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शुक्रवार, 21 अप्रैल 2023

प्रसिद्ध अभिनेत्री कुमकुम के जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धांजलि

प्रसिद्ध अभिनेत्री कुमकुम के जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धांजलि

22 अप्रैल 1934 को बिहार के शेखपुरा (अब) में जन्मीं कुमकुम का असली नाम ज़ैबुनिस्सा  था। उनके पिता हुसैनाबाद के नवाब थे।

कुमकुम का जन्म का नाम जैबुन्निसा है।  वह एक प्रतिष्ठित मुस्लिम परिवार में पैदा हुई उनके पिता का नाम सैयद मंज़ूर हसन और माँ का नाम खुर्शीद बानो था
कुमकुम ने अहमद खान से शादी की और एक बेटी को जन्म देने के बाद, उनका परिवार सऊदी अरब चला गया।

कुमकुम ने पहली भोजपुरी फिल्म "गंगा मैया तोहे पियारी चढ़ाईबो" (1963) में भी अभिनय किया था। दरअसल कुमकुम, गुरुदत्त की खोज मानी जाती हैं। गुरुदत्त को अपनी फिल्म आर पार (1954) के गाने "कभी आर कभी पार लागा तीरे नजर" का फिल्मांकन एक्टर जगदीप पर करना था लेकिन बाद में गुरुदत्त को लगा कि इसे किसी महिला पर फिल्माना चाहिए। उस समय, कोई भी इतना छोटा सा गाना करने के लिए सहमत नहीं हुआ। तब आखिरकार गुरुदत्त ने कुमकुम पर इस गीत का चित्रण किया। बाद में गुरु दत्त ने अपनी फिल्म प्यासा में भी उन्हें छोटा सा किरदार दिया।

कुमकुम ने अपने करियर में लगभग 115 फिल्मों में अभिनय किया। उन्हें मिस्टर एक्स इन बॉम्बे (1964), मदर इंडिया (1957), सन ऑफ इंडिया (1962), कोहिनूर (1960), उजाला, नया दौर, श्रीमान फंटूश, एक सपेरा एक लुटेरा में शानदार अभिनय के लिए जाना जाता है। वह अपने दौर के कई स्टार्स के संग काम कर चुकी थीं, जिनमें किशोर कुमार और गुरु दत्त का भी शामिल है

फ़िल्म सी आई डी (1956) का प्रसिद्ध गीत "ये है बॉम्बे मेरी जान", गीता दत्त द्वारा गाया गया था कुमकुम पर फिल्माया गया  उन्होने शम्मी कपूर के साथ मेम साहब (1956) में एक साइड रोल किया और चार दिल चार राहें (1959) में शम्मी कपूर के साथ लीड रोल में अभिनय किया

उन्होने प्रख्यात कत्थक गुरु पंडित, शंभू महाराज द्वारा कत्थक में  प्रशिक्षित लिया   उन्होंने दिलीप कुमार के साथ फिल्म कोहिनूर (1960) में अपनी नृत्य प्रतिभा दिखाई।  "मधुबन में राधिका नाचे रे" और "हाये जादुगर क़ातिल, हाज़िर है मेरा दिल", नौशाद द्वारा संगीतबद्ध आशा भोसले द्वारा गाया गया गीत कुमकुम पर फिल्माया गया था  उन्होने  किशोर कुमार के साथ गंगा की लहरें  श्रीमान  फंटूश, हाए मेरा दिल और मिस्टर एक्स इन बॉम्बे जैसी फिल्मों में काम किया  मिस्टर एक्स इन बॉम्बे का गीत "खूबसूरत हसीना" फ़िल्म हाय मेरा दिल का गीत "इजाज़त हो तो फ़िल्म  श्रीमान फंटूश का गीत "सुल्ताना सुल्ताना" और गंगा की लहरें का गीत "मचलती हुई" जैसे गाने किशोर-कुमकुम की जोड़ी पर फिल्माये थे जो आज भी लोकप्रिय है  

