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शुक्रवार, 28 अप्रैल 2023

केदार शर्मा

राज कपूर, भारत भूषण, मधुबाला, माला सिन्हा और तनूजा को फ़िल्म इंडस्ट्री में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले प्रसिद्ध निर्माता-निर्देशक और अभिनेता केदार शर्मा के की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रधांजलि

केदार शर्मा  भारतीय फ़िल्म निर्देशक, निर्माता, पटकथा लेखक और हिंदी फ़िल्मों के गीतकार थे। उन्हें बॉलीवुड में ऐसे फ़िल्मकार के तौर पर याद किया जाता है जिन्होंने राज कपूर, भारत भूषण, मधुबाला, माला सिन्हा और तनुजा को फ़िल्म इंडस्ट्री में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। केदार शर्मा ने कई फ़िल्मों में अपने अभिनय से भी दर्शकों का दिल जीता। इन फ़िल्मों में इंकलाब, पुजारिन, विद्यापति, बड़ी दीदी, नेकी और बदी शामिल हैं।

केदार शर्मा का जन्म 12 अप्रैल, 1910 को पंजाब के नरौल शहर (अब पाकिस्तान) में हुआ था। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा अमृतसर से पूरी की। इसके बाद वह नौकरी की तलाश में मुंबई आ गए, लेकिन वहां काम नहीं मिलने के कारण वह अमृतसर लौट गए। इस बीच उन्होंने अमृतसर के ख़ालसा कॉलेज से स्नाकोत्तर की पढ़ाई पूरी की।

वर्ष 1933 में केदार शर्मा को देवकी बोस निर्देशित फ़िल्म 'पुराण भगत' देखने का अवसर मिला। इस फ़िल्म से वह इस कदर प्रभावित हुए कि उन्होंने निश्चय किया कि वह फ़िल्मों में ही अपना करियर बनाएंगे। अपने इसी सपने को पूरा करने के लिए केदार कलकत्ता चले गए। कलकत्ता में केदार की मुलाकात फ़िल्मकार देवकी बोस से हुई और उनकी सिफ़ारिश से उन्हें न्यू थियेटर में बतौर छायाकार शामिल कर लिया गया। वर्ष 1934 में प्रदर्शित फ़िल्म 'सीता' बतौर छायाकर केदार की पहली फ़िल्म थी। इसके बाद न्यू थियेटर की फ़िल्म 'इंकलाब' में केदार को एक छोटी सी भूमिका निभाने का अवसर मिला। वर्ष 1936 में प्रदर्शित फ़िल्म 'देवदास' केदार शर्मा के सिने कैरियर की अहम फ़िल्म साबित हुई। इस फ़िल्म में वह बतौर कथाकार और गीतकार की भूमिका में थे। फ़िल्म हिट रही और केदार फ़िल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने में कामयाब हो गए।

केदार शर्मा को 1940 में फ़िल्म 'तुम्हारी जीत' को निर्देशित करने का मौका मिला, लेकिन दुर्भाग्य से यह फ़िल्म पूरी नहीं हो सकी। इसके बाद उन्होंने 'औलाद' फ़िल्म को निर्देशित किया, जिसकी सफलता के बाद वह कुछ हद तक बतौर निर्देशक अपनी पहचान बनाने में कामयाब हुए। वर्ष 1941 में उन्हें 'चित्रलेखा' फ़िल्म को निर्देशित करने का मौका मिला। इस फ़िल्म की सफलता के बाद केदार शर्मा बतौर निर्देशक फ़िल्म इंडस्ट्री में स्थापित हो गए। इन सबके साथ ही फ़िल्म 'चित्रलेखा' का स्नान दृश्य बहुत चर्चित हुआ था, जो फ़िल्म अभिनेत्री मेहताब पर फ़िल्माया गया था। इस फ़िल्म के बाद मेहताब दर्शकों के बीच काफ़ी लोकप्रिय हुई थीं, लेकिन फ़िल्म के शुरूआत के समय मेहताब स्नान दृश्य के फ़िल्मांकन के लिए तैयार नही थीं। केदार ने जब मेहताब के समक्ष स्नान दृश्य के फ़िल्मांकन का प्रस्ताव रखा तो मेहताब बोलीं, यह सीन आप दर्शकों के लिए रखना चाहते हैं या सिर्फ अपनी खुशी के लिए। केदार ने तब मेहताब को समझाया, देखो सेट पर अभिनेत्री और निर्देशक का रिश्ता पिता-पुत्री का होता है। केदार की यह बात मेहताब के दिल को छू गई और उसने केदार के सामने यह शर्त रखी कि दृश्य के फ़िल्मांकन के समय सेट पर केवल वहीं मौजूद रहेंगे।

