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मंगलवार, 25 अप्रैल 2023

मीनू मुमताज

अभिनेत्री मीनू मुमताज़ के जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धांजलि

मीनू मुमताज़ का जन्म 26 अप्रैल 1942 में मुम्बई तत्कालीन बॉम्बे में हुआ था
मीनू मुमताज़ भारतीय अभिनेत्री थीं। वह अपने समय के मशहूर कॉमेडियन महमूद अली की बहन थीं। भारतीय सिनेमा की दिग्गज अभिनेत्री रहीं मीना कुमारी और मीनू मुमताज़ में काफी गहरी मित्रता थी। सन 1950 से लेकर 1960 के दशक में बतौर डांसर कई फिल्मों में काम करने वाली मीनू मुमताज़ एक डांसर के साथ-साथ कैरेक्टर आर्टिस्ट भी थीं। मीनू मुमताज़ का असली नाम मालिकाउन्निसा अली था। जब फिल्मों में काम करने लगीं तो मीना कुमारी ने उनका नाम बदलकर मीनू मुमताज़ कर दिया था। तब से फिल्म इंडस्ट्री में मीनू मुमताज़ के नाम से मशहूर हो गईं।

परिचय
मीनू मुमताज ने फिल्मी दुनिया में ‘सखी हातिम’ से कदम रखा था। 1950 और 1960 के दशक की कई हिंदी फिल्मों में उन्होंने काम किया। कई बार फिल्मों में वह डांसर के तौर पर भी नजर आई हैं। उनकी सबसे ज्यादा मशहूर फिल्मों में ‘सीआईडी’, ‘नया दौर’, ‘ताज महल’, ‘गबन’ और ‘जमीर’ शामिल हैं। पहली फिल्म ‘सखी हातिम’ में मीनू मुमताज बलराज साहनी जैसे दिग्गज अभिनेता के साथ थीं। उन्होंने गुरुदत्त साहब के साथ भी काम किया। ‘चौदहवीं का चांद’, ‘कागज के फूल’, ‘साहिब बीवी और गुलाम’, ‘ताजमहल’, ‘घूंघट’, ‘इंसान जाग उठा’, ‘घर बसाके देखो’ जैसी कई फिल्मों में उन्होंने काम किया था।

मृत्यु

अभिनेत्री मीनू मुमताज़ की मृत्यु 23 अक्टूबर, 2021 को कनाडा में हुई। वह बीते कई सालों से बीमार थीं और लगभग बीस वर्षों से कनाडा में ही रह रही थीं। मीनू मुमताज़ के निधन के बारे में बात करते हुए उनके भतीजे नौषाद ने कहा, "वह जईफ थीं और उनकी उम्र भी 80 के आसपास थी। अब तक मैं जिस किसी से भी मिला हूं, वह उनमें से सबसे प्यारी इंसान थीं।" अपने बड़े भाई महमूद की तरह मीनू मुमताज़ ने भी अपनी पहचान फिल्मों में बनाने का फैसला किया था।

शनिवार, 22 अप्रैल 2023

सत्यजीत राय

सत्यजीत रे की जीवनी:- 
नाम –  सत्यजीत रे
जन्म -  2 मई 1921
आयु -  71 वर्ष
जन्म स्थान -  कोलकाता, पश्चिम बंगाल
पिता का नाम –  सुकुमार रे
माता का नाम –  सुप्रभात रे
पत्नी का नाम –  ज्ञात नहीं
पेशा –  फिल्म निर्माता
मृत्यु -  23/04/1992
भाई-बहन –  नहीं
पुरस्कार -  राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार
सत्यजीत रे का जीवन परिचय :- सत्यजीत रे एक भारतीय फिल्म निर्देशक, लेखक, प्रकाशक, चित्रकार, सुलेखक, संगीतकार, ग्राफिक डिज़ाइनर थे। रविवार बीसवीं सदी की सर्वश्रेष्ठ फिल्म निर्देशकों में होती है। यदि कोई भारतीय फिल्म निर्माता है जिसने पश्चिम में फिल्म निर्देशकों को प्रभावित किया है और उन्हें प्रभावित करके जारी रखा है, तो वह सनीजीत रे हैं। उन्होंने फिल्मों, फिल्मों और लघु फिल्मों सहित 36 फिल्मों का निर्देशन किया। इनमें से 32 ने राष्ट्रीय पुरस्कार जीते। सर्वश्रेष्ठ निर्देशक के लिए 6 पुरस्कार थे। अकादमी पुरस्कार ने अवाइट लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार से नवाजा। उन्हें 1992 में देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया था। तो आइए जानते हैं सत्यजीत रे के जीवन के बारे में। 

सत्यजीत रे का जन्म 2 मई 1921 को कोलकाता में हुआ था। वह एक बंगाली अहीर परिवार से थे। सत्यजीत रे का पूरा नाम सत्यजीत 'सुकुमार' राय था। इसके अलावा उन्हें सत्यजीत रे और शोत्तोजित रॉय के नाम से भी जाना जाता है। उनके पिता का नाम सुकुमार राय और माता का नाम सुप्रभा राय था। उसे केवल 2 वर्ष हुए थे जब उसके पिता का देहांत हुआ था। उनके पालन-पोषण से उनकी मां ने अपने भाई के घर पर किया था। उनका एक अनुभवी अनुभव और उनकी आवाज़ बहुत तेज़ थी। सत्यजीत रे के दादा उपेंद्र किशोर राय एक लेखक और चित्रकार थे उनके भी बांग्ला में बच्चों के लिए रोचक कविताएँ लिखते थे और वे चित्रकारी भी करते थे।
राय को अपने जीवन में मिले कई पुरस्कार और सम्मान। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय ने उन्हें डॉक्टरेट की डिग्री प्रदान की। चार्ली चैपलिन इस सम्मान पाने वाले के बाद वे पहले फिल्म निर्देशन कर रहे थे। उन्हें 1985 में भाई साहब फाल्के पुरस्कार और 1987 में फ्रांस से लेजॉन डी'ऑन्यू पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उनकी मृत्यु से कुछ समय पहले, उन्हें प्रतिष्ठित अकादमी पुरस्कार और भारत के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया था। मरणोपरांत सैन फ़्रांसिस्को में अंतरराष्ट्रीय फिल्मोत्सवों में ये निर्देशन में जीवन-पर्यन्त उपलब्धि-स्वरूप अकिरा कुरोसावा पुरस्कार मिला 

