शैली थी, जिसकी बदौलत उन्होंने हज़ारों लोगों को अपना प्रशंसक बनाया। उन्हें हिन्दी फ़िल्मों के सर्वोच्च सम्मान ' दादा साहब फाल्के पुरस्कार ' से भी नवाजा गया।
पंकज मलिक का जन्म 10 मई, 1905 को कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) में हुआ था। उनके पिता का नाम मनीमोहन मलिक और माता का नाम मनमोहिनी था। उनके पिता पारम्परिक बंगाली संगीत में विशेष रुचि रखते थे। पंकज मलिक ने दुर्गादास बन्धोपाध्याय के संरक्षण में 'भारतीय शास्त्रीय संगीत' की अपनी प्रारम्भिक शिक्षा पाई थी। कम उम्र में ही उन्होंने ख्याल, ध्रुपद , टप्पा और अन्य शास्त्रीय संगीत का ज्ञान हासिल कर लिया था। उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय के 'स्कॉटिश चर्च कॉलेज' में अध्ययन किया। शिक्षा समाप्त करने के बाद ही उनके जीवन में एक अहम मोड़ आया। उनका सम्पर्क दीनेन्द्रनाथ टैगोर से हुआ, जो रवीन्द्रनाथ टैगोर के भतीजे थे। उन्होंने दीनेन्द्रनाथ टैगोर से रवीन्द्र संगीत सीखा। बांग्ला भाषियों में रवीन्द्रनाथ टैगोर की कविताओं को लोकप्रिय बनाने में मलिक के गाए गीतों का बड़ा योगदान माना जाता है
पंकज मलिक आकाशवाणी से जुड़ने वाले शुरुआती कलाकारों में थे। पंकज मलिक का फ़िल्मी सफर मूक फ़िल्मों के दौर में ही शुरू हो गया था, किंतु उन्हें सही पहचान 1930 के दशक में बोलती फ़िल्मों की शुरूआत के साथ मिली। हिन्दी और बांग्ला दोनों भाषाओं को मिलाकर उन्होंने एक सौ से अधिक फ़िल्मों में संगीत दिया और कई में अभिनय भी किया। उनकी उल्लेखनीय संगीत रचनाओं में 'महिषासुरमर्दिनी' भी शामिल है। आकाशवाणी के लिए बनाए गए बांग्ला और संस्कृत मिश्रित इस कार्यक्रम में हेमंत कुमार सहित उस दौर के सभी प्रसिद्ध गायकों ने अपनी आवाज़ दी। इस कार्यक्रम को आज भी प्रतिवर्ष चैत्र मास के नवरात्र से ठीक पहले महालय के अवसर पर आकाशवाणी द्वारा प्रसारित किया जाता है और लोग इसे बेहद रुचि से सुनते हैं।
पंकज मलिक के संगीत निर्देशन वाली शुरूआती हिन्दी फ़िल्मों में से एक 'धरती माता' काफ़ी चर्चित हुई। ग्रामीण भारत के जीवन पर आधारित इस फ़िल्म में किसानों की समस्याएँ और उन्हें मुसीबतों से जूझने का रास्ता दिखाने का प्रयास किया गया था। पंकज मलिक ने इस फ़िल्म में बेहतरीन संगीत दिया और उनकी धुनों के कारण पूरी फ़िल्म में ग्रामीण परिवेश जीवंत होता दिखाई दिया। 'धरती माता' फ़िल्म में के. एल. सहगल ने आदर्शवादी युवक की भूमिका निभायी थी। इस फ़िल्म के गीत 'प्रभु मोहे बुला गांव में दुनिया रंगरंगीली बाबा दुनिया रंगरंगीली' आदि बेहद कामयाब रहे। 'धरती माता' के बाद पंकज मलिक की कई फ़िल्में प्रदर्शित हुईं, जिन्हें समीक्षकों के अलावा दर्शकों ने काफ़ी पसंद किया। ऐसी फ़िल्मों में 'दुश्मन', 'काशीनाथ', 'ज़िंदगी', 'नर्तकी' और
'मेरी बहन' आदि शामिल हैं। 'नर्तकी' संगीत की दृष्टि से एक अहम फ़िल्म थी। देवकी बोस निर्देशित इस फ़िल्म में पंकज मलिक ने एक कवि की भूमिका निभायी और कई गीत भी गाए थे। इन गानों में 'ये कौन आया सबेरे सबेरे कौन तुझे समझाए मूरख' विशेष तौर पर याद किए जाते हैं।
