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रविवार, 2 अप्रैल 2023

जय प्रदा

फ़िल्म अभिनेत्री जया प्रदा के जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनायें

जयाप्रदा (जन्म 3 अप्रैल 1962) एक भारतीय फ़िल्म अभिनेत्री और राजनीतिज्ञ हैं।

प्रारंभिक जीवन 

जयाप्रदा का जन्म ललिता रानी के रूप में, भारत के आंध्र प्रदेश राज्य में स्थित राजमंड्री के एक मध्यम-वर्गीय परिवार में हुआ था। उनके पिता कृष्णा एक तेलुगू फ़िल्म फाइनेंशियर थे। उनकी मां नीलवाणी ने उन्हें कम उम्र में ही नृत्य और संगीत कक्षाओं में दाख़िल कर दिया था।

कैरियर

जब वे चौदह वर्ष की थीं, तब उन्होंने अपने स्कूल के वार्षिक समारोह में एक नृत्य प्रदर्शन किया। दर्शकों में एक फ़िल्म निर्देशक भी शामिल थे और उन्होंने जयाप्रदा से तेलुगू फ़िल्म 'भूमिकोसम' में तीन मिनट के नृत्य प्रदर्शन की पेशकश की। जयाप्रदा हिचकिचाईं, लेकिन उनके परिवार ने उन्हें प्रस्ताव स्वीकार करने के लिए प्रोत्साहित किया। उन्हें फ़िल्म में अपने काम के लिए केवल 10 रुपए दिए गए, पर उन्हें और भी बड़े मौक़े मिले, जब फ़िल्म के उन तीन मिनटों के अंश को तेलुगू फ़िल्म उद्योग की प्रमुख हस्तियों को दिखाया गया और उनके सामने प्रस्तावों की बाढ़ आ गई। बड़े फ़िल्म निर्माताओं ने उनके सामने अपनी विशेष दर्जे की फ़िल्मों में भूमिकाओं की पेशकश की और उन्होंने स्वीकार कर लिया। सन् 1976 में हिट की तिकड़ी के साथ, एक बड़ी स्टार बन गईं: के. बालचंदर की अंतुलेनी कथा, जिसमें उनके नाटकीय कौशल को समेटा गया; के. विश्वनाथ की सिरी सिरी मुव्वा, जिसमें उन्होंने शानदार नृत्य कौशल वाली एक मूक लड़की की भूमिका निभाई और सीता की शीर्षक भूमिका में बड़े बजट वाली पौराणिक फ़िल्म सीता कल्याणम्, जिसने उनकी बहुमुखी प्रतिभा की पुष्टि की। सन् 1977 में उन्होंने अडवी रामुडु में अभिनय किया, जिसने बॉक्स ऑफ़िस के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए और स्थाई रूप से उन्हें एक स्टार का दर्जा दिया। जयाप्रदा तथा सह-अभिनेता एन.टी. रामराव पर फ़िल्माया गया गीत "आरेसुकोबोई पारेसुकुन्नानु" जनता के बीच ज़बरदस्त हिट साबित हुआ। उन्होंने तेलुगू फ़िल्मों से बाहर निकल कर, तमिल, मलयालम और कन्नड़ फ़िल्मों में भी अभिनय किया और उनकी इन सब भाषाओं में फ़िल्में सफल रहीं।

बॉलीवुड कैरियर

के. विश्वनाथ ने फ़िल्म सिरी सिरी मुव्वा (1976) का पुनर्निर्माण हिंदी में सरगम शीर्षक से किया और सन् 1979 में जयाप्रदा को बॉलीवुड से परिचित कराया. फ़िल्म ज़बरदस्त हिट हुई और वे रातों रात वहां भी स्टार बन गईं। उन्होंने बतौर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पहला फ़िल्मफ़ेयर नामांकन अर्जित किया, लेकिन अपनी सफलता को भुना नहीं सकीं, क्योंकि वे हिंदी नहीं बोल सकती थीं।इसके तीन साल बाद निर्देशक के। विश्वनाथ ने हिट फ़िल्म 'कामचोर' (1982) के ज़रिए हिंदी फ़िल्मों में दुबारा प्रवेश कराया, जहां पहली बार वे धाराप्रवाह हिन्दी बोलती नज़र आईं.[3] अब वे लगातार हिन्दी फ़िल्मों में काम करने में सक्षम बनीं और प्रकाश मेहरा की फ़िल्म शराबी (1984) में अमिताभ बच्चन की प्रेमिका के रूप में और के। विश्वनाथ की 'संजोग' (1985 की फ़िल्म) में अपनी चुनौतीपूर्ण दोहरी भूमिका के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के रूप में दो और फ़िल्मफ़ेयर नामांकन अर्जित किए।