कुमकुम लेखक निर्देशक रामानंद सागर की पसंदीदा अभिनेत्री थी।  सागर ने 1968 की सुपरहिट फिल्म आँखे में धर्मेंद्र की बहन के रूप में कुमकुम को लेने का फैसला किया। 1970 में फ़िल्म गीत में कुमकुम को  रामानंद सागर ने एक छोटी सी भूमिका  लेकिन फ़िल्म ललकार (1972) में, उन्हें धर्मेंद्र के साथ कास्ट किया गया जबकि राजेंद्र कुमार को माला सिन्हा के साथ कास्ट किया गया था।  कुमकुम को किरण कुमार के साथ जलते बदन (1973) में अभिनय करने का मौका मिला  जिसका निर्माण, निर्देशन और लेखन एक बार फिर रामानंद सागर ने किया।  1973 में उन्हें फ़िल्म धमकी में विनोद खन्ना के कास्ट किया गया और युगल गीत "चाँद  क्या है रूप का दर्पन" बेहद लोकप्रिय हुआ।  उन्हें प्रकाश मेहरा द्वारा निर्देशित कॉमेडी फिल्म एक कुंवारा एक कुवारी में प्राण के साथ अभिनय करने का अवसर मिला यह एक ब्लॉकबस्टर फ़िल्म थी।

शादी के बाद उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री छोड़ दी

कुमकुम की मृत्यु 28 जुलाई 2020 को 86 वर्ष की आयु में मुंबई में उनके निवास स्थान पर हुई,

उषा किरण

प्रसिद्ध अभिनेत्री उषा किरण के जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धांजलि

उषा किरण (22 अप्रैल 1929 - 9 मार्च 2000) एक भारतीय फिल्म अभिनेत्री थीं।  चार दशक से अधिक के कैरियर में, उन्होंने 50 से अधिक हिंदी और मराठी फिल्मों में अभिनय किया उनकी प्रमुख फिल्में दाग (1952), पतिता (1953), बादबाँ (1954), चुपके चुपके (1975), मिली (1975) और बावर्ची (1972) थी वह 1996 और 1997 के दौरान मुंबई की शेरिफ भी थीं। 

उन्होंने अपने अभिनय कैरियर की शुरुआत एम.जी.  रंगनेकर के मराठी नाटक आशीर्वाद से किया उन्होंने उदय शंकर की डांस-ड्रामा फिल्म कल्पना (1948) में एक छोटी भूमिका के साथ हिंदी फिल्म उद्योग में प्रवेश किया।  उन्होंने कई लोकप्रिय हिंदी फिल्मों जैसे नज़राना (1961), दाग (1952), और बादबाँ (1954)  काबुलीवाला  (1961), पतिता (1953), मिली, बावर्ची (1972) और चुपके चुपके (1975) में अभिनय किया उन्होंने 1955 में सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री का पहला फिल्मफेयर अवार्ड जीता

उनकी प्रसिद्ध मराठी फ़िल्मों में शामिल हैं शिक्ली बायको  जसाच तासे, पोस्टतली मुल्गी, दुध भाकर, स्त्री जनमा हाय तुज़ी कहानी, कन्यादान (जिसके लिए उन्हें महाराष्ट्र सरकार का सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार मिला) गरबा घरची लेक और कंचनगंगा 

उन्होंने राज कपूर, देव आनंद, अशोक कुमार, दिलीप कुमार, राजेंद्र कुमार, राजेश खन्ना, धर्मेंद्र और अमिताभ बच्चन जैसे अभिनेताओं के साथ अभिनय किया।

उनके पिता का नाम बालकृष्ण विष्णु मराठे और माता का नाम राधा था  पांच बेटियों में वह दूसरी थी  उनका विवाह डॉ मनोहर खेर से हुआ, जो मुंबई के LTMMG (सायन) अस्पताल के डीन थे  वे दो बच्चों, एक बेटे, अद्वैत खेर और एक बेटी, तन्वी आज़मी के माता-पिता थे  उषा किरण का बेटा अद्वैत एक पूर्व मॉडल है, जो अब अपनी पत्नी उत्तरा (जो फेमिना मिस इंडिया - 1982) के साथ नासिक में रहते है और उनकी दो बेटियाँ सौंसक्रुति खेर और सैयामी खेर हैं उषा किरण की बेटी तन्वी आज़मी एक जानी मानी टेलीविज़न और फ़िल्म अभिनेत्री हैं, जिनकी शादी शबाना आज़मी के भाई बाबा आज़मी से हुई

