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बुधवार, 12 अप्रैल 2023

वर्मा मलिक

प्रसिद्ध फ़िल्मी गीतकार वर्मा मालिक के जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धांजलि

वर्मा मलिक या बरकत राय मलिक भारतीय सिनेमा में प्रसिद्ध गीतकार थे। वह पंजाबी और उर्दू के लेखक थे। हिंदी भाषा उन्होंने मुम्बई आकर ही सीखी थी। उन्होंने पंजाबी फ़िल्मों से अपने कॅरियर की शुरुआत की थी। सर्वप्रथम उन्होंने हंसराज बहल की फ़िल्म में काम किया था।

वर्मा मलिक का पूरा नाम बरकत राय मलिक था। उनका जन्म 13 अप्रैल, 1925 को फ़िरोज़पुर, ब्रिटिश भारत में हुआ था। बहुत कम उम्र में ही उन्होंने कविता लिखना शुरू कर दिया था। वो दौर आज़ादी की लड़ाई का था। स्कूल में पढ़ रहे वर्मा मलिक अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ गीत लिखकर कांग्रेस के जलसों और सभाओं में सुनाया करते थे। वह कांग्रेस पार्टी के सक्रिय सदस्य बन गए। इसका अंजाम यह हुआ कि उन्हें गिरफ़्तार कर जेल में डाल दिया गया, लेकिन कम उम्र होने की वजह से वो जल्द ही रिहा भी कर दिए गए।

वह अपने गीतों की प्रशंसा और सराहना में मग्न ही थे कि देश का विभाजन हो गया। ख़ौफनाक परिस्थितियों में वर्मा ज़ख्मी हालत में फ़िरोज़पुर से जान बचाकर भागे। विभाजन के हंगामे में उन्हें पैर में गोली लगी। उन्होंने दिल्ली में शरण ली। दिल्ली आकर उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि पेट पालने के लिए वो क्या करें। संगीत निर्देशक हंसराज बहल के भाई, वर्मा मलिक के दोस्त थे उनके कहने पर वर्मा ने मुंबई की राह पकड़ी। हंसराज बहल ने वर्मा को पंजाबी फ़िल्म 'लच्छी' में गीत लिखने का काम दिया और देखते देखते वर्मा पंजाबी फ़िल्मों के हिट गीतकार बन गए। इसी समय उनके मित्रों ने उन्हें नाम बदलने की सलाह दी और बरकत राय मलिक, वर्मा मलिक के नाम से फ़िल्मी दुनिया में पहचाने जाने लगे। हंसराज बहल की निकटता में वर्मा ने संगीत की समझ भी विकसित की और यमला जट सहित तीन पंजाबी फ़िल्मों में संगीत भी दिया। बहुमुखी प्रतिभा के मालिक इस शख़्स ने करीब 40 पंजाबी फ़िल्मों में गीत लिखे, दो तीन फ़िल्मों के संवाद लिखे और तीन फ़िल्मों का निर्देशन भी किया। लेकिन छठा दशक शुरू होते होते मुंबई में पंजाबी फ़िल्मों का बाज़ार ठप्प पड़ गया। नतीजा यह हुआ कि पंजाबी फ़िल्मों के सबसे लोकप्रिय गीतकार वर्मा मलिक बेरोज़ग़ार हो गए।

