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मंगलवार, 25 अप्रैल 2023

मीनू मुमताज

अभिनेत्री मीनू मुमताज़ के जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धांजलि

मीनू मुमताज़ का जन्म 26 अप्रैल 1942 में मुम्बई तत्कालीन बॉम्बे में हुआ था
मीनू मुमताज़ भारतीय अभिनेत्री थीं। वह अपने समय के मशहूर कॉमेडियन महमूद अली की बहन थीं। भारतीय सिनेमा की दिग्गज अभिनेत्री रहीं मीना कुमारी और मीनू मुमताज़ में काफी गहरी मित्रता थी। सन 1950 से लेकर 1960 के दशक में बतौर डांसर कई फिल्मों में काम करने वाली मीनू मुमताज़ एक डांसर के साथ-साथ कैरेक्टर आर्टिस्ट भी थीं। मीनू मुमताज़ का असली नाम मालिकाउन्निसा अली था। जब फिल्मों में काम करने लगीं तो मीना कुमारी ने उनका नाम बदलकर मीनू मुमताज़ कर दिया था। तब से फिल्म इंडस्ट्री में मीनू मुमताज़ के नाम से मशहूर हो गईं।

परिचय
मीनू मुमताज ने फिल्मी दुनिया में ‘सखी हातिम’ से कदम रखा था। 1950 और 1960 के दशक की कई हिंदी फिल्मों में उन्होंने काम किया। कई बार फिल्मों में वह डांसर के तौर पर भी नजर आई हैं। उनकी सबसे ज्यादा मशहूर फिल्मों में ‘सीआईडी’, ‘नया दौर’, ‘ताज महल’, ‘गबन’ और ‘जमीर’ शामिल हैं। पहली फिल्म ‘सखी हातिम’ में मीनू मुमताज बलराज साहनी जैसे दिग्गज अभिनेता के साथ थीं। उन्होंने गुरुदत्त साहब के साथ भी काम किया। ‘चौदहवीं का चांद’, ‘कागज के फूल’, ‘साहिब बीवी और गुलाम’, ‘ताजमहल’, ‘घूंघट’, ‘इंसान जाग उठा’, ‘घर बसाके देखो’ जैसी कई फिल्मों में उन्होंने काम किया था।

मृत्यु

अभिनेत्री मीनू मुमताज़ की मृत्यु 23 अक्टूबर, 2021 को कनाडा में हुई। वह बीते कई सालों से बीमार थीं और लगभग बीस वर्षों से कनाडा में ही रह रही थीं। मीनू मुमताज़ के निधन के बारे में बात करते हुए उनके भतीजे नौषाद ने कहा, "वह जईफ थीं और उनकी उम्र भी 80 के आसपास थी। अब तक मैं जिस किसी से भी मिला हूं, वह उनमें से सबसे प्यारी इंसान थीं।" अपने बड़े भाई महमूद की तरह मीनू मुमताज़ ने भी अपनी पहचान फिल्मों में बनाने का फैसला किया था।

नितिन बोस

'गंगा-जमुना', 'दीदार', 'डाकू मंसूर', 'चंडीदास', 'धूपछाँव', 'जीवन मरण', 'दुश्मन', 'धरतीमाता' और 'मुजरिम' आदि जैसी फिल्मों के निर्देशक लेखक नितिन बोस के जन्मदिन पर हार्दिक श्रधांजलि
नितिन बोस भारतीय सिनेमा के प्रारंभिक समर्थकों में से एक, प्रसिद्ध फ़िल्म निर्देशक, छायाकार और लेखक थे। वे कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) के प्रसिद्ध 'न्यू थियेटर्स' के पीछे की ताकत थे। वर्ष 1935 में उनकी बंगाली फ़िल्म 'भाग्य चक्र' में उन्होंने फ़िल्मों का पार्श्वगायन से परिचय करवाया था। बाद में यह फ़िल्म हिन्दी में 'धूप छाँव' नाम से बनाई गई। नितिन बोस ने अपने सिने कैरियर में छह मूक फ़िल्मों सहित 50 से भी अधिक फ़िल्मों का निर्देशन और छायांकन किया। उन्हे के. एल. सहगल और उत्तम कुमार के कैरियर को शुरू करने का श्रेय दिया जाता है। बाद में नितिन जी मुंबई आ गये थे और यहाँ फ़िल्म निर्देशन किया। उनकी सर्वश्रेष्ठ फ़िल्मों में से एक 'गंगा जमुना' को हिन्दी सिनेमा की सबसे बड़ी फ़िल्मों में से एक माना जाता है। उनके विशिष्ट योगदान के लिए उन्हें वर्ष 1977 में 'दादा साहब फाल्के पुरस्कार' से सम्मानित किया गया था। नितिन बोस की फ़िल्म 'गंगा जमुना' का प्रसिद्ध गीत "इंसाफ की डगर पे, बच्चो दिखाओ चलके" ऐसा ही एक गीत था, जिसने नई पीढ़ी को उसके दायित्वों का अहसास कराया

