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मंगलवार, 30 मई 2023

रितुपर्णो घोष


*🎂जन्म की तारीख और समय: 31 अगस्त 1963, कोलकाता*
*,🕯️मृत्यु की जगह और तारीख: 30 मई 2013, कोलकाता*

फ़िल्म निर्देशक ऋतुपर्णो घोष की पुण्यतिथि पर  हार्दिक श्रद्धांजलि

ऋतुपर्णो घोष बंगाली फ़िल्मों के प्रसिद्ध निर्देशक, लेखक और अभिनेता थे। 'चोखेर बाली', 'रेनकोट' और 'अबोहोमन' जैसी फ़िल्मों के लिए 'राष्ट्रीय पुरस्कार' विजेता ऋतुपर्णो घोष की ख्याति राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय जगत् में थी। उन्होंने और उनकी फ़िल्मों ने रिकॉर्ड बारह 'राष्ट्रीय पुरस्कार' जीते थे। ऋतुपर्णो घोष उन निर्देशकों में से एक थे, जो फ़िल्म को एक कला मानते थे। व्यवसाय या बॉक्स ऑफिस को ध्यान में रखकर उन्होंने कभी फ़िल्में नहीं बनाईं। उनकी अपनी सोच थी, शैली थी और अपने मिजाज के अनुरूप ही ‍वे फ़िल्में बनाते थे। बहुत कम समय में ही उन्होंने अपनी एक ख़ास पहचान बना ली थी। घोष ने विज्ञापन की दुनिया से अपना व्यवसाय प्रारम्भ किया था और जल्द ही फ़िल्मों की ओर मुड़ गए थे। अपने 19 साल के फ़िल्मी करियर में ऋतुपर्णो घोष ने 19 फ़िल्मों का निर्देशन और तीन फ़िल्मों में अभिनय किया।

#जन्म_तथा_शिक्षा

ऋतुपर्णो घोष का जन्म 31 अगस्त, 1963 को कोलकाता, पश्चिम बंगाल में हुआ था। इनके पिता का नाम सुनील घोष था। सुनील घोष डॉक्युमेंट्री फ़िल्म मेकर और पैंटर थे। ऋतुपर्णो घोष को फ़िल्म मेकिंग की प्रेरणा अपने पिता से ही मिली थी। ऋतुपर्णो घोष ने अपनी प्रारम्भिक स्कूली शिक्षा 'साउथ पॉइंट हाईस्कूल' से प्राप्त की। उन्होंने अपनी अर्थशास्त्र की डिग्री 'जादवपुर यूनिवर्सिटी', कोलकाता से प्राप्त की थी। आगे चलकर अपने आधुनिक विचारों को उन्होंने फ़िल्मों के जरिये पेश किया और जल्दी ही अपनी पहचान एक ऐसे फ़िल्म मेकर के रूप में बना ली, जिसने 'भारतीय सिनेमा' को समृद्ध किया।

#फ़िल्म_निर्माण

विज्ञापन की दुनिया से अपना कैरियर शुरू करने वाले ऋतुपर्णो घोष ने अपने फ़िल्मी कैरियर की शुरुआत बाल फ़िल्मों के निर्माण से की। वर्ष 1994 में बाल फ़िल्म 'हिरेर आंग्टी' के निर्देशन से उन्हें शोहरत मिलने लगी थी। इसके बाद 'उनिशे एप्रिल' के लिए उन्हें 1995 में 'राष्ट्रीय पुरस्कार' से नवाज़ा गया था। यह फ़िल्म प्रख्यात फ़िल्म निर्देशक इंगमार बर्गमन की 'ऑटम सोनाटा' से प्रेरित थी। इस फ़िल्म में ऋतुपर्णो घोष ने माँ-बेटी के तनावपूर्ण रिश्तों को बारीकी से रेखांकित किया था। एक कामकाजी महिला अपने व्यावसायिक कैरियर में सफल है, लेकिन अपनी पारिवारिक ज़िंदगी में वह असफल रहती है। इसका असर उसकी बेटी पर होता है और बेटी अपनी माँ से इस बात को लेकर नाराज है कि वह अपने व्यवसाय को कुछ ज़्यादा ही महत्त्व देती है। इस फ़िल्म में अपर्णा सेन, देबश्री राय और प्रसन्नजीत चटर्जी ने अभिनय किया था। इस फ़िल्म को सिने प्रेमियों ने खूब सराहा था। उनके जानने-पहचानने वाले लोग उन्हें 'ऋतु दा' के नाम से पुकारने लगे थे।

#लोकप्रियता

अपनी फ़िल्मों के माध्यम से ऋतुपर्णो घोष ने बहुत लोकप्रियता प्राप्त की। सारे बड़े फ़िल्मी कलाकार उनके साथ काम करने के लिए तुरंत राजी हो जाते थे, क्योंकि उनकी फ़िल्मों में काम करना गर्व की बात थी। रिश्तों की जटिलता और लीक से हट कर विषय उनकी फ़िल्मों की ख़ासियत होते थे। बांग्ला उनकी मातृभाषा थी और इस भाषा में वे सहज महसूस करते थे। इसलिए अधिकतर फ़िल्में उन्होंने बांग्ला भाषा में ही बनाईं। फ़िल्म फेस्टिवल में सिनेमा देखने वाले दर्शक और ऑफबीट फ़िल्मों के शौकीन ऋतु दा की फ़िल्मों का बेसब्री से इंतज़ार करते थे।

