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शुक्रवार, 12 जनवरी 2024

कुणाल खेमू


कुणाल खेमू 
(जन्म 25 मई 1983) 

एक भारतीय अभिनेता है जो हिन्दी फ़िल्मों में कार्यरत है। उनका जन्म 25 मई 1983 को श्रीनगर, जम्मू और कश्मीर, भारत में हुआ था

कुणाल खेमू जीवनी
कुणाल खेमू एक भारतीय अभिनेता हैं। वह हिंदी सिनेमा में अपनी बेहतरीन फिल्मों ट्रैफिक सिग्नल, गोलमाल 3 और गो गोआ गोन के लिए प्रसिद्ध हैं। 

पृष्ठभूमि 
कुणाल खेमू का जन्म कश्मीरी पंडित परिवार में अभिनेता रवि और ज्योति के घर 25 मई 1983 को हुआ था।  

पढ़ाई 
कुणाल ने अपनी शुरआती पढ़ाई निरंजनलाल डालमिया हाईस्कूल से संपन की है।  उन्होंने अपनी स्नातक की पढ़ाई मुंबई की एमिटी यूनिवर्सिटी से की है।  

शादी 
कुणाल खेमू की शादी अभिनेत्री सोहा अली खान से हुई हैं। 

करियर 
कुणाल ने अपने करियर की शुरुआत बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट दूरदर्शन के वेद रही निर्देशित शो गुल गुलशन थी। उन्होंने अपने फ़िल्मी करियर का डेब्यू महेश भट्ट की फिल्म सिर से किया था। वह इस फिल्म में बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट नजर आए थे। इस फिल्म के बाद वह राजा हिन्दुस्तानी, ज़ख्म,भाई हम हैं रही प्यार के में भी बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट नजर आ चुके हैं। 

इसके बाद साल 2005 में उन्होंने फिल्म कलयुग से बॉलीवुड में बतौर लिड अभिनेता डेब्यू किया। इस फिल्म का निर्देशन मोहित सूरी ने किया था। इसी साल खेमू मधुर भंडारकर की पहली फिल्म ट्रैफिक सिग्नल का हिस्सा बनें। इस फिल्म में उन्होंने अच्छे स्मार्ट मनी लेन्द्र की भूमिका अदा की थी। इस फिल्म ने टिकेट खिड़की की औसत कमाई की थी। इसके बाद वह फिल्म ढोल में बतौर अभिनेता नजर आये। उसके बाद वह ढूँढ़ते रह जाओगे और जय वीरू जैसी फिल्मों में नजर आये। उनकी यह सभी फ़िल्में बॉक्स-ऑफिस पर कुछ खास सफल फ़िल्में साबित नहीं हुई। वर्ष 2010 में वह निर्देशक रोहित शेट्टी की गोलमाल सीरीज के तीसरे भाग गोलमाल 3 में नजर आए। इस फिल्म उनके अलावा अजय देवगन, शरमन जोशी,करीना कपूर मुख्य भूमिका में नजर आये थे। इस फिल्म ने बॉक्स-ऑफिस पर करोड़ो का व्यापर किया था। और साल की सुपरहिट फिल्म साबित हुई थी। 

साल 2012 में खेमू एक बार फिर मुकेश भट्ट की फिल्म ब्लड मनी में मुख्य भूमिका में नजर आए। इस फिल्म में वह बेहद मेहनती और एक पारिवारिक मर्द के रूप दर्शाये गए थे। जो अपने बॉस के द्वारा गलत रास्तो की ओर भटका दिया जाता है।  फिल्म ने बॉक्स-ऑफिस पर अच्छा-खासा व्यापार किया था। फिल्म के गाने भी लोगों को बेहद पसंद आये थे। आलोचकों ने भी कुणाल खेमू के किरदार को अपनी मिली-जुली प्रतिक्रिया दी थी। वह सैफ अली खान के प्रोडक्शन की फिल्म गो गोआ गोन में नजर आये। जो बुरी तरह बॉक्स-ऑफिस पर फ्लॉप साबित हुई थी।
एक्टर कुणाल खेमू और सोहा अली खान ने बेहद निजी समारोह में ब्याह रचाया।अभिनेता कुणाल खेमू वर्ष 1993 की फिल्म 'हम हैं राही प्यार के' में नजर आ चुके है।
कुणाल खेमू उन गिने चुने कलाकरों में आते हैं, जिन्होंने बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट तो खूब नाम कमाया, लेकिन बड़े होकर वो कमाल नहीं दिखा पाए। खेमू साल 2020 में फिल्म मलंग का हिस्सा थे। पिक्चर में वे निगेटिव शेड का रोल प्ले करते नजर आए थे। इसके अलावा वे ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज हुई फिल्म 'लूटकेस' का भी हिस्सा रहे थे।वहीं, कुणाल मीडिया में भी बने रहते हैं। आये दिन वो पत्नी सोहा और बेटी इनाया के साथ नजर आ जाते हैं।

