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सोमवार, 10 अप्रैल 2023

अभिनेत्री रोहिणी हट्टनगड़ी

प्रसिद्ध अभिनेत्री रोहिणी हट्टनगड़ी के जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनाएं
रोहिणी हट्टंगड़ी एक भारतीय फिल्‍म अभिनेत्री हैं। जिनका जन्‍म 11 अप्रैल 1955 को महाराष्‍ट्र के पुणे में हुआ था। उनके पिताजी का नाम अनन्‍त ऑक था। 

रोहिणी ने अपनी स्‍कूली शिक्षा रेणुका स्‍वरूप मेमोरियल गर्ल्‍स हाई स्‍कूल पुणे से पूरी की। इसके बाद उन्‍होंने नेशनल स्‍कूल ऑफ ड्रॉमा नई दिल्‍ली में एडमिशन लिया। इसके साथ ही रोहिणी ने भारतीय क्‍लासिकल डांस कथकली और भरतनाट्यम भी सीखा।
 
रोहिणी एनएसडी के ही अपने बैचमेट जयदेव हट्टंगड़ी से शादी की थी, जिनका 2008 में कैंसर से निधन हो गया था। दोनों का एक बेटा असीम हट्टंगड़ी है जो बॉलीवुड में सक्रिय है। 

रोहिणी ने अपने करियर की शुरुआत मराठी स्टेज शो से की थी। कैरियर के शुरुआती दिनों में जयदेव और रोहिणी ने बॉम्बे में एक मराठी थिएटर ग्रुप (आशीर्वाद) शुरू किया। जिसने 150 से अधिक नाटकों का निर्माण किया था। इसके बाद उन्‍होंने कई टीवी सीरियलों में भी काम किया। 
 
रोहिणी हट्टंगड़ी ने 1978 में सईद अख्तर मिर्ज़ा की फिल्‍म 'अरविंद देसाई की अजिब दास्तान' के साथ फिल्मी करियर की शुरुआत की। फिल्म ने सर्वश्रेष्ठ फिल्म का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीता। और इसके बाद उन्‍होंने अल्बर्ट पिंटो को गुसा क्यूं आता है (1980) और चक्र (1981) में भी मुख्य भूमिकाओं में अभिनय किया।
 
उनका अगला बड़ा ब्रेक एक अंतरराष्ट्रीय फिल्म गांधी (1982) था, जिससे उन्हें अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली, और 1982 में इस फिल्‍म में सहायक भूमिका के लिये उन्‍हें BAFTA अवार्ड मिला इस अवार्ड को पाने वाली वह इकलौती भारतीय अभिनेत्री हैं। 
 
उन्होंने दो 'फिल्मफेयर पुरस्कार' और एक 'राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार' जीता है। वह मुख्‍यत: फिल्म गांधी (1982) में कस्तूरबा गांधी के अभिनय के कारण जानी जाती हैं। उन्हें महेश भट्ट की दो फिल्मों, अर्थ (1982) और सारांश (1984) में उनकी भूमिकाओं के लिए भी जाना जाता है।
 
अपने करियर के इन वर्षों में, उन्होंने  70 से भी अधिक फिल्मों में काम किया है, और प्रत्येक में उन्होंने अपने पात्रों को उतने ही प्रभावशाली ढंग से चित्रित किया है जितना वह अपने थिएटर प्रदर्शन में करती हैं।

कुंदन लाल सहगल

महान पार्श्व गायक ,अभिनेता कुंदन लाल सहगल के जन्मदिन पर हार्दिक श्रधांजलि

कुन्दन लाल सहगल अथवा के. एल. सहगल हिन्दी फ़िल्मों में वैसे तो एक बेमिसाल गायक के रूप में विख्यात हैं लेकिन देवदास (1936) जैसी चंद फ़िल्मों में अभिनय के कारण उनके प्रशंसक उन्हें एक उम्दा अभिनेता भी करार देते हैं। कुन्दन लाल सहगल हिंदी सिनेमा के पहले सुपरस्टार कहे जा सकते हैं। 1930 और 40 के दशक की संगीतमयी फ़िल्मों की ओर दर्शक उनके भावप्रवण अभिनय और दिलकश गायकी के कारण खिंचे चले आते थे।

