29अप्रैल लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
29अप्रैल लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 29 अप्रैल 2023

दीपिका चिलखिया

टी वी सीरियल रामायण की सीता फ़िल्म अभिनेत्री दीपिका चिखलिया के जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनाएं
जन्म की तारीख और समय: 29 अप्रैल 1965 (आयु 58 वर्ष), मुंबई
पति:  हेमंत टोपीवाला
बच्चे:  निधि टोपीवाला ,जूही टोपीवाला
दल: BJP 
पिछला कार्यकाल:लोकसभा की सदस्य (1991–1996)
लंबाई: 1.47 मी
दीपिका चिखालिया  भारतीय अभिनेत्री हैं, जिन्होंने रामानन्द सागर के टीवी सीरियल 'रामायण' में सीता की भूमिका निभाकर प्रसिद्धि पाई और दर्शकों के दिलों में अपनी एक ख़ास जगह बना ली। उनके साथ सीरियल रामायण में राम की भूमिका अरुण गोविल ने तो लक्ष्मण की भूमिका सुनील लहरी ने निभाई थी। दीपिका चिखालिया ने विभिन्न पौराणिक कथा आधारित धारावाहिकों में अभिनय किया है। उन्होंने अभिनेता राज किरन के साथ फ़िल्म 'सुन मेरी लैला' (1986) में अभिनय करके फ़िल्मी दुनिया में पदार्पण किया था। गुजरात के बिजनेसमैन हेमन्त टोपीवाला से विवाह के बाद उनका नाम अब दीपिका टोपीवाला है। 
दीपिका चिखालिया रामानन्द सागर के कैंप में 'विक्रम बेताल' का हिस्सा रह चुकी थीं और इस शो की शूटिंग सागर जी के बंगले पर ही हुआ करती थी। दीपिका चिखालिया के अनुसार- "एक रोज जब मैं बंगले पर पहुंची तो देखा कि बहुत सारे बच्चे वहां आए हुए हैं। मेरी समझ में नहीं आया कि क्या हो रहा है। मैंने पूछा कि क्या घर की कोई भाभीजी ने नर्सरी शुरू की है? पता चला कि रामायण की शूटिंग करने जा रहे हैं और लव-कुश की कास्टिंग चल रही है।
मैंने पूछा कि क्या राम-सीता की कास्टिंग हो गई? तो उन्होंने कहा कि नहीं राम-सीता हमें करना है, पहले हम लव-कुश की कास्टिंग कर रहे हैं। फिर एक दिन मुझे पापा जी का फोन आया कि कुड़ी तू भी आजा चल सीता के लिए टेस्टिंग कर लेते हैं। मैंने कहा कि मैं 'विक्रम बेताल' और 'दादा दादी की कहानियां' में काम कर रही हूं और अभी भी आप टेस्ट करना चाहते हैं? मैं तो राजकुमारी का ही किरदार करती रहती हूं। मैं पूरे वक्त मुकुट वैगरह पहन कर सेट पर घूमती रहती थी।"

उन्हें कहा गया था कि सीता ऐसी होनी चाहिए कि जब वह परदे पर आए तो बताना नहीं पड़े। दर्शक बताए कि ये सीता है। दीपिका ने कहा कि उनके 4-5 स्क्रीन टेस्ट हुए और आखिरकार वह थक गईं और उन्होंने कहा कि लेना है तो लो वरना कोई बात नहीं; तो आखिरी स्क्रीन टेस्ट में उन्होंने कहा कि ठीक है। ये हमारी सीता होगी।

25 जनवरी, 1987 को सीरियल 'रामायण' का पहला एपिसोड प्रदर्शित हुआ था। यह उस समय का सबसे महंगा शो हुआ करता था। धारावाहिक की लोकप्रियता और बने इतिहास पर दीपिका चिखालिया का कहना था कि- "धारावाहिक की लोकप्रियता का अहसास तब हुआ, जब पांच-छह महीने में देश विदेश से फोन आने लगे, इंटरव्यूज होने लगे। उसके बाद हमें एहसास हुआ कि हमने इतिहास रचा है। मुझे याद है कि एक प्रशंसक मेरे लिए रोज बेलपत्र लेकर आता था, क्योंकि मैं महादेव की पूजा करती थी। वह करीब चार-पांच साल तक दरवाजे के पास रखकर चले जाते थे। एक ने मेरी पेंटिंग बनाई थी। लोग हमें देख श्रद्धा से भर जाते थे।"
दीपिका चिखालिया का कहना था कि- "मुझे कृत्रिम जवाहरात (आर्टिफीशियल ज्वेलरी) से एलर्जी थी। बड़ी ज्वैलरी पहनने पर त्वचा में घाव उभर आते थे। ज्वैलरी निर्माता उसमें पीछे स्पंज लगाकर देते थे, ताकि वह मेरे शरीर से स्पर्श न हो। रामायण धारावाहिक में वनवास का शूट सबसे मुश्किल था। वनवास का दृश्य शुरू होता है नदी को पार करने से। उसके लिए तपती धूप में रेत पर हमें बिना चप्पल 45 डिग्री तापमान में खड़े रहना पड़ता था। कहीं कोई छाया नहीं थी। पूरे पैर जल गए थे। उस जमाने में अभिनय करने वालों को सपोर्ट करने के लिए कुछ था ही नहीं। सही मायनों में हमने परिश्रम किया है।"