भारतीय सिनेमा में स्टूडियो युग के महान निर्देशक नितिन बोस का जन्म 26 अप्रैल, 1897 को कोलकाता में हुआ था। इनके पिता का नाम 'हेमेन्द्र मोहन बोस' तथा माता 'मृणालिनी' थीं। नितिन बोस की माताजी मशहूर लेखक उपेन्द्रकिशोर रायचौधरी की बहन थीं। उपेन्द्रकिशोर प्रसिद्ध कवि सुकुमार राय के पिता और ख्याति प्राप्त फ़िल्म निर्माता-निर्देशक सत्यजीत राय के दादा थे। नितिन बोस के भाई मुकुल बोस का भी फ़िल्मी दुनिया से बहुत गहरा रिश्ता रहा, वे साउंड रिकॉर्डिस्ट के रूप में मशहूर थे। नितिन बोस का विवाह शांति बोस से हुआ था। वे दो पुत्रियों रीना और नीता के पिता भी बने।

नितिन बोस अपनी किशोरावस्था से ही अपने दोस्तों और घर परिवार के लोगों के बीच बेहद प्रतिभाशाली गिने जाते थे। शुरू में वह सिनेमैटोग्राफ़र थे, लेकिन सन 1934 में उन्होंने जब एक बार फ़िल्म निर्देशन पर अपना हाथ आजमाया तो फिर कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। उनके मन में निर्देशन की पहली बार इच्छा उस समय जोर मारने लगी, जब उन्होंने देवकी बोस के मुँह से 'चंडीदास' फ़िल्म की पटकथा सुनी। उन्होंने सही मायनों में देवकी बोस के साथ मिल कर भारतीय रोमांटिक सिने युग की नींव डाली। जब उन्होंने 'चंडीदास' की पटकथा सुनी तो अपने आपको 'न्यू थियेटर्स' के मालिक बीरेंद्रनाथ सरकार से यह कहने से नहीं रोक पाए कि मैं भी फ़िल्म निर्देशन करूँगा। उन्हें हिन्दी में 'चंडीदास' को निर्देशित करने का दायित्व सौंपा गया, इस पर वह पूरी तरह से खरे उतरे। उन्होंने अपनी प्रतिभा के बल पर फ़िल्म 'चंडीदास' को भावनात्मक और तकनीकी दृष्टि से एक महान शाहकार बना दिया था

भारतीय हिन्दी सिनेमा की कालजयी फ़िल्मों की सूची जब भी बनायी जायेगी, उसमें 'गंगा जमुना' को ज़रूर रखा जाएगा। फ़िल्म 'गंगा जमुना' न सिर्फ़ भारतीय समाज का महाकाव्यीय चित्रण करती है बल्कि समाज के भौतिकवादी विचारबोध को भी सुसंगत क्रम देती है। 'गंगा-जमुना' का ही शहरी रीमेक बाद में फ़िल्म 'दीवार' के रूप में सामने आया। क्योंकि वक्त बदलने से जीवन शैली का ढंग भले बदल गया हो, उपभोग में आने वाली वस्तुओं की गुणवत्ता और उपभोग का ढंग भले नफासत से परिपूर्ण हो गया हो, मगर नतीजा वही रहता है। इसीलिए दौर कोई भी हो 'गंगा-जमुना' भव्य ही लगती है और आकर्षक भी। दिलीप कुमार और वैजयंती माला ने इस फ़िल्म में अद्भुत अभिनय किया है, लेकिन असली श्रेय तो निर्देशक नितिन बोस को ही जायेगा, क्योंकि 'गंगा-जमुना' को प्रस्तुत करने की कल्पनाशीलता तो उन्हीं की थी।