केदार शर्मा ने वर्ष 1947 में फ़िल्म 'नीलकमल' के जरिए राजकपूर को रूपहले पर्दे पर पहली बार पेश किया। राजकपूर इसके पूर्व केदार की यूनिट में क्लैपर बॉय का काम किया करते थे। वर्ष 1950 में केदार ने फ़िल्म 'बावरे नैन' का निर्माण किया और अभिनेत्री गीता बाली को पहली बार बतौर अभिनेत्री काम करने का अवसर दिया। वर्ष 1950 में ही केदार की एक और सुपरहिट फ़िल्म 'जोगन' प्रदर्शित हुई। फ़िल्म में दिलीप कुमार और नरगिस मुख्य भूमिका में थे। केदार की यह विशेषता रहती थी कि जिस अभिनेता-अभिनेत्री के काम से वह खुश होते उसे पीतल की दुअन्नी देकर सम्मानित किया करते थे। राजकपूर, दिलीप कुमार, गीता बाली और नरगिस को यह सम्मान प्राप्त हुआ था।

केदार शर्मा ने कई फ़िल्मों में अपने अभिनय से भी दर्शकों का दिल जीता। इन फ़िल्मों में इंकलाब, पुजारिन, विद्यापति, बड़ी दीदी, नेकी और बदी शामिल हैं।

केदार शर्मा ने कई फ़िल्मों के लिए गीत भी लिखे। उन्होंने बच्चों के लिए भी कई फ़िल्में बनाईं, जिनमें जलदीप, गंगा की लहरें, गुलाब का फूल, 26 जनवरी, एकता, चेतक, मीरा का चित्र, महातीर्थ और खुदा हाफ़िज़ शामिल हैं।

केदार शर्मा पूरी इंडस्ट्री में अपने दबंग स्वभाव के लिए मशहूर थे। उन्होंने राजकपूर सहित इंडस्ट्री के बड़े-बड़े सूरमाओं के कस-बल ढीले कर दिए थे। तनुजा के उनके निर्देशन में बनने वाली फ़िल्म 'हमारी याद आएगी' में राजकपूर के अपोजिट कास्ट किया गया था। तनुजा सेट पर हमेशा हंसी-मजाक में ही व्यस्त रहती थीं, जबकि केदार शर्मा को सेट पर ऐसा माहौल बिलकुल पसंद नहीं था। इसके अलावा तनुजा को डायलॉग याद करने से भी जबरदस्त एलर्जी होती थीं, जिसकी वजह से केदार शर्मा काफ़ी परेशान हो चुके थे। दरअसल तनुजा अपने कॅरियर को संजीदगी से लेती ही नहीं थीं। उन पर हमेशा अपनी माँ और बहन का स्टारडम हावी रहता था। इसी फ़िल्म के एक सीन में उन्हें राजकपूर के सामने रोना था लेकिन जब सीन शूट होने लगता तनुजा रोने के बजाय हंसने लगती। केदार शर्मा की बार-बार हिदायत के बाद तनुजा ने उनसे कहा कि आज मेरा रोने का मूड नहीं है। बेहतर है कि इस सीन को बाद में शूट किया जाए, बस इतना सुनना था, कि केदार शर्मा का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया और उन्होंने ना आंव देखा ना ताव और एक झन्नाटेदार थप्पड़ तनुजा के गालों पर रसीद कर दिया। केदार शर्मा के इस गुस्से से पूरी यूनिट सन्न रह गयी।

पुरस्कार और सम्मान

केदार शर्मा को निम्नलिखित पुरस्कार और सम्मान प्राप्त हुए थे-

राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार 1956 में सर्वश्रेष्ठ बाल फ़िल्म के जलदीप के लिये दिया गया।
इंडियन फ़िल्म डायरेक्टर्स एसोसिएशन लाइफ़टाइम अचीवमेंट अवार्ड
भारतीय सिनेमा में योगदान के लिए 1982 में प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी से स्वर्ण पुरस्कार
महाराष्ट्र सरकार द्वारा राज कपूर पुरस्कार (उनकी मृत्यु के बाद 1999 में दिया गया)

लगभग पांच दशक तक अपनी फ़िल्मों के जरिए दर्शकों के दिल पर राज करने वाले महान् फ़िल्मकार केदार शर्मा 29 अप्रैल, 1999 को इस दुनिया से अलविदा कह गए।

मंगलवार, 11 अप्रैल 2023

मोहम्मद अली ताज

प्रसिद्धि उर्दू शायर एवं फिल्मी गीतकार ताज भोपाली की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि

ताज भोपाली एक सुप्रसिद्ध शायर थे।
ताज भोपाली का असली नाम मोहम्मद अली ताज था ।
उनका जन्म भोपाल में 1926 में हुआ।
कभी अपनी मोहब्बत से, कभी अपनी शायरी से और कभी-कभी अपनी बातों से ताज भोपाली जी लोगों को जलाया करते थे।शक्लो-सूरत की परवाह उन्होने कभी नहीं की फिर भी उनका धुर काला रंग यूं दमकता रहता था। उनको अपनी इस फक़ीराना तबियत से इस क़दर आशनाई थी कि जब 60 के दशक में उन्हें अशोक कुमार के सेक्रेटरी जनाब एस.एम.सागर ज़िद कर फ़िल्मों में गीत लिखने को बम्बई ले गए तो थोड़ा-बहुत वक़्त ही वहाँ रह पाए। भोपाल की गलियों सदा उनके कानो में ऐसी गूंजती रही कि काम-धाम छोड़-छाड़ वापस लौट आए।
;ताज भोपाली द्वारा लिखी 1969 की फ़िल्म ‘आंसू बन गए फूल’ में यह गीत -. ‘इलेक्शन में मालिक के लड़के खड़े हैं / इन्हें कम न समझो ये खुद भी बड़े हैं’ किशोर कुमार की आवाज़ में लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के संगीत के साथ चुनाव और नेताओं पर खूबसूरत व्यंग किया गया था। इसी गीत की लाईने है कि – ‘इस शहर में जितने हैं, अखबार इनके हैं / काले-सफेद सैकड़ों व्यापार इनके हैं / ...सब अस्पताल इनके हैं, बीमार इनके हैं / परनाम लाख बार करो / इनको वोट दो / वादों पे ऐतबार करो इनको वोट दो’।
इसी फ़िल्म का दूसरा गीत आशा भोंसले ने क्या खूब गाया है –‘ महरबां, महबूब, दिलबर, जानेमन / आज हो जाए कोई दीवानापन’

यह ताज साहब का एक रूप है। दूसरे रूप में उन्हें देखिए तो पहचानना मुश्किल हो जाए।

नुमाइश के लिए जो मर रहे हैं
वो घर के आइनों से डर रहे हैं
बला से जुगनूओं का नाम दे दो
कम-से-कम रोशनी तो कर रहे हैं

तुम्हे कुछ भी नहीं मालूम लोगो
फरिश्तों की तरह मासूम लोगो
ज़मीं पर पांव आंखें आस्मां पर
रहोगे उम्र भर मग़मूम लोगो
रहोगे कब तलक मज़लूम लोगो

निर्वाण घर में बैठ के होता नहीं कभी
बुद्ध की तरह कोई मुझे घर से निकाल दे
पीछे बन्धे हैं हाथ मगर शर्त है सफर
किससे कहें कि पांव के कांटे निकाल दे

जमाल सेन

महान प्रतिभाशाली मगर बदकिस्मत संगीतकाऱ जिनकी प्रतिभा को लोग सम्मान नही दे पाये जमाल सेन की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि

यदि प्रतिभा किसी संगीतकार के लिए सफल होने की एकमात्र कसौटी होती, तो जमाल सेन को अपने समय के सबसे सफल संगीत निर्देशक होना चाहिए था।  लेकिन ऐसा नही था

गायन, नृत्य (कथक) और कविता में उनकी प्रवीणता, जो उनके संगीत कौशल को पूर्णता का स्पर्श देती है और उन्हें रन-ऑफ-द-कंपोज़र्स से अलग करती है फ़िल्म  उद्योग में वे ऐसे कलाकार थे  जिसका कोई मूल्य नहीं था   एक संगीतकार उन्होंने फिल्म शोखियाँ  और दायरा  में हिट संगीत दिया

उनके अंतिम दिनों में उनके पास एक  मात्र दोस्त संगीतकार गुलाम मोहम्मद थे जमाल सेन  गंभीर हृदय रोग से पीड़ित होने के बाद, बॉम्बे के उपनगर, बोरिवली के एक जीर्ण-शीर्ण कमरे में रह रहे थे

जमाल सेन के पूर्वज केसरजी, जो राजस्थान के सुजानगढ़ के रहने वाले थे, उन्हें तानसेन का शिष्य कहा जाता था और इसलिए उन्हें केसर सेन कहा जाता था। संगीत में पारिवारिक विरासत  को उनके पिता द्वारा जमाल सेन को बहुत कम उम्र में ही दे दिया गया था उस्ताद जीवन सेन से  जमाल सेन ने संगीत की शिक्षा ली  जमाल सेन को विभिन्न वाद्य यंत्र जैसे ढोलक, तबला और पखावज पर विशेष महारत हासिल थी

लाहौर में रहते हुए, जमाल सेन को संगीत निर्देशक श्याम सुंदर द्वारा मास्टर गुलाम हैदर से मिलवाया गया, उन दोनों लोगो ने एक साथ 12 साल तक काम किया शास्त्रीय और लोक संगीत के बारे में जमाल सेन के ज्ञान और ढोलक पर उनकी निपुणता के कारण वह खज़ांची (1941) से लेकर मज़बूर (1948) तक फिल्मों में गुलाम हैदर के साथ काम किया 