दीपिका चिखालिया ने राज किरन के साथ फ़िल्म 'सुन मेरी लैला' (1986) में अभिनय करके फ़िल्मी दुनिया में पदार्पण किया। उन्होंने 'रुपये दस करोड़' (1991), 'घर का चिराग' (1989) और 'खुदाई' (1994) में संजय के साथ अभिनय किया। उन्होंने एक मलयाली फ़िल्म 'इतिले इनियम् वरु' (1986) में मामूट्टी के साथ अभिनय किया। इसके अतिरिक्त उन्होंने कन्नड़, तमिल और बंगाली फ़िल्मों में भी काम

इरफान खान

प्रसिद्ध अभिनेता इरफान खान की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि

साहबजादे इरफ़ान अली ख़ान भारतीय हिन्दी सिनेमा और टेलीविजन के प्रसिद्ध अभिनेता थे। हिन्दी के साथ ही उन्होंने कई अंग्रेज़ी फ़िल्मों में भी अभिनय किया। उनके चाहने वालों की संख्या लाखों में है। इरफ़ान ख़ान के बारे में कहा जाता है कि "वह अपनी आँखों से ही सारा अभिनय कर देते थे।" उन्होंने 'द वॉरियर', 'मकबूल', 'हासिल', 'द नेमसेक', 'रोग' जैसी फ़िल्मों से अपने अभिनय का लोहा मनवाया। 'हासिल' फ़िल्म के लिये उन्हें वर्ष 2004 का फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ खलनायक पुरस्कार भी प्राप्त हुआ। वे हिन्दी सिनेमा की तीस से ज्यादा फ़िल्मों में अभिनय कर चुके थे। इरफ़ान ख़ान का नाम हॉलीवुड में भी अपनी पहचान रखता है। उन्होंने 'ए माइटी हार्ट', 'स्लमडॉग मिलियनेयर', 'लाइफ ऑफ़ पाई' और 'द अमेजिंग स्पाइडर मैन' आदि फ़िल्मों में अभिनय किया।

वर्ष 2011 में उन्हें भारत सरकार द्वारा 'पद्मश्री' से सम्मानित किया गया। 60वे राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार-2012 में इरफ़ान ख़ान को फ़िल्म 'पान सिंह तोमर' में अभिनय के लिए श्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार दिया गया। 2017 में प्रदर्शित 'हिंदी मीडियम' फ़िल्म के लिए उन्हें फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता चुना गया। 2020 में प्रदर्शित 'अंग्रेज़ी मीडियम' उनकी प्रदर्शित अंतिम फ़िल्म रही।

जन्म तथा शिक्षा

इरफ़ान ख़ान का जन्म टोंक, राजस्थान में 7 जनवरी, 1967 को हुआ। यहीं के एक स्कूल से उन्होंने अपनी शुरुआती शिक्षा हासिल की। बाद में स्नातक की डिग्री हासिल की। जब इरफ़ान ख़ान अपनी पोस्ट ग्रेजुएश एम.ए. में कर रहे थे, तब उस समय उन्होंने 'नेशनल स्‍कूल ऑफ ड्रामा' में दाखिला ले लिया। कहा जाता है कि उन्होंने इस ड्रामा स्कूल में पढ़ाई करने के लिए छात्रवृत्ति हेतु आवेदन किया था और उनका आवेदन स्वीकार कर लिया गया, जिसके बाद इरफ़ान ख़ान ने दिल्ली स्थित अभिनय के इस कॉलेज में प्रवेश ले लिया।

परिवार

इरफ़ान ख़ान का नाता राजस्थान राज्य के एक पठान परिवार से था। उनकी मां का नाम सईदा बेगम है। मां सईदा बेगम का सम्बंध राजस्थान के टोंक हाकिम परिवार से है। वहीं इरफ़ान के पिता का नाम यासीन अली ख़ान था, जो एक कारोबारी थे और जिनका टायर का व्यापार हुआ करता था। इरफ़ान ख़ान दो भाई और एक बहन है। साल 1995 में इरफ़ान ख़ान ने सुतापा सिकदर से प्रेम विवाह किया। उनके दो बेटे हैं, जिनके नाम- बाबिल और आयन है। कहा जाता है कि इरफ़ान ख़ान की मुलाकात अपनी पत्नी से ड्रामा स्कूल में हुई थी। सुतापा सिकदर भी इरफ़ान की तरह ड्रामा स्कूल की छात्रा थीं और यहां से शुरू हुई इनकी ये दोस्ती प्यार में बदल गई थी।