बुधवार, 24 मई 2023

एमजी श्री कुमार



एमजीश्रीकुमार
जन्म तिथि: 25 माई -1957

जन्म स्थान: हरिपद, केरल, भारत

पेशा: संगीतकार, गायक

  • एमजी श्रीकुमार एक भारतीय गायक, संगीत निर्देशक, संगीत निर्माता, टेलीविजन प्रस्तुतकर्ता और फिल्म निर्माता हैं, जो मुख्य रूप से मलयालम फिल्मों और टेलीविजन में काम करते हैं।
  • उन्होंने मलयालम, तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और हिंदी भाषाओं में 4000 से अधिक गाने गाए हैं।
  • वह KMG Musics नाम की एक म्यूजिक कंपनी के मालिक हैं और त्रिवेंद्रम में Sareegama School of Music भी हैं।
  • श्रीकुमार ने कई पुरस्कार जीते हैं, जिनमें दो राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, तीन केरल राज्य फिल्म पुरस्कार और एक फिल्मफेयर पुरस्कार दक्षिण शामिल हैं।
  • *🔛📽️हिंदी*
    • "मेरा ढोलना" - भूल भुलैया (2007)
    • "हस्ता हुआ" - ये तेरा घर ये मेरा घर (2001)
    • "किस्सा हम" - डोली सजा के रखना (1999)
    • "सात रंग" - सात रंग के सपने (1998)
    • "जिया जले" - दिलसे (1998)
    • "तू ही तू" - कभी ना कभी (1997)
    • "सोजा सोजा", "अपनी जेब" - मुस्कानहाट (1992

कर्ण जोहर


*🎂जन्म तिथि: 25 मई*

जन्म स्थान: मुंबई, महाराष्ट्र, भारत

पेशा: पटकथा लेखक, अभिनेता, टेलीविजन प्रस्तोता, फिल्म निर्देशक, फिल्म निर्माता, फिल्म अभिनेता

 मेरे ब्लॉग पर सुने कर्ण जोर के गीत


  • करण कुमार जौहर (जन्म राहुल कुमार जौहर, 25 मई 1972), जिन्हें अक्सर अनौपचारिक रूप से केजेओ कहा जाता है, एक भारतीय फिल्म निर्देशक, निर्माता, पटकथा लेखक, कॉस्ट्यूम डिजाइनर, अभिनेता और टेलीविजन व्यक्तित्व हैं, जो हिंदी फिल्मों में काम करते हैं।
  • वह हीरू जौहर और निर्माता यश जौहर के बेटे हैं। जौहर ने अपने निर्देशन की शुरुआत व्यापक रूप से देखी गई रोमांस कुछ कुछ होता है (1998) के साथ की, जिसने उन्हें सर्वश्रेष्ठ निर्देशक और सर्वश्रेष्ठ पटकथा के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार दिलाया।
  • उनकी अगली दो फिल्में 'कभी खुशी कभी गम...' थीं।
  • (2001) और कभी अलविदा ना कहना (2006), जो दोनों विदेशी बाजार में बहुत सफल रहे।
  • उनके सामाजिक नाटक माई नेम इज खान (2010) ने उन्हें सर्वश्रेष्ठ निर्देशक के लिए अपना दूसरा फिल्मफेयर पुरस्कार दिलाया।
  • 2018 की जासूसी थ्रिलर राज़ी ने उन्हें सर्वश्रेष्ठ फिल्म के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार जीता।
  • धर्मा प्रोडक्शंस के बैनर तले उन्होंने कई सफल फिल्मों का निर्माण किया, साथ ही उन्हें हिंदी सिनेमा में अग्रणी निर्देशक-निर्माता के रूप में स्थापित किया। जौहर ने मनोरंजन उद्योग के अन्य मार्गों में भी सफलतापूर्वक प्रवेश किया है।
  • वह एक टेलीविजन टॉक शो, कॉफ़ी विद करण, और एक रेडियो शो कॉलिंग करण की मेजबानी करता है, और प्रतियोगिता रियलिटी शो झलक दिखला जा, इंडियाज गॉट टैलेंट, इंडियाज नेक्स्ट सुपरस्टार्स में जज के रूप में दिखाई दिया।