#राष्ट्रीय_पुरस्कार

फ़िल्म 'हिरेर आंग्टी', जो कि एक बाल फ़िल्म थी, उसकी सफलता के बाद से ही ऋतुपर्णो घोष की फ़िल्मों को 'राष्ट्रीय पुरस्कार' मिलना आम बात हो गई। कभी कलाकारों को, कभी लेखकों तो कभी फ़िल्म को 'राष्ट्रीय पुरस्कार' मिलता। वर्ष 1999 में ऋतुपर्णो घोष द्वारा निर्देशित फ़िल्म 'बारीवाली' के लिए अभिनेत्री किरण खेर ने श्रेष्ठ अभिनेत्री का 'राष्ट्रीय पुरस्कार' हासिल किया था। 'बारीवाली' एक ऐसी महिला की कहानी थी, जिसके होने वाले पति की विवाह के एक दिन पहले ही मौत हो जाती है और इसके बाद वह एकांकी जीवन बिताती है। ऋतुपर्णो घोष ने कुल 19 फ़िल्में बनाईं और 12 'राष्ट्रीय पुरस्कार' जीते। ये पुरस्कार उनकी काबलियत को जाहिर करते हैं।

#उल्लेखनीय_तथ्य

'उत्सव' (2000), 'तितली' (2002), 'शुभो महुर्त' (2003) जैसी ‍बांग्ला भाषा में बनी फ़िल्मों ने ऋतुपर्णो घोष की ख्याति को बढ़ाया। इसके बाद ऋतुपर्णो ने हिन्दी फ़िल्मों की मशहूर अभिनेत्री ऐश्वर्या राय को लेकर 'चोखेर बाली' (2003) बनाई। यह फ़िल्म रवीन्द्रनाथ टैगोर के उपन्यास पर आधारित थी। इस फ़िल्म में महिला किरदारों को बखूबी पेश किया गया था।
वर्ष 2004 में ऋतुपर्णो घोष ने हिन्दी भाषा में फ़िल्म 'रेनकोट' बनाई। 'रेनकोट' ऐसे दो प्रेमियों की कहानी है, जो वर्षों बाद बरसात की एक रात में मिलते हैं। इस फ़िल्म को ऐश्वर्या राय के कैरियर की श्रेष्ठ फ़िल्मों में से एक माना जाता है। अभिनेता अजय देवगन ने भी इस फ़िल्म में शानदार अभिनय किया।
वर्ष 2007 में ऋतुपर्णो घोष ने सिनेमा के दिग्गज अभिनेता अमिताभ बच्चन के साथ किया और फ़िल्म 'द लास्ट लियर' बनाई।
ऋतुपर्णो घोष की दूसरी हिन्दी फ़िल्म 'सनग्लास' थी, जो 2012 में रिलीज हुई थी।

#प्रमुख_फ़िल्में

1994 हिरेर आंग्टी बंगाली
1995 उनिशे एप्रिल बंगाली
1997 दहन बंगाली
1999 बेरीवाली बंगाली
2003 चोखेर बाली बंगाली
2004 रेनकोट  हिन्दी
2005 अंतरमहल बंगाली
2006 दोसर  बंगाली
2007 द लास्ट लीअर  अंग्रेज़ी
2008 शोभ चरित्रो काल्पोनिक  बंगाली
2010 अबोहोमन बंगाली
2010 नौकाडूबी बंगाली
2012 चित्रांगदा  बंगाली
2012 सनग्लास  हिन्दी

#समलैंगिक_फ़िल्में

चाहे हिन्दी फ़िल्म 'रेनकोट' में ऐश्वर्या राय और अजय देवगन से संवेदनशील अभिनय करवाना हो या फिर बांग्ला और हिन्दी में 'चोखेरबाली' हो, ऋतुपर्णो घोष ने न केवल महिलाओं से जुड़े मुद्दों को उठाया, बल्कि समलैंगिक मुद्दों को भी वे उठाते रहे। उनकी फ़िल्मों में समलैंगिक विषयों का काफ़ी संजीदा तरीके से चित्रण हुआ है। सर्वश्रेष्ठ अंग्रेज़ी फ़िल्म के लिए 'राष्ट्रीय पुरस्कार' जीतने वाली फ़िल्म 'मेमरीज़ इन मार्च' भी समलैंगिक विषय पर बनाई गई थी, जिसमें ऋतुपर्णो के अभिनय को काफ़ी सराहा गया था। अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त ऋतुपर्णो ने कभी भी बॉलीवुड की मुख्य धारा का रुख नहीं किया और कोलकाता में ही रह कर अलग-अलग विषयों पर अर्थपूर्ण फ़िल्में बनाते रहे। इस बात का अंदाजा़ इसी से लगाया जा सकता है कि उन्हें सिर्फ 49 वर्ष की आयु में ही बारह 'राष्ट्रीय पुरस्कार' और कई अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके थे। सिर्फ़ 21 वर्ष में बहुत कम ही फ़िल्मकारों को इतने पुरस्कार नसीब हुए हैं, लेकिन ऋतुपर्णो घोष अपने आप में ख़ास किस्म के निर्देशक और अभिनेता रहे थे।

#पुरस्कार_व_सम्मान

ऋतुपर्णो घोष ने कई श्रेणियों में बारह 'राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार' जीते थे। उन्हें 'चोखेर बाली', 'उन्नीशे अप्रैल', 'रेनकोट' और 'द लास्ट लीअर' जैसी फ़िल्मों के लिए याद किया जाता है। वर्ष 2012 में आई उनकी आखिरी फ़िल्म 'चित्रांगदा' के लिए उन्हें 60वें 'राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार' समारोह में 'स्पेशल ज्यूरी अवार्ड' दिया गया था। घोष ने अपनी फ़िल्मों 'अरेक्ती प्रेमेर गोल्पो' 'मेमोरीज इन मार्च' और 'चित्रांगदा' में अपना अभिनय कौशल भी दिखाया था।

#निधन

'भारतीय सिनेमा' को अपनी सूझबूझ और फ़िल्मों के माध्यम से समृद्ध बनाने वाले ऋतुपर्णो घोष पैन्क्रियाटाइटिस से पीड़ित थे। 30 मई, 2013 को कोलकाता में सुबह के समय साढ़े सात बजे उन्हें दिल का दौरा पड़ा और उनका निधन हो गया। उनकी आखिरी फ़िल्म 'चित्रांगदा' थी, जो हाल ही में मुंबई में हुए समलैंगिक फ़िल्म महोत्सव की क्लोज़िग फ़िल्म थी। इस महोत्सव के निर्देशक श्रीधर रंगायन का कहना था कि- "हमने एक ऐसा निर्देशक खोया है, जो समलैंगिक विषयों पर खुलकर, बिना डरे और बेहद ही संजीदगी से फ़िल्में बनाता था।"