शुद्ध शाकाहारी

बहुमुखी प्रतिभा के धनी इरफ़ान ख़ान लीक से हटकर चलने वाले लोगों में से एक थे। शायद यही कारण रहा कि वे पठान परिवार से ताल्लुक रखने के बावजूद शुद्ध शाकाहारी थे। इरफ़ान ख़ान ने पठान मुस्लिम परिवार में जन्म होने के बाद भी कभी मीट या मांस नहीं खाया। वह बचपन से ही शाकाहारी थे। यही कारण था कि उनके पिता इरफ़ान को मजाक में कहा करते थे कि- "ये तो पठान परिवार में एक ब्राह्मण पैदा हो गया है।"

इरफ़ान ख़ान के पिता उन्हें शिकार पर भी ले जाया करते थे। जंगल का वातावरण उन्हें काफी रोमांचित भी करता था, लेकिन उन्हें कभी पसंद नहीं आता था, जब मासूम जानवरों का शिकार होता था। इरफ़ान उन जानवरों के साथ खुद को जुड़ा हुआ महसूस करते थे कि आखिर अब इन जानवरों के परिवारों का क्या होगा। वह खुद भी राइफल चलाना जानते थे, लेकिन कभी शिकार नहीं करते थे। गौरतलब है कि नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा में इरफ़ान ख़ान के प्रवेश के कुछ समय बाद ही उनके पिता का निधन हो गया था और घर की तरफ से मिलने वाले पैसे उन्हें मिलना बंद हो गया थे। ड्रामा स्कूल से मिलने वाली फेलोशिप के जरिए उन्होंने अपना कोर्स खत्म किया था। उस मुश्किल दौर में इरफ़ान ख़ान की सहपाठी सुतापा सिकदर ने उनका पूरा साथ दिया। बाद में 23 फ़रवरी, 1995 में दोनों ने विवाह कर लिया था।

कॅरियर

इरफ़ान ख़ान अपनी एक्टिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद मुंबई चले गए और यहां आकर उन्होंने फ़िल्मों में काम खोजना शुरू कर दिया। उनके कॅरियर के शुरुआती दिन काफी संघर्ष भरे थे। उन्हें फ़िल्मों की जगह टी.वी. सीरियल में छोटे मोटे रोल मिलने लगे और इस तरह से इरफ़ान ख़ान के कॅरियर की शुरुआत बतौर एक जूनियर कलाकार से हुई। वह कई हिंदी धारावाहिकों का हिस्सा रह चुके थे और उनके द्वारा किए गए कुछ धारावाहिकों के नाम इस प्रकार हैं

चाणक्य
भारत एक खोज
सारा जहाँ हमारा
बनेगी अपनी बात
चन्द्रकान्ता
श्रीकान्त
स्टार बेस्टसेलर्स
मानो या ना मानो

साल 1988 में आई फ़िल्म ‘सलाम बॉम्बे’ में इरफ़ान को एक छोटा सा रोल मिला था, लेकिन इरफ़ान के इस रोल को फ़िल्म से हटा दिया गया। इस फ़िल्म के बाद इरफ़ान ने कई फ़िल्मों में छोटे-मोटे रोल किये, लेकिन साल 2001 में आई ‘द वारियर’ फ़िल्म ने उनकी जिंदगी बदल दी और इस फ़िल्म से उनको पहचान मिली। ये एक ब्रिटिश फ़िल्म थी, जिसका निर्देशन आसिफ कपाड़िया ने किया था। ये फ़िल्म अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोहों में भी प्रदर्शित की गई थी। इस फ़िल्म के बाद 2004 में आई ‘हासिल’ फ़िल्म में इरफ़ान ख़ान को एक नेगेटिव किरदार में देखा गया और इस किरदार को भी उन्होंने बखूबी निभाया था।

‘रोग’ फ़िल्म में मुख्य भूमिका

साल 2005 में इरफ़ान ख़ान को बतौर लीड रोल अपनी पहली फ़िल्म मिली और इस फ़िल्म का नाम ‘रोग’ था। इस फ़िल्म में इरफ़ान ख़ान ने एक पुलिस ऑफिसर की भूमिका निभाई थी। हालांकि ये फ़िल्म कामयाब फ़िल्म साबित नहीं हुई, लेकिन इरफ़ान ख़ान के अभिनय ने सभी को हैरान कर दिया और हर किसी ने उनके अभिनय की काफी तारीफ की। यह भी कहा गया कि इरफ़ान की आंखें भी एक दमदार अभिनय करती हैं। इस फ़िल्म के बाद इरफ़ान ख़ान को कई और फ़िल्मों में कार्य करने का मौका मिला।