उत्तम सिंह


*उत्तम सिंह*
*🎂जन्म*
25 मई 1948 (आयु 74)

*पंजाब, भारत*

*बॉलीवुड संगीत, अर्ध शास्त्रीय, शास्त्रीय , भारतीय संगीत, पंजाबी क्षेत्रीय लोक*

*व्यवसाय*

*वायलिन वादक, संगीतकार , संगीतकार*

*साधन*
*वायोलिन*

🔛बचपन

उत्तम सिंह के पिता सितार वादक थे। उनका परिवार मुंबई चला गया , जब सिंह 12 वर्ष के थे। उन्होंने तबला और पश्चिमी वायलिन सीखा। उनका परिवार अपनी आय के पूरक के लिए विभिन्न गुरुद्वारों और धार्मिक कार्यों में कीर्तन गाता था ।

🔛वायोलिन बाजनेवाला

उत्तम सिंह ने तीन साल तक वायलिन वादक के रूप में काम किया। उन्हें बड़ा ब्रेक 1963 में मिला, जब उन्होंने मोहम्मद सफी ( नौशाद के सहायक ) द्वारा बनाई जा रही एक डॉक्यूमेंट्री के लिए एक वायलिन वादक के रूप में काम किया। इसके बाद उत्तम सिंह ने नौशाद , रोशन , मदन मोहन , सी. रामचंद्र , सचिन देव बर्मन सहित प्रमुख संगीतकारों के लिए वायलिन बजाया । बाद में, वह एसडी बर्मन के बेटे राहुल देव बर्मन के लिए मुख्य वायलिन वादक बन गए ।

🔛म्यूजिक अरेंजर

सिंह ने बाद में फिल्मों के लिए संगीत की व्यवस्था करने के लिए एक अन्य संगीतकार जगदीश के साथ भागीदारी की । कई भारतीय भाषाओं में 65 से अधिक फिल्मों के लिए काम करते हुए, यह जोड़ी प्रतिष्ठित अरेंजर्स बन गई। इन फिल्मों में प्रमुख राजश्री प्रोडक्शंस की हिट फिल्में, मैंने प्यार किया और हम आपके हैं कौन शामिल हैं..! . उन्होंने इलैयाराजा के साथ विभिन्न तमिल फिल्मों में संगीत अरेंजर्स के रूप में भी काम किया।

🔛संगीत निर्देशक

सिंह और जगदीश ने मनोज कुमार के पेंटर बाबू के लिए संगीत निर्देशक ("उत्तम-जगदीश") के रूप में काम किया । बाद में उन्होंने मनोज कुमार की दूसरी फिल्म क्लर्क में काम किया। साथ में, उन्होंने स्मिता पाटिल-राज बब्बर-राज किरण-अमृता सिंह-अमरीश पुरी अभिनीत वारिस (1988) में भी काम किया। 1992 में जगदीश की मृत्यु के बाद, सिंह ने स्वतंत्र रूप से काम करना शुरू कर दिया। एक संगीत निर्देशक के रूप में उनकी सबसे उल्लेखनीय फिल्म यश चोपड़ा की दिल तो पागल है थी । उन्होंने हम तुमसे मरते हैं, दुश्मन , फ़र्ज़ और प्यार दीवाना होता है सहित कई अन्य फिल्मों के लिए भी संगीत तैयार किया । उन्होंने अनिल शर्मा की गदर: एक प्रेम कथा के लिए संगीत भी तैयार किया(2001) और बाद में द हीरो: लव स्टोरी ऑफ़ ए स्पाई के लिए।

चंद्र प्रकाश द्विवेदी के 2003 के विभाजन नाटक पिंजर के लिए उनके गीत और स्कोर , जिसमें उन्होंने वडाली ब्रदर्स के साथ सहयोग किया , उन्हें बहुत आलोचनात्मक प्रशंसा मिली और संगीतकार के रूप में उनका सबसे अच्छा काम माना जाता है।