मधुमती अभिनेत्री और डांसर


*अभिनेत्री डांसर मधुमती के जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनाएं*

*🎂 जन्म 30 मई 1938*


मधुमती का जन्म 30 मई 1938 में महाराष्ट्र के पास एक सुदूर गांव में पारसी परिवार में हुआ था। उनके पिता जज थे  उन्होंने 1957 में एक रिलीज़ नहीं हुई मराठी फिल्म में एक नर्तकी के रूप में अपनी शुरुआत की।  मधुमती ने 19 साल की कम उम्र में मनोहर दीपक से शादी कर ली।  उन्होंने 1960 के दशक में पंजाबी, मराठी, हिंदी, भोजपुरी और दक्षिण भारतीय फिल्मों में नृत्य करके खुद को व्यस्त रखा।  उनकी नृत्य क्षमताओं और रूप के मामले में उनकी तुलना अक्सर महान नर्तक हेलेन से की जाती थी।  उन्होंने 1977 में बाहर किया और 2001 में वापसी की। 2002 में अपने पति के निधन के बाद, वह अब मुंबई में मधुमती नृत्य अकादमी चलाकर खुद को संभालती हैं।
मधुमती को बचपन से ही डांस का शौक था और इसी के चलते पढ़ाई- लिखाई में उनका मन नहीं लगता था, लेकिन उन्होंने 10वीं तक अपनी पढ़ाई पूरी की। इसके साथ- साथ वो डांस भी सीखती रहीं। वो भारतनाट्यम, कथक, मनिपुरी और कथकली के अलावा फिल्मी डांस भी करती थीं। 
स्कूल में पढ़ते हुए ही मधुमती ने स्टेज डांस करना शुरू कर दिया और इसके बाद उन्हें फिल्मों में ऑफर मिलने लगे। मधुमती फिल्मों में करियर नहीं बनाना चाहती थीं लेकिन फिर भी उन्होंने एक मराठी फिल्म का ऑफर स्वीकार कर लिया। मधुमती के पिता ने उन्हें फिल्मों में यह कहकर काम करने की इजाजत दी कि वो केवल डांस से जुड़े ऑफर को ही स्वीकार करेंगी और एक्टिंग के ऑफर से दूर रहेंगी। इसके बाद उन्होंने कई बड़ी व सुपरहिट फिल्मों में काम किया
एक्टर सुनील दत्त और उनकी पत्नी नरगिस एक्ट्रेस मधुमती के बहुत करीबी थे और उन्हें पसंद करते थे। इसकी वजह थी कि मधुमती सुनील दत्त को राखी बांधती थीं। 
एक्टिंग के अलावा मधुमती स्कूल में डांस भी सिखाती थीं और बाद में उन्होंने महिलाओं के साथ एक डांस ग्रुप बनाया। वहीं दूसरी तरफ मनोहर दीपक भी जाना पहचाना नाम बन गए थे और उन्होंने मधुमती को अपने साथ काम करने के लिए कहा। शुरुआत में तो उन्होंने इसके लिए मना कर दिया लेकिन बाद में दोनों साथ काम करने लगे। 
मनोहर दीपक उम्र में मधुमती से बहुत बड़े थे और शादीशुदा व चार बच्चों के पिता थे। उनकी पत्नी को दिल की बीमारी थी जिसके चलते उनका निधन हो गया। मधुमती की मां दीपक को पसंद तो करती थीं लेकिन उनसे अपनी बेटी की शादी करवाने के लिए तैयार नहीं थीं। लेकिन फिर भी मधुमती ने दीपक मनोहर से 19 साल की उम्र में शादी कर ली। 

मधुमती की तुलना एक्ट्रेस हेलेन से होती थी। इस बारे में मधुमती ने कहा था, 'हम दोनों दोस्त थे लेकिन हेलेन जी सीनियर थी। हां, फिल्म फ्रेटरनिटी को हम दोनों के लुक्स एक जैसे लगते थे और कुछ लोग हमेशा हमारी तुलना करते रहते थे लेकिन हम कभी इससे परेशान नहीं हुए। मैंने हेलेन जी के साथ कुछ गानों में काम भी किया जिसमें फिल्म ये रात फिर ना आएगी का गाना हुजूर ए आला शामिल है।
25 साल तक मधुमती और मनोहर दीपक ने हिंदी व पंजाबी फिल्मों में काम किया। मधुमती की आखिरी फिल्म का नाम है अमर अकबर एंथनी। इसके बाद उन्होंने फिल्मों में काम करना बंद कर दिया और अपना डांस स्कूल शुरू कर दिया। उनके डांस स्कूल में कई नामी बॉलीवुड एक्टर्स ने उनसे डांस सीखा जिसमें अक्षय कुमार, गोविंदा, तबू और अमृता सिह का नाम शामिल है। डांस के साथ- साथ उन्होंने अपना एक्टिंग स्कूल भी शुरू कर लिया। लेकिन साल 2002 में उनके पति मनोहर दीपक का निधन हो गया।

सोमवार, 29 मई 2023

कृष्णा अभिषेक

कृष्णा अभिषेक


*कृष्णा अभिषेक शर्मा*
🎂जन्म
*कृष्णा अभिषेक*
*30 मई 1983*
*मुंबई*
*राष्ट्रीयता भारत*
*व्यवसाय अभिनेता, हास्यकलाकार*
🔛  *उन्होंने ये कैसी मोहब्बत है (2002) के साथ अपनी फिल्म की शुरुआत की, और 2005 में हम तुम और मां जैसी फिल्मों में अभिनय करने गए।जहां जाएगा हमन पायेगा (2007), और और पप्पू पास हो गया एक ही वर्ष में। बाद में वह भोजपुरी फिल्म में शिफ्ट हो गए। उन्होंने २००७ में टीवी श्रृंखला, सौतेला (दूरदर्शन) में मुख्य भूमिका निभाई।*