नितिन बोस भारतीय सिनेमा की वह शख्सियत थे, जिन्होंने सिनेमा के माध्यम से इंसान की सूक्ष्मतम अनुभूतियों को पकड़ने और उनको उभारने का काम किया। 'चंडीदास' फ़िल्म की अपनी सफलता के बाद उन्होंने 1934 में अपनी अगली फ़िल्म 'डाकू मंसूर' का निर्देशन किया। यह एक सामाजिक फ़िल्म थी और अप्रत्यक्ष रूप से हिन्दू-मुस्लिम भाईचारे पर आधारित थी, लेकिन तत्कालीन अंग्रेज़ सरकार ने इस पर साम्प्रदायिकता का ठप्पा लगाते हुए इसे प्रतिबंधित कर दिया था।
जनवरी, 1936 में नितिन बोस द्वारा निर्देशित एक फ़िल्म रिलीज हुई 'धूपछाँव', जिसमें के.सी. डे., उमाशीश तथा पहाड़ी सान्याल जैसे गायक-अभिनेताओं ने काम किया था और उनके द्वारा गाए गए इस फ़िल्म के सभी गीत लोकप्रिय हुए थे, किंतु दो गीत, 'अंधे की लाठी तू ही है, तू ही जीवन-उजियारा है' तथा 'जीवन का सुख आज प्रभु मोहे' ख़ासतौर पर चर्चित हुए। फ़िल्म में ये गीत के.सी. डे द्वारा गाये गए थे और उन्हीं पर इनका फ़िल्मांकन भी हुआ था। मगर बाद में ग्रामोफ़ोन रिकॉर्ड पर जारी करने के लिए इन्हें कुंदनलाल सहगल से गवाया गया और यही इन गीतों की विशेष चर्चा का कारण बना। इन पर कुंदनलाल सहगल की छाप लग गई। हालांकि फ़िल्म में सहगल की कोई भूमिका नहीं थी और न ही कोई गाना उन पर फ़िल्माया गया था, फिर भी उनके स्वर में इन गानों की लोकप्रियता के चलते लोगों ने उनका संबंध इस फ़िल्म के साथ जोड़ लिया और सहगल द्वारा अभिनीत फ़िल्मों की सूची में इस फ़िल्म का नाम शुमार किया जाने लगा

फ़िल्म 'धूपछाँव' की एक और ख़ास बात यह थी कि इसमें निर्देशक नितिन बोस ने संगीतकार आर.सी. बोराल व पंकज मलिक तथा साउंड रिकॉर्डिस्ट मुकुल बोस की सहायता से पारुल घोष, सुप्रभा सरकार एवं हरिमती के स्वरों में एक गीत रिकॉर्ड करके पार्श्वगायन का पहला प्रयोग किया था। मगर नितिन बोस के मन में यह कल्पना कैसे उत्पन्न हुई, इसकी भी एक कहानी है-

एक दिन नितिन बोस सुबह के वक्त पंकज मलिक से मिलने उनके घर गए, तो पंकज बाबू नहा रहे थे। नितिन बोस बाहर कमरे में बैठकर उनका इंतज़ार करने लगे। वहाँ रेडियो चालू था और उस पर एक गीत प्रसारित हो रहा था। उधर बाथरूम से पंकज बाबू के गाने के स्वर आ रहे थे। अचानक नितिन बोस ने लक्ष्य किया कि पंकज बाबू वही गाना गा रहे हैं, जो रेडियो पर प्रसारित हो रहा था। वे रेडियो के स्वर में स्वर मिलाकर गा रहे थे। बस फिर क्या था, नितिन बोस के मानस पटल पर पलक झपकते ही एक तकनीकी क्रांति का ख़ाका स्पष्ट हो गया। जैसे ही पंकज बाबू नहाकर बाहर निकले, नितिन बोस एक बच्चे की तरह अधीर होकर बोले- "दादा, आप रेडियो के स्वर में स्वर मिलाकर गा रहे थे?" पंकज मलिक ने कहा- "हाँ, मैं गा रहा था"। "क्या वह प्रयोग फ़िल्मों में नहीं किया जा सकता?" उत्साह के अतिरेक में उत्तेजित होकर नितिन बोस ने सवाल किया। पंकज बाबू एकदम समझ नहीं पाए कि नितिन बोस क्या कहना चाहते हैं। उन्होंने कहा- "मतलब"? इस पर नितिन बोस ने उनसे कहा कि "मतलब यह कि गाने की रिकॉर्डिंग पहले कर ली जाए और फ़िल्मांकन के समय अभिनेता उस रिकॉर्डिंग को सुनकर उसके अनुसार होंठ हिलाते हुए अभिनय करे।" पंकज बाबू ने कहा- "अद्भुत कल्पना है नितिन। इसे साकार करने के लिए हम प्रयोग करेंगे... हर कीमत पर करेंगे।" और इस तरह फ़िल्मों में पार्श्वगायन की पद्धति का सूत्रपात हुआ, जिसने विश्व सिनेमा का चेहरा ही बदल दिया

1940 में 'न्यू थियेटर्स' में भयानक आग लग गई, जिससे काफ़ी क्षति हुई। जिस कारण नितिन बोस का कैरियर भी थोड़े बहुत प्रभावित हुआ, लेकिन जहाँ 1940 आते-आते 'न्यू थियेटर्स' के तमाम नामचीन निर्देशक, जैसे- देवकी बोस, प्रमथेश बरुआ और फणी मजूमदार इसे छोड़ कर चले गये, वहीं उस दौरान भी नितिन बोस ने फ़िल्म 'काशीनाथ' बनायी, जिसके फ़िल्मांकन पर उन्हें काफ़ी परेशानी का सामना करना पड़ा