सत्यजीत रे का करियर:-
सत्यजीत रे ने चिदानंद दासगुप्ता और अन्य लोगों के साथ 1947 में कलकत्ता फिल्म हाउस की शुरुआत की, जिसमें उन्हें कई विदेशी फिल्में देखने को मिलीं। वे द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान कोलकाता में नए अमेरिकी सैनिकों से मित्रता की स्थापना करते थे, जो उन्हें शहर में होने वाली फिल्मों के बारे में सूचित करते थे। 1949 में, राय ने एक दूर के रिश्ते और लंबे समय से अपने प्रिय बिजॉय राय से शादी की। ये एक हुआ बेटा सन्दीप, जो अब फ़िट फिल्म का निर्देशन कर रहा है। इसी साल फ्रेंच फिल्म के निर्देशक जाँ रन्वार कोलकाता में अपनी फिल्म की शूटिंग करने आए। राय ने देहात में उपयुक्त स्थान खोजने में रन्वार की मदद की। राय ने उन्हें पथेर पांचाली पर फिल्म बनाने का अपना विचार बताया तो रन्वार ने उन्हें इसके लिए बढ़ावा दिया।

सत्यजीत रे को प्रतिष्ठित ऑस्कर अवार्ड का ऑनरेरी ऑर्डर फॉर लाइफटाइम अचीवमेंट भी मिला है।
भारतीय सिनेमा में ऊंचा मुकाम हासिल करने वाले और भारतीय सिनेमा को नई दिशा देने वाले इस महापुरुष का निधन 23 अप्रैल, 1992 को दिल का दौरा पड़ने की वजह से हो गया था।
भारतीय सिनेमा के विकास और रूपों के लिए कई लोगों ने अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है, लेकिन जब भारतीय सिनेमा को पटल पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाने की बात हो तो वहां पर सत्यजीत रे का नाम सबसे पहले आता है।
सन् 1947 में उन्होंने अन्य लोगों के साथ 'कलकत्ता फिल्म सोसायटी' की स्थापना की
सत्यजीत रे का जीवन प्रत्येक भारतीय के लिए एक आदर्श और प्रेरणा का स्रोत है।
सत्यजीत रे एक प्रख्यात फिल्म निर्माता, लेखक, चित्रकार, ग्राफिक डिजाइनर एवं संगीतकार थे।
उनकी पहली फिल्म 'पाथेर पांचाली' एक सफलतम फिल्म थी। इस फिल्म ने रिकॉर्ड 11 अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार जीते जिसमें कान फिल्म फेस्टिवल का सर्वश्रेष्ठ ह्यूमैन डॉक्यूमेंट्री शामिल है
सत्यजित रे ने प्रेमचंद की ही 'शतरंज के खिलाड़ी' और 'सद्गति' पर फिल्में बनाईं, जिन्होंने काफी उत्साह प्राप्त किया
सत्यजीत रे ने इसके बाद चारुलता, विघातक और नायक जैसी अन्य बेहतरीन फिल्में बनाईं।
भारत सरकार ने उन्हें वर्ष 1992 में सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' प्रदान किया था।
इस महान शख्सियत की विरासत को ध्यान में रखते हुए 'सिनेमा में फिट के लिए सत्यजीत रे लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड' की शुरुआत की गई है, जिसे इंडियन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल (एफआई) में हर साल दिया जाएगा।
भारतीय सिनेमा के पितामह सत्यजीत रे का जन्म 2 मई, 1921 को बंगाल के एक ऐसे परिवार में हुआ था जो विश्व में कला और साहित्य के लिए विख्यात था
सत्यजीत रे की शुरुआती शिक्षा कलकता के सरकारी स्कूल में हुई
प्रेसिडेंसी कॉलेज कलकत्ता से स्नातक होने के बाद राय ने पेंटिंग के अध्ययन की शिक्षा ली।
सत्यजीत रे के करियर की आखिरी फिल्म 1991 में बनी अंगटुक फिल्म थी।
सिनेमा में उनके बेजोड़ निर्देशन और अविश्वसनीय योगदान के कारण उन्हें बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में दुनिया के तीन सर्वकालिक निर्देशकों में शामिल किया गया था।
सत्यजीत रे के अंदर फिल्में बनाने को लेकर काफी दिलचस्पी थी
पुरस्कार में 10 लाख रुपये का नकद पुरस्कार, एक प्रमाण पत्र, शॉल, एक सिल्वर म्यूर मेडल और एक स्क्रॉल शामिल हैं।
आज भी उनकी अमिट छाप भारतीय सिनेमा पर स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है।
सत्यजीत रे ने बंगाली बाल साहित्य में दो लोकप्रिय पात्रों की रचना की - जासूस फेलुदा और वैज्ञानिक प्रोफेसर सिंक। उन्होंने कई लघु कथाएँ भी लिखीं, जो बारह कहानियों के संकलन में प्रकाशित हुई थीं और उनके नाम पर हमेशा बारह से संबंधित शब्दों का खेल होता था। उदाहरण के लिए एकर पिठे दुई। राय को पहेलियों और कई अर्थों वाले मैचों से बहुत प्यार था। इसकी कहानियों में यह भी देखा जा सकता है - मामले की तह तक जाने के लिए फेलुदा को अक्सर पहेलियों को घेरना पड़ता है। शर्लक होम्स और डॉक्टर वाटसन की तरह फेलुदा की कहानियां उनके चचेरे भाई तोपसे का वर्णन करती हैं। शंकु की विज्ञान कथाएँ एक दैनंदिनी के रूप में होती हैं जो शंकु के अचानक गिरने के बाद मिलती है। राय ने इन कहानियों में अज्ञात और रोमांचक तत्वों को टटोला है, जो उनकी फिल्मों में नहीं मिलता है। इनकी लगभग सभी कहानियाँ हिंदी, अंग्रेजी और अन्य आकाशगंगाओं में अनूदित हो चुकी हैं।

सत्यजीत रे द्वारा निर्देशित फिल्में:-
1955 - पाथेर पांचाली
1956 - अपराजिता
1958 - पारस पत्थर
1958 - जलसा घर 
1959 - अपूर संसार
1960 – देवी
1961 - रविंद्र नाथ टैगोर
1962 - कंचनजंघा
1962 - अभिजान
1963 - महानगर
1964 - चारुलता
1964 - टू
1965 - कापुरुष और महापुरुष 
1966 - नायक
1967 - चिड़ियाखाना
1968 - गोपी गायने टाइगरा बायने
1969 - अरन्येर डे नाइट
1970 - प्रतिवाद
1971 - सीमाबद्ध
1971 - सिक्किम
1972 - द इनर आई
1973 - अशनि संकेत
1974 - सोनार केल्ला
1975 - जन अरण्य
1976 - बाला
1977 - शतरंज के खिलाड़ी 
1978 - जय बाबा फेलूनाथ
1980 - हीरक राजा देश
1980 - पिकू
1981 - सद्गति
1984 - घर से बाहर
1987 - सुकुमार राय
1989 - गण विनाश
1990 - शाखा प्रशाखा
1991 - विघातक
सत्यजीत रे की मौत:- 
फिल्म जगत का यह दिव्य नक्षत्र 23 अप्रैल 1992 को शाम 5:35 बजे लंबी बीमारी के बाद स्थापित हुआ। वर्ल्ड फिल्म इंडस्ट्री के लिए एक अपूरणीय क्षति। उनकी सेवाओं के लिए देश मनीकाड़ा का ऋणी रहेगा।

