| जन्म | 27 अप्रैल 1993 जयपुर , राजस्थान , भारत |
|---|---|
| पेशा | अभिनेत्री |
| सक्रिय वर्ष | 2012 वर्तमान |
| के लिए जाना जाता है | कुंडली भाग्य |
शिवेंद्र सैनियोल । । ( एम। 2019 रूही मिस इंडिया वर्ल वाइड2010 की फाइनलिस्ट थीं । उन्होंने लेक्मे विक इंडिया फैशन वीक राजी स्टार जे जे व्लाया विक्रम फडनिस रित कुमार और रितु बेरी के लिए मॉडलिंग की है । चतुर्वेदी ने 2012 की जीवनसाथी म्यूजिकल थ्रिलर फिल्म अलाप से अपनी शुरुआत की 2017 में तब वो सुर्खियों में आई जब जी टीवी के भाग्य कुंडली धारावाहिक में शर्लिन खुराना के क्रेक्टर को निभाया मार्च 2023 में, उन्होंने एक पीढ़ी की छलांग के कारण श्रृंखला छोड़ दी क्योंकि वह एक अभिनेत्री के रूप में और अधिक खोज करना चाहती थीं। दिसंबर 2022 से वह स्टार भारत में आशाओं का सवेरा......धीरे धीरे में नजर आई |
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बुधवार, 26 अप्रैल 2023
रूही
मीनू मुमताज
अभिनेत्री मीनू मुमताज़ के जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धांजलि
मीनू मुमताज़ का जन्म 26 अप्रैल 1942 में मुम्बई तत्कालीन बॉम्बे में हुआ था
मीनू मुमताज़ भारतीय अभिनेत्री थीं। वह अपने समय के मशहूर कॉमेडियन महमूद अली की बहन थीं। भारतीय सिनेमा की दिग्गज अभिनेत्री रहीं मीना कुमारी और मीनू मुमताज़ में काफी गहरी मित्रता थी। सन 1950 से लेकर 1960 के दशक में बतौर डांसर कई फिल्मों में काम करने वाली मीनू मुमताज़ एक डांसर के साथ-साथ कैरेक्टर आर्टिस्ट भी थीं। मीनू मुमताज़ का असली नाम मालिकाउन्निसा अली था। जब फिल्मों में काम करने लगीं तो मीना कुमारी ने उनका नाम बदलकर मीनू मुमताज़ कर दिया था। तब से फिल्म इंडस्ट्री में मीनू मुमताज़ के नाम से मशहूर हो गईं।
परिचय
मीनू मुमताज ने फिल्मी दुनिया में ‘सखी हातिम’ से कदम रखा था। 1950 और 1960 के दशक की कई हिंदी फिल्मों में उन्होंने काम किया। कई बार फिल्मों में वह डांसर के तौर पर भी नजर आई हैं। उनकी सबसे ज्यादा मशहूर फिल्मों में ‘सीआईडी’, ‘नया दौर’, ‘ताज महल’, ‘गबन’ और ‘जमीर’ शामिल हैं। पहली फिल्म ‘सखी हातिम’ में मीनू मुमताज बलराज साहनी जैसे दिग्गज अभिनेता के साथ थीं। उन्होंने गुरुदत्त साहब के साथ भी काम किया। ‘चौदहवीं का चांद’, ‘कागज के फूल’, ‘साहिब बीवी और गुलाम’, ‘ताजमहल’, ‘घूंघट’, ‘इंसान जाग उठा’, ‘घर बसाके देखो’ जैसी कई फिल्मों में उन्होंने काम किया था।
मृत्यु
अभिनेत्री मीनू मुमताज़ की मृत्यु 23 अक्टूबर, 2021 को कनाडा में हुई। वह बीते कई सालों से बीमार थीं और लगभग बीस वर्षों से कनाडा में ही रह रही थीं। मीनू मुमताज़ के निधन के बारे में बात करते हुए उनके भतीजे नौषाद ने कहा, "वह जईफ थीं और उनकी उम्र भी 80 के आसपास थी। अब तक मैं जिस किसी से भी मिला हूं, वह उनमें से सबसे प्यारी इंसान थीं।" अपने बड़े भाई महमूद की तरह मीनू मुमताज़ ने भी अपनी पहचान फिल्मों में बनाने का फैसला किया था।