फ़िल्म 'काशीनाथ' के बाद नितिन बोस 'न्यू थियेटर्स' और कोलकाता छोड़ कर 'बंबई' (वर्तमान मुम्बई) चले आये, जहाँ उन्होंने 1944-1945 के बीच तीन फ़िल्में 'पराया धन', 'मुजरिम' व 'मज़दूर' बनायी। वर्ष 1946 में बंबई टॉकीज के भागीदारों ने नितिन बोस से अपने लिए फ़िल्म बनाने का अनुरोध किया और नितिन बोस ने बंबई टॉकीज के लिए पहली फ़िल्म रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कहानी पर बनायी, जिसका नाम 'मिलन' था। फ़िल्म 'मिलन' के नायक अपने समय के मशहूर दिलीप कुमार थे और इस फ़िल्म के छायाकार बॉलीवुड के महान छायाकारों में से एक राधू कर्मकार थे। सन 1949 में नितिन बोस ने 'मशाल' और 1950 में अशोक कुमार और दिलीप कुमार के अभिनय से सजी फ़िल्म 'दीदार' का निर्देशन किया। तीन वर्षों बाद उन्होंने 'वारिस' का भी निर्देशन किया, मगर शायद अभी उनकी क्लासिकी का नमूना आना बाकी था। इसलिए उन्होंने 1961 में 'गंगा-जमुना' बनायी, जो न सिर्फ़ सर्वकालिक महान बॉलीवुड फ़िल्मों में से एक है, बल्कि सर्वकालिक सुपरहिट फ़िल्मों में से भी एक है।

नितिन बोस का निधन 14 अप्रैल, 1986 को कोलकाता में हुआ। इस महान हस्ती को भारतीय सिनेकारों की उच्च श्रेणी में गिना जाता है। उन्होंने अपनी मेहनत, लगन, प्रतिभा और जिज्ञासा व प्रयोगों से बॉलीवुड को समृद्ध किया। यदि नितिन बोस जैसे महान फ़िल्मकार 40 के दशक में न हुए होते तो शायद 80 के दशक में भारत में प्रायोगिक सिनेमा का जो उभार आया था, वह कभी न आता। मृणाल सेन, गौतम घोष, बालू महेन्द्रन, श्याम बेनेगल और गिरीश कसरावल्ली जैसे प्रयोगिक और मौलिक फ़िल्मकारों ने हमेशा उनसे प्रेरणा हासिल की है।

मौसमी चटर्जी

प्रसिद्ध अभिनेत्री मौसमी चटर्जी के जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनाएं

मौसमी चटर्जी (जन्म इंदिरा चट्टोपाध्याय) एक भारतीय अभिनेत्री हैं जिन्हें हिंदी के साथ-साथ बंगाली सिनेमा में उनके काम के लिए पहचाना जाता है।  राजेश खन्ना, शशि कपूर, जीतेंद्र, संजीव कुमार और विनोद मेहरा के साथ उनकी ऑन-स्क्रीन जोड़ी लोकप्रिय थी।  वह 1970 के दशक के दौरान हिंदी फिल्मों में छठी सबसे ज्यादा भुगतान पाने वाली अभिनेत्री थीं। 

चटर्जी का जन्म कलकत्ता में हुआ था।  उसका असली नाम इंदिरा है। उनके पिता प्रंतोष चट्टोपाध्याय (बिक्रमपुर से) भारतीय सेना में थे और उनके दादा एक न्यायाधीश थे।

मौसमी चटर्जी ने अपने कैरियर की शुरुआत बंगाली फ़िल्म बालिका बधू (1967) में की, जिसका निर्देशन तरुण मजूमदार ने किया था। एक साक्षात्कार में, मौसमी चटर्जी ने कहा: "बालिका बधू के बाद, मुझे बंगाली फिल्मों के ऑफर्स  की बाढ़ आ गई थी, लेकिन मैं अपनी पढ़ाई पूरी करना चाहती थी। हालांकि, फिल्में मेरे भाग्य में थीं, इसलिए जब मैं दसवीं कक्षा में पढ़ रही थी, तो मेरी एक करीबी चाची थी।  उसकी मृत्यु-शय्या और उसकी अंतिम इच्छा मुझे विवाहित देखना था। इसलिए, उसकी इच्छा को पूरा करने के लिए मैंने विवाह किया।उसे घर पर इंदिरा के रूप में बुलाया जाता था।  उन्होंने अभिभावक और पड़ोसी हेमंत कुमार के बेटे, जयंत मुखर्जी (बाबू) से सगाई की।  "मुझे बाबू से प्यार हो गया। वह पहला व्यक्ति था जो मैं अपने परिवार के बाहर संपर्क में था।फिर वह परिणीता, अनिंदिता जैसी बंगाली फिल्मों में देखी गई।