शमशाद बेगम

गुज़रे ज़माने की महान पार्श्व गायिका शमशाद बेगम की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रधांजलि

शमशाद बेगम भारतीय सिनेमा में हिन्दी फ़िल्मों की शुरुआती पार्श्वगायिकाओं में से एक थीं। हिन्दी सिनेमा के प्रारम्भिक दौर में उनकी खनखती और सुरीली आवाज़ ने एक बहुत बड़ी संख्या में उनके प्रशसकों की भीड़ तैयार कर दी थी। हिन्दी फ़िल्मों के कई सुपरहिट गीत, जैसे- 'कभी आर कभी पार', 'कजरा मोहब्बत वाला', 'लेके पहला-पहला प्यार', 'बूझ मेरा क्या नाम रे' शमशाद बेगम के नाम पर दर्ज हैं। इन गीतों की लोकप्रियता ने शमशाद बेगम को प्रसिद्धि की बुलन्दियों पर पहुँचा दिया था। वर्ष 2009 में भारत सरकार ने शमशाद बेगम को कला के क्षेत्र में उनके विशिष्ट योगदान के लिए ' पद्मभूषण' से सम्मानित किया था।

शमशाद बेगम का जन्म 14 अप्रैल, सन 1919 को पंजाब राज्य के अमृतसर में हुआ था। वे अपनी युवावस्था से ही के. एल. सहगल की बहुत बड़ी प्रशंसक थीं। फ़िल्में देखना और गीत सुनना उन्हें बहुत पसन्द था। फ़िल्में देखने का शौक़ शमशाद बेगम को इस कदर था कि उन्होंने फ़िल्म ' देवदास' चौदह बार देखी थी। शमशाद बेगम का विवाह गणपतलाल बट्टो के साथ हुआ था। वर्ष 1955 में पति की मृत्यु के बाद वे मुम्बई आ गई थीं और बेटी उषा रात्रा और दामाद के साथ रहने लगी थीं।

पहली बार शमशाद बेगम की आवाज़ लाहौर के पेशावर रेडियो के माध्यम से 16 दिसम्बर, 1947 को लोगों के सामने आई। उनकी आवाज़ के जादू ने लोगों को उनका प्रशंसक बना दिया। तत्कालीन समय में शमशाद बेगम को प्रत्येक गीत गाने पर पन्द्रह रुपये पारिश्रमिक मिलता था। उस समय की प्रसिद्ध कम्पनी जेनोफ़ोन, जो कि संगीत रिकॉर्ड करती थी, उससे अनुबन्ध पूरा होने पर शमशाद बेगम को 5000 रुपये से सम्मानित किया गया था।

शमशाद बेगम की सम्मोहक आवाज़ ने महान संगीतकार नौशाद और ओ. पी. नैय्यर का ध्यान अपनी ओर खींच लिया था और इन्होंने फ़िल्मों में पार्श्वगायिका के रूप में इन्हें गायन का मौका दिया। इसके बाद तो शमशाद बेगम की सुरीली आवाज़ ने लोगों को इनका दीवाना बना दिया। पचास, आठ और सत्तर के दशक में शमशाद बेगम संगीत निर्देशकों की पहली पसंद बनी रहीं। शमशाद बेगम ने 'ऑल इंडिया रेडियो' के लिए भी गाया। इन्होंने अपना म्यूज़िकल ग्रुप 'द क्राउन थिएट्रिकल कंपनी ऑफ़ परफॉर्मिंग आर्ट' बनाया और इसके माध्यम से पूरे देश
में अनेकों प्रस्तुतियाँ दीं। इन्होंने कुछ म्यूज़िक कंपनियों के लिए भक्ति के गीत भी गाए। मशहूर संगीतकार ओ. पी.
नैयर ने उनकी आवाज़ को 'मंदिर की घंटी' बताया था। शमशाद बेगम ने उस समय के सभी मशहूर संगीतकारों के साथ काम किया।

आवाज़ ने सारंगी के उस्ताद हुसैन बख्शवाले साहेब का ध्यान भी अपनी ओर खींचा और उन्होंने इन्हें अपनी
शिष्या बना लिया। लाहौर के संगीतकार ग़ुलाम हैदर ने इनकी जादुई आवाज़ का इस्तेमाल फ़िल्म 'खजांची' ( 1941 ) और 'खानदान' ( 1942 ) में किया। वर्ष 1944 में शमशाद बेगम ग़ुलाम हैदर की टीम के साथ मुंबई आ गई थीं। यहाँ इन्होंने कई फ़िल्मों के लिए गाया। इन्होंने पाश्चात्य से प्रभावित पहला गीत 'मेरी जान मेरी जान सनडे के सनडे' गाकर धूम मचा दी थी। इनकी गायन शैली पूरी तरह मौलिक थी। इन्हें लता मंगेशकर, आशा भोंसले, गीता दत्त और अमीरबाई कर्नाटकी से जरा भी कम नहीं आंका गया।

भारत के प्रमुख त्योहारों में से एक होली पर यूँ तो हिन्दी फ़िल्मों में असंख्य गाने लिखे और गाये गए हैं, किंतु होली का सबसे लोकप्रिय गीत शकील बदायूँनी ने लिखा था। इस गीत को अपने समय के ख्यातिप्राप्त संगीतकार नौशाद ने संगीतबद्ध किया। शमशाद बेगम ने इस
गीत को अपनी सुरीली आवाज़ से सजाकर अमर बना दिया। फ़िल्म 'मदर इंडिया' का यह गीत अभिनेत्री नर्गिस पर फ़िल्माया गया था और गीत के बोल थे- "होली आई रे
कन्हाई रंग छलके, सुना दे ज़रा बाँसूरी"। इस गीत में गोपियाँ नटखट कृष्ण से गुज़ारिश कर रही हैं कि वे होली के मौके पर अपनी जादूई बाँसुरी बजाना बंद न करें। यह गीत अपने समय के सबसे सफल गीतों में से एक था, जो लोगों के हृदय पर छा गया था।