निर्देशक केदार शर्मा से मुलाकात के बाद उन्हें एक स्वतंत्र संगीतकार के रूप में ब्रेक मिला उन्होंने 1951 में केदार शर्मा की फिल्म शोखियां में बेहतरीन एवं हिट संगीत दिया

गीत सपना बन साजन आये (लता मंगेशकर) में राग यमन कल्याण का कल्पनाशील उपयोग शास्त्रीय संगीत पर जमाल सेन की पकड़ को दिखाता है।  गीत - रातों की नींद छीन ली (सुरैया), एक ग़ज़ल जहाँ माधुर्य प्रधान है, और ऐ बरखा बहार (लता, प्रमोदिनी, कोरस) यह  राजस्थानी लोक संगीत की बेहतरीन मिसाल थी  गीत ए दूर देस से आजा रे (सुरैया, लता) एक करामाती मधुर और लोक और शास्त्रीय संगीत के बीच का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।

 शोखियां के बाद 1953 में कमाल अमरोही की फ़िल्म दायरा आयी हालांकि यह फ़िल्म फ्लॉप हो गयी  फिल्म को भजन, देवता तुम हो मेरा सहारा, मैने थामा है दामन तुम्हारा (रफी, मुबारक बेगम, कोरस), राग भूप में काफी हिट रहा जब सीन की आवश्यकता होती थी जमाल सेन पश्चिमी धुन भी कंपोज़ करने में आगे थे उनका गीत सुन सुन मेरी कहानी (रफी) उसका एक उदाहरण है

जमाल सेन, जिन्होंने आकाशवाणी, कलकत्ता पर एक गायक के रूप में अपना करियर शुरू किया था - वे रेडियो पर वंदे मातरम गाने वाले पहले व्यक्तियों में से थे - वह शास्त्रीय गायन में अपना करियर बनाना चाहते थे  अपनी प्रतिभा और बुलंद आदर्शों के साथ, वह फिल्मों के लिए मिसफिट थे।  हेरफेर करने में असमर्थता और समझौता करने से इनकार करने के कारण, उन्हें औसत दर्जे की फ़िल्में मिलीं, जिसके लिए उन्होंने संगीत तैयार किया, कम बजट की फिल्मों के कारण उसकी समृद्ध प्रतिभा में भारी कमी आई।

एक बार निर्माता के आसिफ, जो उनसे एक स्टूडियो में मिले थे, उन्हें प्रभावशाली फ़िल्म मुग़ल-ए-आज़म के सेट को दिखाने के लिए ले गए और उन्हें गोपीकृष्ण के फ़िल्माये गये डांस सीक्वेंस को दिखाया जमाल सेन ने आसिफ को बताया कि हालांकि सेट में सीक्वेंस  के लिए आवश्यक माहौल बनाया गया था, लेकिन वह निश्चित नहीं था कि डांस सीक्वेंस से मेल खाएगा।  के आसिफ ने इस पहलू के बारे में नहीं सोचा था, इसलिए बिना किसी हिचकिचाहट के उन्होंने जमाल सेन से संगीत और डांस सीक्वेंस के लिए आवश्यक बोल की रचना करने का अनुरोध किया।  सेन ने किया  हालाँकि उनके द्वारा रचित इस टुकड़े का फिल्म में इस्तेमाल नहीं किया गया था। 

बाद में, जब के आसिफ़ ने फिल्म सस्ता ख़ून महंगा पानी  की घोषणा की, यह फ़िल्म राजस्थानी पृष्ठभूमि पर आधारित थी, तो उन्होंने नौशाद की रचनाओं में प्रामाणिकता लाने के लिए जमाल सेन से सलाहकार बनने के लिए कहा।  लेकिन किस्मत ने एक बार फिर धोखा दिया यह प्रोजेक्ट कभी पूरा नही हो पाया

स्वाभिमानी  व्यक्ति जमाल सेन कभी काम मांगने नही गये   नतीजतन, वह धीरे-धीरे संगीत की दुनिया से ओझल हो गये और भुला दिये गये शोखियां और दायरा  अतीत की बात थी।  एक व्यावसायिक सिनेमा में उनकी प्रतिभा का बहुत कम उपयोग किया गया 

जमाल सेन को अपनी ताकत पता थी  और इस पर गर्व था।  एक बार, उनका गाना सुनने के बाद, उस्ताद बडे गुलाम अली खान ने उन्हें 'तानसेन' और 'सुर का बिछु' कहा, उस्ताद अमीर खान ने उन्हें 'संगीत शास्त्री' बताया।  प्रभावशाली खिताबों और श्रद्धांजलि के बावजूद, जमाल सेन ने दयनीय स्थिति में कोई बदलाव नही आया