कुंदन लाल सहगल अपने चहेतों के बीच के.एल सहगल के नाम से मशहूर थे। *उनका जन्म 11 अप्रैल 1904 को जम्मू के नवाशहर में हुआ था।* उनके पिता अमरचंद सहगल जम्मू शहर में न्यायालय के तहसीलदार थे। बचपन से ही सहगल का रुझान गीत-संगीत की ओर था। उनकी मां केसरीबाई कौर धार्मिक क्रिया-कलापों के साथ-साथ संगीत में भी काफ़ी रुचि रखती थीं। 

सहगल ने किसी उस्ताद से संगीत की शिक्षा नहीं ली थी, लेकिन सबसे पहले उन्होंने संगीत के गुर एक सूफ़ी संत सलमान युसूफ से सीखे थे। सहगल की प्रारंभिक शिक्षा बहुत ही साधारण तरीके से हुई थी। उन्हें अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ देनी पड़ी थी और जीवन यापन के लिए उन्होंने रेलवे में टाईमकीपर की मामूली नौकरी भी की थी। बाद में उन्होंने रेमिंगटन नामक टाइपराइटिंग मशीन की कंपनी में सेल्समैन की नौकरी भी की कहते हैं कि वे एक बार उस्ताद फैयाज ख़ाँ के पास तालीम हासिल करने की गरज से गए, तो उस्ताद ने उनसे कुछ गाने के लिए कहा। उन्होंने राग दरबारी में खयाल गाया, जिसे सुनकर उस्ताद ने गद्गद् भाव से कहा कि बेटे मेरे पास ऐसा कुछ भी नहीं है कि जिसे सीखकर तुम और बड़े गायक बन सको। 

वर्ष 1930 में कोलकाता के न्यू थियेटर के बी.एन. सरकार ने उन्हें 200 रूपए मासिक पर अपने यहां काम करने का मौक़ा दिया। यहां उनकी मुलाकात संगीतकार आर.सी.बोराल से हुई, जो सहगल की प्रतिभा से काफ़ी
प्रभावित हुए। शुरुआती दौर में बतौर अभिनेता वर्ष 1932 में प्रदर्शित एक उर्दू फ़िल्म ‘मोहब्बत के आंसू’ में उन्हें काम करने का मौक़ा मिला। वर्ष 1932 में
ही बतौर कलाकार उनकी दो और फ़िल्में ‘सुबह का सितारा’ और ‘जिंदा लाश’ भी प्रदर्शित हुई, लेकिन इन फ़िल्मों से उन्हें कोई ख़ास पहचान नहीं मिली

वर्ष 1933 में प्रदर्शित फ़िल्म ‘पुराण भगत’ की कामयाबी के बाद बतौर गायक सहगल कुछ हद तक फ़िल्म उद्योग में अपनी पहचान बनाने में सफल हो गए। वर्ष 1933 में ही प्रदर्शित फ़िल्म ‘यहूदी की लड़की’, ‘चंडीदास’ और ‘रूपलेखा’ जैसी फ़िल्मों की कामयाबी से उन्होंने दर्शकों का ध्यान अपनी गायकी और अदाकारी की ओर आकर्षित किया।

वर्ष 1935 में शरत चंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास पर आधारित पी.सी.बरूआ निर्देशित फ़िल्म ‘देवदास’ की कामयाबी के बाद बतौर गायक-अभिनेता सहगल शोहरत की बुलंदियों पर जा पहुंचे। कई बंगाली फ़िल्मों के साथ-साथ न्यू थियेटर के लिए उन्होंने 1937 में ‘प्रेंसिडेंट’, 1938 में ‘साथी’ और ‘स्ट्रीट सिंगर’ तथा वर्ष 1940 में ‘ज़िंदगी’ जैसी कामयाब फ़िल्मों को अपनी गायिकी और अदाकारी से सजाया। वर्ष 1941 में सहगल मुंबई
के रणजीत स्टूडियो से जुड़ गए। वर्ष 1942 में प्रदर्शित उनकी ‘सूरदास’ और 1943 में‘तानसेन’ ने बॉक्स ऑफिस पर सफलता का नया इतिहास रचा। वर्ष 1944 में उन्होंने न्यू थियेटर की ही निर्मित फ़िल्म ‘मेरी बहन’ में भी काम किया