फिरोज खान
*हिंदी फिल्मो के प्रसिद्ध अभिनेता निर्माता निर्देशक फ़िरोज़ खान की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रधांजलि*
हिन्दी फ़िल्मों के प्रसिद्ध अभिनेता एवं फ़िल्म निर्माता-निर्देशक थे। फ़िरोज़ ख़ान अपनी ख़ास शैली, अलग अंदाज़ और किरदारों के लिए जाने जाते रहे।फ़िल्मों में कहीं वो एक सुंदर हीरो की भूमिका में हैं तो कहीं खूंखार विलेन के रोल में दोनों ही चरित्रों में फ़िरोज़ ख़ान जान डाल देते थे।
फ़िरोज़ ख़ान का *जन्म 25 सितंबर,1939 को बेंगलूर में हुआ था*।अफ़ग़ानी पिता और ईरानी माँ के बेटे फ़िरोज़ बेंगलूर से हीरो बनने का सपना लेकर मुंबई पहुंचे। उनके तीन भाई संजय ख़ान(अभिनेता-निर्माता), अकबर ख़ान और समीर ख़ान हैं। उनकी एक बहन हैं,जिनका नाम दिलशाद बीबी है। फ़िरोज़ ख़ान ने सुंदरी के साथ जिंदगी का सफर 1965 में शुरू किया। दोनों 20 साल तक साथ रहे। 1985 में उनके बीच तलाक हो गया। फ़िरोज़ ख़ान के पुत्र फ़रदीन ख़ान भी अभिनेता हैं।
बॉलीवुड में फ़िरोज़ ख़ान ने अपने कैरियर की शुरूआत 1960 में बनी फ़िल्म 'दीदी' से की। शुरुआती कुछ फ़िल्मों में अभिनेता का किरदार निभाने के बाद उन्होंने कुछ समय के लिए खलनायकों की भी भूमिका अदा की ख़ास तौर पर गांव के गुंडों की। वर्ष 1962 में फ़िरोज़ ने अंग्रेज़ी भाषा की एक फ़िल्म 'टार्जन गोज टू इंडिया' में काम किया। इस फ़िल्म में नायिका सिमी ग्रेवाल थीं। 1965 में उनकी पहली हिट फ़िल्म 'ऊंचे लोग' आई जिसने उन्हें सफलता का स्वाद चखाया।अभिनय के लिहाज से फ़िरोज़ ख़ान के लिए 70 का दशक ख़ास रहा।फ़िल्म 'आदमी और इंसान' (1970) में अभिनय के लिए फ़िरोज़ को फ़िल्म फेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक कलाकार का पुरस्कार मिला। 70 के दशक में उन्होंने आदमी और इंसान, मेला, धर्मात्मा जैसी बेहतरीन फ़िल्में दीं। इसी दशक में उन्होंने निर्माता-निर्देशक के रूप में अपना सफर शुरू किया। उनके इस सफर की शुरुआत फ़िल्म धर्मात्मा से हुई। वर्ष 1980 की फ़िल्म क़ुर्बानी से उन्होंने एक सफल निर्माता-निर्देशक के रूप में सभी को अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। क़ुर्बानी उनके कैरियर की सबसे सफल फ़िल्म रही। इसमें उनके साथ विनोद खन्ना भी प्रमुख भूमिका में थे। क़ुर्बानी ने हिंदी सिनेमा को एक नया रूप दिया। क़ुर्बानी ने ही हिंदी सिनेमा में अभिनेत्रियों को भी हॉट एंड बोल्ड होने का अवसर दिया। फ़िल्म में फ़िरोज़ और जीनत अमान की बिंदास जोड़ी को दर्शकों ने खूब पसंद किया।