*उन्होंने स्टैंड-अप कॉमेडी शो, कॉमेडी सर्कस के विभिन्न सत्रों में भाग लिया, जिसमें कॉमेडी सर्कस 2 (2008), कॉमेडी सर्कस 3 (2009) शामिल हैं, जहां वे थे। सुदेश लहरी के साथ कॉमेडी सर्कस 3 (2009) में वाइल्ड कार्ड एंट्री। उन्होंने नच बलिए (सीजन ३) (२००७) से शुरू होने वाले सेलिब्रिटी युगल नृत्य-रियलिटी शो में भाग लिया।और कभी कभी प्यार कभी यार (2008) गर्ल फ्रेंड कश्मीरा शाह के साथ और अंततः बाद में जीत हासिल की। वह इसी तरह के एक शो, जलवा फोर 2 का 1 (2008) में भी दिखाई दिए। 2010 में, उन्होंने कोरियोग्राफर रॉबिन मर्चेंट के साथ डांस रियलिटी शो, झलक दिखला जा (सीजन 4) में भाग लिया।इससे पहले वह डीडी नेशनल, क्रेजी किया रे पर सुधा चंद्रन के साथ रियलिटी डांस शो में जज के रूप में भी दिखाई दिए थे।*

*एक सेलिब्रिटी जोड़े के रूप में उन्होंने और कश्मीरा शाह ने फरवरी २०११ में यूटीवी बिंदास पर रियलिटी शो लव लॉक अप में भाग लिया।जिसमें अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा ने शांति निर्माता की भूमिका निभाई। 2020 में, उन्होंने भारती सिंह और अन्य के साथ अपने नए शो फनहिट में जारी में अभिनय किया।*

🔛🎥। फ़िल्में

हम तुम और मदर
और पप्पू पास हो गया
जहाँ जाएगा हमें पाएगा
ओ पुष्पा आई हेट टीयर्स (2020)
देशद्रोही
हुक या क्रूक
बोल बच्चन
मिस्टर मनी
एंटर्टेंमेंट
क्या कुल हैं हम 3
सीता

🔛📺। धारावाहिक

कभी कभी प्यार कभी कभी यार
कहानी कॉमेडी सर्कस की
एंटर्टेंमेंट के लिए कुछ भी करेगा
कॉमेडी सर्कस
कॉमेडी नाईटस बचाओ
कांमेडी नाईटस लाइव

धृतिमान चटर्जी


*धृतिमान चटर्जी*

*जन्म*
30 मई 1945 
कलकत्ता , बंगाल प्रेसीडेंसी , ब्रिटिश भारत
व्यवसाय
फिल्म, टीवी और स्टेज अभिनेता, विज्ञापन और लघु फिल्म निर्माता, साहित्य कलाकार और वाचक

धृतिमान उनका स्क्रीन नाम है। उन्हें अन्यथा सुंदर चटर्जी के रूप में जाना जाता है और चेन्नई में अंग्रेजी मंच पर काफी सक्रिय हैं। 30 मई 1945 को जन्मे, उन्होंने कोलकाता के सेंट जेवियर्स कॉलेजिएट स्कूल और प्रेसीडेंसी कॉलेज और दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में शिक्षा प्राप्त की थी। चटर्जी ने विज्ञापन , सामाजिक संचार और वृत्तचित्र फिल्म निर्माण में एक समानांतर करियर बनाया ।

2019 में, चटर्जी ने इफ नॉट फॉर यू में कथन के लिए अपनी आवाज दी ,महान गायक-गीतकार बॉब डायलन के साथ कोलकाता के लंबे समय तक चलने वाले प्रेम संबंध के बारे में एक वृत्तचित्र. अपने अभिनय गुणों के बारे में, सत्यजीत रे ने एक बार टिप्पणी की थी, "मुझे नहीं पता कि ये फिल्म निर्माता किस स्टार की परिभाषा का उपयोग कर रहे हैं, लेकिन मेरा कुछ ऐसा है। एक स्टार स्क्रीन पर एक ऐसा व्यक्ति है जो बाद में भी अभिव्यक्तिपूर्ण और दिलचस्प बना रहता है। उसने कुछ भी करना बंद कर दिया है। यह परिभाषा उस दुर्लभ और भाग्यशाली नस्ल को बाहर नहीं करती है जिसे प्रति फिल्म लाखों रुपये मिलते हैं; और इसमें हर कोई शामिल है जो कैमरे के सामने शांत रहता है, एक व्यक्तित्व पेश करता है और सहानुभूति पैदा करता है। यह एक दुर्लभ नस्ल है भी लेकिन हमारी फिल्मों में यह मिला है। प्रतिद्वंदी के धृतिमान चटर्जी ऐसे ही एक स्टार हैं। - ( हमारी फिल्में उनकी फिल्में ) 

कभी मुख्यधारा के "बॉलीवुड" का हिस्सा नहीं रहे, उन्होंने आश्चर्यजनक रूप से बहुत कम संख्या में फिल्में बनाई हैं। हाल के वर्षों में उन्होंने जेन कैंपियन जैसे विविध फिल्म निर्माताओं और बेहद सफल मुंबई निर्देशकों संजय लीला भंसाली और मणिरत्नम के साथ भूमिकाएँ निभाईं।  धृतिमान को भारत में कई अभिनय पुरस्कार मिले हैं और वह भारतीय राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की जूरी में रहे हैं।

वह वर्तमान में 14 दिसंबर 2013 से एबीपी आनंद पर बंगाली में प्रधानमंत्री के एंकर हैं ।