अपने दो दशक के सिने करियर में सहगल ने 36 फ़िल्मों में अभिनय भी किया। हिंदी फ़िल्मों के अलावा उन्होंने उर्दू , बंगाली और तमिल फ़िल्मों में भी अभिनय किया। सहगल ने अपने संपूर्ण सिने करियर के दौरान लगभग 185 गीत गाए, जिनमें 142 फ़िल्मी और 43 गैर-फ़िल्मी गीत शामिल हैं। अपनी दिलकश आवाज़ से सिने प्रेमियों के दिल पर राज करने वाले के.एल.सहगल 18 जनवरी , 1947 को केवल 43 वर्ष की उम्र में इस संसार को अलविदा कह गए।

सहगल की आवाज़ की लोकप्रियता का यह आलम था कि कभी भारत में सर्वाधिक लोकप्रिय रहा रेडियो सीलोन कई साल तक हर सुबह सात बज कर 57 मिनट पर इस गायक का गीत बजाता था। सहगल की आवाज़ लोगों की दैनिक दिनचर्या का हिस्सा बन गई थी। सहगल रवीन्द्र संगीत गाने का सम्मान पाने वाले पहले गैर बांग्ला गायक और भारतीय सिनेमा के पहले सुपर स्टार थे। यह वह समय था जब भारतीय फ़िल्म उद्योग मुंबई में नहीं बल्कि कलकत्ता में केंद्रित था। उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उस जमाने में उनकी शैली में गाना अपने आपमें सफलता की कुंजी मानी
जाती थी। मुकेश और किशोर कुमार ने अपने कैरियर के आरंभ में सहगल की शैली में गायन किया भी था। कुंदन के बारे में कहा जाता है कि पीढ़ी दर पीढी इस्तेमाल करने के बाद भी उसकी आभा कम नहीं पडती। सहगल सचमुच संगीत के कुंदन थे। सहगल की आवाज़ पाकिस्तानी शायर अफ़ज़ाल अहमद सैयद से शब्द उधार लें, तो कह सकते हैं, जैसे काग़ज़ मराकशियों ने ईजाद किया था, हुरूफ़ फिनिशियों ने, सुर गंधर्वों ने, उसी तरह सिनेमा का संगीत सहगल ने ईजाद किया। दुनिया में
कई रहस्य हैं चुनौती देते। चुनौती सहगल भी दे गए हैं। फ़क़ीरों-सा बैराग, साधुओं-सी उदारता, मौनियों-सी आवाज़, हज़ार भाषाओं का इल्म रखने वाली आंखें, रात के पिछले पहर गूंजने वाली सिसकी जैसी ख़ामोशी, और पुराने वक़्तों के रिकॉर्ड की तरह पूरे माहौल में हाहाकार मचाती एक सरसराहट बता दो एक बार, ये सब क्या है? वह कौन- सी गंगोत्री है, जहां से निकल कर आती है सहगल की आवाज़? पता कर लो, कहां से आता है सहगल का दर्द, जो सीने में हूक, आंखों में नमी और कंठ में कांटे दे जाता है? क्यों एक रुलाहट आंखों पर दस्तक
देती है और बिना कुछ कहे तकती हुई-सी लौट जाती है? यह सुबह या दुपहरी की नहीं, सांझ के झुटपुटे की आवाज़ है, जिसका असर रात के साथ गहरा होता जाता है। अगर आप दिल से कमज़ोर हैं, आधी रात को सहगल मत सुनिए। उन्हें सुनना भाषा में तमीज़ को जीना है। आंख में आंसू का सम्मान करना है। दुख जो दिल के क़गार पर रहता है, उसे बीचो-बीच लाकर महल में
जगह देनी है। दुख को जियो, तो जीने का शऊर आ जाता है। 