अपने बाद के वर्षों में, लगातार हताशा से, उन्होंने शराब की ओर रुख किया, और इस उम्मीद से जी रहे थे कि उनके बेटे शंभू सेन और मदन सेन संगीत में परिवार की समृद्ध परंपरा को आगे बढ़ाएंगे।  लेकिन 40 वर्ष की कम उम्र में मदन की अचानक हृदय गति रुकने से मृत्यु हो गई। और वह सदमे से कभी उबर नहीं पाये एक साल के भीतर, 12 अप्रैल, 1979 को उनकी भी मृत्यु हो गई

केदार शर्मा

राज कपूर, भारत भूषण, मधुबाला, माला सिन्हा और तनूजा को फ़िल्म इंडस्ट्री में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले प्रसिद्ध निर्माता-निर्देशक और अभिनेता केदार शर्मा के जन्मदिन पर हार्दिक श्रधांजलि
केदार शर्मा  भारतीय फ़िल्म निर्देशक, निर्माता, पटकथा लेखक और हिंदी फ़िल्मों के गीतकार थे। उन्हें बॉलीवुड में ऐसे फ़िल्मकार के तौर पर याद किया जाता है जिन्होंने राज कपूर, भारत भूषण, मधुबाला, माला सिन्हा और तनुजा को फ़िल्म इंडस्ट्री में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। केदार शर्मा ने कई फ़िल्मों में अपने अभिनय से भी दर्शकों का दिल जीता। इन फ़िल्मों में इंकलाब, पुजारिन, विद्यापति, बड़ी दीदी, नेकी और बदी शामिल हैं।

केदार शर्मा का जन्म 12 अप्रैल, 1910 को पंजाब के नरौल शहर (अब पाकिस्तान) में हुआ था। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा अमृतसर से पूरी की। इसके बाद वह नौकरी की तलाश में मुंबई आ गए, लेकिन वहां काम नहीं मिलने के कारण वह अमृतसर लौट गए। इस बीच उन्होंने अमृतसर के ख़ालसा कॉलेज से स्नाकोत्तर की पढ़ाई पूरी की।

वर्ष 1933 में केदार शर्मा को देवकी बोस निर्देशित फ़िल्म 'पुराण भगत' देखने का अवसर मिला। इस फ़िल्म से वह इस कदर प्रभावित हुए कि उन्होंने निश्चय किया कि वह फ़िल्मों में ही अपना करियर बनाएंगे। अपने इसी सपने को पूरा करने के लिए केदार कलकत्ता चले गए। कलकत्ता में केदार की मुलाकात फ़िल्मकार देवकी बोस से हुई और उनकी सिफ़ारिश से उन्हें न्यू थियेटर में बतौर छायाकार शामिल कर लिया गया। वर्ष 1934 में प्रदर्शित फ़िल्म 'सीता' बतौर छायाकर केदार की पहली फ़िल्म थी। इसके बाद न्यू थियेटर की फ़िल्म 'इंकलाब' में केदार को एक छोटी सी भूमिका निभाने का अवसर मिला। वर्ष 1936 में प्रदर्शित फ़िल्म 'देवदास' केदार शर्मा के सिने कैरियर की अहम फ़िल्म साबित हुई। इस फ़िल्म में वह बतौर कथाकार और गीतकार की भूमिका में थे। फ़िल्म हिट रही और केदार फ़िल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने में कामयाब हो गए।
केदार शर्मा को 1940 में फ़िल्म 'तुम्हारी जीत' को निर्देशित करने का मौका मिला, लेकिन दुर्भाग्य से यह फ़िल्म पूरी नहीं हो सकी। इसके बाद उन्होंने 'औलाद' फ़िल्म को निर्देशित किया, जिसकी सफलता के बाद वह कुछ हद तक बतौर निर्देशक अपनी पहचान बनाने में कामयाब हुए। वर्ष 1941 में उन्हें 'चित्रलेखा' फ़िल्म को निर्देशित करने का मौका मिला। इस फ़िल्म की सफलता के बाद केदार शर्मा बतौर निर्देशक फ़िल्म इंडस्ट्री में स्थापित हो गए। इन सबके साथ ही फ़िल्म 'चित्रलेखा' का स्नान दृश्य बहुत चर्चित हुआ था, जो फ़िल्म अभिनेत्री मेहताब पर फ़िल्माया गया था। इस फ़िल्म के बाद मेहताब दर्शकों के बीच काफ़ी लोकप्रिय हुई थीं, लेकिन फ़िल्म के शुरूआत के समय मेहताब स्नान दृश्य के फ़िल्मांकन के लिए तैयार नही थीं। केदार ने जब मेहताब के समक्ष स्नान दृश्य के फ़िल्मांकन का प्रस्ताव रखा तो मेहताब बोलीं, यह सीन आप दर्शकों के लिए रखना चाहते हैं या सिर्फ अपनी खुशी के लिए। केदार ने तब मेहताब को समझाया, देखो सेट पर अभिनेत्री और निर्देशक का रिश्ता पिता-पुत्री का होता है। केदार की यह बात मेहताब के दिल को छू गई और उसने केदार के सामने यह शर्त रखी कि दृश्य के फ़िल्मांकन के समय सेट पर केवल वहीं मौजूद रहेंगे।