9 मार्च 2000 में 70 वर्ष की आयु में उनका नासिक में निधन हो गया

कानन देवी

प्रसिद्ध अभिनेत्री,गायिका,एवं फ़िल्म निर्माता कानन देवी के जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धांजलि

कानन देवी भारत की प्रसिद्ध अभिनेत्री, गायिका और फ़िल्म निर्माता थीं। उनका मूल नाम 'कानन बाला' था। भारतीय सिनेमा जगत् में कानन देवी का नाम एक ऐसी शख्सियत के तौर पर याद किया जाता है, जिन्होंने न केवल फ़िल्म निर्माण की विधा बल्कि अभिनय और पार्श्वगायन से भी दर्शकों के बीच अपनी ख़ास पहचान बनाई थी। बगैर प्रशिक्षण हासिल किए कानन ने गायन की दुनिया में प्रवेश किया और अभिनय के क्षेत्र में भी अपनी पहचान बनाई। वह पहली बांग्ला कलाकार थीं, जिन्हें भारतीय सिनेमा में उल्लेखनीय योगदान के लिए 1976 में 'दादा साहेब फाल्के पुरस्कार' से सम्मानित किया गया था।

फ़िल्मी_शुरुआत

कानन देवी का जन्म पश्चिम बंगाल के हावड़ा में 22 अप्रैल, 1916 को एक मध्यम वर्गीय बंगाली परिवार में हुआ था। बाल्यावस्था के दिनों में ही उनके दत्तक पिता रमेश चन्द्र दास की मृत्यु हो गई थी। इसके बाद परिवार की आर्थिक ज़िम्मेदारी को देखते हुए कानन देवी अपनी माँ के साथ काम में हाथ बंटाने लगीं। कानन देवी जब सिर्फ़ 10 वर्ष की ही थीं, तब अपने एक पारिवारिक मित्र की मदद से उन्हें 'ज्योति स्टूडियो' द्वारा निर्मित फ़िल्म 'जयदेव' में काम करने का अवसर मिला। इसके बाद कानन देवी को ज्योतिस बनर्जी के निर्देशन में राधा फ़िल्म्स के बैनर तले बनी कई फ़िल्मों में बतौर बाल कलाकार काम करने का मौका मिला। वर्ष 1934 में प्रदर्शित फ़िल्म 'माँ' बतौर अभिनेत्री कानन देवी के सिने कैरियर की पहली हिट फ़िल्म साबित हुई।

सफलता

कुछ समय के बाद कानन देवी न्यू थियेटर में शामिल हो गईं। इस बीच उनकी मुलाकात रायचंद बोराल से हुई, जिन्होंने कानन देवी के सामने हिन्दी फ़िल्मों में काम करने का प्रस्ताव रखा। तीस और चालीस के दशक में फ़िल्म अभिनेता या अभिनेत्रियों को फ़िल्मों में अभिनय के साथ ही पार्श्वगायक की भूमिका भी निभानी पड़ती थी। इस स्थिति को ध्यान में रखते हुए कानन देवी ने भी संगीत की शिक्षा लेनी शुरू कर दी। उन्होंने संगीत की प्रारंभिक शिक्षा उस्ताद अल्लारक्खा और भीष्मदेव चटर्जी से प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने अनादि दस्तीदार से रवीन्द्र संगीत भी सीखा। वर्ष 1937 में प्रदर्शित फ़िल्म 'मुक्ति' बतौर अभिनेत्री कानन देवी के सिने करियर की सुपर हिट फ़िल्म साबित हुई। पी.सी.बरुआ के निर्देशन में बनी इस फ़िल्म की ज़बरदस्त कामयाबी के बाद कानन देवी न्यू थियेटर की चोटी की कलाकारों में गिनी जाने लगी थीं।