2007 में आई मल्टीस्टार फ़िल्म ‘लाइफ इन ए मेट्रो’ का हिस्सा इरफ़ान भी थे और इस फ़िल्म में इरफ़ान द्वारा किए गए अभिनय को फिर से लोगों द्वारा पसंद किया गया। इस फ़िल्म में उनकी जोड़ी कोंकणा सेन के साथ नजर आई थी। इस फ़िल्म के बाद इरफ़ान को 'एसिड फैक्ट्री', 'न्यूयॉर्क', 'पान सिंह तोमर', 'हैदर', 'पीकू', 'तलवार', 'जज्बा', 'हिंदी मीडियम' सहित कई फ़िल्मों में देखा गया और इन फ़िल्मों के लिए उन्हें कई पुरस्कार भी मिले।

हॉलीवुड सिनेमा में योगदान

इरफ़ान ख़ान का नाम उन भारतीय अभिनेताओं में गिना जाता है, जिन्होंने भारतीय सिनेमा के साथ-साथ विदेशी सिनेमा यानी हॉलीवुड में भी कार्य किया। इरफ़ान ने बॉलीवुड सहित कई हॉलीवुड फ़िल्मों में भी दमदार प्रदर्शन किया। उनके द्वारा की गई कुछ हॉलीवुड फ़िल्मों के नाम इस प्रकार हैं-

सच अ लॉन्ग जर्नी (1988)
द नेमसेक (2006)
ए माइटी हार्ट (2007)
दार्जीलिंग लिमिटेड (2007)
स्लमडॉग मिलियनेयर (2008)
लाइफ ऑफ पाई (2012)
द अमेजिंग स्पाइडर मैन (2012)
जुरासिक वर्ल्ड (2015)
इन्फर्नो (2016)

पुरस्कार व सम्मान

पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल से 'पद्मश्री' प्राप्त करते इरफ़ान ख़ान

इरफ़ान ख़ान को भारत सरकार द्वारा 'पद्मश्री' दिया जा चुका है। ये पुरस्कार उन्हें 2011 में बॉलीवुड में किए गए उनके कार्यों के लिए दिया गया था।
उन्हें पहला फ़िल्मफ़ेयर खिताब 2003 में उनके द्वारा निभाये गए फ़िल्म 'हासिल' में खलनायक किरदार के लिए दिया गया था।
साल 2007 में इरफ़ान ख़ान को ‘लाइफ इन मेट्रो’ फिल्म के लिए फ़िल्मफ़ेयर दिया गया। ये पुरस्कार उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता के लिए दिया गया था और इसी फिल्म के लिए उन्हें 2008 में आईफ़ा पुरस्कार भी दिया गया।
इरफ़ान ख़ान को 2012 में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के लिए अपना पहला राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। उन्हें ये पुरस्कार फिल्म ‘पान सिंह तोमर’ के लिए दिया गया था। इस फिल्म के लिए उनको फ़िल्मफ़ेयर क्रिटिक्स अवार्ड भी मिल चुका है।
2013 में इरफ़ान ख़ान को उनकी फ़िल्म 'लंच बॉक्स' के लिए दुबई अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह, एशिया प्रशांत फिल्म समारोह और एशियाई फिल्म समारोह में अवार्ड दिए गए थे।
स्लमडॉग मिलियनेयर के लिए इरफ़ान ख़ान को सेंट्रल ओहियो फिल्म क्रिटिक्स एसोसिएशन की ओर से सर्वश्रेष्ठ एन्सेबल अवार्ड दिया गया था। वहीं 'पीकू' फिल्म के लिए भी उन्हें मेलबर्न के भारतीय फिल्म महोत्सव में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का अवार्ड दिया गया था।
फ़िल्म ‘हिंदी मीडियम’ में इरफ़ान ख़ान ने 'राज' नाम के व्यक्ति का रोल किया था और इस रोल के लिए उन्हें हाल ही में फ़िल्मफ़ेयर में बेस्ट ऐक्टर का खिताब दिया गया।

जिंदादिल इंसान

इरफ़ान ख़ान ऐसे इंसान थे, जो भीड़ में तो थे ही अकेलापन भी उन्हें बहुत रास आता था। जब सब साथ में चिल्ल कर रहे होते तो वह अकेले कहीं जाकर बैठ जाते। इरफ़ान ख़ान का बचपन भी फ़िल्मी रहा। उनकी ज्यादतर तस्वीरें बचपन की ऐसी ही हैं, जिनमें फ़िल्म के किसी सीन की नकल करते दिखते हैं। कैंसर के इलाज के दौरान भी इरफ़ान हमेशा मुस्कुरात रहते थे। इतना ही नहीं वह बहादुर इंसान भी थे। इरफ़ान वह सब करते थे, जिसमें उनका दिल लगता था। प्रकृति प्रेमी भी थे। इरफ़ान की जिंदगी एक खूबसूरत यात्रा रही है। जब जहां दिल किया, चल दिए जिंदगी की तलाश में। अपने जीवन के अंतिम दिनों में वह थोड़े दार्शनिक अंदाज के भी हो गए थे। हालांकि कुछ लोग मानते हैं कि यह अंदाज शुरू से उनके साथ रहा। वह खुद के भीतर खुद को भी तलाशते थे। इरफ़ान अपने इंस्टा पर बचपन की जो भी यादें शेयर करते, उनमें ज्यादातर तस्वीरें इसी तरह किसी फ़िल्म को देखकर दोस्तों के साथ उसे आजमाते हुए दिखते। जिंदादिल इंसान थे इरफ़ान।