केदार शर्मा ने वर्ष 1947 में फ़िल्म 'नीलकमल' के जरिए राजकपूर को रूपहले पर्दे पर पहली बार पेश किया। राजकपूर इसके पूर्व केदार की यूनिट में क्लैपर बॉय का काम किया करते थे। वर्ष 1950 में केदार ने फ़िल्म 'बावरे नैन' का निर्माण किया और अभिनेत्री गीता बाली को पहली बार बतौर अभिनेत्री काम करने का अवसर दिया। वर्ष 1950 में ही केदार की एक और सुपरहिट फ़िल्म 'जोगन' प्रदर्शित हुई। फ़िल्म में दिलीप कुमार और नरगिस मुख्य भूमिका में थे। केदार की यह विशेषता रहती थी कि जिस अभिनेता-अभिनेत्री के काम से वह खुश होते उसे पीतल की दुअन्नी देकर सम्मानित किया करते थे। राजकपूर, दिलीप कुमार, गीता बाली और नरगिस को यह सम्मान प्राप्त हुआ था।

केदार शर्मा ने कई फ़िल्मों में अपने अभिनय से भी दर्शकों का दिल जीता। इन फ़िल्मों में इंकलाब, पुजारिन, विद्यापति, बड़ी दीदी, नेकी और बदी शामिल हैं।

केदार शर्मा ने कई फ़िल्मों के लिए गीत भी लिखे। उन्होंने बच्चों के लिए भी कई फ़िल्में बनाईं, जिनमें जलदीप, गंगा की लहरें, गुलाब का फूल, 26 जनवरी, एकता, चेतक, मीरा का चित्र, महातीर्थ और खुदा हाफ़िज़ शामिल हैं।

केदार शर्मा पूरी इंडस्ट्री में अपने दबंग स्वभाव के लिए मशहूर थे। उन्होंने राजकपूर सहित इंडस्ट्री के बड़े-बड़े सूरमाओं के कस-बल ढीले कर दिए थे। तनुजा के उनके निर्देशन में बनने वाली फ़िल्म 'हमारी याद आएगी' में राजकपूर के अपोजिट कास्ट किया गया था। तनुजा सेट पर हमेशा हंसी-मजाक में ही व्यस्त रहती थीं, जबकि केदार शर्मा को सेट पर ऐसा माहौल बिलकुल पसंद नहीं था। इसके अलावा तनुजा को डायलॉग याद करने से भी जबरदस्त एलर्जी होती थीं, जिसकी वजह से केदार शर्मा काफ़ी परेशान हो चुके थे। दरअसल तनुजा अपने कॅरियर को संजीदगी से लेती ही नहीं थीं। उन पर हमेशा अपनी माँ और बहन का स्टारडम हावी रहता था। इसी फ़िल्म के एक सीन में उन्हें राजकपूर के सामने रोना था लेकिन जब सीन शूट होने लगता तनुजा रोने के बजाय हंसने लगती। केदार शर्मा की बार-बार हिदायत के बाद तनुजा ने उनसे कहा कि आज मेरा रोने का मूड नहीं है। बेहतर है कि इस सीन को बाद में शूट किया जाए, बस इतना सुनना था, कि केदार शर्मा का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया और उन्होंने ना आंव देखा ना ताव और एक झन्नाटेदार थप्पड़ तनुजा के गालों पर रसीद कर दिया। केदार शर्मा के इस गुस्से से पूरी यूनिट सन्न रह गयी।
पुरस्कार और सम्मान

केदार शर्मा को निम्नलिखित पुरस्कार और सम्मान प्राप्त हुए थे-

राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार 1956 में सर्वश्रेष्ठ बाल फ़िल्म के जलदीप के लिये दिया गया।
इंडियन फ़िल्म डायरेक्टर्स एसोसिएशन लाइफ़टाइम अचीवमेंट अवार्ड
भारतीय सिनेमा में योगदान के लिए 1982 में प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी से स्वर्ण पुरस्कार
महाराष्ट्र सरकार द्वारा राज कपूर पुरस्कार (उनकी मृत्यु के बाद 1999 में दिया गया)