मुंबई_आगमन

सन 1941 में कानन देवी ने न्यू थियेटर छोड़ दिया और अब वे स्वतंत्र तौर पर काम करने लगीं। 1942 में प्रदर्शित फ़िल्म 'जवाब' बतौर अभिनेत्री कानन देवी के सिने करियर की सर्वाधिक हिट फ़िल्म साबित हुई। इस फ़िल्म में उन पर फ़िल्माया गया यह गीत- "दुनिया है तूफान मेल", उन दिनों श्रोताओं के बीच काफ़ी लोकप्रिय हुआ। इसके बाद कानन देवी की 'हॉस्पिटल', 'वनफूल' और 'राजलक्ष्मी' जैसी फ़िल्में भी प्रदर्शित हुई, जो टिकट खिड़की पर सुपरहिट रहीं। अपनी इस सफलताओं के बाद कानन देवी ने सन 1948 में फ़िल्म नगरी मुंबई (भूतपूर्व बम्बई) का रुख़ किया। 1948 में ही प्रदर्शित फ़िल्म 'चंद्रशेखर' एक अभिनेत्री के रूप में कानन देवी की अंतिम हिन्दी फ़िल्म थी। फ़िल्म में उनके नायक की भूमिका अशोक कुमार ने निभाई थी।

पुरस्कार

वर्ष 1949 में कानन देवी ने फ़िल्म निर्माण के क्षेत्र में भी कदम रख दिया। 'श्रीमती पिक्चर्स' के अपने बैनर तले कानन देवी ने कई सफल फ़िल्मों का निर्माण किया। वर्ष 1976 में फ़िल्म निर्माण के क्षेत्र में कानन देवी के उल्लेखनीय योगदान को देखते हुए उन्हें फ़िल्म जगत् के सर्वोच्च सम्मान 'दादा साहब फाल्के पुरस्कार' से सम्मानित किया गया। कानन देवी बंगाल की पहली अभिनेत्री बनीं, जिन्हें यह पुरस्कार दिया गया था।

फ़िल्मी_सफर

अपने तीन दशक लंबे सिने कैरियर में उन्होंने लगभग 60 फ़िल्मों में अभिनय किया। उनकी अभिनीत उल्लेखनीय फ़िल्मों में- 'जयदेव', 'प्रह्लाद', 'विष्णु माया', 'माँ', 'हरि भक्ति', 'कृष्ण सुदामा', 'खूनी कौन', 'विद्यापति', 'साथी', 'स्ट्रीट सिंगर', 'हार-जीत', 'अभिनेत्री', 'परिचय', 'लगन', 'कृष्ण लीला', 'फैसला' और 'आशा' आदि शामिल हैं।

फ़िल्म_निर्माण

कानन देवी ने अपने बैनर 'श्रीमती पिक्चर्स' के तहत कई फ़िल्मों का निर्माण भी किया। उनकी फ़िल्मों में कुछ हैं-

वामुनेर में (1948)
अन्नया (1949)
मेजो दीदी (1950)
दर्पचूर्ण (1952)
नव विद्यान (1954)
आशा (1956)
आधारे आलो (1957)
राजलक्ष्मी ओ श्रीकांता (1958)
इंद्रनाथ, श्रीकांता औ अनदादीदी (1959)
अभया ओ श्रीकांता (1965)

निधन

अपनी निर्मित फ़िल्मों, पार्श्वगायन और अभिनय के जरिए दर्शकों के बीच ख़ास पहचान बनाने वाली कानन देवी 17 जुलाई, 1992 को इस दुनिया को अलविदा कह गईं।

बी आर चोपड़ा

प्रसिद्ध फ़िल्म निर्माता-निर्देशक बी.आर.चोपड़ा के जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धांजलि

बल्देव राज चोपड़ा भारतीय सिनेमा जगत् में 'बी. आर. चोपड़ा' के नाम से प्रसिद्ध हैं। उन्हें एक ऐसे फ़िल्मकार के रूप में याद किया जाता रहेगा, जिन्होंने पारिवारिक, सामाजिक और साफ-सुथरी फ़िल्में बनाकर लगभग पाँच दशक तक सिने प्रेमियों के दिलों में अपनी ख़ास पहचान बनाई। 'नया दौर', 'वक़्त', 'हमराज', 'बाबुल' और 'बागवान' जैसी जीवन में रची-बसी कहानियों को दर्शाती बी. आर. चोपड़ा की फ़िल्में आज भी सिने प्रेमियों के दिल और दिमाग पर अमिट छाप छोड़ती हैं। उन्होंने विधवा पुनर्विवाह और वेश्यावृत्ति जैसी सामाजिक समस्या को अपनी फ़िल्मों का विषय बनाया। उनकी ज़्यादातर फ़िल्में किसी न किसी सामाजिक मुद्दे पर आधारित रहती थीं। फ़िल्म जगत् में दिए गए उनके योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें फ़िल्मों के सबसे बड़े सम्मान 'दादा साहब फाल्के पुरस्कार' देकर सम्मानित किया।