सहगल की उदारता के कई कि़स्से मिलते हैं। कहते हैं कि न्यू थिएटर्स के ऑफिस से उनकी सैलरी सीधे उनके घर पहुंचाई जाती थी, क्योंकि अगर उनके हाथ में पैसे होते, तो आधा वह शराब में उड़ा देते, बाक़ी ज़रूरतमंदों में बांट
देते। एक बार उन्होंने पुणे में एक विधवा को हीरे की अंगूठी दे दी थी। सहगल बिना शराब पिए नहीं गाते थे।
'शाहजहां' के दौरान नौशाद ने उनसे बिना शराब पिए गवाया, और उसके बाद सहगल की जि़द पर वही गाना शराब पिलाकर गवाया। बिना पिए वह ज़्यादा अच्छा गा रहे थे। उन्होंने नौशाद से कहा, 'आप मेरी ज़िंदगी में पहले क्यों नहीं आए? अब तो बहुत देर हो गई।
सहगल को खाना बनाने का बहुत शौक़ था। मुग़लई मीट डिश वह बहुत चाव से बनाते थे और स्टूडियो में ले जाकर साथियों को भी खिलाते थे। यही नहीं, आवाज़ की चिंता किए बग़ैर वह अचार, पकोड़ा और तैलीय चीज़ें भी ख़ूब खाते थे। सिगरेट के भी ज़बर्दस्त शौक़ीन थे।
सहगल ने ग़ालिब की क़रीब बीस ग़ज़लों को अपनी आवाज़ का सोज़ दिया। ग़ालिब से इसी मुहब्बत के कारण उन्होंने एक बार उनके मज़ार की मरम्मत करवाई थी। सहगल पहले गायक थे, जिन्होंने गानों पर रॉयल्टी शुरू की। उस वक़्त प्रचार और प्रसार की दिक़क़्तों के बावजूद श्रीलंका, ईरान , इराक़, इंडोनेशिया अफ़ग़ानिस्तान और फिजी में सुने जाते थे। आज भी 18 जनवरी को कई देशों में सहगल की याद में संगीत जलसे होते हैं। वह विग लगाकर एक्टिंग करते थे। अभिनेत्री कानन देवी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है, 'साथी की शूटिंग के दौरान हवा के झोंके से उनकी विग उड़ गई और उनका गंजा सिर दिखने लगा। लेकिन सहगल अपनी धुन में मगन शॉट देते रहे। इस पर दर्शक हंस पड़े।
सहगल झेंपने की जगह लोगों के ठहाकों में शामिल हो गए।सहगल की क़द्र भारत से ज़्यादा पाकिस्तान में नज़र आती है। वहाँ ज़िला स्तर पर सहगल यादगार कमेटियां बनी हैं। सहगल की बरसी पर आम प्रशंसा बाक़ायदा लंगर लगाते हैं। भारत रत्न सम्मानित लता मंगेशकर सहगल की बड़ी भक्त हैं। वह चाहती थीं कि सहगल की कोई निशानी उनके पास हो। वह उनकी स्केल चेंजर हारमोनियम अपने पास रखना चाहती थीं, पर सहगल की बेटी ने उसे अपने पास रखते हुए सहगल की रतन जड़ी अंगूठी लता को दी। लता के पास आज भी वह निशानी है। कहते हैं कि कमउम्र में लता ने सहगल की एक फ़िल्म देखने के बाद उनसे शादी करने का ख्याल ज़ाहिर किया था।

हास्य अभिनेता गोप

प्रसिद्ध हास्य अभिनेता गोप के जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धांजलि
इतने मशहूर थे कि किसी मोटे आदमी को देखकर लोग कहते थे -‘‘वो देखो गोप!’’ यानी गोप और मोटापा एक दूसरे के पर्याय थे। उनका जन्म 11 अप्रैल 1914 को हैदराबाद सिंध (अब पाकिस्तान) के एक सिंधी परिवार में हुआ था। वो नौ भाई-बहन में से एक थे। उनका पूरा नाम था गोप कमलानी। गोप ने ही साबित किया था कि खूबसूरत-दिलकश चेहरे व जिस्म भले ही आकर्षण का केंद्र होते हैं, मगर दिलो-दिमाग पर छा जाने की कूवत सिर्फ़ मोटे-थुलथुले जिस्म और बड़े गोल चेहरे में ही होती है। इनके चेहरे पर टपकता भोलापन कुदरत की नायाब देन है जिससे इंकार करना मुश्किल है। दूसरा सच ये है कि ऐसे लोग पैदाईशी नेचुरल आर्टिस्ट होते है। गोप को अपनी इस खूबी का पूरा अहसास था। इसीलिये वे कभी अहसासे-कमतरी का शिकार नहीं हुए। बल्कि आईने में अपनी शक्लो-सूरत देखकर खुद पर हंसते ही नहीं फ़िदा भी रहते। उन्हें दूसरों पर गुस्सा नहीं आता था। आता भी था तो भी लोग हंसते थे-क्या कमाल की कॉमेडी कर रहा है गोप भाई!