1972 में हिंदी फिल्म अनुराग से नायिका के रूप में उनकी  शुरुआत हुई इस फ़िल्म के निर्देशक शक्ति सामंत थे  फिल्म बहुत सफल हुई।  उसमें मौसमी चटर्जी ने एक अंधी लड़की का किरदार निभाया, जिसे प्यार हो जाता है और उनके अभिनय ने उसे सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के रूप में फ़िल्मफ़ेयर नामांकन दिलवाया।  अनुराग ने सर्वश्रेष्ठ चित्र के रूप में फिल्मफेयर पुरस्कार जीता।  अपनी हिंदी फिल्मी कैरियर की शुरुआत के बारे में, उन्होंने एक साक्षात्कार में कहा: " मेरे ससुर एक प्रसिद्ध फिल्मी हस्ती थे, तो कई फिल्मी हस्तियां हमारे घर का चक्कर लगाती थीं। उनमें से एक फिल्म निर्माता शक्ति सामंत भी थे, जिन्होंने मुझे अभिनय करने के लिए प्रेरित किया लेकिन मैंने मना कर दिया, लेकिन मेरे ससुर और मेरे पति दोनों ने मुझे प्रोत्साहित किया, इस प्रकार मुझे फ़िल्म अनुराग मिल गयी। "जब उनसे हिंदी फिल्मों में उनकी पहली भूमिका के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि"  शक्ति दा ने मुझे बताया कि मुझे एक अंधी महिला का किरदार निभाना है जिसे मैंने टाल दिया था। मैंने ईमानदारी से शक्ति दा से कहा कि मैं इस भूमिका के साथ न्याय नहीं कर सकती क्योंकि मैंने कभी किसी अंधे व्यक्ति का अध्ययन नहीं किया है, लेकिन शक्ति दा ने मुझे आश्वासन दिया कि वह मुझे एक अंधी पाठशाला में ले लाएंगे और मुझे प्रशिक्षित करेगे. उन्होंने पहले एक छोटे से मुहूर्त शॉट को करने के लिए जोर दिया जब मैं स्टूडियो पहुंची तो मैं नूतनजी, दादा मुनि (अशोक कुमार को प्यार से बुलाया जाने वाला नाम ), राजेश खन्ना, एसडी बर्मन और अन्य को देखने के लिए उत्साहित थी शक्ति दा ने एक्शन कहा जिसे मैंने अपने मुहूर्त शॉट  को आत्मविश्वास के साथ शूट किया शॉट के बाद, शक्ति दा ने मुझे बताया कि मैंने इस शॉट को इतनी कुशलता से किया है कि मुझे नेत्रहीन स्कूल जाने की ज़रूरत नहीं थी

1973 में, उन्होंने शशि कपूर के साथ नैना में अभिनय किया, विनोद खन्ना के साथ कच्चे धागे और विनोद मेहरा के उस पार जैसी फिल्मों में अभिनय किया  1974 में, उन्होंने तत्कालीन संघर्षरत अमिताभ बच्चन के साथ थ्रिलर फ़िल्म बेनाम और राजेश खन्ना के साथ सस्पेंस ड्रामा हमशक्ल में अभिनय किया।  उनकी सबसे सफल फिल्म 1974 के अंत में आई, जहां उन्होंने मनोज कुमार की रोटी कपडा और मकान में काम किया इस फ़िल्म में बलात्कार की घटना के अभिनय को अच्छे ढंग से निभाया उनके प्रदर्शन ने उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री के रूप में फिल्मफेयर नामांकन दिलवाया  वह कई सफल फिल्मों जैसे स्वर्ग नरक, माँग भरो सजना, प्यासा सावन, ज्योति बनी ज्वाला जितेन्द्र के साथ शशि कपूर के साथ स्वयंवर और राकेश रोशन के साथ आनंद आश्रम का हिस्सा बनीं।  उन्होंने चार फिल्मों में ऋषि कपूर के साथ अभिनय किया, जिनमें से कोई भी सफल नहीं रही

उन्होने विनोद मेहरा के साथ  अनुराग, उस-पार,, उमर कैद मज़ाक़, ज़िंदगी और दो झूठे सहित लगभग 10 फिल्मों में काम किया उन्होंने अमिताभ बच्चन के साथ केवल 2 फिल्मों बेनाम एवं मन्ज़िल (1979)  में काम किया
 उत्तम कुमार के साथ उनकी बंगाली फिल्म, ओगु बोधु सुंदरी, 1981 में रिलीज़ हुई और सफल हुई  राजेश खन्ना के साथ उनकी फिल्मों में भोला भाला, प्रेम बंधन और घर परिवार शामिल है उन्होंने संजीव कुमार के साथ अंगूर, दासी और इतनी सी बात जैसी फिल्मों  में काम किया।  1985 में, उन्होंने बंगाली फिल्म प्रतिज्ञा में अभिनय किया।

1985 के बाद, उन्होंने कई फिल्मों जैसे वतन के रखवाले, आग ही आग और घायल में सहायक भूमिकायें की