लगभग पांच दशक तक अपनी फ़िल्मों के जरिए दर्शकों के दिल पर राज करने वाले महान् फ़िल्मकार केदार शर्मा 29 अप्रैल, 1999 को इस दुनिया से अलविदा कह गए।[

गुलशन बावरा

*महान गीतकार गुलशन बावरा के जन्मदिन पर हार्दिक  श्रधांजलि*

गुलशन बावरा हिन्दी फ़िल्मों के प्रसिद्ध गीतकार थे। उनका मूल नाम गुलशन कुमार मेहता था। उन्हें 'बावरा' का उपनाम फ़िल्म वितरक शांतिभाई पटेल ने दिया था। बाद में यह नाम इतना प्रसिद्ध हुआ कि पूरा फ़िल्म उद्योग उन्हें इसी नाम से पुकारने लगा। अपनी साहित्यिक सोच के कारण ही गुलशन बावरा फ़िल्म संगीत से जुड़े थे। वे पहले रेलवे में कार्यरत थे, लेकिन उनकी कल्पना की उड़ान ने उन्हें फ़िल्म उद्योग के आसमान पर स्थापित कर दिया, जहाँ उनका योगदान ध्रुव तारे के समान अटल और अविस्मर्णीय है।

हिन्दी सिनेमा के प्रसिद्ध गीतकार गुलशन बावरा का जन्म 12 अप्रैल, सन 1937 को अविभाजित भारत के पंजाब में शेखपुरा (अब पाकिस्तान में) नामक क़स्वे में हुआ था। लाहौर से करीब तीस कि.मी. दूर शेखपुरा क़स्बे में जन्मे गुलशन बावरा ने बचपन में ही विभाजन के दौरान रेलगाड़ी से भारत आते वक्त अपने पिता को तलवार से कटते और माँ को सिर पर गोली लगते देखा था। भाई के साथ भागकर वे जयपुर आ गए, जहाँ उनकी बहन ने उनकी परवरिश की। यहाँ पर ये तथ्य उल्लेखनीय है कि इस भयावह त्रासदी की यंत्रणा को झेलने वाले गुलशन बावरा ने इसे अपनी जिंदगी, अपने व्यक्तित्व और अपने लिखे गीतों पर कभी हावी नहीं होने दिया। बाद में भाई को दिल्ली में नौकरी मिलने की वज़ह से वे दिल्ली चले गए। सन 1955 में रेलवे में क्लर्क की नौकरी मिलने पर गुलशन जी मुंबई चले आए। लिखने का शौक उनको बचपन से ही था। बचपन में माँ के साथ भजन मंडली में शिरकत करने की वज़ह से भजन लिखने से उनके लेखन का सफर शुरू हुआ था, जो कॉलेज के दिनों में आते-आते आशानुरूप रुमानी कविताओं में बदल गया। इसीलिए मुंबई में नौकरी करते वक़्त फुर्सत मिलते ही उन्होंने संगीतकार जोड़ी कल्याणजी-आनंदजी के दफ़्तर के चक्कर लगाने नहीं छोड़े। गुलशन बावरा को पहली सफलता इसी जोड़ी के संगीत-निर्देशन में रवींद्र दावे की फ़िल्म "सट्टा बाज़ार" (1957) में मिली, जब उनका लिखा निम्न गीत बेहद लोकप्रिय हुआ

"तुम्हें याद होगा कभी हम मिले थे, मोहब्बत की राहों में मिल कर चले थे,
भुला दो मोहब्बत में हम तुम मिले थे, सपना ही समझो कि मिल कर चले थे।

फ़िल्म 'सट्टा बाज़ार' के निर्माण के दौरान गुलशन जी को उनका नाम 'बावरा' मिला था। फ़िल्म के वितरक शांतिभाई पटेल उनके काम से खासे खुश थे। रंग-बिरंगी शर्ट पहनने वाले लगभग 20 साल के युवक को देखकर उन्होंने कहा था कि- "मैं इसका नाम गुलशन बावरा रखूँगा। यह बावरे (पागल व्यक्ति) जैसा दिखता है।" फ़िल्म प्रदर्शित होने पर उसके पोस्टर्स में सिर्फ़ तीन लोगों के नाम प्रमुखता से प्रदर्शित किए गए थे। एक फ़िल्म के निर्देशक रविंद्र दवे, संगीतकार कल्याणजी-आनंदजी और बतौर गीतकार गुलशन बावरा।