गोप की इस खूबी पर उस दौर के मशहूर डायरेक्टर के.एस.दरियानी फ़िदा हो गये। उन्होंने पाया कि गोप में कामयाबी की कुंजी सेंस ऑफ ह्यूमर और टाईमिंग ज़बरदस्त है। उन्होंने गोप को समझाया कि चूंकि कुदरत ने जहां एक तरफ उन्हें मोटा जिस्म देकर नाइंसाफी की है तो दूसरी ओर इसकी भरपाई भी कर दी है। आप चाहें तो इसकी वजह से चार पैसे कमा सकते हैं जो आपके परिवार की गुरबत को खत्म करने में मदद करेंगे। बंबई में सिनेमा का परदा आपका इंतज़ार कर रहा है। गोप की समझ में बात आ गयी। आना-कानी कर रहे पिता को जैसे-तैसे मना लिया।

गोप 1930 में बंबई आ गये। डायरेक्टर दरियानी ने उनकी स्वाभाविक अभिनय प्रतिभा को तराशा। वो साईलेंट सिनेमा से टॉकी फिल्मों की ओर प्रस्थान का दौर था। गोप जितना मोटा आदमी सिनेमा के परदे पर पहली बार नमूंदार हुआ था। उनको और उनके चेहरे का भोलापन देखकर ही लोग हंसते-हंसते इतना लोट-पोट हो जाते थे कि गोप को इंतज़ार करना पड़ता था कि लोग हंसना बंद करें तो वो अपना संवाद कहें। बहरहाल गोप की पहली फिल्म थी इंसान या शैतान जो 1933 में रिलीज़ हुई थी। इसमें हीरोईन थी जद्दन बाई (नरगिस की मां और संजय दत्त की नानी)। स्वाभाविक था कि गोप इसमें हास्य कलाकार थे।

जल्दी ही गोप इतने ज्यादा मशहूर हो गये कि फिल्म के तमाम अहम किरदार उनके किरदार के सामने फीके पड़ने लगे। लीड कलाकार उनसे जलने लगे। फिल्म के क्रेडिट टाईटिल्स में उनको हीरो-हीरोईन के ठीक बाद जगह मिलने लगी। उनका नाम देखते ही तालियां बजने लगती थी। कभी-कभी ये भी गुमान होता था कि दर्शक सिर्फ़ गोप को ही देखने आया है। उनकी कुछ मशहूर फिल्में थीं- पगड़ी, सनम, रंगभूमि, हिंदुस्तान हमारा, लैला मजनूं, मिर्ज़ा साहिब, चोरी चोरी, पतंगा, तराना, शारदा, बादबान, मक्खीचूस, पाकिटमार, नाता, धर्मपत्नी, सगाई, नगीना, सज़ा, आरज़ू, पारस, अनमोल रतन आदि। पचास के दशक में उन्होंने गोप प्रोडक्शन की नींव डाली और कुछ फिल्में प्रोडयूस कीं जिनमें हंगामा और बिरादरी बहुत मशहूर हुई थीं। इन्हें उनके भाई राम कमलानी ने डायरेक्ट किया था। गोप की शादी उस दौर की कामयाब अभिनेत्री लतिका से हुई थी।