मृत्यु

अभिनेता इरफ़ान ख़ान का निधन 29 अप्रॅल, 2020 को मुंबई के कोकिलाबेन अस्पताल में हुआ। वह काफ़ी लम्बे समय से बीमार चल रहे थे। साल 2018 में ही उन्होंने दुनिया को अपने कैंसर के बारे में जानकारी दी थी। इरफ़ान ख़ान पेट की समस्या से जूझ रहे थे। उन्हें कॉलन संक्रमण (Colon infection) हुआ था। फ़िल्म निर्देशक शूजीत सरकार ने इरफ़ान ख़ान के निधन की जानकारी सबसे पहले दी।इरफ़ान ख़ान को वर्सोवा के कब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-खाक किया गया, जहाँ कोरोना संकट के कारण जारी लॉकडाउन के बीच सिर्फ 20 लोगों के आने की ही अनुमति दी गई थी।

इरफ़ान ख़ान अपनी मां की मृत्यु का शोक मना रहे थे। उनकी मां सईदा बेगम ने 25 अप्रॅल, 2020 को जयपुर, राजस्थान में अंतिम सांस ली, जहां वह रहती थीं। लॉकडाउन के कारण अभिनेता इरफ़ान ख़ान शारीरिक रूप से अपनी मां के अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हो सके थे। उन्होंने कथित तौर पर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से मां का अंतिम संस्कार किया। इसके तीन दिन बाद ही वह भी दुनिया को अलविदा कह गए।

शुक्रवार, 28 अप्रैल 2023

केदार शर्मा

राज कपूर, भारत भूषण, मधुबाला, माला सिन्हा और तनूजा को फ़िल्म इंडस्ट्री में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले प्रसिद्ध निर्माता-निर्देशक और अभिनेता केदार शर्मा के की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रधांजलि

केदार शर्मा  भारतीय फ़िल्म निर्देशक, निर्माता, पटकथा लेखक और हिंदी फ़िल्मों के गीतकार थे। उन्हें बॉलीवुड में ऐसे फ़िल्मकार के तौर पर याद किया जाता है जिन्होंने राज कपूर, भारत भूषण, मधुबाला, माला सिन्हा और तनुजा को फ़िल्म इंडस्ट्री में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। केदार शर्मा ने कई फ़िल्मों में अपने अभिनय से भी दर्शकों का दिल जीता। इन फ़िल्मों में इंकलाब, पुजारिन, विद्यापति, बड़ी दीदी, नेकी और बदी शामिल हैं।

केदार शर्मा का जन्म 12 अप्रैल, 1910 को पंजाब के नरौल शहर (अब पाकिस्तान) में हुआ था। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा अमृतसर से पूरी की। इसके बाद वह नौकरी की तलाश में मुंबई आ गए, लेकिन वहां काम नहीं मिलने के कारण वह अमृतसर लौट गए। इस बीच उन्होंने अमृतसर के ख़ालसा कॉलेज से स्नाकोत्तर की पढ़ाई पूरी की।

वर्ष 1933 में केदार शर्मा को देवकी बोस निर्देशित फ़िल्म 'पुराण भगत' देखने का अवसर मिला। इस फ़िल्म से वह इस कदर प्रभावित हुए कि उन्होंने निश्चय किया कि वह फ़िल्मों में ही अपना करियर बनाएंगे। अपने इसी सपने को पूरा करने के लिए केदार कलकत्ता चले गए। कलकत्ता में केदार की मुलाकात फ़िल्मकार देवकी बोस से हुई और उनकी सिफ़ारिश से उन्हें न्यू थियेटर में बतौर छायाकार शामिल कर लिया गया। वर्ष 1934 में प्रदर्शित फ़िल्म 'सीता' बतौर छायाकर केदार की पहली फ़िल्म थी। इसके बाद न्यू थियेटर की फ़िल्म 'इंकलाब' में केदार को एक छोटी सी भूमिका निभाने का अवसर मिला। वर्ष 1936 में प्रदर्शित फ़िल्म 'देवदास' केदार शर्मा के सिने कैरियर की अहम फ़िल्म साबित हुई। इस फ़िल्म में वह बतौर कथाकार और गीतकार की भूमिका में थे। फ़िल्म हिट रही और केदार फ़िल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने में कामयाब हो गए।

