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सोमवार, 18 मार्च 2024

गीत कार योगेश

#29may
#19marche 
प्रसिद्ध गीतकार योगेश 

 🎂19 मार्च, 1943, लखनऊ, उत्तर प्रदेश; 

⚰️मृत्यु- 29 मई, 2020, मुम्बई, महाराष्ट्र) 

प्रसिद्ध भारतीय गीतकार और लेखक थे। उन्हें विशेष रूप से फ़िल्म 'आनंद' के गीत 'कहीं दूर जब दिन ढल जाये' और 'ज़िन्दगी कैसी है पहेली हाए'; 'रिमझिम गिरे सावन' (फ़िल्म- मंज़िल), 'रजनीगंधा फूल तुम्हारे' (फ़िल्म- रजनीगंधा) जैसे सुपरहित गीतों के लिए प्रसिद्धि प्राप्त है। भारतीय हिंदी सिनेमा में उनके दिये योगदान के लिए उन्हें 'दादा साहब फाल्के पुरस्कार' के अलावा 'यश भारती पुरस्कार' भी दिया गया।

जीवन परिचय

हिन्दी फ़िल्मों के सुपरिचित गीतकार योगेश गौड उर्फ़ योगेश का जन्म लखनऊ, उत्तर प्रदेश में एक मध्यवर्गीय परिवार में हुआ। आरंभिक शिक्षा लखनऊ के संस्कृति संपन्न माहौल में हुई, इस तरह योगेश का बचपन और किशोरावस्था यहीं बीते। पिता की असामयिक मृत्यु के कारण पढाई बीच में ही रोक कर रोज़गार की तलाश में लग गए। परिवार, मित्रों की सलाह पर मायानगरी मुंबई का रुख किया, मकसद इतना था कि जल्द-से-जल्द कोई काम मिले। मुंबई फ़िल्म उद्योग में पहला लक्ष्य नहीं था, महानगर की परिस्थितियों में योगेश को समझ में नहीं आ रहा था कि किस तरह एक शुरुआत होगी। इस क्रम में उन्होंने कहानी लेखन को चुना और सफ़र पर निकल पड़े, धीरे-धीरे पटकथाएं और संवाद लिखकर सिने-जीवन का आगाज़ किया

गीत एवं पटकथा लेखन

योगेश जी के मुंबई में आरंभिक संघर्ष को मित्र व सहयोगी सत्यप्रकाश ने साथ दिया, दोनों में सच्ची दोस्ती सा रिश्ता बना। भाई सत्यप्रकाश योगेश के सलाहकार, प्रेरक और संकट-मोचक रहे। मित्र के साथ ‘चाल’ में गुज़रा यह वक्त प्रेरणा का वरदान सा बन गया। आत्म-निर्भर पहचान के लिए अपने नाम से ‘गौड’ हटाने का फ़ैसला उनके व्यक्तित्व विकास के लिए अवसरों के नए द्वार लेकर आया, कहानी, पटकथा, संवाद के बाद कविता और गीत-लेखन की ओर उन्मुख हुए। यहां पर बचपन में कविता लिख कर याद करने का अभ्यास काम आया। लखनऊ का साहित्य-सांस्कृतिक सांचा और आत्मबल योगेश को कवि-गीतकार रूप दे गया।

योगेश जी को सगीत निर्देशक की ‘धुनों’ पर गीत लिखना पसंद नहीं था। गीत-लेखन की तकनीकी मांगों से अपरिचित होकर फ़िल्मकार रोबिन बैनर्जी के पास काम मांगा। उस समय सगीत धुनों पर ही गीत लिखने का चलन था। रोबिन बैनर्जी उन दिनों फ़िल्म ‘मासूम’ (1963) पर काम कर रहे थे। योगेश को रोबिन जी ने इस फ़िल्म के गीत लिखने को कहा। इस अनुभव ने उनकी आँखें खोल दी। अब वह संगीत धुनों पर लिखने को समझ चुके थे। रोबिन बैनर्जी-योगेश का सफ़र सखी रौबिन, मारवेल मैन, फ़्लाइंग सर्कस, रौबिनहुड समेत लगभग दर्जन भर फ़िल्मों तक रहा।