अपने बॉलीवुड फ़िल्म कैरियर के साथ, उन्होंने दक्षिण में के. विश्वनाथ की तेलुगू हिट फ़िल्म 'सागर संगमम' (1983) जैसी सराहनीय फ़िल्मों में काम करना जारी रखा। उनके प्रशंसकों में न केवल आम जनता शामिल थीं, बल्कि महान भारतीय निर्देशक सत्यजीत रे भी, जिन्होंने कहा कि वे विश्व की सबसे सुंदर महिलाओं में से एक हैं। हालांकि, उन्होंने बंगाली फ़िल्मों में भी अभिनय किया है, लेकिन कभी रे के लिए काम नहीं किया। (उन्होंने दावा किया कि रे के मन में उनके साथ एक फ़िल्म बनाने का विचार था, लेकिन उनकी बीमारी और मृत्यु के बाद यह सहयोग संभव नहीं हो पाया।)

जयाप्रदा ने न केवल अमिताभ बच्चन और जितेंद्र के साथ सफल जोड़ी बनाई, बल्कि तत्कालीन परदे पर उनकी प्रतिद्वंद्वी श्रीदेवी के साथ भी, जिनके साथ उन्होंने लगभग एक दर्जन फ़िल्मों में अभिनय किया है। उनकी तेलुगू फ़िल्म 'देवता' (फ़िल्म) (1982) का, जिसमें उन्होंने दो बहनों की भूमिकाएं निभाईं, जो एक दूसरे के लिए बड़ा बलिदान करती हैं, हिट हिंदी फ़िल्म 'तोहफ़ा' (1984) के रूप में पुनर्निर्माण किया गया। इन फ़िल्मों ने जयाप्रदा को परंपरागत रूढ़िवादी वर्ग के सिनेमाप्रेमियों का चहेता बना दिया। यह एक ऐसी छवि थी, जो उस समय अच्छी तरह से काम आई, जब उन्होंने एक राजनीतिज्ञ के रूप में अपना नया कॅरिअर शुरू किया।

2002 में, उन्होंने फ़िल्म 'आधार' में एक अतिथि भूमिका के ज़रिए मराठी फ़िल्म उद्योग में क़दम रखा। अब तक, उन्होंने सात भाषाओं में काम किया है और अपने 30-वर्षीय फ़िल्म करिअर के दौरान 300 फिल्मों को पूरा किया है। 2004 में उन्होंने परिपक्व भूमिकाएं निभानी शुरू की।

वे चेन्नई में जयाप्रदा थियेटर की मालकिन भी हैं

फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार एवं नामांकन 

लाइफ़टाइम एचीवमेंट अवार्ड (दक्षिण)(2007)
सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री - सरगम (1979)
सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री - शराबी (1984)
सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री - संजोग (1985 की फ़िल्म) (1985)

अन्य पुरस्कार 

अंतुलेनी कथा के लिए नंदी सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार
कला सरस्वती पुरस्कार
किन्नेर सावित्री पुरस्कार
राजीव गांधी पुरस्कार
नरगिस दत्त स्वर्ण पदक
शकुंतला कला रत्नम् पुरस्कार
उत्तम कुमार पुरस्कार
उत्तम लेखक (2005) के लिए कलाकार पुरस्कार
ANR उपलब्धि पुरस्कार (2008)

किशोरी अमोनकर

प्रसिद्ध शास्त्रीय गायिका किशोरी अमोनकर की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि

किशोरी अमोनकर  हिंदुस्‍तानी शास्‍त्रीय परंपरा की प्रमुख गायिकाओं में से एक और जयपुर घराने की अग्रणी गायिका थीं। हिंदुस्तानी संगीत में गायिकाएँ तो एक से एक हुई लेकिन राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जो ख्याति किशोरी अमोनकर को मिली, वह किसी और को नसीब नहीं हुई। कोकिलकंठी किशोरी अमोनकर की सुरीली आवाज़ से देश विदेश के लाखों संगीत रसिक मंत्रमुग्ध हैं। ख़्याल, मीरा के भजन, मांड, राग भैरवी की बंदिश 'बाबुल मोरा नैहर छूटल जाए' पर उनका गायन तो जैसे संगीत रसिकों के दिल में नक्श सा हो गया है। इस समय किशोरी की गायकी के चहेते सारे देश में बड़ी संख्या में हैं। गायन के अलावा वे एक श्रेष्ठ गुरु भी हैं। उनके शिष्यों में मानिक भिड़े, अश्विनी देशपांडे भिड़े, आरती अंकलेकर जैसी जानी मानी गायिकाएं भी हैं।

परिचय_और_संगीत_शिक्षा

प्रसिद्ध गायिका मोघूबाई कुर्दीकर (जिन्‍होंने जयपुर घराने के वरिष्‍ठ गायन सम्राट उस्‍ताद अल्‍लादिया ख़ाँ साहब से शिक्षा प्राप्‍त की) की बेटी किशोरी अमोनकर संगीत से ओतप्रोत वातावरण में पली-बढ़ीं।

सुप्रसिद्ध गायिका मोगूबाई कुर्डीकर की पुत्री और गंडा-बंध शिष्या किशोरी अमोनकर ने एक ओर अपनी माँ से विरासत में और तालीम से पायी घराने की विशुद्ध शास्त्रीय परम्परा को अक्षुण्ण रखा है, दूसरी ओर अपनी मौलिका सृजनशीलता का परिचय देकर घराने की गायिकी को और भी संपुष्ट किया है। माँ मोगूबाई कुर्डीकर, उनकी गुरु बहन केसरीबाई केरकर तथा उनके दिग्गज उस्ताद उल्लादिया खाँ की तालीम को आगे बढ़ाते किशोरी ने आगरा घराने के उस्ताद अनवर हुसैन खाँ से लगभग तीन महीने तक 'बहादुरी तोड़ी' की बंदिश सीखी। प. बालकृष्ण बुआ, पर्वतकार, मोहन रावजी पालेकर, शरतचंद्र आरोलकर से भी प्रारम्भिक मार्गदर्शन प्राप्त किया। फिर अंजनीबाई मालफेकर जैसी प्रवीण गायिका से मींड के सौंदर्य-सम्मोहन का गुर सीखा। उनकी ममतामयी माँ गुरु के रूप में अनुशासनपालन वा कड़े रियाज़ के मामले में उतनी ही कठोर रहीं, जितनी कि उनके समय में उनके अपने गुरु कठोर थे।

गायन_प्रतिभा

किशोरी अमोनकर ने न केवल जयपुर घराने की गायकी की बारीकियों और तकनीकों पर अधिकार प्राप्‍त किया, बल्‍कि कालांतर में अपने कौशल और कल्‍पना से एक नवीन शैली भी विकसित की। इस प्रकार उनकी शैली में अन्‍य घरानों की बारीकियां भी झलकती हैं। अमोनकर की प्रस्‍तुतियां ऊर्जा और लावण्‍य से अनुप्राणित होती हैं। उन्‍होंने प्राचीन संगीत ग्रंथों पर विस्‍तृत शोध किया है और उन्‍हें संगीत की गहरी समझ है। उनका संगीत भंडार विशाल है और वह न केवल पारंपरिक रागों, जैसे जौनपुरी, पटट् बिहाग, अहीर और भैरव प्रस्‍तुत करती हैं, बल्‍कि ठुमरी, भजन और खयाल भी गाती हैं।