केदार शर्मा को 1940 में फ़िल्म 'तुम्हारी जीत' को निर्देशित करने का मौका मिला, लेकिन दुर्भाग्य से यह फ़िल्म पूरी नहीं हो सकी। इसके बाद उन्होंने 'औलाद' फ़िल्म को निर्देशित किया, जिसकी सफलता के बाद वह कुछ हद तक बतौर निर्देशक अपनी पहचान बनाने में कामयाब हुए। वर्ष 1941 में उन्हें 'चित्रलेखा' फ़िल्म को निर्देशित करने का मौका मिला। इस फ़िल्म की सफलता के बाद केदार शर्मा बतौर निर्देशक फ़िल्म इंडस्ट्री में स्थापित हो गए। इन सबके साथ ही फ़िल्म 'चित्रलेखा' का स्नान दृश्य बहुत चर्चित हुआ था, जो फ़िल्म अभिनेत्री मेहताब पर फ़िल्माया गया था। इस फ़िल्म के बाद मेहताब दर्शकों के बीच काफ़ी लोकप्रिय हुई थीं, लेकिन फ़िल्म के शुरूआत के समय मेहताब स्नान दृश्य के फ़िल्मांकन के लिए तैयार नही थीं। केदार ने जब मेहताब के समक्ष स्नान दृश्य के फ़िल्मांकन का प्रस्ताव रखा तो मेहताब बोलीं, यह सीन आप दर्शकों के लिए रखना चाहते हैं या सिर्फ अपनी खुशी के लिए। केदार ने तब मेहताब को समझाया, देखो सेट पर अभिनेत्री और निर्देशक का रिश्ता पिता-पुत्री का होता है। केदार की यह बात मेहताब के दिल को छू गई और उसने केदार के सामने यह शर्त रखी कि दृश्य के फ़िल्मांकन के समय सेट पर केवल वहीं मौजूद रहेंगे।

केदार शर्मा ने वर्ष 1947 में फ़िल्म 'नीलकमल' के जरिए राजकपूर को रूपहले पर्दे पर पहली बार पेश किया। राजकपूर इसके पूर्व केदार की यूनिट में क्लैपर बॉय का काम किया करते थे। वर्ष 1950 में केदार ने फ़िल्म 'बावरे नैन' का निर्माण किया और अभिनेत्री गीता बाली को पहली बार बतौर अभिनेत्री काम करने का अवसर दिया। वर्ष 1950 में ही केदार की एक और सुपरहिट फ़िल्म 'जोगन' प्रदर्शित हुई। फ़िल्म में दिलीप कुमार और नरगिस मुख्य भूमिका में थे। केदार की यह विशेषता रहती थी कि जिस अभिनेता-अभिनेत्री के काम से वह खुश होते उसे पीतल की दुअन्नी देकर सम्मानित किया करते थे। राजकपूर, दिलीप कुमार, गीता बाली और नरगिस को यह सम्मान प्राप्त हुआ था।

केदार शर्मा ने कई फ़िल्मों में अपने अभिनय से भी दर्शकों का दिल जीता। इन फ़िल्मों में इंकलाब, पुजारिन, विद्यापति, बड़ी दीदी, नेकी और बदी शामिल हैं।

केदार शर्मा ने कई फ़िल्मों के लिए गीत भी लिखे। उन्होंने बच्चों के लिए भी कई फ़िल्में बनाईं, जिनमें जलदीप, गंगा की लहरें, गुलाब का फूल, 26 जनवरी, एकता, चेतक, मीरा का चित्र, महातीर्थ और खुदा हाफ़िज़ शामिल हैं।

केदार शर्मा पूरी इंडस्ट्री में अपने दबंग स्वभाव के लिए मशहूर थे। उन्होंने राजकपूर सहित इंडस्ट्री के बड़े-बड़े सूरमाओं के कस-बल ढीले कर दिए थे। तनुजा के उनके निर्देशन में बनने वाली फ़िल्म 'हमारी याद आएगी' में राजकपूर के अपोजिट कास्ट किया गया था। तनुजा सेट पर हमेशा हंसी-मजाक में ही व्यस्त रहती थीं, जबकि केदार शर्मा को सेट पर ऐसा माहौल बिलकुल पसंद नहीं था। इसके अलावा तनुजा को डायलॉग याद करने से भी जबरदस्त एलर्जी होती थीं, जिसकी वजह से केदार शर्मा काफ़ी परेशान हो चुके थे। दरअसल तनुजा अपने कॅरियर को संजीदगी से लेती ही नहीं थीं। उन पर हमेशा अपनी माँ और बहन का स्टारडम हावी रहता था। इसी फ़िल्म के एक सीन में उन्हें राजकपूर के सामने रोना था लेकिन जब सीन शूट होने लगता तनुजा रोने के बजाय हंसने लगती। केदार शर्मा की बार-बार हिदायत के बाद तनुजा ने उनसे कहा कि आज मेरा रोने का मूड नहीं है। बेहतर है कि इस सीन को बाद में शूट किया जाए, बस इतना सुनना था, कि केदार शर्मा का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया और उन्होंने ना आंव देखा ना ताव और एक झन्नाटेदार थप्पड़ तनुजा के गालों पर रसीद कर दिया। केदार शर्मा के इस गुस्से से पूरी यूनिट सन्न रह गयी।