निजी एल्बम
संपादन करना
सिंह ने 1996 में अपना पहला निजी एल्बम ओम साईं राम रिकॉर्ड किया। बाद में, उन्होंने अपनी बेटी प्रीति सिंह के एल्बम सूर (2002) के लिए भी संगीत तैयार किया।

🔛पुरस्कार

फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक पुरस्कार - 1997 ( दिल तो पागल है के लिए )
नामांकन

अंतर्राष्ट्रीय भारतीय फिल्म अकादमी पुरस्कार (सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक) - 2002 ( गदर: एक प्रेम कथा के लिए )
फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक पुरस्कार - 2002 ( गदर: एक प्रेम कथा के लिए )
स्क्रीन वीकली अवार्ड (सर्वश्रेष्ठ पृष्ठभूमि संगीत) -2004 ( पिंजर के लिए )
ज़ी सिने अवार्ड सर्वश्रेष्ठ पृष्ठभूमि संगीत - 2003 ( पिंजर के लिए )
स्क्रीन वीकली अवार्ड (सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक) -2002 ( गदर: एक प्रेम कथा के लिए )

वायलिन वादन


उत्तम सिंह आरडी बर्मन शो

लक्ष्मीकांत प्यारे लाल आज लक्ष्मीकांत शांताराम कुदलकर प्यारे लाल आज भी दोस्ती निभा रहे है।


लक्ष्मीकांत शांताराम कुदलकर का जन्म 3 नवंबर 1937 को लक्ष्मी पूजन के दिन हुआ था

25 मई 1998 में 60 साल की उम्र में नानावती अस्पताल, मुंबई में उनका निधन हो गया




महान संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के लक्ष्मीकांत की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रधांजलि

लक्ष्मीकांत शांताराम कुदलकर का जन्म 3 नवंबर 1937 को लक्ष्मी पूजन के दिन हुआ था, अपने जन्म के दिन की वजह से, उनका नाम लक्ष्मी रखा गया, जो देवी लक्ष्मी के नाम पर था। उन्होंने अपने बचपन के दिन मुंबई के विले पार्ले (पूर्व) की मलिन बस्तियों में अत्यंत गरीबी के बीच बिताया। उनके पिता की मृत्यु उस समय हो थी जब वे बच्चे ही थे। अपने परिवार की खराब वित्तीय हालत के कारण वे अपने शैक्षणिक शिक्षा भी पूरी नहीं कर सके। लक्ष्मीकांत के पिता के दोस्त, जो खुद एक संगीतकार थे उन्होंने लक्ष्मीकांत उनके बड़े भाई को संगीत सीखने की सलाह दी उसके बाद लक्ष्मीकांत ने सारंगी बजाना सीखा और उनके बड़े भाई ने तबला बजाना सीखा। उन्होंने जाने-माने सारंगी खिलाड़ी हुसैन अली की सोहबत में दो साल बिताए।

लक्ष्मीकांत ने अपनी फिल्म कैरियर की शुरुआत एक बाल अभिनेता के रूप में हिंदी फिल्म भक्त पुंडलिक (1949) और आंखें (1950) फिल्म से की। उन्होंन कुछ गुजराती फिल्मों में काम किया।

इस बीच घर की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए लक्ष्मीकांत ने संगीत समारोह में हिस्सा लेना शुरू कर दिया। आगे चलकर वाद्य यंत्र मेंडोलियन बजाने की शिक्षा बालमुकुंद इंदौरकर से ली। लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की जोड़ी के रूप में फ़िल्म जगत में अपने संगीत का लोहा मनवाकर ही माने। अपने कैरियर की शुरुआत में कल्याण जी आनन्द जी के सहायक के रूप में उन्होंने 'मदारी', 'सट्टा बाज़ार', 'छलिया' और 'दिल तेरा हम भी तेरे' जैसी कई फ़िल्मों में काम किया। इस जोड़ी पर संगीत का ऐसा जुनुन था कि मशहूर निर्माता-निर्देशक बाबू भाई मिस्त्री की क्लासिकल फ़िल्म 'पारसमणि' ने इनकी तक़दीर बदल कर रख दी। फिर पीछे मुड़कर देखने का मौक़ा ही नहीं मिला।