प्रमुख गीत

'छोड़ बाबुल का घर' मदर इंडिया
'होली आई रे कन्हाई' मदर इंडिया ( 1957 
'ओ गाड़ी वाले गाड़ी धीरे हाँक रे' मदर इंडिया
'तेरी महफ़िल में क़िस्मत आज़मा कर हम भी देखेंगे' मुग़ल-ए-आज़म
'मेरे पिया गए रंगून' पतंगा
'कभी आर कभी पार' आर पार
'लेके पहला पहला प्यार' सी.आई.डी. ( 1956 )
'कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना' सी.आई.डी. ( 1956 )
'बूझ मेरा क्या नाम रे, नदी किनारे गाँव रे' सी.आई.डी. ( 1956 ) 
'मिलते ही आंखें दिल हुआ दीवाना किसी का। बाबुल
'बचपन के दिन भुला न देना' दीदार
'दूर कोई गाए' बैजू बावरा
'सैया दिल में आना रे' बहार
'मोहन की मुरलिया बाजे' मेला ( 1948 )
'कजरा मुहब्बत वाला' क़िस्मत ( 1968)

अपनी सुरीली आवाज़ से हिन्दी फ़िल्म संगीत की सुनहरी हस्ताक्षर शमशाद बेगम के गानों में अल्हड़ झरने की लापरवाह रवानी, जीवन की सच्चाई जैसा खुरदरापन और बहुत दिन पहले चुभे किसी काँटे की रह रहकर उठने वाली टीस का सा एहसास समझ में आता है। उनकी आवाज़ की यह अदाएँ सुनने वालों को बरबस ही अपनी ओर आकर्षित करती है और उनके गानों की लोकप्रियता का आलम यह है कि आज भी उन पर रीमिक्स बन रहे हैं।

'प्रेस्टिजियस ओ.पी. नैयर अवार्ड'
- 2009' पद्म भूषण - 2009

भारतीय सिनेमा में अपनी सुरीली आवाज़ से लोगों का दिल जीत लेने वाली मशहूर पार्श्वगायिका शमशाद बेगम का निधन 23 अप्रैल , 2013 को मुम्बई में हो गया। शमशान बेगम ने हिन्दी फ़िल्म जगत से भले ही कई वर्ष पहले दूरियाँ बना ली थीं, किंतु अपने पूरे कैरियर में बेशुमार और प्रसिद्ध गानों को अपनी आवाज़ दी। उन्होंने न जाने कितने ही अनगिनत गानों को अपनी आवाज़ से सजाकर हमेशा-हमेशा के लिए ज़िंदा कर दिया। उनकी
बेटी उषा का कहना था कि- "मेरी माँ हमेशा यही कहती थीं की मेरी मौत के बाद मेरे अंतिम संस्कार के बाद ही किसी को बताना कि मैं अब इस दुनिया से जा चुकी हूँ, और मैं कहीं नहीं जाउँगी जहाँ से आई थी, वहीं वापस जा रही हूँ, मैं सदा सबके साथ हूँ। ये खनकी आवाज़ अब अपनी जुबान से गाये गए गानों से ही सबके दिलों को सुकून देगी।"

*प्रसिद्ध गायिका एस जानकी के जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनाएं*

*प्रसिद्ध गायिका एस जानकी के जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनाएं*

सिस्तला जानकी (जन्म 23 अप्रैल 1938) एक भारतीय पार्श्व गायिका और आंध्र प्रदेश की सामयिक संगीत-संगीतकार हैं।  उन्हें सम्मानपूर्वक "जानकी अम्मा" और दक्षिण भारत की कोकिला कहा जाता है।  वह भारत की सबसे प्रसिद्ध पार्श्व गायिकाओं में से एक हैं।  उन्हें तमिलनाडु में 'इसाईकुयिल' और कर्नाटक में 'गाना कोगिले' (गायन कोयल) के रूप में जाना जाता है।  उन्होंने तेलुगु, कन्नड़, तमिल, मलयालम, हिंदी, संस्कृत, ओडिया,तुलु, उर्दू, पंजाबी सहित 17 भाषाओं में एकल, युगल और कोरस गीतों सहित फिल्मों, एल्बमों, टीवी और रेडियो में 48,000 से अधिक गाने  रिकॉर्ड किए हैं।  , कोंकणी और अंग्रेजी, जापानी, जर्मन और सिंहला जैसी विदेशी भाषाओं में भी, हालांकि उनके करियर में सबसे अधिक गाने कन्नड़ में थे, उसके बाद मलयालम थे। 1957 में तमिल फिल्म विधान विलायट्टू से शुरू होकर, उनका करियर छह दशकों से अधिक का है। 

जानकी का जन्म 23 अप्रैल को पल्लापटला, रेपल्ले तालुका, गुंटूर, मद्रास प्रेसीडेंसी, ब्रिटिश भारत (अब आंध्र प्रदेश में) में हुआ था।उनके पिता, श्रीराममूर्ति सिस्तला एक आयुर्वेदिक डॉक्टर और शिक्षक थे।  उन्होंने अपना अधिकांश बचपन सिरसिला में बिताया, जहां उन्हें नौ साल की उम्र में मंच पर प्रदर्शन का पहला मौका मिला।  उन्होंने नदस्वरम विदवान पेडस्वामी के माध्यम से संगीत की मूल बातें सीखीं।  हालांकि उन्होंने कभी भी शास्त्रीय संगीत का कोई औपचारिक प्रशिक्षण नहीं लिया।

 जानकी ने 1959 में वी. रामप्रसाद से शादी की। उन्होंने उनके करियर को प्रोत्साहित किया और उनकी अधिकांश रिकॉर्डिंग के दौरान उनके साथ रहे।  1997 में कार्डियक अरेस्ट के कारण उनकी मृत्यु हो गई।उनका इकलौता बेटा मुरली कृष्णा हैदराबाद में रहता है और उसकी पत्नी उमा मुरलीकृष्ण भरतनाट्यम और कुचिपुड़ी डांसर हैं।

 जानकी 5 भारतीय भाषाओं को धाराप्रवाह बोल सकती हैं और 5 भारतीय भाषाओं  तेलुगु, तमिल, कन्नड़, मलयालम और हिंदी में लिख सकती हैं। 

उन्होंने चार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और 33 विभिन्न राज्य फिल्म पुरस्कार जीते हैं। वह मैसूर विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट की मानद उपाधि तमिलनाडु सरकार से कलैमामणि पुरस्कार और कर्नाटक सरकार से कर्नाटक राज्योत्सव पुरस्कार प्राप्त कर चुकी हैं 2013 में, उन्होंने पद्म भूषण को स्वीकार करने से इनकार कर दिया, और बताया कि यह  बहुत छोटा है और "बहुत देर से" आया था और दक्षिण भारतीय कलाकारों को उनकी उचित पहचान नहीं दी गई थी।