पुरस्कार और सम्मान

केदार शर्मा को निम्नलिखित पुरस्कार और सम्मान प्राप्त हुए थे-

राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार 1956 में सर्वश्रेष्ठ बाल फ़िल्म के जलदीप के लिये दिया गया।
इंडियन फ़िल्म डायरेक्टर्स एसोसिएशन लाइफ़टाइम अचीवमेंट अवार्ड
भारतीय सिनेमा में योगदान के लिए 1982 में प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी से स्वर्ण पुरस्कार
महाराष्ट्र सरकार द्वारा राज कपूर पुरस्कार (उनकी मृत्यु के बाद 1999 में दिया गया)

लगभग पांच दशक तक अपनी फ़िल्मों के जरिए दर्शकों के दिल पर राज करने वाले महान् फ़िल्मकार केदार शर्मा 29 अप्रैल, 1999 को इस दुनिया से अलविदा कह गए।

सिद्धान्त चतुर्वेदी

सिद्धान्त चतुर्वेदी ने गल्ली बॉय में एक सहायक अभिनेता के रूप में कार्य किया है। ये इस मूवी में एक रैपर का किरदार निभा रहे हैं। इन्होंने इस मूवी में एम.सी.शेर का किरदार निभाया है। 1857 के क्रांति में अग्रज भूमिका निभाने वाले अमर शहीद मंगल पांडे की जन्मभूमि नगवा जिला बलिया उत्तर प्रदेश में जन्म हुआ। 
जन्म की तारीख और समय: 29 अप्रैल 1993

सिद्धांत चतुर्वेदी का जीवन परिचय|सिद्धांत चतुर्वेदी की जीवनी हिंदी में

सिद्धांत चतुर्वेदी एक भारतीय बॉलीवुड अभिनेता हैं, जिन्हें 2019 की बॉलीवुड फिल्म- स्ट्रीट बॉय में "एमसी शेर" के रूप न्होंने 2017 से 2019 तक सीएम प्राइम वीडियो वेब सीरीज इनसाइड एज में एक किशोर क्रिकेटर के रूप में अभिनय किया था।

साल 2019 में सुपरहिट फिल्म गली बॉय में एक स्ट्रीट रैप्टर की सहायक भूमिका के साथ बॉलीवुड फिल्मों में कदम रखा। जिसके लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। उन्हें गली बॉय में एमसी शेर के रूप में अपनी भूमिका के लिए काफी पहचान मिली।

गली बॉय की जारी के बाद, सिद्धांत चतुर्वेदी ने एक साक्षात्कार में कहा कि उनके माता-पिता पहले ही 15 से अधिक बार फिल्म देख चुके हैं।


उन्होंने कुछ विज्ञापन, असाइनमेंट और फोटोशूट किए। इसके बाद, थ्योरी मुंबई में एक अभिनेता और लेखक के रूप में एक थिएटर समूह में शामिल हो गए। थिएटर ग्रुप में एक नाटक के दौरान, वे फिल्म का निर्देशन करते हुए लव रंगो में आते हैं और उन्होंने उन्हें अपने टीवी सीरियल में रोल देने का वादा किया।

उन्होंने अपने करियर की शुरुआत साल 2016 में फिल्म निर्देशन लव रंजन के टीवी सिद्धांत धारावाहिक 'लाइफ सही है' से की थी। इस टीवी धारावाहिक में उन्हें साहिल हुड्डा' की भूमिका के लिए लिया गया

अगले साल 2017 में उन्होंने सीएम प्राइम वीडियो की वेब सीरीज "इनसाइड एज" में एक क्रिकेटर पैसिफिक कनौजिया के रूप में चमकने के लिए चुना जो भारतीय प्रीमियर लीग से प्रेरित था।

सिद्धांत की पहली फिल्म एवं प्रसद्दि –

जोया ने अपनी एक्टिंग से बहुत प्रभावित किया और जोया ने सिद्धांत को अपनी आने वाली फिल्म स्ट्रीट बॉय (2019) के लिए नोटिस देने के लिए कहा। जोया पिछले एक साल से फिल्म के लिए “एमसी शेर नामक एक स्ट्रीट रैप्टर” एक चरित्र के लिए एक नए चेहरे की तलाश कर रही थी और उनकी मांग सिद्धांत की सफलता के कारण गंभीर रूप से समाप्त हो गई।