धृतिमान चटर्जी एक भारतीय अभिनेता हैं। उन्होंने अपने अभिनय करियर की शुरुआत 1970 में सत्यजीत रे की प्रतिवंडी ( द एडवर्सरी ) के नायक के रूप में की थी । उनका अधिकांश अभिनय कार्य भारत के "समानांतर", या स्वतंत्र सिनेमा में रहा है, जिसमें सत्यजीत रे , मृणाल सेन और अपर्णा सेन जैसे फिल्म निर्माता शामिल हैं और अपने अभिनय कौशल के लिए विख्यात हैं। उन्होंने दीपा मेहता और जेन कैंपियन जैसे प्रसिद्ध फिल्म निर्माताओं के साथ अंग्रेजी फिल्मों में भी काम किया है ।

परेश रावल


*परेश रावल*

*🎂जन्म की तारीख और समय: 30 मई 1955, मुम्बई*
*पत्नी: स्वरूप संपत (विवा. 1987)*
*बच्चे: अदित्य रावल, अनिरुद्ध रावल, आदित्य रावल*

*दल: भारतीय जनता पार्टी*
*इनाम: फिल्मफेयर पुरस्कार - सर्वश्रेष्ठ परफॉरमेंस इन ए कॉमिक रोल*

रावल ने अभिनय की शुरूआत 1984 में की थी। तब यह होली नामक फ़िल्म में एक सहायक किरदार निभाया था। इसके बाद 1986 में नाम नामक फ़िल्म से उनके अभिनय का गुण लोगों को पता चला। इसके बाद वह 1980 से 1990 के मध्य 100 से अधिक फ़िल्मों में खलनायक की भूमिका में नजर आए। इसमें कब्जा, किंग अंकल, राम लखन, दौड़, बाज़ी और कई फ़िल्मों में कार्य किया।

यह एक हास्य फ़िल्म अंदाज़ अपना अपना में पहली बार दो किरदार में नजर आए। इसके बाद वर्ष 2000 में एक हिन्दी फ़िल्म "हेरा फेरी" में अपने अभिनय और किरदार के कारण वह इसके बाद कई फ़िल्मों में मुख्य किरदार भी निभा चूकें हैं। हेरा फेरी फ़िल्म में राजू (अक्षय कुमार) और श्याम (सुनील शेट्टी) उसके घर किराए पर रहते हैं। जबकि रावल उसमें मकान मालिक का किरदार निभाते हैं। इस किरदार को हेरा फेरी के सफलता का श्रेय दिया गया है। इसमें उनके कार्य के लिए वह फ़िल्मफेयर पुरस्कार (सर्वश्रेष्ठ हास्यकार) भी जीत चूकें हैं। उनका बाबुराव का किरदार उसके दूसरे भाग फिर हेरा फेरी (2006) में भी देखने को मिला, यह फ़िल्म भी सफल रही। रावल को सर्वश्रेष्ठ फिल्म पुरस्कार, सर्वश्रेष्ठ कॉमेडियन और लीड रोल के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार, सहायक भूमिका मिली है। परेश रावल सबसे लोकप्रिय और वाणिज्यिक सफल फिल्मों में क्षणाशन (1991), मनी (199 3), मनी मनी (1995), गोविंदा गोविंदा (1994), रिक्शावुडू (1995), बावागरु बागुनारा (1998), शंकर दादा एमबीबीएस (2004), और टीन मार (2011) इत्यादि। 2012 में आयी फिल्म omg में कांजिलाल मेहता के रूप में उनका किरदार आज भी विस्मरणीय है फिल्म जगत में ये एक ऐसे चेहरे में गिने जाते है जिनका अभिनय चाहे किसी भी किरदार में हो जान डाल देती है फिल्म में। वर्ष 2018 में राजकुमार हिरानी की फिल्म संजू (संजय दत्त की बायोपिक फिल्म) में सुनील दत्त (संजय दत्त के पिता) के रूप में उनका साक्षात् चित्रण किया जिससे उन्होंने फिल्म में काफी प्रसिद्धि मिली ।

*परेश रावल हिन्दी फ़िल्मों के एक अभिनेता हैं। 2014 में उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया गया। यह 1994 में राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार सहायक किरदार के लिए से सम्मानित हुए। इसके बाद इन्हें सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता का फ़िल्मफेयर पुरस्कार भी मिल चुका है*

जेनिफर विंगेट


*जेनिफर विंगेट*

*🎂30 मई 1985*

*जेनिफर विंगेट टेलीविजन और फ़िल्म अभिनेत्री हैं जो कई धारावाहिकों में दिख चुकी हैं। वेें खासकर सरस्वतीचंद्र, बेहद और बेपनाह जैैैसे धारावाहिको में अपनी बेहतरीन प्ररदर्शन के लिए जानी जाती हैं। इन्होंने 2012 में अपने दोस्त और दिल मिल गए के सह कलाकार करन सिंह ग्रोवर से शादी कर ली थी। नवम्बर 2014 में दोनों का तलाक हो गया।*
*जन्म की तारीख और समय: 30 मई 1985 (आयु 38 वर्ष), मुम्बई*
*पति: करन सिंह ग्रोवर (विवा. 2012–2014)*
*माता-पिता: हेमंत विंगेट, प्रभा विंगेट*
*भाई: मोसेस विनगेट*

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🎥फिल्मे
1995 अकेले हम अकेले तुम - युवा लड़की के रूप में
1997 राजा की आएगी बारात - स्कूल में एक बच्चे के रूप में
2000 राजा को रानी से प्यार हो गया - तनु के रूप में
2003 कुछ ना कहो - पूजा के रूप में