सबसे बहुमुखी गायकों में से एक के रूप में व्यापक रूप से प्रशंसित, गायक एस पी बालासुब्रमण्यम और संगीतकार इलैयाराजा के साथ उनके जुड़ाव के बारे में सबसे अधिक चर्चा की जाती है।  1960, 1970 और 1980 के दशक में पी.बी. श्रीनिवास, एस.पी. बालसुब्रमण्यम, केजे येसुदास, पी जयचंद्रन और डॉ राजकुमार के साथ उनके युगल गीत सभी दक्षिण भारतीय भाषाओं में चार्ट में सबसे ऊपर थे। उन्होंने लगभग सभी शैलियों के गाने गाए हैं और दुनिया भर में 5000 से अधिक संगीत कार्यक्रमों में मंचों पर लाइव प्रदर्शन किया है।  अक्टूबर 2016 में, जानकी ने फिल्मों और मंच प्रदर्शनों के लिए गायन से संन्यास की घोषणा की।  हालांकि, फिल्म बिरादरी के दबाव में, उन्होंने 2018 में तमिल फिल्म पन्नाडी के लिए वापसी की।

मनोज बाजपाई

फ़िल्म अभिनेता मनोज बाजपेयी के जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनाएं
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मनोज बाजपेयी एक भारतीय फिल्म अभिनेता हैं, जोकि हिंदी सिनेमा के साथ-साथ तेलुगु और तमिल फिल्मों मे भी सक्रिय हैं। वह अपने एक्टिंग करियर मे अब तक दो नेशनल फिल्म अवार्ड और चार फिल्म फेयर अवार्ड जीत चुके हैं। 
मनोज को फिल्म 'भोंसले' के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के 67वां राष्ट्रिय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। 

मनोज बाजपेयी का जन्म 23 अप्रैल 1969 को नरकटियागंज, बिहार में हुआ था। बाजपेयी बचपन से एक्टर बनना चाहते थे। मनोज ने अपनी हाई स्कूल तक की पढ़ाई बिहार के बेतिया जिले के के. आर. हाई स्कूल से की। 17 की उम्र में बाजपयी अपने गांव नारकाटिया से दिल्ली शिफ्ट हो गये। कॉलेज के दिनों में मनोज ने थियेटर करना शुरू कर दिया था।

मनोज बाजपेयी ने फिल्मी दुनिया में डेब्यू गोविन्द निल्हानी की फिल्म द्रोखाल से वर्ष 1994 में किया था। इसके बाद वाजपयी बायोग्राफिकल ड्रामा फिल्म बैंडिट क्वीन में नजर आये। लेकिन मनोज को हिंदी सिनेमा में पहचान फिल्म शूल से मिली। मनोज को हिंदी सिनेमा मे अपनी पहचान बनाने के लिए काफी स्ट्रगल करना पड़ा, लेकिन आज वह हिंदी सिनेमा में सर्वश्रेष्ठ एक्टर्स की श्रेणी मे आते हैं। अब तक मनोज बाजपेयी कई फिल्मों में काम कर चुके हैं, जिनमे, कलाकार, दाउद, तम्मना, सत्या, प्रेम कथा, कौन, शूल, फिजा, दिल पे मत ले यार, पिंजर, एलओसी कारगिल, वीर-जारा, जेल आदि शमिल हैं।

उन्‍हें फिल्‍मों से सम्‍बन्धित कई पुरस्‍कारों से नवाजा जा चुका है। उन्‍हें राष्‍ट्रपति द्वारा पद्मश्री पुरस्‍कार से भी सम्‍मानित किया जा चुका है।

मनोज बाजपेयी से जुड़े दिलचस्प फैक्ट्स  

मनोज का जन्‍म बिहार के पश्चिम चंपारण स्थित बेलवा गांव में एक साधारण किसान परिवार में हुआ था।  

मनोज के दिल में बचपन से ही एक्टिंग को लेकर जबरदस्‍त क्रेज था। दिल्‍ली में पढ़ाई के दौरान उन्‍हें यूनिवर्सिटी में एक्टिंग के लिए प्‍लेटफॉर्म भी मिला। लेकिन जब मनोज ने अपने परिवार मे एक्टिंग में करियर बनाने की बात कही तो विरोध हुआ। गांव में पड़ोसियों और रिश्तेदारों ने मजाक उड़ाना शुरू कर दिया।

मनोज बाजपेयी ने यह बात कई इंटरव्यूज बताई है कि उन्हें एनएसडी में एडमिशन ना मिलने का बहुत दुख हुआ था। इसके बाद उन्होंने दिल्ली में ही बैरी जॉन के साथ थिएटर करना शुरू कर दिया। 

मनोज ने अपना फिल्मी करियर 1994 में शेखर कपूर निर्देशित फिल्म 'बैंडिट क्वीन' से शुरु किया। लेकिन बॉलीवुड में उनको 1998 मे राम गोपाल वर्मा की फिल्म 'सत्या' से पहचान मिली। इस फिल्म के लिए उन्हे सर्वश्रेष्ठ सह अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हुआ।

मनोज बाजपेयी ने अपना टीवी करियर दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले धारावाहिक स्वाभिमान के साथ शुरु किया। इसी धारावाहिक से आशुतोष राणा और रोहित रॉय को भी पहचान मिली थी। 

साल 1999 मे आई फिल्म 'शूल' मे उनके किरदार समर प्रताप सिंह के लिए उन्हे फिल्मफेयर का सर्वोत्तम अभिनेता पुरस्कार मिला। अमृता प्रीतम के मशहूर उपन्यास 'पिंजर' पर आधारित फिल्म पिंजर के लिए उन्हें एक बार फिर से राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।

मनोज अपनी वाइफ से साथ बहुत ही कम बाहर आते हैं, बताया जाता है कि, जब वे इंडस्ट्री में संघर्ष कर रहे थे तब वो दिल्ली की एक लड़की को डेट कर रहे थे और फिर उस लड़की से शादी कर ली। मनोज की ये शादी 2 महीना भी नहीं टिकी। इसके बाद  2006 में उन्होंने  बॉलीवुड अभिनेत्री नेहा से शादी की। दोनों की एक छोटी सी बेटी है जिसका नाम अवा है।