1985 से 1991 तक, चटर्जी को एक चरित्र अभिनेत्री के रूप में अधिक प्रस्ताव मिले और उन्होंने मां और भाभी (भाभी) की भूमिकाओं को करना शुरू किया अक्सर धर्मेंद्र या सुनील दत्त के साथ उन्होंने जोड़ी बनाई।  उन्होंने घायल में सनी देओल की भाभी का किरदार निभाया  उन्होने 1990 में फ़िल्म घर परिवार आ अब लौट चलें राजेश खन्ना के  साथ  फिर उन्होंने फिल्म संतान प्रतीक (1993) और उधार की ज़िंदगी जीतेन्द्र के साथ  की 1995 से सहायक अभिनेत्री के रूप में उनकी कुछ फिल्मों हैं कीमत: दे आर बैक (1998), आ अब लौट चलें (1999) और ना तुम जानो ना हम, हम कौन हैं  (2004)

2006 में, मौसमी  चटर्जी ने सिनेमा में वापसी की, तनुजा चंद्रा की ज़िन्दगी रॉक्स के साथ।  उन्होंने 2003 में इंडो-कैनेडियन प्रोडक्शन बॉलीवुड / हॉलीवुड में काम किया। 

उन्होंने निर्माता जयंत मुखर्जी संगीतकार और गायक हेमंत कुमार के बेटे से शादी की, जो रवीन्द्र संगीत के प्रतिपादक भी हैं।  उनकी दो बेटियां हैं, पायल और मेघा।  उन्होंने शादी के बाद हिंदी फिल्मों में अभिनय करना शुरू किया। 

चटर्जी ने 2004 के लोकसभा चुनाव में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा, लेकिन वे हार गए 2019 में, वह भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गईं।  उनकी बेटी पायल की मृत्यु 13 दिसंबर 2019 को हुई।
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नाम :- मौसमी चटर्जी
जन्म तिथि :- 26 अप्रैल 1948
मिनी बायो:- मौसमी चटर्जी को 1970 के दशक में हिंदी पर्दे पर आने वाले सबसे खूबसूरत चेहरों में से एक माना जाता था। वह मूल रूप से कोलकाता (पूर्व में कलकत्ता), पश्चिम बंगाल की एक अभिनेत्री हैं। उन्होंने तरुण मजूमदार द्वारा निर्देशित बंगाली हिट, द यंग वाइफ (1967) में अपनी पहली फिल्म की शुरुआत की, जब वह अपनी शुरुआती किशोरावस्था में थीं। हिंदी फिल्म अनुराग (1972) में नायिका के रूप में उनकी शुरुआत एक अन्य प्रसिद्ध बंगाली निर्देशक शक्ति सामंत के सौजन्य से हुई। उसने एक अंधी लड़की की भूमिका निभाई जो प्यार में पड़ जाती है, और उसके प्रदर्शन ने उसे सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के रूप में फिल्मफेयर नामांकन दिलाया। इस फिल्म ने ही सर्वश्रेष्ठ चित्र के रूप में फिल्मफेयर पुरस्कार जीता। इसने एक और बड़ी हिट फिल्म का नेतृत्व किया, जहां उसने मनोज कुमार की रोटी कपड़ा और मकान (1974) में एक बलात्कार पीड़िता की भूमिका निभाई। फिल्म में उसका रेप सीक्वेंस आज भी हिंदी सिनेमा के सबसे परेशान करने वाले दृश्यों में से एक माना जाता है। उनके प्रदर्शन ने उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री के रूप में फिल्मफेयर नामांकन अर्जित किया। जिसके कारण सुपरस्टार राजेश खन्ना के साथ हमशक्ल, भोला भाला, प्रेम बंधन, घर परिवार, आ अब लौट चलें में अधिक भूमिकाएँ निभाईं। उन्होंने अमिताभ बच्चन के साथ थ्रिलर बेनाम (1974) और बासु चटर्जी की फिल्म मंजिल (1979) में अभिनय किया। उन्होंने अन्य सभी शीर्ष प्रमुख पुरुषों के साथ नायिका की भूमिका निभाई, जैसे कि अंगूर, इतनी