स्वर्ण लता


स्वर्णलता एक भारतीय पार्श्व गायिका थीं। लगभग 22 वर्षों के करियर में, उन्होंने तमिल, मलयालम, तेलुगु, कन्नड़, हिंदी, उर्दू, बंगाली, उड़िया, पंजाबी और बडगा सहित कई भारतीय भाषाओं में 10,000 से अधिक गाने रिकॉर्ड किए।
जन्म की तारीख और समय: 29 अप्रैल 1973,
मृत्यु की तारीख: 12 सितंबर 2010, 
माता-पिता: K.C. C herukutty;कल्याणी
बहन: सरोज,
उनका जन्म केरल में मलयाली पिता केसी चेरुकुट्टी और तमिल मां कल्याणी के घर हुआ था। उनके पिता एक हारमोनियम वादक और गायक थे। उनकी मां की भी संगीत में रुचि थी। स्वर्णलता को हारमोनियम और कीबोर्ड बजाने का प्रशिक्षण दिया गया था। स्वर्णलता का परिवार बाद में  कर्नाटक के शिवमोग्गा जिले के भद्रावती चला गया, जहां उन्हों ने शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने 3 साल की उम्र में गाना शुरू किया। संगीतकारों और संगीत प्रेमियों के परिवार से घिरी स्वर्णलता को कर्नाटक और हिंदुस्तानी संगीत में प्रशिक्षित किया गया था। उनकी बहन सरोजा उनकी पहली संगीत शिक्षिका थीं।

स्वर्णलता को पहला मौका 1987 में एमएस विश्वनाथन को मिला, जब KJ ysudas केसाथ निथिक्कू थडानाई  फिल्म में "चिन्नाचिरु किलिये" युगल गीत प्रस्तुत किया । इसके बाद, उन्हें कई अन्य संगीत निर्देशकों द्वारा उनके बैटन के तहत गाने के प्रदर्शन के लिए संपर्क किया गया। उन्हें निर्देशक पिवेनू  के साथ काम करने का अवसर भी मिला ।   उनहो ने इलैया राजा  और  Ar rahman  जैसे संगीतकारों द्वारा भर्ती किया गया था । उन्होंने कुछ हिंदी गाने भी रिकॉर्ड किए, जिनमें सबसे उल्लेखनीय है फिल्म रंगीला का *हे रामा यह क्या हुआ गायक हरिहरन के साथ । तेलगु में उन्होंने मणि शर्मा , रमन गोगुला राजकोटी  और  वन्देमात्रम श्री निवास के संगीत निर्देशन में और गाने रिकॉर्ड किए । उनमें राममा चिलकम्मा, ओसे रामुलम्मा और निज़ाम बाबूलु जैसे टॉप रेटेड गाने शामिल हैं। एआर रहमान ने अपने कई गानों के लिए स्वर्णलता को काम पर रखा था। वह अपने समय की सबसे बहुमुखी गायिकाओं में एक थी   "मलयिल यारो मनथोडू पेसा" या  करूथममा से "पोराले पोन्नुथायी " जैसी धुनों को गाने में सक्षम थीं, साथ ही साथ रहमान के प्रायोगिक गीत जैसे कधलान से " मुकाबला" भी गा सकती थीं। या पवित्रा से "मोत्तु विट्टाधा" ।

सवर्ण लता AR रहमान   के संगीत निर्देशन में राष्ट्रीय पुरस्कार पाने वाली पहली महिला पार्श्व गायिका थीं । उन्हें "पोराले पोन्नुथायी" गीत के लिए पुरस्कार मिला। उन्होंने संगीत निर्देशकों देवा , विद्यासागर, हैरिस जयराज , अनु मलिक , शंकर_अहसान_लाय , राज_कोटि , युवान शंकर राजा , मणि शर्मा , हमसलेखा और कई अन्य लोगों के साथ कई गाने रिकॉर्ड किए।

उन्होंने तमिल फिल्म अनारकली (हिंदी फिल्म मुगलेआजम के डब संस्करण के लिए लतामंगेशकर और शमशाद बेगम द्वारा प्रस्तुत सभी गाने रिकॉर्ड किए और बॉलीवुड संगीत निर्देशक निषाद अली द्वारा उनकी प्रशंसा की गई , जिसे उन्होंने सर्वश्रेष्ठ क्षण माना उसका कैरियर। 

टेलीविजन

स्वर्णलता कई टेलीविजन गायन प्रतियोगिताओं में जज के रूप में दिखाई दीं, विशेष रूप से 2001 विजय टीवी रियलिटी शो और 2004 जया टीवी रागमालिका में।

12 सितंबर 2010 को 37 साल की उम्र में स्वर्णलता का मलार हॉस्पिटल्स लिमिटेड अडयार, चिनाई में फेफड़ों की बीमारी के कारण निधन हो गया

सोफा बेड

हवा भर कर बनाए जाने वाले सोफे और गद्दे (Inflatable Sofas & Air Mattresses) छोटे घरों, मेहमानों के आने पर अतिरिक्त जगह बनाने,...