फ़िल्म 'आनंद' से मिली सफलता

प्रसिद्ध संगीत निर्देशक सलिल चौधरी बहु-चर्चित फ़िल्म ‘आनंद’ (1971) पर काम कर रहे थे, उन्हें इस फ़िल्म के लिए एक सुलझे हुए गीतकार की तलाश थी। मशहूर शैलेन्द्र की कमी में योगेश का चयन किया। आनंद की सफ़लता से ‘योगेश’ देशभर में विख्यात होकर सलिल चौधरी के साथ अपने कैरियर की ‘सफ़लतम’ यात्रा पर निकल पड़े। सलिल दा-योगेश ने आनंद के अलावे ‘अनोखादान’, ‘अन्नदाता’, ‘आनंद महल’, ‘रजनीगंधा’ और ‘मीनू’ जैसी फ़िल्मों में साथ काम किया। सलिल दा की जलेबीदार, कठिन संगीत धुनों के लिए गीत लिखना योगेश के लिए बहुत ही ‘चुनौतीपूर्ण’ कार्य रहा। निस दिन, रजनीगंधा फूल तुम्हारे, प्यास लिए मनवा जैसे गीतों में गीतकार की ‘कविताई’ निखर कर सामने आई। इस तरह सलिल दा के मापदंडों पर एक गीतकार ‘कवि’ भी बन सका।

योगेश ने अपने कैरियर में संगीतकार घरानों के ‘पिता-पुत्र’ संगीतकारों के साथ काम किया, इस परम्परा में सलिल एवं संजय चौधरी और सचिन देव एवं राहुल देव बर्मन के लिए गीत लिखे। जाने-माने संगीतकार सचिन देव बर्मन की ‘उसपार’ तथा ‘मिली’ योगेश के यादगार ‘प्रोजेक्ट’ रहे, इन फ़िल्मों का जीवंत गीत-संगीत इस साथ की सुनहरी याद है। 'मिली' अभी पूरी भी न हुई थी कि सचिन देव बीच में ‘बीमार’ पड़ गए, पिता की आधी फ़िल्म को राहुल देव बर्मन ने ‘बडी सूनी-सूनी है ज़िंदगी’ और ‘मैने कहा फूलों से’ रिकार्ड कर पूरा किया। संगीतकार राहुल की ‘लिस्ट’ में योगेश का नम्बर पाँचवीं पायदान पर आता था, फिर भी राहुल देव-योगेश की जोड़ी 8 से 10 फ़िल्मों में साथ आई।

फ़िल्मकार ऋषिकेश मुखर्जी के निर्देशन मे बनी ‘आनंद’ (1971) के बाद योगेश को सिने जगत् में उचित सम्मान मिला, फ़िल्म के कभी ना भुलाए जा सकने वाले गीत आज भी लोकप्रिय बने हुए हैं। कहा जाता है कि ऋषिकेश जी को ‘आनंद’ बनाने की प्रेरणा मूलत: एक जापानी फ़िल्म से मिली, कहानी से इस क़दर प्रोत्साहित हुए कि केन्द्र में ‘महिला’ को रखकर ‘मिली’ भी बनाई। योगेश जी ने दोनों फ़िल्मों के गीत लिखकर ऋषिकेश दा की ‘सबसे बड़ा सुख’, ‘रंग-बिरंगी’ और ‘किसी से ना कहना’ के गीत समेत अनेक फ़िल्मों के गीत लिखे।[1]

प्रसिद्ध गीत

कहीं दूर जब दिन ढल जाये (आनंद)
रिमझिम गिरे सावन (मंज़िल)
रजनीगंधा फूल तुम्हारे (रजनीगंधा)
ज़िन्दगी कैसी है पहेली (आनंद)
ना बोले तुम, ना मैने कुछ कहा (बातों बातों में)
कई बार यूँ भी देखा है (रजनीगंधा)
कहा तक ये मन को अंधेरे छलेंगे (बातों बातों में)
आए तुम याद मुझे, गाने लगी हर धडकन (मिली)
न जाने क्यों होता है, ये जिंदगी के साथ (छोटी सी बात)