याना गुप्ता

*अभिनेत्री लेखिका मॉडल याना गुप्ता के जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनाएं*
याना गुप्ता
जन्मयाना सिनकोवा
23 अप्रैल 1979 (आयु 44)
ब्रनो, चेकोस्लविया
राष्ट्रीयताचैक-भारत
व्यवसायमॉडल, अभिनेत्री, लेखिका
याना गुप्ता जन्म का नाम याना सिनकोवा चेक मॉडल और अभिनेत्री हैं जो मुम्बई में काम करती हैं। याना चेक गणराज्य की नागरिक हैं। अपने विवाह के पश्चात इन्होंने अपना कुलनाम बदल कर गुप्ता कर लिया था तथा तलाक के बाद भी इसी नाम को रखा|

गुप्ता घूमने की बहुत शौकीन हैं। वर्ष 2000 में भारत में आचार्य रजनीश के पूना आश्रम में रहते समय इनकी मुलाक़ात चित्रकार सत्य गुप्ता से हुई। आश्रम में एक कार्यक्रम के दौरान याना ने गाना गाया था जिसमें गिटार के साथ सत्य ने संगीत दिया। "[याना] समझ गई थीं कि वे उन्हें पसंद करते हैं"। सत्य याना से उम्र में चौदह वर्ष बड़े हैं। दोनो आश्रम में रहते हुए ही एक दूसरे से प्रेम करने लगे और तीन हफ़्ते बाद इनका विवाह हो गया और याना ने अपना सिनकोवा कुलनाम बदल कर अपने पति का गुप्ता कुलनाम अपना लिया। याना के माता-पिता "शुरुआत में सदमे में थे"। उन्हें चिंता थी कि याना को भारत में मलेरिया या कोई और बीमारी हो जाएगी।

निवर्तमान समय में याना यूनाइटेड किंगडम में रहने वाले भारतीय-आयरिश मूल के किसी व्यक्ति के साथ सम्बंध में हैं और चाहती हैं कि 2014 तक उनका विवाह हो जाए, परन्तु यह चाहती हैं कि वह "आधिकारिक तौर" पर इनके समक्ष प्रस्ताव रखें। याना किसी ऐसे शहर में अपनी गृहस्थी बसाना चाहती हैं जो "प्रकृति के नज़दीक" हो और यह मुम्बई में रहना पसंद नहीं करेंगी।

भारत में अपने कैरियर की शुरुआत से पहले याना फै़शन जगत के प्रमुख केन्द्रों जैसे मिलान, हैम्बर्ग और जापान में सफ़लता प्राप्त कर चुकी थीं। सत्य गुप्ता से अपने विवाह के पश्चात इन्होंने अपने पति के साथ पूना में फ़्लैट किराए पर लिया, परन्तु छह महीनों के अंदर ही उन्हें पैसे की कमी खलने लगी। मॉडल के रूप में याना ने कई भारतीय फोटोग्राफरों को अपनी फ़ोटो ई-मेल द्वारा भेजीं। कुछ दिनों के इंतजार के पश्चात मुम्बई के एक फ़ैशन डिज़ाइनर से इन्हें पहला प्रस्ताव आया। इसके कुछ समय पश्चात ही याना मॉरिशस एक फ़िल्म की शूटिंग के लिए गईं।

ईश्वर निवास द्वारा निर्देशित 2003 एक्शन फ़िल्म दम के मशहूर गाने "बाबूजी ज़रा धीरे चलो" में याना ने आइटम गर्ल की भूमिका की अदा करी जो कि इनके कैरियर के लिए ब्रेकआउट प्रदर्शन साबित हुआ। इसके पश्चात इन्हें कई फ़िल्मों के आइटम गानों में कार्य करने के प्रस्ताव मिलने लगे

2012 में याना ने वास्तविकता पर आधारित भारतीय टेलिविज़न धारावाहिक बिग बॉस के छठे सत्र में भाग लेने के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था। इसके लिए इन्होंने "कुछ पूर्व प्रतिबद्धताओं" को जिम्मेदार बताया।

वर्ष 2011 में याना ने अपनी पहली किताब का विमोचन किया। अंग्रेज़ी भाषा की अपनी इस स्वास्थ्य और कल्याण सम्बन्धित किताब, जिसका शीर्षक है हाउ टू लव योर बॉडी एण्ड गैट द बॉडी यू लव (अंग्रेज़ी: How To Love Your Body And Get The Body You Love), में याना ने स्वास्थ्य युक्तियाँ दी हैं।

उषा गांगुली

प्रसिद्ध रंगमंच अभिनेत्री एवं निर्देशिका उषा गांगुली की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि

उषा गांगुली जन्म- 1945, कानपुर, उत्तर प्रदेश; मृत्यु- 23 अप्रॅल, 2020, कोलकाता, पश्चिम बंगाल) प्रसिद्ध भारतीय समाज सेविका तथा रंगमंच की अभिनेत्री और निर्देशक थीं कोलकाता जहां बंगाली थियेटर का बोलबाला था, वहां उन्होंने हिंदी थियेटर स्थापित किया। उनको वहां वैकल्पिक हिंदी रंगमंच के एक नए रूप को लाने का श्रेय दिया जाता है। उषा गांगुली का नाटक 'काशी का अस्सी' बहुत चर्चित रहा था। उन्हें वर्ष 1998 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

परिचय

उषा गांगुली का जन्म 1945 में उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर में हुआ था। उन्होंने 1976 में रंगकर्मी थियेटर ग्रुप की स्थापना की, जो अपने प्रोडक्शंस, जैसे कि महाभोज, रुदाली, कोर्ट मार्शल के लिए जानी जाती है। उषा गांगुली कोलकाता में हिंदी रंगमंच का अभ्यास करने वाली एकमात्र थियेटर निर्देशक थीं, जो काफी हद तक बंगाली भाषी थीं।

कॅरियर

उषा गांगुली ने अपने कॅरियर की शुरुआत 1970 में कलकत्ता विश्वविद्यालय से सम्बद्ध एक अंडरग्रेजुएट कॉलेज, भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज, कलकत्ता में एक शिक्षक के रूप में की थी। साथ ही उन्होंने उसी साल संगत कला मंदिर से अभिनय की शुरुआत की और अपने पहले नाटक 'मिठी की' से काम शुरू किया। 'गाडी' में उन्होंने वसंतसेना की भूमिका निभाई थी। उन्होंने 2008 में अपनी सेवानिवृत्ति तक, भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज में हिंदी व्याख्याता के रूप में अध्यापन कार्य जारी रखा और साथ में थियेटर का अभ्यास किया।

उन्होंने 'रेनकोट' (2004) की स्क्रिप्ट पर काम किया था, जो रितुपर्णो घोष द्वारा निर्देशित 'ओ हेनरी द गिफ्ट ऑफ द मैगी' पर आधारित एक हिंदी फिल्म थी। फिल्‍म में अजय देवगन और ऐश्वर्या राय ने काम किया था।