प्रसिद्ध गीत

लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की जोड़ी ने हिन्दी सिनेमा को बेहतरीन गीत दिये उनमें कुछ के नाम नीचे दिये गये हैं।

सावन का महीना... (फ़िल्म- मिलन)
दिल विल प्यार व्यार... (फ़िल्म- शागिर्द)
बिन्दिया चमकेगी... (फ़िल्म- दो रास्ते)
मंहगाई मार गई... (फ़िल्म- रोटी कपड़ा और मकान)
डफली वाले... (फ़िल्म- सरगम)
तू मेरा हीरो है... (फ़िल्म- हीरो )
यशोदा का नन्दलाला... (फ़िल्म- संजोग)
चिट्ठी आई है... (फ़िल्म- नाम)
एक दो तीन... (फ़िल्म- तेज़ाब)
चोली के पीछे क्या है... (फ़िल्म- खलनायक)

निधन

25 मई 1998 में 60 साल की उम्र में नानावती अस्पताल, मुंबई में उनका निधन हो गया

सुनिलदत

*🎂जन्म6 जून 1929*
*🕯️मृत्यु25 मई 2005,*
*🔛महान अभिनेता, निर्माता, निर्देशक, राजनीतिज्ञ सुनील दत्त की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि*

*सुनील दत्त ने भी कुछ पंजाबी फिल्मों - मन जीते जग जीत (1973), दुख भंजन तेरा नाम (1974) और सत श्री अकाल (1977) में अभिनय किया -इसके अलावा, उन्होंने वास्तव में कभी किसी अन्य पंजाबी फिल्म में काम नहीं किया।*

सुनील दत्त से जुडी रोचक जानकारी –

  • जब सुनील दत्त पांच वर्ष के थे, तभी इनके पिता का निधन हो गया था।
  • महज 18 साल की उम्र में इन्होने देश भर में हिंदू-मुस्लिम साम्प्रदायिक दंगों को देखा था।
  • एक समय के बाद इनका पूरा परिवार मंडौली नामक एक छोटे से गांव में पुनर्स्थापित हुआ था।
  • कई वर्षों बाद यह लखनऊ चले गए, जहां इन्होने अमीनाबाद की गलियों में काफी समय बिताया था।
  • बाद में यह मुम्बई चले गए जहाँ इन्होने बेस्ट परिवहन विभाग में काम किया था।
  • एक रिपोर्ट में मुताबिक मदर इंडिया के सेट पर आग लगने की वजह से इन्होने नरगिस को आग से बचाया था, यहीं से यह नरगिस के प्यार में पड़े थे।
  • वर्ष 1964 की फिल्म “यादों” में निर्देशन और अभिनय करके इन्होने एक रिकॉर्ड बनाया, जिसमें इन्होने एक अभिनेता के रूप में भी कार्य किया था।
  • वर्ष 1982 में, महाराष्ट्र सरकार ने इनको एक वर्ष के लिए ‘मुंबई का शेरिफ’ नियुक्त किया था।
  • इनको भारत सरकार द्वारा पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया था।
  • यह भारत के एक महान अभिनेता और राजनीतिज्ञ रहे थे।

सुनील दत्त भारतीय सिनेमा में एक ऐसे अभिनेता थे जिनको पर्दे पर देख एक आम हिन्दुस्तानी अपनी ज़िंदगी की झलक देखता था। सुनील दत्त 2004-05 के दौरान भारत सरकार में युवा मामलों और खेल विभाग में कैबिनेट मंत्री भी रहे।सुनील दत्त का वास्तविक नाम बलराज रघुनाथ दत्त था।