सी बात जैसी फ़िल्मों में संजीव कुमार और स्वर्ग नरक, ज्योति बने ज्वाला, जस्टिस चौधरी, दिल और दीवार, प्यासा सावन जैसी जीतेंद्र के साथ और अनुराग जैसे विनोद मेहरा के साथ, घर एक मंदिर स्वयंवर में झूट, जिंदगी, उस पार, नैना, मजाक, उमर क़ैद और शशि कपूर के साथ। उन्होंने अधिक हिंदी और बंगाली हिट फ़िल्में कीं, और 1986 तक, उन्होंने माँ और भाभी (भाभी) की चरित्र भूमिकाओं में बदलाव किया। मौसमी' के निजी जीवन ने उन्हें अपने करियर की शुरुआत से ही गॉसिप कॉलम में रखा है। उन्होंने प्रसिद्ध संगीत संगीतकार और गायक हेमंत मुखर्जी के बेटे निर्माता जयंत मुखर्जी से जल्दी शादी कर ली। उनकी दो बेटियां पायल और मेघा हैं। उन्होंने शादी के बाद हिंदी फिल्मों में काम किया, जो उस समय असामान्य था, क्योंकि शादी से पहले फिल्मों में काम करने और शादी के बाद फिल्में छोड़ने का रिवाज था। एक समय पर, उन्हें अपने पति को फिल्म वितरक रमेश सिप्पी (शोले (1975) के निर्देशक के साथ भ्रमित न होने) के लिए छोड़ने के लिए कहा गया था, लेकिन फिर उन्होंने अपना विचार बदल दिया और अपने पति और उनकी दो बेटियों के साथ रहने लगीं। 2005 में, वह द यंग वाइफ (1967) में उन्हें फिल्मों से परिचित कराने वाले निर्देशक तरुण मजूमदार ने अपनी छोटी बेटी मेघा को अपनी अगली बंगाली फिल्म "भालोबसर अनेक नाम" में पेश करने का फैसला किया। (मौसमी ने फिल्म में मेघा की चचेरी बहन के रूप में एक सहायक भूमिका निभाई।) उनकी बड़ी बेटी पायल ने प्राइम चैनल में क्रिएटिव हेड के रूप में कैमरे के पीछे अपना नाम बनाया है, जो टेलीविजन शो की देखरेख करती है। मध्य आयु में, मौसमी ने स्वीकार किया है तनुजा चंद्रा की ज़िंदगी रॉक्स (2006) में दोहरी भूमिका निभाने और बॉलीवुड/हॉलीवुड (2002) में अभिनय करने के लिए कनाडा चली गईं, जिसके लिए उन्हें जिनी सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री का नामांकन मिला। उन्होंने 2004 में राजनीति में भी प्रवेश किया है, भले ही उनके पास कोई अनुभव नहीं है, लेकिन उन्होंने उत्साह और कड़ी मेहनत से इसकी भरपाई करने की कोशिश की। मौसमी ने तनुजा चंद्रा की ज़िंदगी रॉक्स (2006) में दोहरी भूमिका निभाने के रूप में नई चुनौतियों को स्वीकार किया और बॉलीवुड/हॉलीवुड (2002) में अभिनय करने के लिए कनाडा चली गईं, जिसके लिए उन्हें जिनी सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री का नामांकन मिला। उन्होंने 2004 में राजनीति में भी प्रवेश किया है, भले ही उनके पास कोई अनुभव नहीं है, लेकिन उन्होंने उत्साह और कड़ी मेहनत से इसकी भरपाई करने की कोशिश की। मौसमी ने तनुजा चंद्रा की ज़िंदगी रॉक्स (2006) में दोहरी भूमिका निभाने के रूप में नई चुनौतियों को स्वीकार किया और बॉलीवुड/हॉलीवुड (2002) में अभिनय करने के लिए कनाडा चली गईं, जिसके लिए उन्हें जिनी सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री का नामांकन मिला। उन्होंने 2004 में राजनीति में भी प्रवेश किया है, भले ही उनके पास कोई अनुभव नहीं है, लेकिन उन्होंने उत्साह और कड़ी मेहनत से इसकी भरपाई करने की कोशिश की।