बी. आर. चोपड़ा का जन्म 22 अप्रैल, 1914 को तत्कालीन पंजाब राज्य के लुधियाना शहर में हुआ था। उन्होंने अंग्रेज़ी साहित्य में अपनी स्नातकोत्तर की शिक्षा लाहौर के मशहूर 'गवर्नमेंट कॉलेज' में पूरी की थी। इस कॉलेज ने फ़िल्म और साहित्य जगत् को 'बलराज साहनी', 'देवानंद', 'चेतन आनंद' और 'खुशवंत सिंह' जैसी शख्सियतें दी हैं। बी. आर. चोपड़ा बचपन के दिनों से ही फ़िल्म में काम कर शोहरत की बुलंदियों पर पहुँचना चाहते थे। देश के विभाजन के पश्चात् उनका परिवार दिल्ली आ गया, लेकिन कुछ दिन के बाद बी. आर. चोपड़ा का मन वहाँ नहीं लगा और वह अपने सपनों को साकार करने के लिए दिल्ली से मुम्बई आ गए।

बी. आर. चोपड़ा ने अपने कैरियर की शुरूआत फ़िल्म पत्रकार के रूप में की थी। फ़िल्मी पत्रिका 'सिने हेराल्ड' में वह फ़िल्मों की समीक्षा लिखा करते थे। कुछ ही समय में बी. आर. चोपड़ा ने इस पत्रिका का सारा भार स्वयं उठा लिया और 1947 तक इसे निरंतर चलाया। इसी वर्ष उन्होंने आई. एस. जौहर के साथ मिलकर फ़िल्म 'चांदनी चौक' का निर्माण शुरू किया, लेकिन लाहौर में दंगे भड़कने के कारण उन्हें इस फ़िल्म को बीच में ही बंद करना पड़ा।

वर्ष 1949 में फ़िल्म 'करवट' से उन्होंने फ़िल्म निर्माण के क्षेत्र में कदम रखा, लेकिन दुर्भाग्य से यह फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह असफल हुई। 1951 में अशोक कुमार अभिनीत फ़िल्म 'अफ़साना' को बी. आर. चोपड़ा ने निर्देशित किया। फ़िल्म ने बॉक्स ऑफिस पर अपने पच्चीस सप्ताह पूरे किए और 'रजत जयंती' (सिल्वर जुबली) मनाई। इस फ़िल्म की सफलता के बाद बी. आर. चोपड़ा फ़िल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने में सफल हो गए। वर्ष 1955 में उन्होंने 'बी. आर. फ़िल्मस बैनर' का निर्माण किया। इस बैनर तले उन्होंने सबसे पहले फ़िल्म 'नया दौर' का निर्माण किया। फ़िल्म नया दौर के माध्यम से बी. आर. चोपड़ा ने आधुनिक युग और ग्रामीण संस्कृति के बीच टकराव को रूपहले पर्दे पर पेश किया, जो दर्शकों को काफ़ी पसंद आया। फ़िल्म 'नया दौर' ने सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित किए और बी. आर. चोपड़ा को आकाश की बुलन्दियों पर पहुँचा दिया।

अपनी इस सफलता के बाद बी. आर. चोपड़ा ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और एक से बढ़कर एक फ़िल्मों का निर्माण कर दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया। इन फ़िल्मों में 'साधना' (1958), 'क़ानून' (1960), 'गुमराह' (1963) और 'हमराज़' (1967) जैसी सुपरहिट फ़िल्में शामिल हैं। बी. आर. चोपड़ा के बैनर तले निर्मित फ़िल्में समाज को संदेश देने वाली होती थीं। साठ के दशक के दौर में निर्मित फ़िल्में संगीत प्रधान हुआ करती थीं। लेकिन बी. आर. चोपड़ा अपने दर्शकों को हर बार कुछ नया देना चाहते थे। इसी बात का ध्यान रखते 1960 में उन्होंने 'क़ानून' जैसी प्रयोगात्मक फ़िल्म का निर्माण किया था। यह फ़िल्म इंडस्ट्री में किया गया एक नया प्रयोग था। जब फ़िल्म का निर्माण बगैर गानों के भी किया गया