जीवन_परिचय

हिन्दी सिनेमा जगत में सुनील दत्त को एक ऐसी शख़्सियत के तौर पर याद किया जाता है, जिन्होंने फ़िल्म निर्माण, निर्देशन और अभिनय से लगभग चार दशक तक दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया। उनके किरदार वास्तविक जीवन के बहुत क़रीब होते थे और उनका व्यक्तित्व भी उनके किरदार की तरह उज्ज्वल और प्रभावशाली रहा। सुनील दत्त का जन्म 6 जून, 1929 को पंजाब (पाकिस्तान) के झेलम ज़िले के खुर्दी गाँव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। सुनील दत्त बचपन से ही अभिनय के क्षेत्र में जाना चाहते थे। बलराज साहनी फ़िल्म इंडस्ट्री में अभिनेता के रुप में उन दिनों स्थापित हो चुके थे, इसे देखते हुए उन्होंने अपना नाम बलराज दत्त से बदलकर सुनील दत्त रख लिया। उनका बचपन यमुना नदी के किनारे मंदाली गाँव में बीता जो हरियाणा प्रदेश में है। सुनील दत्त इसके बाद लखनऊ चले गये और जहाँ पर वह अख्तर नाम से अमीनाबाद गली में एक मुसलमान औरत के घर पर रहे। कुछ समय बाद अपने सपनों को पूरा करने के लिए वह मुंबई चले गए।

कार्यक्षेत्र

मुम्बई आकर सुनील दत्त ने मुंबई परिवहन सेवा के बस डिपो में चेकिंग क्लर्क के रुप में कार्य किया, जहाँ उनको 120 रुपए महीने के मिलते थे। फ़िल्म इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाने के लिए 1955 से 1957 तक सुनील दत्त संघर्ष करते रहे। हिन्दी सिनेमा जगत में अपने पैर जमाने के लिए वह ज़मीन की तलाश में एक स्टूडियो से दूसरे स्टूडियो भटकते रहे थे। उसके बाद सुनील दत्त ने 'जय हिंद कॉलेज' में पढ़कर स्नातक किया। सुनील दत्त ने रेडियो सिलोन की हिन्दी सेवा के उद्घोषक के तौर पर अपना कैरियर शुरू किया था। जहाँ वह फ़िल्मी कलाकारों का इंटरव्यू लिया करते थे। एक इंटरव्यू के लिए उन्हें 25 रुपये मिलते थे। यह दक्षिण एशिया की पचास के दशक मे सबसे लोकप्रिय रेडियो सेवा थी।

विवाह

सुनील दत्त ने 'मदर इंडिया' फ़िल्म की शूटिंग के दौरान एक आग की दुर्घटना में नर्गिस को अपनी जान की परवाह किये बिना बचाया। इस हादसे में सुनील दत्त काफ़ी जल गए थे तथा नर्गिस पर भी आग की लपटों का असर पड़ा था। उन्हें इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया और उनके स्वस्थ होकर बाहर निकलने के बाद दोनों ने शादी करने का फैसला कर लिया। नर्गिस 11 मार्च, 1958 में सुनील दत्त की जीवन संगिनी बन गई।

फ़िल्मी_सफर_की_शुरुआत

सुनील दत्त की पहली फ़िल्म 'रेलवे प्लेटफॉर्म' 1955 में प्रदर्शित हुई, जिसमें उन्होंने अभिनेता के रूप में कार्य किया। अपनी पहली फ़िल्म से उन्हें कुछ ख़ास पहचान नहीं मिली। उन्होंने इस फ़िल्म के बाद 'कुंदन', 'राजधानी', 'किस्मत का खेल' और 'पायल' जैसी कई छोटी फ़िल्मों में अभिनय किया, लेकिन इनमें से उनकी कोई भी फ़िल्म सफल नहीं हुई।

1957 में प्रदर्शित हुई फ़िल्म 'मदर इंडिया' से सुनील दत्त को अभिनेता के रूप में ख़ास पहचान और लोकप्रियता मिली। उन्होंने इस फ़िल्म में एक ऐसे युवक 'बिरजू' की भूमिका निभाई जो गाँव में सामाजिक व्यवस्था से काफ़ी नाराज़ है और इसी की वजह से विद्रोह कर डाकू बन जाता है। साहूकार से बदला लेने के लिए वह उसकी पुत्री का अपहरण कर लेता है लेकिन इस कोशिश में अंत में वह अपनी माँ के हाथों मारा जाता है। इस फ़िल्म में नकारात्मक हीरो का किरदार निभाकर वह दर्शकों के दिल में जगह बनाने में सफल रहे।

वक़्त (1965‌)