📺टेलीविजन

2003–04 शाका लाका बूम बूम - पिया के रूप में
2004–08 कसौटी जिंदगी की - स्नेहा बजाज के रूप में
2006-07 क्या होगा निम्मो का - नताशा के रूप में
2007-09 संगम - गंगा सागर भाटिया के रूप में
2009 देख इंडिया देख - मेजबान के रूप में
2009 लाफ्टर के पटाखे - मेजबान के रूप में
2009 कॉमेडी सर्कस 3 - प्रतियोगी के रूप में
2009 ज़रा नचके दिखा 2 - मेजबान के रूप में
2009 दिल मिल गए - डॉ रिद्धीमा गुप्ता मलिक के रूप में
2011 जोर का झटका: टोटल वाइपआउट प्रतियोगी के रूप में
2011 कॉमेडी का महा मुक़ाबला - मेजमान के रूप में
2011 नचलेवे विथ सरोज खान - समापन समारोह के मेजबान के रूप में
2013–14 सरस्वतीचंद्र कुमुद सरस्वतीचंद्र व्यास के रूप में
2014 स्टार होली मस्ती गुलाल की - मेजबान के रूप में
2016 बेहद - माया मेहरोत्रा के रूप में
2018 बेपनाह - ज़ोया सिद्दीकी के रूप में

सोमवार, 24 अप्रैल 2023

पंडित सुख राम शर्मा

धूल का फूल साधना वचन हमजोली जैसी फिल्मो के पटकथा एवम् संवाद लेखक पंडित मुखराम शर्मा की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रधांजलि

पण्डित मुखराम शर्माभारतीय सिनेमा ' में अपने समय के ख्यातिप्राप्त पटकथा लेखक थे। वे मेरठ से साधारण शख्स के तौर पर मायानगरी मुंबई पहुँचे थे और फ़िल्मी दुनिया में कथा, पटकथा और संवाद लेखक के तौर पर एक महान हस्ति का दर्जा पाया था। पूरे भारत से फ़िल्म वितरक मुखराम शर्मा को फ़ोन करके पूछा करते थे कि उनकी अगली फ़िल्म कौन-सी है और किसके साथ है। उस समय मुखरामजी का जवाब किसी फ़िल्म के सभी अधिकार रातों-रात बिकवाने की गारंटी हुआ करता था। वे जो लिख रहे होते थे,उसका ट्रैक रखने के लिए वितरक और निर्माता उनके घर के नियमित चक्कर लगाते रहते थे। उनके पास अपनी पसंद के निर्माता और निर्देशकों को अपनी कहानियाँ को बेचने का विशेष अधिकार प्राप्त था।

पंडित मुखराम शर्मा का जन्म 30 मई, 1909 में मेरठ के क़िला परीक्षितगढ़ क्षेत्र के एक गाँव पूठी में हुआ था उन्होंने अपने व्यावसायिक जीवन की शुरुआत हिन्दी और संस्कृत के शिक्षक के रूप में की थी। मुखरामजी मेरठ में ही शिक्षक के पद पर नियुक्त हुए थे,लेकिन शिक्षण कार्य से प्यार करने के बावजूद भी वे अपने भीतर एक कमी महसूस करते थे। उन्होंने महसूस किया कि शिक्षण उनका असली व्यवसाय नहीं था।

फ़िल्में देखना मुखराम शर्मा जी बहुत पसंद करते थे और "प्रभात फ़िल्म कंपनी" और "न्यू थियेटर" द्वारा बनाई गई फ़िल्मों के बड़े शौकीन तथा प्रशंसक थे। पत्रिकाओं के लिए लघु कहानियाँ और कविताएँ लिखने वाले मुखराम शर्मा ने निश्चय किया कि अब वे फ़िल्मों के लिए भी लिखना शुरू करेंगे। वह मेरठ में अपने एक मित्र के पास गए, जो हिन्दी फ़िल्म उद्योग के साथ जुड़ा हुआ था और मुम्बई आता-जाता रहता था।उन्होंने उसे अपनी एक कहानी सुनाई। दोस्त उनसे इतना प्रभावित हुआ कि उसने मुखरामजी से अपने साथ मुम्बई आने को कहा।इस प्रकार वर्ष 1939 में मुखराम शर्मा सपनों के शहर मुम्बई आ गये।

शुरुआत में मुखराम शर्मा जी को सफलता प्राप्त नहीं हुई। फ़िल्म निर्माताओं ने इस प्रतिभाशाली लेखक का स्वागत नहीं किया और मुखराम बहुत ही हताशा और निराशा में अपनी पत्नी और बच्चों के साथ, जो उनके साथ ही मुंबई रहने आ गये थे, पुणे चले गए। वे 'प्रभात फ़िल्म्स', जिसे वी. शांताराम चला रहे थे, पहुँचे और वहाँ चालीस रुपया प्रति माह पर कलाकारो को मराठी सिखाने की जिम्मेदारी स्वीकार कर ली।

वर्ष 1942 में उन्हें राजा नेने द्वारा निर्देशित फ़िल्म "दस बजे" के गीत लिखने का मौका मिला, जिसमें उर्मिला और परेश बनर्जी अदाकारी कर रहे थे। फ़िल्म 'दस बजे' एक सुपर हिट साबित हुई। इस प्रारंभिक सफलता के चलते मुखराम शर्मा को राजा हरिश्चंद्र और तारामती की प्रेम
कहानी पर आधारित शोभना समर्थ अभिनीत राजा नेने की अगली फ़िल्म "तारामती" लिखने का अवसर मिला। यह फ़िल्म न सिर्फ़ एक बड़ी हिट सबित हुई बल्कि मुखरामजी द्वारा इसके तुरंत बाद लिखी गईं अगली दो फ़िल्मों 'विष्णु भगवान' और 'नल दमयंती' को भी
सफ़लता मिली। किंतु अब मुखराम शर्मा एक बदलाव चाहते थे और उनकी कामना सामाजिक समस्याओं के विषयों पर भी कहानी लिखने की थी। यह अवसर भी मुखराम शर्मा को जल्द ही मिल गया। उन्हें यह मौका तब मिला, जब राजा नेने ने अज्ञात मराठी अभिनेताओ के साथ उनकी एक शुरूआती कहानी पर फ़िल्म बनायी। लेकिन यह फ़िल्म असफल रही। इसके बाद उनकी अगली मराठी फ़िल्म "स्त्री जन्मा तुझी कहानी" को भारी सफ़लता मिली। यह फ़िल्म निर्देशक दत्ता धर्माधिकारी के साथ थी, जिन्होंने मुखरामजी की एक लघु कथा को मराठी में बना डाला था। इस फ़िल्म की सफलता यादगार रही और बाद में इसे "औरत तेरी यही कहानी"फ़िल्म के रूप में हिन्दी में पुनर्निर्मित भी किया गया। इसके बाद हालाँकि उनके पुणे स्थित घर में निर्माताओं का तांता बंध गया था, किंतु मुखरामजी उसकी अनदेखी करके मुंबई लौट आए। अब सफलता उनके क़दम चूम रही थी।