न्यू थियेटर्स की फ़िल्म 'यात्रिक' पंकज मलिक को विशेष रूप से प्रिय थी। इसमें उन्होंने अमर संगीत दिया है। कैलाश, केदारनाथ , और बद्रीनाथ की यात्रा पर आधारित इस फ़िल्म में पंकज मलिक ने संस्कृति की कई मशहूर रचनाओं को अपना स्वर दिया और अपने विशेष संगीत को फ़िल्म का एक ख़ूबसूरत पक्ष बना दिया। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान 1940 के दशक की शुरुआत में न्यू थियेटर्स से जुड़े अधिकतर बड़े नामों ने 'बंबई' (वर्तमान मुम्बई ) की राह पकड़ ली, किंतु पंकज मलिक को अधिक रकम का प्रस्ताव आकर्षित नहीं कर पाया और उन्होंने बंबई जाने से साफ़ इंकार कर दिया।
प्रमुख_फ़िल्में
पंकज मलिक की कुछ प्रमुख फ़िल्मों के नाम निम्नलिखित हैं-
यांत्रिक - 1952
मंजूर - 1949
मेरी बहन - 1944
नर्तकी - 1940
जिन्दगी - 1940
डाक्टर - 1940
धरती माता - 1938
देवदास - 1936
यहूदी की लड़की - 1933
पुरस्कार
भारत सरकार ने संगीत के क्षेत्र में पंकज मलिक के विशेष योगदान को देखते हुए उन्हें 'पद्मश्री ' ( 1970 ) से सम्मानित किया था। फ़िल्म जगत के सर्वोच्च ' दादा साहब फाल्के पुरस्कार' ( 1972 ) से नवाजे गए पंकज मलिक को दर्जनों पुरस्कार मिले। इसके साथ ही उन्हें
लोगों का भरपूर प्यार भी मिला।
निधन
न्यू थियेटर्स से अपार प्रेम करने वाले पंकज मलिक इसके बंद होने तक इससे जुड़े रहे। 'जलजला' और 'कस्तूरी' उनकी आखिरी फ़िल्मों में थी, जिनका संगीत निर्देशन उन्होंने विशेष अनुरोध करने पर ही स्वीकर किया था। इसके बाद वह फ़िल्मों से अलग हो गए और संगीत की शिक्षा के क्षेत्र में विशेष तौर पर सक्रिय रहे और अंतत 19 फ़रवरी , 1978 को वह इस दुनिया को अलविदा कह गए। पंकज मलिक को अपने जीवन काल में वह सब मिला, जिसकी हसरत किसी कलाकार को होती है।
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वर्ष 1915 के आसपास का वक्त। कलकत्ते के एक मध्यमवर्गीय परिवार में पैदा हुए पंकज को संगीत का जुनून था। बालक हारमोनियम के साथ सुर साधना चाहता था। उसने अपने पिता से हारमोनियम मांगा, मगर पिता ने हंसकर हारमोनियम की मांग टाल दी। उधर पंकज को तो जैसे संगीत का सुरूर चढ़ा हुआ था। उसके पड़ोस में शैलेंद्रनाथ घोष रहते थे। घोष बाबू भी संगीत के शौकीन थे, पर नौकरी का चक्कर उनसे उनका घर छुड़वाकर उन्हें इराक ले गया था।
इराक जाने से पहले घोष बाबू अपने घर की चाबी पंकज के पिता को दे गए थे। एक दिन पंकज घोष बाबू के घर पहुंचा, तो उसे वहां हारमोनियम दिखा। हारमोनियम देखते ही उसकी बाछें खिल गईं, पर साथ में पिता थे तो उस वक्त वह शांत रहा। उसके बाद तो जब भी पंकज के पिता घर से बाहर होते, या उसे डांट पड़ने का डर न होता, वह चुपके से घोष बाबू के घर की चाबी उठाता, ताला खोलता, अंदर से सिटकनी लगाता और जब तक उसे दिल को तसल्ली ना हो जाती, वह उल्टा-सीधा, कैसे भी करके हारमोनियम बजाता रहता। इस तरह से चोरी-चोरी पंकज का रियाज तब तक चलता रहा, जब तक कि घोष बाबू इराक से वापस नहीं लौट आए।
घोष बाबू आए तो पंकज ने अपनी चोरी उनके सामने रखी। घोष बाबू ने उसे हारमोनियम बजाकर सुनाने के लिए कहा। पंकज ने हारमोनियम बजाया। इतने पक्के सुर सुनकर घोष बाबू हक्के-बक्के रह गए। खुश होकर उन्होंने हारमोनियम पंकज को दे दिया, और भविष्यवाणी की कि यह बालक आगे चलकर महान संगीतकार बनेगा। घोष बाबू की भविष्यवाणी सही निकली। यह बालक था पंकज मलिक, जो आगे चलकर हिंदुस्तानी फिल्मों के शुरुआती दौर का सबसे विख्यात संगीतकार बने। किसी ने सच ही कहा है कि पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं।
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