फ़िल्मों से अभिनय के बाद उन्होंने निर्देशन की तरफ रुख किया। उन्होंने लीक से हट कर फ़िल्में बनाई। 70 से 80 के दशक के बीच उनके निर्देशन में बनी फ़िल्में धर्मात्मा, क़ुर्बानी, जांबाज और दयावान बॉक्स ऑफिस पर हिट हुई। वर्ष 1975 में बनी धर्मात्मा पहली भारतीय फ़िल्म थी जिसकी शूटिंग अफ़ग़ानिस्तान में की गई। यह एक निर्माता निर्देशक के रूप में फ़िरोज़ की पहली हिट फ़िल्म भी थी। यह फ़िल्म हॉलीवुड की फ़िल्म गॉडफादर पर आधारित थी। 1998 में फ़िल्म प्रेम अगन से उन्होंने अपने बेटे को फ़िल्मों में लाने का काम किया पर उनके बेटे फ़रदीन ख़ान उनकी तरह शोहरत बटोरने में विफल रहे। 2003 में उन्होंने अपने बेटे और स्पोर्ट्स प्यार के लिए फ़िल्म 'जानशीं' बनाई पर फ़िल्म में अभिनय करने के बाद भी वह अपने बेटे को हिट नहीं करवा सके। फ़िरोज़ ख़ान ने आखिरी बार फ़िल्म वेलकम में काम किया। फ़िल्म वेलकम में भी उनका वही बिंदास स्टाइल नजर आया जिसके लिए वह जाने जाते हैं। फ़िरोज़ ख़ान को बालीवुड की ऐसी शख्सियत के रूप में याद किया जाता है जिन्होंने फ़िल्म निर्माण की अपनी विशेष शैली बनाई थी। फ़िरोज़ ख़ान की निर्मित फ़िल्मों पर नजर डालें तो उनकी फ़िल्में बड़े बजट की हुआ करती थीं। जिनमें बड़े-बड़े सितारे, आकर्षक और भव्य सेट, खूबसूरत लोकेशन, दिल को छू लेने वाला गीत, संगीत और उम्दा तकनीक देखने को मिलती थी। अभिनेता के रूप में भी फ़िरोज़ ख़ान ने बालीवुड के नायक की परम्परागत छवि के विपरीत अपनी एक विशेष शैली गढ़ी जो आकर्षक और तड़क-भड़क वाली छवि थी। उनकी अकड़कर चलने की अदा और काउब्वाय वाली इमेज दर्शकों के मन में आज भी बसी हुई है। फ़िल्म निर्माण और निर्देशन के क्रम में फ़िरोज़ ख़ान ने हिन्दी फ़िल्मों में कुछ नई बातों का आगाज किया। अपराध फ़िल्म में भारत की पहली फ़िल्म थी जिसमें जर्मनी में कार रेस दिखाई गई थी।धर्मात्मा की शूटिंग के लिए वह अफ़ग़ानिस्तान के खूबसूरत लोकेशनों पर गए। इससे पहले भारत की किसी भी फ़िल्म का वहां फ़िल्मांकन नहीं किया गया था। अपने कैरियर की सबसे हिट फ़िल्म क़ुर्बानी से फीरोज ख़ान ने पाकिस्तान की पॉप गायिका नाजिया हसन के संगीत कैरियर की शुरुआत कराई। वर्ष 2003 में फ़िरोज़ ख़ान ने अपने पुत्र फ़रदीन ख़ान को लांच करने के लिये जानशीं का निर्माण किया।बॉलीवुड में लेडी किलर के नाम से मशहूर फ़िरोज़ ख़ान ने चार दशक लंबे सिने कैरियर में लगभग 60 फ़िल्मों में अभिनय किया। उनकी उल्लेखनीय फ़िल्मों में कुछ हैं आग, प्यासी शाम, सफर, मेला, खोटे सिक्के, गीता मेरा नाम, इंटरनेशनल क्रुक, काला सोना, शंकर शंभु,नागिन, चुनौती, क़ुर्बानी वेलकम आदि।