हालांकि 1953 में उन्होंने हिंदी फ़िल्म 'चकोरी' के गीत लिखने का मौक़ा मिला था इसके निर्देशक भी हंसराज बहल थे, लेकिन फ़िल्म हिट नहीं हो सकी कुछ और फ़िल्मों में भी वर्मा ने हिंदी गीत लिखे। फ़िल्म 'दिल और मोहब्बत' के लिए ओ. पी. नैय्यर के संगीत निर्देशन में लिखा गीत 'आंखों की तलाशी दे दे मेरे दिल की हो गयी चोरी' लोकप्रिय भी हुआ, लेकिन वर्मा मलिक को हिंदी फ़िल्मों के गीत लिखने के और मौके नहीं मिले। पंजाबी फ़िल्मों की व्यस्तता की वजह से वर्मा ने भी अधिक भागदौड़ नहीं की। मूल रूप से पंजाबी और उर्दू जानने वाले वर्मा मलिक को मुंबई आते ही हिंदी की अहमियत का एहसास हो गया था। पंजाबी गीत लिखने के दौर में उन्होंने बाक़ायदा हिंदी लिखनी पढ़नी सीखी। उन्होंने इस भाषा को कितनी गहराई से पढ़ा इसका सुबूत फ़िल्म 'हम तुम और वो' के इस गाने से मिलता है। "प्रिये प्राणेश्वरी.. हृदयेश्वरी, यदि आप हमें आदेश करें तो प्रेम का हम श्रीगणेश करें..."। यह इकलौता ऐसा गाना था जिसमें गूढ़ हिंदी शब्दों का प्रयोग किया गया और गाना बेहद हिट हुआ। बेरोज़गारी का दौर लंबा होने लगा तो वर्मा मलिक गुमनाम से हो गए। उन्होंने काफ़ी भागदौड़ की मगर कोई फ़ायदा नहीं हुआ। विभाजन के बाद वर्मा मलिक के जीवन का सबसे कड़ा समय खिंचता ही चला गया। हताश होकर उन्होंने फ़ैसला कर लिया कि वो गीत लिखने की तलाश बंद कर अब कोई दूसरा काम शुरू कर देंगे क्योंकि घर का खर्च चलाना नामुमकिन हो गया था

अब सवाल ये था कि वे क्या काम करें इसी उधेड़ बुन में भटकते हुए के दिन वर्मा फेमस स्टूडियो के सामने से गुज़रे तो उन्हें अपने मित्र मोहन सहगल की याद आयी। उनसे मिलने के दौरान ही कल्याणजी आनंदजी का ज़िक्र हुआ और गीत लिखने के मौके की तलाश में वर्मा कल्याणजी के घर जा पहुंचे। उस समय मनोज कुमार कल्याणजी के साथ बैठे हुए थे। मनोज कुमार वर्मा मलिक को जानते थे और उनके पंजाबी गीतों के प्रशंसक भी थे। मनोज कुमार ने वर्मा मलिक से पूछा कि क्या नया लिखा है वर्मा ने उन्हें तीन चार गीत सुनाए जिसमें एक गीत यह भी था "रात अकेली, साए दो हुस्न भी हो और इश्क भी हो तो फिर उसके बाद इकतारा बोले तुन तुन" मनोज को यह गीत पसंद आ गया और उन्होंने अपनी फ़िल्म 'उपकार' के लिये गीत चुन लिया, लेकिन बदकिस्मती से उपकार में इस गीत की सिचुएशन नहीं निकल पायी।

मनोज कुमार न ये गीत भूले न ही वर्मा मलिक को भूल पाए। उन्होंने अपनी अगली फ़िल्म 'यादगार' के लिये इस गाने को सामाजिक परिप्रेक्ष्य में लिखने को कहा तो वर्मा मलिक ने गीत को इस तरह बदल दिया बातें लंबीं मतलब गोल, खोल न दे कहीं सबकी पोल तो फिर उसके बाद इकतारा बोले तुन तुन, फ़िल्म 'यादगार' हिट हुई और ये गाना भी। फ़िल्मों में एक हिट से किस्मत बदल जाती है। वर्मा मलिक के साथ भी ऐसा ही हुआ। इसके बाद वर्मा के हाथ में काम ही काम आ गया। सफलता और लोकप्रियता के उजाले ने निराशा और हताशा के अंधेरे को खत्म कर दिया।

रेखा की पहली फ़िल्म 'सावन भादों' में वर्मा के लिखे इस गीत ने कई साल तक धूम मचाए रखी 'कान में झुमका चाल में ठुमका कमर पे चोटी लटके हो गया दिल का पुर्जा पुर्जा लगे पचासी झटके', हो तेरा रंग है नशीला अंग-अंग है नशीला'। यह गीत काफ़ी लोकप्रिय रहा। इसके बाद 'पहचान', 'बेईमान', 'अनहोनी', 'धर्मा', 'कसौटी', 'विक्टोरिया न. 203', 'नागिन', 'चोरी मेरा काम', 'रोटी कपड़ा और मकान', 'संतान', 'एक से बढ़कर एक', जैसी फ़िल्मों में हिट गीत लिखने वाले वर्मा मलिक जिंदगी को भरपूर अंदाज़ में जीने लगे।