मृत्यु

गीतकार तथा लेखक योगेश का निधन 29 मई, 2020 को बसई, मुम्बई में हुआ।

हिंदी सिनेमा की महान कलाकार लता मंगेशकर ने उनके निधन पर लिखा- "मुझे अभी पता चला कि दिल को छूने वाले गीत लिखने वाले कवि योगेश जी का आज स्वर्गवास हो गया है। ये सुनकर मुझे बहुत दु:ख हुआ। योगेश जी के लिखे गीत मैंने गाए। योगेश जी बहुत शांत और मधुर स्वभाव के इंसान थे। मैं उनको विनम्र श्रद्धांजलि अर्पण करती हूं"। योगेश के साथ लता मंगेशकर ने कई फिल्मों में काम किया था।
🎥
  • (1993)चोर और चांद
  •  (1994)दुलारा
  • (1995) बेवफा सनम 

रविवार, 28 मई 2023

पृथ्वी राज कपूर

महान अभिनेता पृथ्वीराज कपूर की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रधांजलि

हम अपने बेटे के धड़कते हुए दिल के लिये हिन्दुस्तान की तकदीर नहीं बदल सकते.” 

“हम मोहब्बत के दुश्मन नहीं, अपने उसूलों के ग़ुलाम हैं.” 
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🔛जन्म की तारीख और समय: 14 दिसंबर 1924, पेशावर पाकिस्तान

मृत्यु की जगह और तारीख: 2 जून 1988, नई दिल्ली

बच्चे:रितु नंदा रीमा कपूर राजी कपूर रणधीर कपूर ऋषि कपूर
पत्नी: कृष्णा कपूर (विवा. 1946–1988)
दादा या नाना: 
दीवान बाशेस्वरनाथ सिंह कपूर
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विविध भारती

पृथ्वीराज कपूर हिंदी फ़िल्म और रंगमंच अभिनय के इतिहास पुरुष, जिन्होंने बंबई में पृथ्वी थिएटर स्थापित किया। 'भारतीय सिनेमा जगत् के युगपुरुष' पृथ्वीराज कपूर का नाम एक ऐसे अभिनेता के रूप में याद किया जाता है, जिन्होंने अपनी कड़क आवाज, रोबदार भाव भंगिमाओं और दमदार अभिनय के बल पर लगभग चार दशकों तक सिने दर्शकों के दिलों पर राज किया।

पृथ्वीराज ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा लायलपुर और लाहौर (पाकिस्तान) में रहकर पूरी की। पृथ्वीराज के पिता दीवान बशेस्वरनाथ कपूर पुलिस विभाग में सब इंस्पेक्टर के रूप में कार्यरत थे। बाद में उनके पिता का तबादला पेशावर में हो गया। पृथ्वीराज ने अपनी आगे की पढ़ाई पेशावर के एडवर्ड कॉलेज से की। साथ ही उन्होंने एक वर्ष तक क़ानून की पढ़ाई भी की लेकिन बीच में ही उन्होंने अपनी पढ़ाई छोड़ दी, क्योंकि उस समय तक उनका रुझान थिएटर की ओर हो गया था।

पृथ्वीराज कपूर का महज 18 वर्ष की उम्र में ही विवाह हो गया और वर्ष 1928 में अपनी चाची से आर्थिक सहायता लेकर पृथ्वीराज कपूर अपने सपनों के शहर मुंबई पहुंचे।

पृथ्वीराज कपूर 1928 में मुंबई में इंपीरियल फ़िल्म कंपनी से जुडे़ थे। वर्ष 1930 में बीपी मिश्रा की फ़िल्म 'सिनेमा गर्ल' में उन्होंने अभिनय किया। इसके कुछ समय पश्चात् एंडरसन की थिएटर कंपनी के नाटक शेक्सपियर में भी उन्होंने अभिनय किया। लगभग दो वर्ष तक फ़िल्म इंडस्ट्री में संघर्ष करने के बाद पृथ्वीराज को वर्ष 1931 में प्रदर्शित फ़िल्म आलम आरा में सहायक अभिनेता के रूप में काम करने का मौक़ा मिला।