ख़ुद को किसी दायरे में बांध कर नहीं रखने वाले ही एक दिन दुनिया को अपने सम्मोहन से बांध देते हैं। बॉलीवुड की दुनिया में जहां अभिनेता फ़िल्में खो देने के डर से अपनी छवि में बंधे रहते हैं वहां एक अभिनेता ऐसा भी था जिसने कभी ख़ुद को किसी छवि में बंधने नहीं दिया।अभिनेता फ़िरोज़ ख़ान ने बॉलीवुड में स्टाइलिश और बिंदास होने के जो पैमाने रखे उस तक आज भी कोई नहीं पहुंच पाया है। राजसी अंदाज़ में उन्होंने एक अर्से तक दर्शकों के दिलों पर राज किया है। फ़िल्म इंडस्ट्री में ऐसे कई प्रसंग और किस्से हैं, जिनमें फ़िरोज़ ख़ान ने बेधड़क दिल की बात रखी।अपने इस बिंदास और बेख़ौफ़ मिज़ाज के कारण वे आलोचना के शिकार हुए और कई बेहतरीन फ़िल्में उनके हाथों से निकल गई। कहते हैं कि संगम के निर्माण के समय राज कपूर ने राजेंद्र कुमार के पहले उनके नाम पर विचार किया था। पुरानी और नयी पीढ़ी के अभिनेताओं के बीच फ़िरोज़ एक योजक की तरह रहे। उन्हें अपने मुखर, खुले, आक्रामक और एक हद तक अहंकारी स्वभाव के कारण बदनामी झेलनी पड़ी। इसके बावजूद उन्होंने छवि सुधारने की कोशिश नहीं की।अपने लापरवाह अंदाज़ में जीते रहे। फ़िरोज़ एक मंझे हुए अभिनेता के साथ ही अपनी स्पष्ट राय रखने के लिए जाने जाते थे। कुछ वर्ष पहले उन्होंने पाकिस्तान की स्थिति को लेकर बयान दिया तो वहां के शासकों की नज़र में वह चुभ गए। यही वजह रही कि उन्हें पाकिस्तान का वीजा न देने का फैसला हुआ। इसके बावजूद वह अपनी बेबाक राय पर अडिग रहे। हालांकि फ़िरोज़ ख़ान ने असल जिंदगी में काफ़ी संघर्ष भी किया है।
उन्हें वर्ष 1970 में फ़िल्म 'आदमी और इंसान' के लिए फ़िल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेता का पुरस्कार दिया।
वर्ष 2000 में फ़िरोज़ को लाइफटाइम अचीवमेंट का फ़िल्मफेयर पुरस्कार दिया गया।
अपने बेटे फ़रदीन के करियर को चमकाने की उन्होंने कोशिश की, लेकिन बात नहीं बनी। कुछ फ़िल्मों में फ़िरोज़ ने चरित्र रोल भी निभाए, लेकिन 'शेर भले ही बूढ़ा हो जाए, वह घास नहीं खाता' अंदाज में फ़िरोज़ ने अपनी आन-बान-शान हमेशा कायम रखी।फ़िरोज़ ख़ान कैंसर से पीड़ित थे और मुंबई में उनका लंबे समय तक इलाज चला। *27 अप्रैल ,2009 को उन्होंने बेंगलूर स्थित अपने फार्म हाउस में अंतिम सांस ली।*
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नाम :- फिरोज खान
जन्म नाम :- जुल्फिकार अली शाह खान
जन्म तिथि :- 25 सितंबर 1939
जन्म स्थान :- बैंगलोर, कर्नाटक, भारत
ऊंचाई :- 1.83 मी
मिनी बायो:- फ़िरोज़ का जन्म 25 सितंबर, 1939 को बैंगलोर में एक पठान पिता, सादिक और एक ईरानी माँ, फातिमा के यहाँ हुआ था। उनके तीन भाई हैं, अब्बास उर्फ संजय, अकबर और समीर। संजय और अकबर दोनों अपने-अपने अधिकारों के भीतर अभिनेता हैं, जबकि समीर एक फिल्म-निर्माता हैं और बैंगलोर में स्थित उनके गोल्डन पाम्स स्पा में सहायता करते हैं। उन्होंने 1960 में बैंगलोर के एक