फ़िल्म 'पहचान' के गीत "सबसे बड़ा नादान वही है" के लिए- फ़िल्मफेयर ट्रॉफ़ी
फ़िल्म 'बेइमान' के गीत "जय बोलो बेइमान की जय बोलो" के लिये- फ़िल्मफेयर ट्रॉफ़ी

आठवें दशक में फ़िल्म संगीत में बहुत बदलाव आना शुरू हो गया था। इसी समय वर्मा मलिक की जीवन संगिनी की मौत हो गयी। इस घटना ने वर्मा मलिक पर ऐसा असर डाला कि उनकी जिंदगी से दिलचस्पी खत्म हो गयी। ऐसे में गीत लिखने का सिलसिला भी रूक गया। धीरे-धीरे वो फ़िल्मी दुनिया से ही नहीं पूरी दुनिया से कटकर अपने कमरे में सिमट गए। उनके पुत्र राजेश मलिक असिस्टेंट डायरेक्टर हैं लेकिन उनके बहुत कहने पर भी वर्मा मलिक ने कलम नहीं उठायी।

वर्मा मलिक ने 15 मार्च, 2009 को मुम्बई, महाराष्ट्र में बहुत ख़ामोशी से दुनिया से विदा ले ली। इतनी ख़ामोशी से कि उनके मरने का ज़िक्र अगले दिन किसी अख़बार में भी नहीं हुआ

बलराज साहनी


महान अभिनेता बलराज साहनी की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रधांजलि

बलराज साहनी  हिन्दी फ़िल्मों के प्रसिद्ध अभिनेता थे। उनका जन्म रावलपिंडी ( पाकिस्तान ) में हुआ था। बलराज साहनी ख्याति प्राप्त लेखक भीष्म साहनी के बड़े भाई व चरित्र अभिनेता परीक्षत साहनी के पिता थे। वे रंगमंच और सिनेमा की अप्रतिम प्रतिभा थे।बलराज साहनी को एक ऐसे अभिनेता के रूप में जाना जाता था, जिन्हें रंगमंच और फ़िल्म दोनों ही माध्यमों में समान दिलचस्पी थी।उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे अपने सशक्त अभिनय से दर्शकों को पर्दे के पात्र से भावनात्मक रूप से जोड़ देते थे।

रावलपिंडी में एक मध्यम वर्गीय व्यवसायी परिवार में 1 मई , 1913 को बलराज साहनी का जन्म हुआ था। उनका मूल नाम 'युधिष्ठर साहनी' था। बलराज साहनी का झुकाव बचपन से ही पिता के पेशे की ओर न होकर अभिनय की ओर था। उन्होंने अंग्रेज़ी साहित्य में स्नात्तकोत्तर की शिक्षा लाहौर के मशहूर 'गवर्नमेंट कॉलेज' से पूरी की थी। पढ़ाई पूरी करने के बाद बलराज साहनी रावलपिंडी लौट गये और पिता के व्यापार में उनका हाथ बंटाने लगे।

वर्ष 1930 के अंत मे बलराज साहनी और उनकी पत्नी दमयंती रावलपिंडी को छोड़कर गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर के ' शांति निकेतन' पहुंचे, जहां बलराज साहनी अंग्रेज़ी के शिक्षक नियुक्त हुए। वर्ष 1938 में बलराज साहनी ने महात्मा गांधी के साथ भी काम किया। इसके एक वर्ष के पश्चात महात्मा गांधी के सहयोग से बलराज साहनी को
बी.बी.सी के हिन्दी के उदघोषक के रूप में इंग्लैंड में नियुक्त किया गया। लगभग पांच वर्ष के इग्लैंड प्रवास के बाद वह 1943 में भारत लौट आये