शब्द_और_धुन

पद्म विभूषण से सम्मानित किशोरी ने योगराज सिद्धनाथ की सारेगामा द्वारा निकाली गई एलबम 'ऋषि गायत्री' के लोकार्पण के अवसर पर कहा, "मैं शब्दों और धुनों के साथ प्रयोग करना चाहती थी और देखना चाहती थी कि वे मेरे स्वरों के साथ कैसे लगते हैं। बाद में मैंने यह सिलसिला तोड़ दिया क्योंकि मैं स्वरों की दुनिया में ज़्यादा काम करना चाहती थी। मैं अपनी गायकी को स्वरों की एक भाषा कहती हूं।" उन्होंने कहा, "मुझे नहीं लगता कि मैं फ़िल्मों में दोबारा गाऊंगी। मेरे लिए स्वरों की भाषा बहुत कुछ कहती हैं। यह आपको अद्भुत शांति में ले जा सकती है और आपको जीवन का बहुत सा ज्ञान दे सकती है। इसमें शब्दों और धुनों को जोड़ने से स्वरों की शक्ति कम हो जाती है।" वह कहती हैं, "संगीत का मतलब स्वरों की अभिव्यक्ति है। इसलिए यदि सही भारतीय ढंग से इसे अभिव्यक्त किया जाए तो यह आपको असीम शांति देता है।

किशोरी_अमोनकर_पर_वृत्तचित्र

देश की प्रसिद्ध शास्त्रीय संगीत गायिका एवं पद्मविभूषण किशोरी अमोनकर पर 'भिन्न षड़ज' नामक वृत्तचित्र एक समय के लोकप्रिय फ़िल्म कलाकार अमोल पालेकर और उनकी जीवन संगीनी संध्या गोखले ने बनायी है। यह वृत्तचित्र 72 मिनट का है। किशोरी जी के जीवन में एक ऐसा समय आया, जब उनकी आवाज चली गई। आयुर्वेदिक उपचार के बाद जब इनकी आवाज़ वापस आई, तो इनकी गायकी एक सर्वथा नवीन दृष्टि लेकर, एक नई चमक लेकर वापस आई। अमोल पालेकर बताते हैं कि 'हमने छोटी-मोटी बातों पर ध्यान देने की बजाए पूरी डॉक्युमेंट्री को उनके संगीत, उनके व्यक्तित्व और उनकी सोच-प्रक्रिया तक केंद्रित रखा है।' गोवा, मुंबई और पुणे में डॉक्युमेंट्री की शूटिंग हुई। इसमें पं. हरिप्रसाद चौरसिया, पं. शिवकुमार शर्मा और उस्ताद अमजद अली जैसे संगीत क्षेत्र के दिग्गजों ने अमोनकर और उनके संगीत पक्ष के बारे में टिप्पणी करते हुए दिखाया गया है।

एलबम

ख्याल गायकी, ठुमरी और भजन गाने में विशेषज्ञता प्राप्त किशोरी की अब तक 'प्रभात', 'समर्पण' और 'बॉर्न टू सिंग' सहित कई एलबम जारी हो चुकी हैं।

सम्मान_और_पुरस्कार

सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायिका श्रीमती किशोरी अमोनकर को शास्त्रीय संगीत की परम्परा को लोकप्रिय और समृद्ध बनाने में उनके योगदान के लिए 'आईटीसी संगीत पुरस्कार' से सम्मानित किया गया । पुरस्कार के तहत उन्हें प्रतीक चिह्न और प्रशस्ति पत्र प्रदान किया गया। 'गान सरस्वती' की उपाधि एवं पद्म विभूषण से सम्मानित श्रीमती अमोनकर ने इस अवसर पर अपनी मिठास भरी भावपूर्ण शैली में राग तिलक कामोद में निबद्ध रचना "सकल दु:ख हरन सदानन्द घट घट प्रगट " और एक अन्य रचना "मेरो पिया रसिया सुन री सखी तेरो दोष कहां " प्रस्तुत की।

1987 - पद्म भूषण
2002 - पद्म विभूषण
1985 - संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार
2009 - संगीत नाटक अकादमी फ़ेलोशिप

निधन

मशहूर हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायिका किशोरी अमोनकर का सोमवार 3 अप्रैल, 2017 को मुंबई में निधन हो गया। वह 84 वर्ष की थीं। पारिवारिक सूत्रों ने बताया कि रात को 12 बजे के करीब मध्य मुंबई में स्थित आवास पर अमोनकर का निधन हुआ।

आशा भोसले

आशा भोसले 🎂08 सितंबर 1933 ⚰️12 अप्रैल 2026 जन्म की तारीख और समय: 8 सितंबर 1933, सांगली मृत्यु की जगह और तारीख: 12 अप्रैल 2026 ब...