अंग्रेजी माध्यम स्कूल से लौटने के बाद सिल्वर स्क्रीन पर अपनी एंट्री की। . उनका करियर शुरू में 'दीदी' में एक नायक के रूप में शुरू हुआ, फिर उन्होंने खलनायक की भूमिकाओं के लिए साइन अप किया, और फिर एक नायक के रूप में वापसी की। धर्मात्मा, कुर्बानी, जांबाज़ और दयावान की रिलीज़ के बाद वह और भी लोकप्रिय हो गए। उन्हें आदमी और इंसान में उनकी भूमिका के लिए एक पुरस्कार मिला। 27 अप्रैल, 2009 को उनके बंगलौर फार्म हाउस में कैंसर से उनकी मृत्यु हो गई। उन्हें स्पोर्ट्स-कार रेस पसंद है और उन्होंने इस खेल को अपराध और फिर जानशीन में शामिल किया है। वह अपने चरित्र का नाम राजेश या राकेश रखना पसंद करते हैं। वह भगवान श्री साईं बाबा के उपासक हैं और हमेशा अपनी उंगली पर सोने की अंगूठी पहनते हैं और उनके पास एक तस्वीर है। साईं बाबा भारत में मुसलमानों, ईसाइयों, सिखों और हिंदुओं द्वारा पूजनीय और पूजे जाते हैं। उन्होंने 1965 में सुंदरी से शादी की और वे लैला और फरदीन के माता-पिता बन गए। एक इस्लामी मौलवी द्वारा आपत्ति जताए जाने के बावजूद, फ़िरोज़ और संजय ने अपने बच्चों की शादी गैर-इस्लामी परिवारों से कर दी। लैला की शादी राजपाल से हुई थी, जबकि फरदीन ने मयूर और पूर्व बॉलीवुड आकर्षक मुमताज की बेटी नताशा माधवानी से शादी की थी। सुंदरी और फ़िरोज़ का 1985 से तलाक हो गया है। फ़िरोज़ विवादों से दूर रहे हैं, हालाँकि उन्होंने खुद को रूढ़िवादी पाकिस्तानी सरकार द्वारा प्रतिबंधित कर लिया था। अभिनय के अलावा इस प्रतिभाशाली कलाकार ने फिल्मों का संपादन, निर्माण, लेखन और निर्देशन भी किया है।
विनोद खन्ना
जन्म
6 अक्टूबर 1946 (आयु 76)
पेशावर (1901–55), ब्रितानी भारत
(अभी, पाकिस्तान)
मृत्यु
27 अप्रैल 2017
व्यवसाय
अभिनेता ,राजनीतिज्ञ
जीवनसाथी
गीताजंलि (1971–1985 तलाक)
कविता (1990–2017 (निधन तक))
बच्चे
राहुल खन्ना (पुत्र)
अक्षय खन्ना (पुत्र)
साक्षी खन्ना (पुत्र)
श्रद्धा खन्ना (पुत्री)
विनोद खन्ना का जन्म एक व्यापारिक परिवार में ०६ अक्टूबर १९४६ को पेशावर ,ब्रितानी भारत (वर्तमान पाकिस्तान) में हुआ था। उनका परिवार अगले साल १९४७ में हुए भारत-पाक विभाजन के बाद पेशावर से मुंबई आ गया था। उनके माता-पिता का नाम क्रमशः कमला और किशनचंद खन्ना था। १९६० के बाद की उनकी स्कूली शिक्षा नासिक के एक बोर्डिंग स्कूल में हुई वहीं उन्होंने सिद्धेहम कॉलेज से वाणिज्य में स्नातक किया था।
इनके तीन पुत्र और एक पुत्री है,जिसमें अक्षय खन्ना और राहुल खन्ना जो कि दोनों फ़िल्म अभिनेता है। २७ अप्रैल २०१७ को लम्बे समय से कैंसर से पीड़ित रहने के कारण मुम्बई के एच एन रिलायंस अस्पताल में निधन हो गया।
फिल्मी सफर