बलराज साहनी अपने बचपन का शौक़ पूरा करने के लिये 'इंडियन प्रोग्रेसिव थियेटर एसोसियेशन' ( इप्टा ) में
शामिल हो गये। 'इप्टा' में वर्ष 1946 में उन्हें सबसे पहले फणी मजमूदार के नाटक 'इंसाफ' में अभिनय करने का मौका मिला। इसके साथ ही ख़्वाजा अहमद अब्बास के निर्देशन में इप्टा की ही निर्मित फ़िल्म 'धरती के लाल' में
भी बलराज साहनी को बतौर अभिनेता काम करने का मौका मिला। इप्टा से जुडे रहने के कारण बलराज साहनी को कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। उन्हें अपने क्रांतिकारी और कम्युनिस्ट विचारों के कारण जेल भी जाना पडा। उन दिनों वह फ़िल्म 'हलचल' की शूटिंग में व्यस्त थे और निर्माता के आग्रह पर विशेष व्यवस्था के तहत फ़िल्म की शूटिंग किया करते थे। शूटिंग खत्म होने के बाद वापस जेल चले जाते थे।  साम्यवादी विचारधारा के मुखर समर्थक साहनी जनमानस के अभिनेता थे, जो अपने सशक्त अभिनय से दर्शकों को पर्दे के पात्र से भावनात्मक रूप से जोड़ देते थे। जब पर्दे पर वह अपनी ' दो बीघा ज़मीन ' फ़िल्म में ज़मीन गंवा चुके मज़दूर, रिक्शा चालक की भूमिका में नज़र आए तो कहीं से नहीं महसूस हुआ कि कोलकाता की सड़कों पर रिक्शा खींच रहा रिक्शा चालक शंभु नहीं बल्कि कोई स्थापित अभिनेता है। दरअसल पात्रों में पूरी तरह डूब जाना उनकी खूबी थी। यह 'काबुली वाला', 'लाजवंती', 'हक़ीक़त', दो बीघा ज़मीन , 'धरती के लाल', ' गर्म हवा ', 'वक़्त', 'दो रास्ते' सहित उनकी किसी भी फ़िल्म में महसूस किया जा सकता है।

बलराज साहनी का फ़िल्मों में आना संयोग ही रहा था। उन्होंने 'हंस पत्रिका' को एक कहानी लिखी थी, जो अस्वीकृत होकर लौट आई। उन्होंने खुद ही लिखा है कि- "वह उन भाग्यशाली लेखकों में थे जिनकी भेजी हुई कोई रचना अस्वीकृत नहीं हुई थी।" लेकिन बीच में चार साल तक उन्होंने कोई कहानी नहीं लिखी। छूटे अभ्यास को बहाल करने का प्रयास करते हुए उन्होंने एक कहानी लिखी और उसे 'हंस पत्रिका' को भेज दिया, लेकिन वह अस्वीकृत होकर वापस आ गई। इससे उनके स्वाभिमान को ठेस लगी और उसके बाद उन्होंने कोई कहानी नहीं लिखी। उन्होंने अपने एक आलेख में लिखा था कि फ़िल्मों का मार्ग अपनाने का कारण वह अस्वीकृत कहानी भी रही।

दो बीघा ज़मीन
धरती के लाल
हमलोग
गर्म हवा
सीमा
वक़्त
कठपुतली
लाजवंती
सोने की चिडिया
घर संसार
सट्टा बाज़ार
भाभी की चूड़ियाँ
हक़ीक़त
दो रास्ते
एक फूल दो माली
मेरे हमसफर
दो बीघा ज़मीन
दो बीघा ज़मीन 
उनकी प्रमुख फिल्में है
वर्ष 1953 में बिमल राय के निर्देशन मे बनी फ़िल्म दो बीघा जमीन बलराज साहनी के कैरियर मे अहम पड़ाव साबित हुई। फ़िल्म दो बीघा जमीन की कामयाबी के बाद बलराज साहनी शोहरत की बुंलदियों पर जा पहुंचे। इस फ़िल्म के माध्यम से उन्होंने एक रिक्शावाले के किरदार को जीवंत कर दिया। रिक्शावाले को फ़िल्मी पर्दे पर साकार करने के लिये बलराज साहनी ने कलकत्ता की सड़कों पर 15 दिनों तक खुद रिक्शा चलाया और रिक्शेवालों की ज़िंदगी के बारे में उनसे जानकारी हासिल की। फ़िल्म की शुरूआत के समय निर्देशक बिमल राय सोचते थे कि बलराज साहनी शायद ही फ़िल्म मे रिक्शावाले के किरदार को अच्छी तरह से निभा सकें। वास्तविक ज़िंदगी मे बलराज साहनी बहुत पढे लिखे इंसान थे। लेकिन उन्होंने बिमल राय की सोच को गलत साबित करते हुये फ़िल्म में अपने किरदार के साथ पूरा न्याय किया। दो बीघा जमीन को आज भी भारतीय फ़िल्म इतिहास की सर्वश्रेष्ठ कला फ़िल्मों में शुमार किया जाता है। इस फ़िल्म को अंतराष्ट्रीय स्तर पर भी काफ़ी सराहा गया तथा कांस फ़िल्म महोत्सव के दौरान इसे अंतराष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हुआ।