सुनील दत्त की सुपरहिट फ़िल्म 'वक़्त' 1965 में प्रदर्शित हुई। उनके सामने इस फ़िल्म में बलराज साहनी, राजकुमार, शशि कपूर और रहमान जैसे नामी सितारे थे, इसके बावज़ूद सुनील अपने दमदार अभिनय से दर्शकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने में सफल रहे। सुनील दत्त के सिने करियर का 1967 सबसे महत्त्वपूर्ण साल साबित हुआ। उस साल उनकी 'मिलन', 'मेहरबान' और 'हमराज़' जैसी सुपरहिट फ़िल्में प्रदर्शित हुई, जिनमें उनके अभिनय के नए रूप देखने को मिले। इन फ़िल्मों की सफलता के बाद वह अभिनेता के रुप में शोहरत की बुलंदियों पर जा पहुंचे।

सुनील दत्त भारतीय सिनेमा के उन अभिनेताओं में से एक है जिनकी फ़िल्मों ने पचास और साठ के दशक में दर्शकों पर अमित छाप छोड़ी। 'मदर इंडिया' की सफलता के बाद उन्हें 'साधना' (1958), 'सुजाता' (1959), 'मुझे जीने दो' (1963), 'ख़ानदान' (1965 ), 'पड़ोसन' (1967 ) जैसी सफल फ़िल्मों से भारतीय दर्शको के बीच एक सफल अभिनेता के रूप में पहचान मिली। सुनील दत्त को निर्देशक बी. आर. चोपड़ा के साथ 'गुमराह' (1963), 'वक़्त' (1965 ) और 'हमराज़' (1967) जैसी फ़िल्मों में निभाई गई यादगार भूमिकाओं ने भी दर्शकों के बीच लोकप्रिय किया।

मल्टी_स्टारर_फ़िल्मों_का_अहम_हिस्सा

सुनील दत्त के सिने करियर पर नज़र डालने पर पता लगता है कि वह मल्टी स्टारर फ़िल्मों का अहम हिस्सा रहे है। फ़िल्म निर्माताओं को ऐसी फ़िल्मों में जब कभी अभिनेता की ज़रूरत होती थी वह उन्हें नज़र अंदाज़ नहीं कर पाते थे। सुनील दत्त की मल्टीस्टारर सुपरहिट फ़िल्मों में 'नागिन', 'जानी दुश्मन', 'शान', 'बदले की आग', 'राज तिलक', 'काला धंधा गोरे लोग', 'वतन के रखवाले', 'परंपरा', 'क्षत्रिय' आदि प्रमुख हैं।

मुन्ना_भाईएम_बी_बी_एस

1993 में प्रदर्शित फ़िल्म 'क्षत्रिय' के बाद सुनील दत्त लगभग 10 वर्ष तक फ़िल्म अभिनय से दूर रहे। विधु विनोद चोपड़ा के ज़ोर देने पर उन्होंने 2007 में प्रदर्शित फ़िल्म 'मुन्ना भाई एम.बी.बी.एस' में अभिनय किया। फ़िल्म में उन्होंने अभिनेता संजय दत्त के पिता की भूमिका निभाई। पिता-पुत्र की इस जोड़ी को दर्शकों ने काफ़ी पसंद किया। इस फ़िल्म के माध्यम से पहली बार पिता पुत्र (सुनील दत्त और संजय दत्त) एक साथ पर्दे पर नजर आए थे। हालांकि फ़िल्म 'क्षत्रिय' और 'रॉकी' में भी सीनियर और जूनियर दत्त ने साथ काम किया मगर एक भी दृश्य में वे साथ में नहीं थे।

फ़िल्म_निर्देशन

फ़िल्म 'यादें' (1964) के साथ सुनील दत्त ने फ़िल्म निर्देशन में भी क़दम रखा। इस पूरी फ़िल्म में सिर्फ एक युवक की भूमिका थी जो अपने संस्मरण को याद करता रहता है। इस किरदार को सुनील दत्त ने निभाया था। उनकी यह फ़िल्म बहुत सफल नहीं रही, लेकिन भारतीय सिनेमा जगत के इतिहास में अपना नाम दर्ज करा गई।