उन्होंने अपने फ़िल्मी सफर की शुरूआत १९६८ में आयी फ़िल्म "मन का मीत" से की,जिसमें उन्होंने एक खलनायक(गद्दार) का अभिनय किया था। कई फ़िल्मों में उल्लेखनीय सहायक और खलनायक के किरदार निभाने के बाद १९७१ में उनकी पहली एकल हीरो वाली फ़िल्म हम तुम और वो आयी। कुछ वर्ष के फ़िल्मी संन्यास, जिसके दौरान वे आचार्य रजनीश के अनुयायी बन गए थे। बाद में उन्होंने अपनी दूसरी फ़िल्मी पारी भी सफलतापूर्वक खेली(किरदार निभाया) और २०१७ तक फ़िल्मों में सक्रिय रहे।
राजनैतिक कैरियर
वर्ष १९९७ और १९९९ में वे दो बार पंजाब के गुरदासपुर क्षेत्र से भाजपा की ओर से सांसद चुने गए थे। जबकि २००२ में वे संस्कृति और पर्यटन के केन्द्रिय मंत्री भी रहे। इसके बाद सिर्फ ६ माह पश्चात ही उनको अति महत्वपूर्ण विदेश मामलों के मंत्रालय में राज्य मंत्री बना दिया गया था।
विनोद खन्ना की फिल्में
1978 खून की पुकार
1978 खून का बदला खून
1978 मैं तुलसी तेरे आँगन की अजय चौहान
1978 आखिरी डाकू
1978 डाकू और जवान
1978 मुकद्दर का सिकन्दर विशाल आनन्द
1977 हत्यारा विजय सिंह
1977 आप की खातिर सागर
1977 इंकार
1977 अमर अकबर एन्थोनी अमर
1977 खून पसीना
1977 परवरिश किशन
1977 जलियाँ वाला बाग़
1977 आधा दिन आधी रात
1977 महा बदमाश
1977 चोर सिपाही
1976 शक विनोद जोशी
1976 शंकर शंभु
1976 हेरा फेरी
1976 नेहले पे देहला
1976 लगाम
1975 ज़मीर
1975 सेवक
1975 प्रेम कहानी
1975 कैद वकील जय सक्सेना
1974 हाथ की सफाई शंकर कुमार
1974 इम्तहान प्रमोद शर्मा
1974 पत्थर और पायल
1974 चौकीदार गोपाल
1974 फ़रेबी
1974 कुँवारा बाप
1973 अचानक मेजर रंजीत खन्ना
1973 कच्चे धागे
1973 पाँच दुश्मन
1973 प्यार का रिश्ता
1973 अनोखी अदा गोपाल
1973 धमकी
1973 गद्दार
1972 दो यार
1972 सब का साथी
1972 परिचय
1972 एक खिलाड़ी बावन पत्ते
1972 एक हसीना दो दीवाने
1972 एक बेचारा
1972 परछाइयाँ
1971 दोस्त और दुश्मन
1971 एलान राम सिंह
1971 मेरे अपने श्याम
1971 मेमसाब अर्जुन
1971 हंगामा
1971 मेरा गाँव मेरा देश जब्बार सिंह
1971 रेशमा और शेरा विजय सिंह
1971 रखवाला श्याम
1971 प्रीतम अनिल ठाकुर
1971 जाने अनजाने पुलिस इंस्पेक्टर हेमंत
1971 हम तुम और वो विजय
1970 पूरब और पश्चिम
1970 सच्चा झूठा इंस्पेक्टर प्रधान
1970 आन मिलो सजना अनिल चौधरी
1970 मस्ताना इंस्पेक्टर प्रसाद
1969 नतीजा
1968 मन का मीत
बतौर निर्माता
1997 हिमालय पुत्र
नामांकन और पुरस्कार
1999 में उनको फ़िल्मों में उनके 30 वर्ष से भी ज्यादा समय के योगदान के लिए फिल्मफेयर के लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित भी किया गया।2018 में उन्हें मरणोपरांत भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च पुरस्कार, दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
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