गोप के किरदार गोप की शख्सियत को नज़र में रखकर लिखे जाते थे। गोप नहीं तो वो किरदार कोई दूसरा भी नही कर सकता था। उनके किरदारों के नाम सुनकर ही हंसी छूटती थी। जैसे शारदा में उनका नाम था-हुक्मदास। इसी तरह मक्खीचूस में में वो मानिकलाल मक्खीचूस थे, तो पाकेट मार में उधारचंद डब्बू। बारादरी में लट्टू सिंह, सगाई में फुम्मन, तराना में तोतेराम तोते, सज़ा में सेठ मोटूमल और पारस में बांके उर्फ छज्जू। दिलीप कुमार-मधुबाला की तराना में विलेन यों तो जीवन थे परंतु सह-विलेन के रूप में उनका तोतेराम तोते का किरदार भारी पड़ा। पतंगा का मशहूर गाना – मेरे पिया गये रंगून किया है वहां से टेलीफून….उन पर हीरोइन निगार सुल्ताना पर फिल्माया गया था। ये गाना आज भी खूब गुनगुनाया जाता है और इसके ढेरों रीमिक्स भी बने हैं।

दरियादिली में भी जवाब नहीं था उनका। सुना है कि इस कॉमेडी किंग की ट्रेजडी यह थी कि जिसकी भी मदद की, बदले में बुराई ही मिली। बताया जाता है कि उनकी मौत भी एक ट्रैजिक कॉमेडी थी। फिल्म के सेट पर स्क्रिप्ट पढ कर वह बोले थे- ‘ठीक है मैंने थोड़ा पढ़ लिया है बाकी ऊपर जाकर पढ़ लूंगा।’ऊपर जाकर पढ़ने से मुराद सेट की ऊपरी मंज़िल से थी। यह बात उन्होंने इतने भोलेपन से कही कि सभी हंस पड़े थे। सबने यही समझा कि भाई कॉमेडी कर रहे हैं। पर उस वक़्त कोई नहीं जानता था कि उनका कहा कुछ ही देर में एक ख़ौफ़नाक़़ हकीकत में बदलने वाला है। दरअसल उनका यही कहा उनका आखिरी संवाद साबित हो गया। संवाद बोलते-बोलते गोप सचमुच ही ऊपर यानि भगवान के घर चले गये थे।

गोप ने लगभग 60 फिल्में की थीं। महज़ 44 साल की कम उम्र में सन् 1957 में उनकी जिंदगी का सफ़र पूरा हो गया। कामयाबी की बुलंदियों पर काबिज़ किसी कॉमेडियन का इतनी कम उम्र में दुनिया से कूच कर जाना किसी हैरत-अंगेज़ ट्रेजडी से कम नहीं है।

अमिता कमर सुल्ताना

प्रसिद्ध अभिनेत्री अमिता के जन्मदिन पर हार्दिक शुभ कामना
अमिता उनका असली नाम क़मर सुल्ताना है उनका जन्म 11 अप्रैल 1940 में कलकत्ता (कोलकाता) में हुआ था वह एक भारतीय अभिनेत्री हैं।  वह बॉलीवुड फिल्मों जैसे तुमसा नहीं देखा, मेरे महबूब और गूंज उठी शहनाई में दिखाई दीं।

अमिता मधुबाला की जबरदस्त प्रशंसक थी अमिता पर जब  लेखराज भाखरी की नजर पड़ी, तो उन्होंने अपनी फिल्म ठोकर में शम्मी कपूर के साथ उनको साइन किया।  यह उनकी पहली फ़िल्म थी, जिसमें उन्हें जयजयंती के रूप में श्रेय दिया गया था।  हीरोइन के रूप में अमिता की पहली फिल्म ठोकर 1953 में रिलीज़ हुई, श्री चैतन्य महाप्रभु (1954), विजय भट्ट द्वारा निर्देशित थी।  स्क्रीन नाम अमिता उन्हें इसी फिल्म से मिला फिल्म विफल रही, लेकिन अमिता अमर कीर्तन, बादल और बिजली, बागी सरदार और इंद्रसभा जैसी फिल्मों में काम करती रहीं।

1956 में उनके करियर में एक सकारात्मक मोड़ आया जब उन्होंने फ़िल्म शीरीं फरहाद में  अपनी आइडियल मधुबाला के साथ अभिनय किया।  इसके बाद उन्हें शम्मी कपूर और नलिनी जयवंत के साथ अभिमान, ज़माना और हम सब चोर है (1956) में मुख्य भूमिकाओं के लिए चुना गया।