मुख्य नाटक
उषा गांगुली के चर्चित नाटकों में मुख्य हैं

महाभोज (1984)
लो‍क कथा (1987)
होली (1989)
कोर्ट मार्शेल (1991
रुदाली (1992)
मुक्ति (1999)
शोभायात्रा (2000)
काशीनामा (2003)
मानसी (बंगाली में, 2011)
उनके कुछ बेहद पॉपुलर नाटक रहे 'महाभोज', 'लोक कथा', 'रुदाली'। 'रुदाली' नाटक महाश्वेता देवी की इसी नाम की एक कहानी पर आधारित था। 1992 में इसके लिए उषा को बेस्ट डायरेक्टर का सम्मान भी दिया गया था। बर्तोल्त ब्रेख्त की लम्बी कहानी 'मदर करेज एंड हर चिल्ड्रेन' पर आधारित 'हिम्मत माई', और स्वदेश दीपक के लिखे नाटक 'कोर्ट मार्शल' को भी उन्होंने डायरेक्ट किया। उनके ओरिजिनल नाटकों में 'अंतर्यात्रा' और 'खोज' बहुत पॉपुलर हुए। 2004 में फिल्म आई थी 'रेनकोट', उसकी स्क्रिप्ट पर भी उन्होंने काम किया था।

अपने नाटकों के किरदारों को समझने और उन्हें बेहतर तरीके से स्टेज पर उतारने के लिए उषा तगड़ी रिसर्च करती थीं। महाश्वेता देवी की कहानी रुदाली को नाटक के रूप में ढालने के लिए उन्होंने पंजाब में ‘स्यापे’ और बिहार में ‘रुदाली’ की परम्पराओं के बारे में जानकारी इकठ्ठा की। रुदालियां वो होती थीं, जो किसी के मरने पर शोक जताने जाया करती थीं और बुक्का फाड़-फाड़ कर रोती थीं।

रंगमंडली का निर्माण

अपने अभिनय, निर्देशन व बतौर संगठक जो अनूठा काम उषा गांगुली ने किया, वो एक परिघटना की तरह है। वे इकलौती ऐसी महिला रंगकर्मी थीं, जिन्होंने आजादी के पश्चात हिन्दी रंगमंच की पहली पेशेवर रंगमंडली का निर्माण किया। हबीब तनवीर को छोड़कर चार दशकों से भी अधिक वक्त तक अपने नाट्य संगठन को सफलतापूर्वक चलाए रखने वाली कोई दूसरी मिसाल नहीं है। उषा गांगुली द्वारा स्थापित ‘रंगकर्मी’ की गिनती भारत के बेहतरीन नाट्य समूहों में होती है। उनका वामपंथी आन्दोलन से जुड़ाव व मार्क्सवाद के प्रति गहरी प्रतिबद्धता उन्हें रंग-निर्देशकों की भीड़ से बिल्कुल अलहदा बना देता था।

सम्मान व पुरस्कार

साल 1998 में उषा गांगुली को संगीत नाटक अकादमी, भारत के राष्ट्रीय संगीत अकादमी, नृत्य और नाटक द्वारा दिए गए निर्देशन के लिए संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उन्हें 'गुडिया घर' नाटक के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के रूप में पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा भी सम्मानित भी किया गया।

मृत्यु

जानी-मानी रंगकर्मी उषा गांगुली का निधन 23 अप्रॅल, 2020 को कोलकाता, पश्चिम बंगाल में हुआ। उनकी उम्र 75 वर्ष थी। पारिवारिक सूत्रों के मुताबिक़ उषा गांगुली रीढ़ की हड्डी की समस्या से लंबे वक्त से परेशान थीं। शहर के लेक गार्डेंस इलाके में स्थित अपने फ्लैट में वह सुबह सात बजे घरेलू सहायिका को अचेत अवस्था में मिलीं। जब डॉक्टर को बुलाया गया तो उसने बताया कि कुछ समय पहले दिल का दौरा पड़ने से उनकी मौत हुई।

गुरुवार, 13 अप्रैल 2023

शमशाद बेगम

*गुज़रे ज़माने की महान पार्श्व गायिका शमशाद बेगम के जन्मदिन पर हार्दिक श्रधांजलि*

शमशाद बेगम भारतीय सिनेमा में हिन्दी फ़िल्मों की शुरुआती पार्श्वगायिकाओं में से एक थीं। हिन्दी सिनेमा के प्रारम्भिक दौर में उनकी खनखती और सुरीली आवाज़ ने एक बहुत बड़ी संख्या में उनके प्रशसकों की भीड़ तैयार कर दी थी। हिन्दी फ़िल्मों के कई सुपरहिट गीत, जैसे- 'कभी आर कभी पार', 'कजरा मोहब्बत वाला', 'लेके पहला-पहला प्यार', 'बूझ मेरा क्या नाम रे' शमशाद बेगम के नाम पर दर्ज हैं। इन गीतों की लोकप्रियता ने शमशाद बेगम को प्रसिद्धि की बुलन्दियों पर पहुँचा दिया था। वर्ष 2009 में भारत सरकार ने शमशाद बेगम को कला के क्षेत्र में उनके विशिष्ट योगदान के लिए ' पद्मभूषण' से सम्मानित किया था।

शमशाद बेगम का जन्म 14 अप्रैल, सन 1919 को पंजाब राज्य के अमृतसर में हुआ था। वे अपनी युवावस्था से ही के. एल. सहगल की बहुत बड़ी प्रशंसक थीं। फ़िल्में देखना और गीत सुनना उन्हें बहुत पसन्द था। फ़िल्में देखने का शौक़ शमशाद बेगम को इस कदर था कि उन्होंने फ़िल्म ' देवदास' चौदह बार देखी थी। शमशाद बेगम का विवाह गणपतलाल बट्टो के साथ हुआ था। वर्ष 1955 में पति की मृत्यु के बाद वे मुम्बई आ गई थीं और बेटी उषा रात्रा और दामाद के साथ रहने लगी थीं।

पहली बार शमशाद बेगम की आवाज़ लाहौर के पेशावर रेडियो के माध्यम से 16 दिसम्बर, 1947 को लोगों के सामने आई। उनकी आवाज़ के जादू ने लोगों को उनका प्रशंसक बना दिया। तत्कालीन समय में शमशाद बेगम को प्रत्येक गीत गाने पर पन्द्रह रुपये पारिश्रमिक मिलता था। उस समय की प्रसिद्ध कम्पनी जेनोफ़ोन, जो कि संगीत रिकॉर्ड करती थी, उससे अनुबन्ध पूरा होने पर शमशाद बेगम को 5000 रुपये से सम्मानित किया गया था।