वर्ष 1933 में पृथ्वीराज कपूर कोलकाता के मशहूर न्यू थिएटर के साथ जुड़े। वर्ष 1933 में प्रदर्शित फ़िल्म 'राज रानी' और वर्ष 1934 में देवकी बोस की फ़िल्म 'सीता' की कामयाबी के बाद बतौर अभिनेता पृथ्वीराज अपनी पहचान बनाने में सफल हो गए। इसके बाद पृथ्वीराज ने न्यू थिएटर की निर्मित कई फ़िल्मों में अभिनय किया। इन फ़िल्मों में 'मंजिल' 1936 और 'प्रेसिडेंट' 1937 जैसी फ़िल्में शामिल हैं। वर्ष 1937 में प्रदर्शित फ़िल्म विद्यापति में पृथ्वीराज के अभिनय को दर्शकों ने काफ़ी सराहा। वर्ष 1938 में चंदूलाल शाह के रंजीत मूवीटोन के लिए पृथ्वीराज अनुबंधित किए गए। रंजीत मूवी के बैनर तले वर्ष 1940 में प्रदर्शित फ़िल्म 'पागल' में पृथ्वीराज कपूर अपने सिने कैरियर में पहली बार एंटी हीरो की भूमिका निभाई। इसके बाद वर्ष 1941 में सोहराब मोदी की फ़िल्म सिकंदर की सफलता के बाद पृथ्वीराज कामयाबी के शिखर पर जा पहुंचे। 

वर्ष 1944 में पृथ्वीराज कपूर ने अपनी खुद की थियेटर कंपनी पृथ्वी थिएटर शुरू की। पृथ्वी थिएटर में उन्होंने आधुनिक और शहरी विचारधारा का इस्तेमाल किया, जो उस समय के फारसी और परंपरागत थिएटरों से काफ़ी अलग था। धीरे-धीरे दर्शकों का ध्यान थिएटर की ओर से हट गया, क्योंकि उन दिनों दर्शकों के ऊपर रुपहले पर्दे का क्रेज कुछ ज़्यादा ही हावी हो चला था। सोलह वर्ष में पृथ्वी थिएटर के 2662 शो हुए जिनमें पृथ्वीराज ने लगभग सभी शो में मुख्य किरदार निभाया। पृथ्वी थिएटर के प्रति पृथ्वीराज इस क़दर समर्पित थे कि तबीयत ख़राब होने के बावजूद भी वह हर शो में हिस्सा लिया करते थे। वह शो एक दिन के अंतराल पर नियमित रूप से होता था। एक बार तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने उनसे विदेश में जा रहे सांस्कृतिक प्रतिनिधिमंडल का प्रतिनिधित्व करने की पेशकश की, लेकिन पृथ्वीराज ने नेहरू जी से यह कह उनकी पेशकश नामंजूर कर दी कि वह थिएटर के काम को छोड़कर वह विदेश नहीं जा सकते। पृथ्वी थिएटर के बहुचर्चित कुछ प्रमुख नाटकों में दीवार, पठान, 1947, गद्दार, 1948 और पैसा 1954 शामिल है। पृथ्वीराज ने अपने थिएटर के जरिए कई छुपी हुई प्रतिभा को आगे बढ़ने का मौक़ा दिया, जिनमें रामानंद सागर और शंकर जयकिशन जैसे बड़े नाम शामिल है।