अमिता के करियर में महत्वपूर्ण मोड़ हालांकि तब आया जब वह फिल्मिस्तान स्टूडियो के मालिक तोलाराम जालान की नायिका बन गईं, जिन्होंने शम्मी कपूर के सामने तुमसा नहीं देखा (1957)में उनको साइन किया  एक नए स्टार के रूप में अमिता को बढ़ावा देने के लिए और लाभप्रद तरीके से पेश करने के लिए उसके मेकअप, अलमारी और प्रकाश व्यवस्था के साथ बहुत सावधानी बरती गई।  इसके अलावा, फिल्म का व्यापक प्रचार भी अभिनेत्री पर केंद्रित था।  फिल्म एक बड़ी सफलता थी लेकिन इस फ़िल्म का सारा श्रेय शम्मी कपूर ले गये  अमिता को गूंज उठी शहनाई की महिला प्रधान भूमिका मिली, यह रोल पहले आशा पारेख करने वाली थी जिसके साथ उन्होंने पहले श्री चैतन्य महाप्रभु (1954) में अभिनय किया था।  इस फिल्म ने राजेंद्र कुमार को अभिनेता के तौर पर लिया गया यह फ़िल्म 1959 की शीर्ष कमाई वाली फिल्मों में से एक बन गयी इतने परिपक्व और संवेदनशील प्रदर्शन के बावजूद, अमिता की अनदेखी की गई और राजेंद्र कुमार को फिल्म की सफलता का  श्रेय दिया गया। 
हालाँकि उसने इन हिट्स के साथ शम्मी कपूर और राजेंद्र कुमार बड़े स्टार बन गये लेकिन अमिता को वह  स्टारडम  नहीं मिला

राखी (1962) और ब्लॉकबस्टर फ़िल्म  मेरे महबूब (1963) जैसी मल्टी-स्टार फिल्मों से भी उनके करियर ग्राफ में मदद नहीं मिली, भले ही उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री के रूप में बाद के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया था और बाद में वह ग्रेड-बी फिल्मों में अभिनय करने लगी जो बॉक्स ऑफिस पर सफल भी रही, लेकिन उनकी स्टार की स्थिति के बहुत ज़्यादा सुधार नही हुआ 1965 में हम सब उस्ताद है में किशोर कुमार के साथ उन्होंने अभिनय किया 1965 तक वह रिश्ते नाते (1965), और आसरा (1966) जैसी फिल्मों में नकारात्मक और खलनायक का किरदार निभा चुकी थी  वह राजश्री और बबीता के साथ अराउंड द वर्ल्ड (1967) और हसीना मान जायेगी (1968) जैसी फिल्मों में सहायक अभिनेत्री के रुप मे अभिनय किया  हसीना मान जायेगी (1968)के रिलीज के बाद, निराश होकर  अमिता ने फिल्म उद्योग छोड़ दिया क्योंकि उन्हें प्रमुख भूमिकाएं नहीं मिल रही थीं उन्होंने विवाह कर लिया

फिल्म जगत से सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने शादी की और उनकी एक बेटी, सबिया ( सबीहा) थी।  सबिया ने अनोखा रिश्ता (1986)खिलाड़ी (1992) और 100 डेज  (1991) जैसी फिल्मों में मुख्य अभिनेत्री के रूप में बॉलीवुड में अपना हाथ आजमाया, जो बड़ी हिट रहीं, लेकिन उनका करियर कभी नहीं बढ़ा  वह फ़िल्म क़यामत की रात (1992) में दिखाई दीं, इसके बाद वह हिंदी फ़िल्म के दृश्य से गायब हो गयी

अमिता को फिल्मफेयर अवार्ड के लिए फिल्म मेरे महबूब (1962) के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री के रूप में नामांकित किया गया था लेकिन फ़िल्म गुमराह (1963) के लिए वह अवार्ड  शशिकला को मिल गया   वह 20 नवंबर 2005 को सिने एंड टीवी आर्टिस्ट्स एसोसिएशन द्वारा लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड स्वीकार करने के लिए केवल एक बार बाहर निकली और फिर गायब हो गई।

आशा भोसले

आशा भोसले 🎂08 सितंबर 1933 ⚰️12 अप्रैल 2026 जन्म की तारीख और समय: 8 सितंबर 1933, सांगली मृत्यु की जगह और तारीख: 12 अप्रैल 2026 ब...