शमशाद बेगम की सम्मोहक आवाज़ ने महान संगीतकार नौशाद और ओ. पी. नैय्यर का ध्यान अपनी ओर खींच लिया था और इन्होंने फ़िल्मों में पार्श्वगायिका के रूप में इन्हें गायन का मौका दिया। इसके बाद तो शमशाद बेगम की सुरीली आवाज़ ने लोगों को इनका दीवाना बना दिया। पचास, आठ और सत्तर के दशक में शमशाद बेगम संगीत निर्देशकों की पहली पसंद बनी रहीं। शमशाद बेगम ने 'ऑल इंडिया रेडियो' के लिए भी गाया। इन्होंने अपना म्यूज़िकल ग्रुप 'द क्राउन थिएट्रिकल कंपनी ऑफ़ परफॉर्मिंग आर्ट' बनाया और इसके माध्यम से पूरे देश
में अनेकों प्रस्तुतियाँ दीं। इन्होंने कुछ म्यूज़िक कंपनियों के लिए भक्ति के गीत भी गाए। मशहूर संगीतकार ओ. पी.
नैयर ने उनकी आवाज़ को 'मंदिर की घंटी' बताया था। शमशाद बेगम ने उस समय के सभी मशहूर संगीतकारों के साथ काम किया।

आवाज़ ने सारंगी के उस्ताद हुसैन बख्शवाले साहेब का ध्यान भी अपनी ओर खींचा और उन्होंने इन्हें अपनी
शिष्या बना लिया। लाहौर के संगीतकार ग़ुलाम हैदर ने इनकी जादुई आवाज़ का इस्तेमाल फ़िल्म 'खजांची' ( 1941 ) और 'खानदान' ( 1942 ) में किया। वर्ष 1944 में शमशाद बेगम ग़ुलाम हैदर की टीम के साथ मुंबई आ गई थीं। यहाँ इन्होंने कई फ़िल्मों के लिए गाया। इन्होंने पाश्चात्य से प्रभावित पहला गीत 'मेरी जान मेरी जान सनडे के सनडे' गाकर धूम मचा दी थी। इनकी गायन शैली पूरी तरह मौलिक थी। इन्हें लता मंगेशकर, आशा भोंसले, गीता दत्त और अमीरबाई कर्नाटकी से जरा भी कम नहीं आंका गया।

भारत के प्रमुख त्योहारों में से एक होली पर यूँ तो हिन्दी फ़िल्मों में असंख्य गाने लिखे और गाये गए हैं, किंतु होली का सबसे लोकप्रिय गीत शकील बदायूँनी ने लिखा था। इस गीत को अपने समय के ख्यातिप्राप्त संगीतकार नौशाद ने संगीतबद्ध किया। शमशाद बेगम ने इस
गीत को अपनी सुरीली आवाज़ से सजाकर अमर बना दिया। फ़िल्म 'मदर इंडिया' का यह गीत अभिनेत्री नर्गिस पर फ़िल्माया गया था और गीत के बोल थे- "होली आई रे
कन्हाई रंग छलके, सुना दे ज़रा बाँसूरी"। इस गीत में गोपियाँ नटखट कृष्ण से गुज़ारिश कर रही हैं कि वे होली के मौके पर अपनी जादूई बाँसुरी बजाना बंद न करें। यह गीत अपने समय के सबसे सफल गीतों में से एक था, जो लोगों के हृदय पर छा गया था।

प्रमुख गीत

'छोड़ बाबुल का घर' मदर इंडिया
'होली आई रे कन्हाई' मदर इंडिया ( 1957 
'ओ गाड़ी वाले गाड़ी धीरे हाँक रे' मदर इंडिया
'तेरी महफ़िल में क़िस्मत आज़मा कर हम भी देखेंगे' मुग़ल-ए-आज़म
'मेरे पिया गए रंगून' पतंगा
'कभी आर कभी पार' आर पार
'लेके पहला पहला प्यार' सी.आई.डी. ( 1956 )
'कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना' सी.आई.डी. ( 1956 )
'बूझ मेरा क्या नाम रे, नदी किनारे गाँव रे'सी.आई.डी. ( 1956 ) 
'मिलते ही आंखें दिल हुआ दीवाना किसी का। बाबुल
'बचपन के दिन भुला न देना' दीदार
'दूर कोई गाए' बैजू बावरा
'सैया दिल में आना रे' बहार
'मोहन की मुरलिया बाजे' मेला ( 1948 )
'कजरा मुहब्बत वाला' क़िस्मत ( 1968)

अपनी सुरीली आवाज़ से हिन्दी फ़िल्म संगीत की सुनहरी हस्ताक्षर शमशाद बेगम के गानों में अल्हड़ झरने की लापरवाह रवानी, जीवन की सच्चाई जैसा खुरदरापन और बहुत दिन पहले चुभे किसी काँटे की रह रहकर उठने वाली टीस का सा एहसास समझ में आता है।उनकी आवाज़ की यह अदाएँ सुनने वालों को बरबस ही अपनी ओर आकर्षित करती है और उनके गानों की लोकप्रियता का आलम यह है कि आज भी उन पर रीमिक्स बन रहे हैं।

'प्रेस्टिजियस ओ.पी. नैयर अवार्ड'
- 2009' पद्म भूषण - 2009

भारतीय सिनेमा में अपनी सुरीली आवाज़ से लोगों का दिल जीत लेने वाली मशहूर पार्श्वगायिका शमशाद बेगम का निधन 23 अप्रैल , 2013 को मुम्बई में हो गया। शमशान बेगम ने हिन्दी फ़िल्म जगत से भले ही कई वर्ष पहले दूरियाँ बना ली थीं, किंतु अपने पूरे कैरियर में बेशुमार और प्रसिद्ध गानों को अपनी आवाज़ दी। उन्होंने न जाने कितने ही अनगिनत गानों को अपनी आवाज़ से सजाकर हमेशा-हमेशा के लिए ज़िंदा कर दिया। उनकी
बेटी उषा का कहना था कि- "मेरी माँ हमेशा यही कहती थीं की मेरी मौत के बाद मेरे अंतिम संस्कार के बाद ही किसी को बताना कि मैं अब इस दुनिया से जा चुकी हूँ, और मैं कहीं नहीं जाउँगी जहाँ से आई थी, वहीं वापस जा रही हूँ, मैं सदा सबके साथ हूँ। ये खनकी आवाज़ अब अपनी जुबान से गाये गए गानों से ही सबके दिलों को सुकून देगी।"

आशा भोसले

आशा भोसले 🎂08 सितंबर 1933 ⚰️12 अप्रैल 2026 जन्म की तारीख और समय: 8 सितंबर 1933, सांगली मृत्यु की जगह और तारीख: 12 अप्रैल 2026 ब...