बी. आर. चोपड़ा ने अपने भाई और जाने माने फ़िल्म निर्माता-निर्देशक यश चोपड़ा को भी शोहरत की बुलंदियों पर पहुँचाने में अहम योगदान दिया था। 1959 में प्रदर्शित फ़िल्म 'धूल का फूल', 'वक़्त' और 'इत्तफ़ाक' जैसी फ़िल्मों की सफलता के बाद ही यश चोपड़ा फ़िल्म इंडस्ट्री में एक निर्देशक के रूप में स्थापित हुए थे। सुप्रसिद्ध पार्श्वगायिका आशा भोंसले को भी कामयाबी के शिखर पर ले जाने में निर्माता और निर्देशक बी. आर. चोपड़ा की फ़िल्मों का अहम योगदान था। पचास के दशक में जब आशा भोंसले को केवल बी और सी ग्रेड की फ़िल्मों मे ही गाने का मौका मिला करता था, उस समय बी. आर. चोपड़ा ने ही आशा भोंसले की प्रतिभा को पहचाना और अपनी फ़िल्म 'नया दौर' में गाने का मौका दिया। यह फ़िल्म आशा भोंसले के सिने कैरियर की पहली सुपरहिट फ़िल्म साबित हुई।

इस फ़िल्म में मोहम्मद रफी और आशा भोंसले के गाए युगल गीत बहुत लोकप्रिय हुए, जिनमें 'मांग के साथ तुम्हारा', 'उड़े जब जब जुल्फे तेरी' आदि गीत शामिल हैं। फ़िल्म 'नया दौर' की कामयाबी के बाद ही आशा जी को अपनी मंज़िल प्राप्त हुई थी। इसके बाद बी. आर. चोपड़ा ने आशा जी को अपनी और भी कई फ़िल्मों में गाने का मौका दिया। इन फ़िल्मों में 'वक़्त' 'गुमराह', 'हमराज', 'आदमी और इंसान', और 'धुंध' प्रमुख हैं। आशा भोंसले के अलावा पार्श्वगायक महेन्द्र कपूर को भी हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री में स्थापित करने में बी. आर.चोपड़ा की अहम भूमिका रही है

स्वास्थ्य खराब रहने के कारण अस्सी के दशक में बी. आर. चोपड़ा ने फ़िल्मों का निर्माण करना कुछ कम कर दिया। इस दौरान 1980 में उन्होंने 'इंसाफ का तराजू' और 'निकाह' 1982 का निर्माण किया। वर्ष 1985 में बी. आर .चोपड़ा ने दर्शकों की रग को पहचानते हुए छोटे पर्दे की ओर भी रूख कर लिया। दूरदर्शन के इतिहास में अब तक सबसे ज़्यादा कामयाब रहे सीरियल 'महाभारत' के निर्माण का श्रेय भी बी. आर. चोपड़ा को ही जाता है। 96 प्रतिशत दर्शकों तक पहुँचने के साथ ही इस सीरियल ने अपना नाम 'गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड' में भी दर्ज कराया। बी. आर. चोपड़ा के लिए यह एक महान् उपलब्धि थी।

बी. आर. चोपड़ा को प्राप्त हुए सम्मान पर यदि गौर किया जाए तो उन्हें 1998 में हिन्दी सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान 'दादा साहब फाल्के पुरस्कार' से सम्मानित किया गया। इसके अलावा 1960 में प्रदर्शित फ़िल्म 'क़ानून' के लिए वह सर्वश्रेष्ठ निर्देशक के रूप में 'फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार' से सम्मानित किए गए थे। बहुमुखी प्रतिभा के धनी बी. आर. चोपड़ा ने फ़िल्म निर्माण के अलावा 'बागवान' और 'बाबुल' की कहानी भी लिखी

अपनी निर्मित फ़िल्मों से दर्शको के बीच विशिष्ट पहचान बनाने वाले फ़िल्मकार बी. आर. चोपड़ा ने 5 नवम्बर, 2008 को इस दुनिया को अलविदा कर दिया।

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