प्रमुख फ़िल्में

पंडित मुखराम शर्मा की मुम्बई में फ़िल्म 'औलाद' थी। जब वर्ष 1954 में यह फ़िल्म परदे पर आई तो इसकी सफलता के बाद मुखरामजी ने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। 1955 में अपनी कहानी के लिए पहला 'फ़िल्म फेयर पुरस्कार' लेने के बाद उन्होंने निम्नलिखित सफल फ़िल्में लिखीं- मुखराम शर्मा द्वारा लिखित प्रमुख फ़िल्में

1. वचन
 2. एक ही रास्ता
3. दुश्मन 
4. साधना
5. संतान 
6. बहनें
7. तलाक़ 
8. धूल का फूल
9. समाधि
10. हमजोली
11. वचन 
12. स्वप्न सुहाने
13. पतंगा 
14. दादी माँ
15.जीने की राह
16. मैं सुन्दर हूँ
17. राजा और रंक 
18. दो कलियाँ
19. घराना
 20. गृहस्थी
21. प्यार किया तो डरना क्या 
22. हमजोली
23. नौकर 
24. सौ दिन सास के

मुखराम शर्मा जी ने वर्ष 1958 में एक निर्माता के तौर पर 'तलाक़' और 'संतान' सहित आधा दर्जन फ़िल्में बनाई थीं। सामाजिक समस्याओं पर प्रकाश डालने और अपनी कहानियों के द्वारा उनका हल ढूँढने में उनकी रुचि ने उनके लेखन के पीछे की असली ताकत के रूप में काम किया। उनकी लगभग सभी फ़िल्में अपनी सामाजिक टिप्पणी और सुधार की दिशा में दिए गए सुझावों के कारण पसंद की जाती थीं। फ़िल्म 'एक ही रास्ता' विधवाओं की समस्याओं पर आधारित थी।'वचन' एक अविवाहित बेटी की कहानी थी, जो अपने परिवार का
लालन-पालन करती है। फ़िल्म 'स्वप्न सुहाने' भाइयों और उनके पारस्परिक संबंधों की कहानी थी, जबकि 'पतंगा' में मालिक और नौकर के बीच के संवेदनशील रिश्ते को प्रमुखता के साथ प्रस्तुत किया गया था।

मुखरामजी की सबसे मशहूर फ़िल्मों में से एक 'साधना' गहरी अंतर्दृष्टि के साथ एक वेश्या के जीवन पर प्रकाश डालती है। यह वकालत करती है कि वेश्यावृत्ति एक ऐसी सामाजिक प्रथा है, जहाँ पुरुष भी समान रूप से ज़िम्मेदार है और कोई भी वेश्या सबसे पहले एक स्त्री
है फिर कुछ और। अपनी इस फ़िल्म के माध्यम से मुखरामजी जी ने समाज के समक्ष यह बात रखी कि एक वेश्या को समाज द्वारा स्वीकार किया जाना चाहिए। उन्होंने फ़िल्म के माध्यम से दर्शकों को विश्वास दिलाया कि यह न सिर्फ़ संभव है बल्कि सही भी है। बॉक्स-ऑफिस पर 'साधना' फ़िल्म की सफलता ने यह
साबित कर दिखाया कि मुखरामजी समय के साथ थे और उन्हें अपने दर्शकों की नब्ज़ की पूरी तरह समझ थी।

फ़िल्म 'साधना' के निर्माण के बारे में एक दिलचस्प किस्सा भी है। इस फ़िल्म की कहानी को पूरा करने के बाद मुखरामजी बिमल रॉय के पास गये और उनसे
इसका निर्देशन करने के लिए आग्रह किया। बिमल रॉय ने 'मोहन स्टूडियो' में मिलने का सुझाव दिया और कार यात्रा के दौरान मुखरामजी से 'साधना' की कहानी सुनाने को कहा। कहानी सुनते ही बिमल रॉय इसके बोल्ड विषय से प्रभावित होकर तुरंत इसे बनाने पर सहमत हो गये। लेकिन वे एक उलझन में थे कि इस कहानी को दर्शकों द्वारा स्वीकार किया जाएगा या नहीं। उन्होंने फ़िल्म का अंत बदलने के लिए एक सुझाव दिया। उनका दावा था कि 'रजिनी' (उर्फ़ चम्पाबाई, अभिनेत्री वैजयंती माला द्वारा निभाया गया चरित्र) चूँकि एक बदनाम औरत है, लोग उसे बहू के रूप में स्वीकार नहीं करेंगे। इसलिए कहानी को उसकी मौत के साथ समाप्त करना बेहतर होगा। मुखरामजी ने बिमल दा को सुना और ड्राइवर से गाड़ी रोकने को कहा। वे कार से बाहर आ गये, बिमल दा को लगा कि मुखरामजी शंका निवारण अथवा किसी और आवश्यक कार्य हेतु उतरे हैं, परन्तु उनके आश्चर्य का ठिकाना ना रहा, जब मुखरामजी वहाँ से चल दिए। उन्होंने एक टैक्सी ली और सीधे बी. आर. चोपड़ा के पास पहुँचे,जो कहानी को जस का तस फ़िल्माने के लिए राज़ी थे। पण्डित मुखराम शर्मा और बी. आर. चोपड़ा ने लम्बे अरसे तक एक साथ काम किया। बी. आर.चोपड़ा उनके अंतिम दिनों तक गहरे दोस्त भी बने रहे। चोपड़ा ने हमेशा अपनी फ़िल्मों में मुखरामजी के योगदान को भरपूर सराहा तथा उन्हें हमारी सफलता का लेखक (ऑथर ऑफ़ ऑवर सक्सेस) कह कर उनका सम्मान किया।