sj शंकर जयकिशन

*महान संगीतकार जोड़ी शंकर जयकिशन के शंकर की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि*
शंकर सिंह रघुवंशी भारतीय सिनेमा के प्रसिद्ध संगीतकार थे। इन्होंने अपनी जोड़ी संगीतकार जयकिशन के साथ मिलकर बनाई और शंकर-जयकिशन नाम से प्रसिद्ध हुए।
शंकर जयकिशन (जिन्हें S-J के नाम से भी जाना जाता है), 1949 से 1971 तक एक साथ काम करते हुए हिंदी फिल्म उद्योग की एक लोकप्रिय और सफल भारतीय संगीतकार जोड़ी थी। उन्हें हिंदी फिल्म उद्योग के सर्वश्रेष्ठ रचनाकारों में से एक माना जाता है। बाद में, शंकर अकेले संगीत निर्देशक के रूप में कार्य करते रहे, फिर भी 1987 तक शंकर-जयकिशन के बैनर तले संगीत देते रहे|

15 अक्टूबर 1922 को जन्मे शंकर के पिता रामसिंह रघुवंशी मूलत: मध्य प्रदेश के थे और काम के सिलसिले में हैदराबाद में बस गये थे। शंकर को शुरु से ही कुश्ती का शौक़ था और उनका कसरती बदन बचपन के इसी शौक़ का परिणाम था। घर के पास के एक शिव मंदिर में पूजा अर्चना के दौरान तबला वादक का वादन भी बचपन में बहुत आकर्षित करता था। तबला बजाने की लगन दिनों दिन बढ़ती गयी। महफ़िलों में तबला बजाते हुए उस्ताद नसीर खान की निगाह उन पर पड़ी और शंकर उनके चेले हो गये। माली हालात ऐसे थे किट्यूशन भी करनी पड़ी।
कहते हैं कि हैदराबाद में ही एक बार किसी गली से गुजरते हुए तबला सुनकर शंकर एक तवायफ़ के कोठे पर पहुँच गये और तबलावादक को ग़लत बजाने पर टोक दिया। बात बढ़ी तो शंकर ने इस सफ़ाई से बजाकर अपनी क़ाबिलियत का परिचय दिया कि वाह-वाही हो गयी। शंकर अपनी कला को और निखारने के लिए एक नाट्य मंडली में शामिल हो गये, जिसके संचालक मास्टर सत्यनारायण थे और हेमावती ने बम्बई जा कर पृथ्वी थियेटर्स में नौकरी कर ली, तो शंकर भी 75 रुपये प्रतिमाह पर पृथ्वी थियेटर्स में तबलावादक बन गये।पृथ्वी थियेटर्स के नाटकों में कुछ छोटी-मोटी भूमिकाएँ मिलने लगीं और वहीं शंकर ने सितार बजाना भी सीख लिया।

शंकर जयकिशन की मुलाक़ात भी अजीब ढंग से हुई। ऑपेरा हाउस थियेटर के पास की व्यायामशाला में कसरत के लिए शंकर जाया करते थे और वहीं दत्ताराम से उनकी मुलाक़ात हुई। दत्ताराम शंकर से तबले और ढोलक की बारीकियाँ सीखने लगे, और एक दिन उन्हें फ़िल्मों में संगीत का काम दिलाने के लिए दादर में गुजराती फ़िल्मकार चंद्रवदन भट्ट के पास ले गये। वहीं जयकिशन भी फ़िल्मों में काम की तलाश में आये हुए थे। इंतज़ार के क्षणों में ही बातों में शंकर को पता चला कि जयकिशन हारमोनियम बजाते थे। उस समय सौभाग्य से पृथ्वी थियेटर में हारमोनियम मास्टर की जगह ख़ाली थी।
शंकर ने प्रस्ताव रखा तो जयकिशन झट से मान गये और इस तरह पृथ्वी थियेटर्स के परचम तले शंकर और जयकिशन साथ-साथ काम करने लगे। 'पठान' में दोनों ने साथ-साथ अभिनय भी किया। काम के साथ-साथ दोस्ती भी प्रगाढ़ होती गयी। शंकर साथ-साथ हुस्नलाल भगतराम के लिए भी तबला बजाने का काम करते थे और दोनों भाइयों से भी संगीत की कई बारीकियाँ उन्होंने सीखीं। पृथ्वी थियेटर्स में ही काम करते करते शंकर और जयकिशन राजकपूर के भी क़रीबी हो गए। हालाँकि राज कपूर की पहली फ़िल्म के संगीतकार थे पृथ्वी थियेटर्स के वरिष्ठ संगीतकार राम गाँगुली और शंकर जयकिशन उनके सहायक थे, लेकिन बरसात के लिए संगीत की रिकार्डिंग के शुरुआती दौर में जब राजकपूर को पता चला कि बरसात के लिए बनायी एक धुन राम गाँगुली उसी समय बन रही एक दूसरी फ़िल्म के लिए
प्रयुक्त कर रहे हैं तो वे आपा खो बैठे। शंकर जयकिशन की प्रतिभा के तो वो कायल थे ही और जब उन्होंने शंकर के द्वारा उनकी लिखी कम्पोज़िशन 'अम्बुआ का पेड़ है, वही मुडेर है, मेरे बालमा, अब काहे की देर है' की बनायी धुन सुनी तो उन्होंने राम गाँगुली की जगह शंकर जयकिशन को ही बरसात का संगीत सौंप दिया। यही धुन बाद में 'जिया बेकरार है, छायी बहार है' के रूप में 'बरसात' में आयी। फ़िल्म बरसात में उनकी जोड़ी ने जिया बेकरार है और बरसात में हमसे मिले तुम सजन जैसा सुपरहिट संगीत दिया। फ़िल्म की कामयाबी के बाद शंकर जयकिशन बतौर संगीतकार अपनी पहचान बनाने मे सफल हो गये। इसे महज एक संयोग ही कहा जायेगा कि फ़िल्म बरसात से ही गीतकार शैलेन्द्र और हसरत जयपुरी ने भी अपने सिने कैरियर की शुरूआत की थी।
फ़िल्म बरसात की सफलता के बाद शंकर जयकिशन राजकपूर के चहेते संगीतकार बन गये। इसके बाद राजकपूर की फ़िल्मों के लिये शंकर जयकिशन ने बेमिसाल संगीत देकर उनकी फ़िल्मों को सफल बनाने मे महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
*शंकर सिंह पुत्र राम सिंह रघुवंशी (15 अक्टूबर 1922 - 26 अप्रैल 1987) हैदराबाद के थे।*

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