आकर्षक व्यक्तित्व व शानदार आवाज़ के स्वामी पृथ्वीराज कपूर ने सिनेमा और रंगमंच दोनों माध्यमों में अपनी अभिनय क्षमता का परिचय दिया हालांकि उनका पहला प्यार थिएटर ही था। उनके पृथ्वी थिएटर ने क़रीब 16 वर्षों में दो हज़ार से अधिक नाट्य प्रस्तुतियां कीं। पृथ्वी राज कपूर ने अपनी अधिकतर नाट्य प्रस्तुतियों में महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाईं। थिएटर के प्रति उनकी दीवानगी स्पष्ट थी। पृथ्वी थिएटर की नाट्य प्रस्तुतियों में सामाजिक जागरूकता के साथ ही देशभक्ति और मानवीयता को प्रश्रय दिया गया। वर्ष 1944 में स्थापित पृथ्वी थिएटर के नाटकों में यथार्थवाद और आदर्शवाद पर भी पर्याप्त ज़ोर दिया गया।

इसी दौरान पृथ्वीराज कपूर की मुग़ले आजम, हरिश्चंद्र तारामती, सिकंदरे आजम, आसमान, महल जैसी कुछ सफल फ़िल्में प्रदर्शित हुईं। वर्ष 1960 में प्रदर्शित के. आसिफ की मुग़ले आज़म में उनके सामने अभिनय सम्राट दिलीप कुमार थे, इसके बावजूद पृथ्वीराज कपूर अपने दमदार अभिनय से दर्शकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने में सफल रहे। वर्ष 1965 में प्रदर्शित फ़िल्म आसमान महल में पृथ्वीराज ने अपने सिने कैरियर की एक और न भूलने वाली भूमिका निभाई। इसके बाद वर्ष 1968 में प्रदर्शित फ़िल्म तीन बहुरानियां में पृथ्वीराज ने परिवार के मुखिया की भूमिका निभाई, जो अपनी बहुरानियों को सच्चाई की राह पर चलने के लिए प्रेरित करता है। इसके साथ ही अपने पुत्र रणधीर कपूर की फ़िल्म कल आज और कल में भी पृथ्वीराज कपूर ने यादगार भूमिका निभाई। वर्ष 1969 में पृथ्वीराज कपूर ने एक पंजाबी फ़िल्म नानक नाम जहां है में भी अभिनय किया। फ़िल्म की सफलता ने लगभग गुमनामी में आ चुके पंजाबी फ़िल्म इंडस्ट्री को एक नया जीवन दिया।

पचास के दशक में पृथ्वीराज कपूर की जो फ़िल्में प्रदर्शित हुईं उनमें शांताराम की दहेज 1950 के साथ ही उनके पुत्र राज कपूर की निर्मित फ़िल्म आवारा प्रमुख है। फ़िल्म आवारा में पृथ्वीराज कपूर ने अपने पुत्र राजकपूर के साथ अभिनय किया। साठ का दशक आते-आते पृथ्वीराज कपूर ने फ़िल्मों में काम करना काफ़ी कम कर दिया।

पृथ्वीराज को देश के सर्वोच्च फ़िल्म सम्मान दादा साहब फाल्के के अलावा पद्म भूषण तथा कई अन्य पुरस्कारों से भी नवाजा गया। उन्हें राज्यसभा के लिए भी नामित किया गया था

उनकी अंतिम फ़िल्मों में राज कपूर की आवारा (1951), कल आज और कल, जिसमें कपूर परिवार की तीन पीढ़ियों ने अभिनय किया था और ख़्वाजा अहमद अब्बास की 'आसमान महल' भी थी। एक अभिनेता और प्रतिभा पारखी के रूप में उनकी दुर्जेय प्रतिष्ठा मूल रूप से उनके शानदार फ़िल्मी जीवन के पूर्वार्द्ध पर आधारित है। फ़िल्मों में अपने अभिनय से सम्मोहित करने वाले और रंगमंच को नई दिशा देने वाली यह महान् हस्ती 29 मई, 1972 को इस दुनिया से रुखसत हो गए। उन्हें मरणोपरांत दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

आशा भोसले

आशा भोसले 🎂08 सितंबर 1933 ⚰️12 अप्रैल 2026 जन्म की तारीख और समय: 8 सितंबर 1933, सांगली मृत्यु की जगह और तारीख: 12 अप्रैल 2026 ब...