पण्डित मुखराम शर्मा ने आने वाले वर्षों में एक शानदार सितारे का दर्ज़ा हासिल किया और उनका महत्व इस बात से पता चलता है कि वे अपनी लिखी फ़िल्म में कहानी, पटकथा और संवाद के लिए अलग-अलग क्रेडिट्स लिया करते थे। बाद में वे नायडू की फ़िल्म 'देवता' लिखने के लिए दक्षिण भारत की ओर चले गए। फिर एक के बाद एक एल. वी. प्रसाद की 'दादी माँ','जीने की राह', 'मैं सुंदर हूँ', 'राजा और रंक'; एवीएम स्टूडियो की 'दो कलियाँ'; जैमिनी फ़िल्म्स की 'घराना,'गृहस्थी' तथा अन्य निर्माताओं के लिए 'प्यार किया तो डरना क्या' और 'हमजोली' जैसी अनेकों फ़िल्में लिखते चले गये। ये सभी फ़िल्में उस समय की बड़ी हिट्स थीं। प्रसिद्धि और सौभाग्य की वर्षा से बिना डिगे पण्डित मुखराम शर्मा ने 70 वर्ष की उम्र में एक लम्बी फ़िल्मी पारी खेलने के बाद लेखन कार्य से सेवानिवृत्त होने का फैसला कर लिया। वर्ष 1980 में फ़िल्म 'नौकर' और 'सौ दिन सास के' प्रदर्शित होने के बाद वे मेरठ वापस लौट आए।

पंडित मुखराम शर्मा ने अपने बेहतरीन काम के लिए कई पुरस्कार भी जीते। वर्ष 1950 से 1970 तक उनके उल्लेखनीय पुरस्कारों में तीन 'फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार'
भी थे, जो उन्हें फ़िल्म 'औलाद', 'वचन' और 'साधना' के लिए मिले थे। वर्ष 1961 में उन्हें प्रतिष्ठित 'संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार 'भी मिला, जिसे उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद से ग्रहण किया था। मुखरामजी 'मेरठ रत्न पुरस्कार' से भी नवाज़े गये, जो उन्हें मेरठ को दिए गये अपने उत्कृष्ट योगदान के लिए प्रदान किया गया था। फ़िल्मों में उनके योगदान के लिए उन्हें "इम्पा और
'टीवी कलाकार एसोसिएशन' से भी सम्मान हासिल हुए। फ़रवरी 2000 में उनके निधन से थोड़ा पहले उन्हें 'ज़ी
लाइफ़टाइम अचीवमेंट पुरस्कार' से भी सम्मानित किया गया था। 

पण्डित मुखराम शर्मा हमेशा ज़मीन से जुड़े व्यक्ति रहे। वे कड़ी मेहनत की सराहना करते थे और समय के महत्व को भली-भाँति समझते थे। उन्हें नयी कारों का शौक़ था और उन दिनों में उन्होंने एम्बैसैडर कार का नवीनतम मॉडल भी अपने लिए ख़रीदा था, किंतु सफ़लता ने इस साधारण आदमी को नहीं बदला। हालाँकि वे मुंबई फ़िल्म सर्किट की बड़ी से बड़ी हस्ती के साथ उठते-बैठते थे, लेकिन उन्होंने इसकी ख़ुमारी को कभी अपने पर हावी नहीं होने दिया। उनकी दुनिया उनके कमरे तक ही सीमित थी, जो उनका ऑफ़िस भी था। वे अपनी प्रेरणा ढूँढने के लिए होटल या शहर के बाहर जाना पसंद नहीं करते थे। अपने कमरे में अपने दीर्घकालिक सहयोगी विष्णु मेहरोत्रा के साथ बैठ कर, मुखरामजी रोज़ सवेरे नियमित तौर पर लेखन करते थे। दोपहर के भोजन बाद वे निर्माताओं से मिलना पसंद करते थे। सफलता ने उन्हें और अधिक विनम्र बनाने और अपनी जड़ों से बांधे रखने में ही सहयोग दिया। 5000 रुपये की वह धनराशि, जो उन्होंने 'साधना' फ़िल्म के लिए 'फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार' द्वारा प्राप्त की थी, पूथी की कन्या पाठशाला को दान कर दिये थे।

अपनी बढ़ती हुई उम्र में भी मुखरामजी ने लिखने का सिलसिला जारी रखा और कई कहानियाँ तथा आधा दर्जन से भी अधिक उपन्यास प्रकाशित करवाये। अपने बाद के वर्षों में मुखरामजी, जिनका नाम दर्शक फ़िल्म के पोस्टर्स पर देखने के मुरीद थे, प्रसिद्धि और पैसे की तरफ़ मुड़ने में ज़रा भी दिलचस्पी नहीं रखता था। उन्होंने अपने प्रियजनों के बीच अपने शहर में 25 अप्रैल , 2000 को मेरठ में अपनी अंतिम साँस ली। यद्यपि उनके बेटे रामशरण ने 'स्वप्न सुहाने', 'देवर भाभी', 'बहनें' और 'पतंगा' जैसी फ़िल्मों के निर्माण के ज़रिये अपने पिता के पदचिह्नों पर चलने का प्रयास किया, पर मुखरामजी अपने बच्चों को फ़िल्म उद्योग में लाने के लिए उत्सुक नहीं थे। इसका मुख्य कारण था-उनका अपना प्रारंभिक वर्षों का कठिनतम संघर्ष।

आशा भोसले

आशा भोसले 🎂08 सितंबर 1933 ⚰️12 अप्रैल 2026 जन्म की तारीख और समय: 8 सितंबर 1933, सांगली मृत्यु की जगह और तारीख: 12 अप्रैल 2026 ब...