फ़िल्म_निर्माण

सुनील दत्त ने 1963 में प्रदर्शित फ़िल्म 'यह रास्ते है प्यार के' के ज़रिए फ़िल्म निर्माण के क्षेत्र में भी क़दम रख दिया। यह फ़िल्म टिकट खिड़की पर ज़्यादा सफल नहीं रही। इस फ़िल्म के बाद सुनील दत्त ने फ़िल्म 'मुझे जीने दो' का निर्माण किया। यह फ़िल्म डाकुओं के जीवन पर आधारित थी। यह फ़िल्म सुपरहिट साबित हुई। इसके बाद उन्होंने अपने भाई सोम दत्त को बतौर मुख्य अभिनेता फ़िल्म 'मन का मीत' में लांच किया। सोम दत्त का फ़िल्मी सफर बहुत सफल नहीं रहा। सुनील दत्त ने 1971 में अपनी महत्वकांक्षी फ़िल्म 'रेशमा और शेरा' का निर्माण और निर्देशन किया। इस फ़िल्म में उन्होंने भूमिका भी निभाई। यह एक पीरियड और बड़े बजट की फ़िल्म थी जिसे दर्शकों ने नकार दिया। निर्माता और निर्देशक बनने के बाद भी सुनील दत्त अभिनय से कभी ज़्यादा समय के लिए दूर नहीं रहे।[1] सुनील दत्त की सत्तर और अस्सी के दशक में बनी फ़िल्में 'प्राण जाए पर वचन ना जाए' (1974), 'नागिन' (1976), 'जानी दुश्मन' (1979) और 'शान' (1980) में उनकी भूमिकाएँ पसंद की गयी। इस समय में सुनील दत्त धार्मिक पंजाबी फ़िल्मों से भी जुड़े रहे। जिनमें 'मन जीते जग जीते' (1973), 'दुख भंजन तेरा नाम' (1974 ), 'सत श्री अकाल' (1977) प्रमुख हैं।

राजनीति_में

सुनील दत्त ने फ़िल्मों में कई भूमिकाएँ निभाने के बाद समाज सेवा के लिए राजनीति में प्रवेश किया और कांग्रेस के सहयोग से लोकसभा के सदस्य बने। साल 1968 में वह पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किए गए। सुनील दत्त को 1982 में मुंबई का शेरिफ नियुक्त किया गया। हिन्दी फ़िल्मों के अलावा सुनील दत्त ने कई पंजाबी फ़िल्मों में भी अपने अभिनय का जलवा दिखाया। इनमें 'मन जीते जग जीते' 1973, 'दुख भंजन तेरा नाम' 1974 और 'सत श्री अकाल' 1977 जैसी सुपरहिट फ़िल्में शामिल है।[3]

नर्गिस_की_मृत्यु

1980 में सुनील दत्त ने अपने बेटे संजय दत्त को फ़िल्म 'रॉकी' में लांच किया। यह एक सुपरहिट फ़िल्म साबित हुई लेकिन फ़िल्म के प्रदर्शित होने के थोड़े समय के बाद ही उनकी पत्नी नर्गिस का कैंसर की बीमारी की वजह से देहांत हो गया। नर्गिस की कैंसर से हुई मृत्यु के कारण उन्हें इस बीमारी के प्रति सामाजिक जागरूकता के प्रति बढ़ने की प्रेरणा मिली। सुनील दत्त ने पत्नी की याद में 'नर्गिस दत्त फाउंडेशन' की स्थापना की। यह वो समय था जब सुनील दत्त सामाजिक कार्यक्रमों में ज़्यादा दिलचस्पी लेने लगे।
सम्मान_और_पुरस्कार

1963 - फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार (मुझे जीने दो)
1965 - फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार (ख़ानदान)
1968 - पद्मश्री
1995 - फ़िल्मफ़ेयर लाइफ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार
1997 - स्टार स्क्रीन लाइफ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार
2001 - ज़ी सिने लाइफ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार
2005 - फाल्के रत्न पुरस्कार

मृत्यु

हिन्दी फ़िल्मों के पहले एंग्री यंग मैन और राजनीतिक तौर पर एक आदर्श नेता सुनील दत्त का 25 मई, 2005 को हृदय गति रुकने के कारण बांद्रा स्थित उनके निवास स्थान पर देहांत हो गया। सुनील दत्त 'मदर इंडिया' के 'बिरजू' के रूप में या एक आदर्श नेता के तौर पर आज भी हमारे बीच मौज़ूद हैं।

आशा भोसले

आशा भोसले 🎂08 सितंबर 1933 ⚰️12 अप्रैल 2026 जन्म की तारीख और समय: 8 सितंबर 1933, सांगली मृत्यु की जगह और तारीख: 12 अप्रैल 2026 ब...