फ़िल्म ‘हलचल’ के ठीक बाद बलराज साहनी को जिया सरहदी की फ़िल्म ‘हम लोग’ का प्रस्ताव मिला था। इसमें उन्हें एक निम्न मध्यवर्गीय परिवार के बेरोजगार युवक की भूमिका मिली। यह पहली फिल्म थी, जिसमें बलराज काफ़ी हद तक अपने रंग में नजर आये और कैमरे के सामने की उनकी अकड़न खत्म-सी हो गयी। ‘हम लोग’ सफल रही और बलराज के अभिनय को काफ़ी सराहा गया। अब वे आर्थिक रूप से भी बेहतर स्थिति में थे। ‘दो बीघा जमीन’ में तो उनकी प्रतिभा पूरी तरह परवान चढ़ गई थी। वे अपने किरदार के साथ एकाकार हो गये और एक बेहतरीन स्क्रीन अभिनेता के तौर पर उनकी पहचान स्थापित हो गयी।

मुंबई के उपनगर जोगेश्वरी में दूध वालों की एक बस्ती थी। ये दूध वाले उत्तर प्रदेश से थे। जिस दिन बलराज को ‘दो बीघा जमीन’ के लिए चुना गया, उस दिन से ही उन्होंने जोगेश्वरी के इन दूध वालों की कॉलोनी में जाना शुरू कर
दिया। वे गौर से दूध वालों के जीवन को देखा करते थे। उनके बातचीत करने, उठने-बैठने के तरीके पर गौर करते थे। उन्होंने लिखा है कि- "दो बीघा जमीन’ में मेरी सफलता के पीछे इन दूध वालों की जिंदगी का नजदीकी मुआयना काफ़ी काम आया"। फिर कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता ) में शूटिंग के दौरान उनकी बिहार से आये एक रिक्शे वाले से मुलाकात हुई। जब बलराज ने उस रिक्शे वाले को फिल्म की कहानी सुनाई तो वह रोने लगा और उसने बताया कि यह तो बिल्कुल मेरी कहानी है। उसके पास भी दो बीघा जमीन थी, जो उसने एक
जमींदार के पास गिरवी रखी थी और वह उसे छुड़ाने के लिए पिछले पंद्रह साल से कलकत्ता में रिक्शा चला रहा था। हालांकि उसे उम्मीद नहीं थी कि वह उस जमीन को कभी हासिल कर पायेगा। इस अनुभव ने बलराज साहनी को बदल कर रख दिया। उन्होंने खुद से कहा कि- "मुझ पर दुनिया को एक गरीब, बेबस आदमी की कहानी बताने की जिम्मेदारी डाली गयी है, और मैं इस जिम्मेदारी को
उठाने के योग्य होऊं या न होऊं, मुझे अपनी ऊर्जा का एक-एक कतरा इस जिम्मेदारी को निभाने में खर्च करना चाहिए"। 

बलराज साहनी बेहतरीन साहित्यकार भी थे, जिन्होंने 'पाकिस्तान का सफ़र' और 'रूसी सफरनामा' जैसे चर्चित यात्रा वृतांतों की रचना की, जिनमें उन देशों की राजनीतिक, भौगोलिक, आर्थिक और सामाजिक परिस्थतियों का शानदार चित्रण किया गया है।

बलराज साहनी की मृत्यु 13 अप्रैल 1973 को मुंबई में हुआ।

आशा भोसले

आशा भोसले 🎂08 सितंबर 1933 ⚰️12 अप्रैल 2026 जन्म की तारीख और समय: 8 सितंबर 1933, सांगली मृत्यु की जगह और तारीख: 12 अप्रैल 2026 ब...