इसके बाद के आगामी कुछ साल गुलशन जी के लिए मशक्कत वाले रहे और इन सालों में वे कई फ़िल्मों में अभिनय कर अपना गुजारा चलाते रहे। उनके जिस गीत ने पूरे भारत में उनके नाम का सिक्का जमा दिया, उसके लिए सारा श्रेय उनकी गुड्स क्लर्क की नौकरी को देना उचित जान पड़ता है। दरअसल रेलवे के मालवाहक विभाग में गुलशन बावरा अक्सर पंजाब से आई गेहूँ से लदी बोरियाँ देखा करते थे और वहीं उनके मन कभी न भुलाई जा सकने वाली वे पंक्तियाँ बन पड़ीं जो हिन्दी सिनेमा के इतिहास में अमर हो गईं। मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे-मोती, मेरे देश की धरती। जब उन्होंने अपने मित्र मनोज कुमार को ये पंक्तियाँ सुनाईं तो उसी समय मनोज जी ने इसे अपनी फ़िल्म 'उपकार' के लिए चुन लिया। इस गीत ने ही उन्हें सन 1967 में सर्वश्रेष्ठ गीत का 'फ़िल्मफेयर पुरस्कार' दिला गया। कहते हैं कि गुलशन बावरा ने यह गीत राज कपूर की फिल्‍म 'जिस देश में गंगा बहती है' के लिए लिखा था। यह गीत राज कपूर को पसंद भी आया था, लेकिन तब तक वे शैलेंद्र के गीत "होंठों पे सच्‍चाई रहती है, जहां दिल में सफाई रहती है" को फाइनल कर चुके थे। आखिरकार मनोज कुमार ने 'उपकार' में इसका प्रभावशाली उपयोग किया।

सही माएने में फ़िल्म 'उपकार' के इस गीत ने गुलशन बावरा को भारत की जनता से जोड़ दिया। सत्तर की शुरुआत में सबसे पहले 1974 में फ़िल्म 'हाथ की सफाई' में लता मंगेशकर द्वारा गाए उनके गीत "तू क्या जाने बेवफ़ा.." और "वादा कर ले साजना..." बेहद लोकप्रिय रहे। फिर 1975 में आई फ़िल्म 'जंजीर' में उनके गीतों- "दीवाने हैं दीवानों को ना घर चाहिए..." और "यारी है ईमान मेरा यार मेरी ज़िदगी...." ने पूरे देश में धूम मचा दी। इन दोनों ही फ़िल्मों का संगीत कल्याणजी-आनंदजी ने दिया था।

गुलशन बावरा ने जीवन के हर रंग के गीतों को अल्फाज दिए। उनके लिखे गीतों में 'दोस्ती, रोमांस, मस्ती, गम' आदि विभिन्न पहलू देखने को मिलते हैं। 'जंजीर' फ़िल्म का गीत 'यारी है ईमान मेरा यार मेरी ज़िन्दगी' दोस्ती की दास्तान बयां करता है, तो 'दुग्गी पे दुग्गी हो या सत्ते पे सत्ता' गीत मस्ती के आलम में डूबा हुआ है। उन्होंने बिंदास प्यार करने वाले जबाँ दिलों के लिए भी 'खुल्ल्म खुल्ला प्यार करेंगे', 'कसमें वादे निभाएंगे हम', आदि गीत लिखे। उनके पास हर मौके के लिए गीत था। पाकिस्तान से आकर बसे बावरा जी ने अपने फ़िल्मी कैरियर की तुलना में यूं तो कम गीत लिखे, लेकिन उनके द्वारा लिखे सादे व अर्थपूर्ण गीतों को हमेशा पसंद किया गया। उन्होंने संगीतकार कल्याणजी-आनंदजी के संगीत निर्देशन में 69 गीत लिखे और आर. डी. बर्मन के साथ 150 गीत लिखे। पंचम दा गुलशन बावरा जी के पडोसी थे। पंचम दा के साथ उनकी कई यादें जुडी हुई थीं। इन यादों को गुलशन बावरा ने 'अनटोल्ड स्टोरीज' नाम की एक सीडी में संजोया था। इसमें उन्होंने पंचम दा की आवाज़ रिकार्ड की थी और कुछ गीतों के साथ जुड़े किस्से-कहानियां भी प्रस्तुत किये थे।

गुलशन बावरा ने अपनी सक्रियता के निरन्तर समय में लगातार लोकप्रिय गीत लिखे। कल्याणजी-आनंदजी से उनकी ट्यूनिंग खूब जमती रही। लगभग सत्तर से भी ज्यादा गाने उन्होंने उनके लिए लिखे। बाद में उनका जुड़ाव राहुल देव बर्मन से भी हुआ। एक बार गुलशन उनकी टीम में क्या आये, गहरे मित्र बन गये। राहुल देव बर्मन को गुलशन सहित उनके तमाम दोस्त पंचम कहकर बुलाया करते थे। इस टीम ने भी अनेक सफल और लोकप्रिय फिल्मों में मधुर और अविस्मरणीय गीतों की रचना की। एक सौ पचास से ज्यादा गाने गुलशन और पंचम की जोड़ी की उपलब्धि है। जिन फिल्मों के लिए गुलशन बावरा ने गीत लिखे उनमें 'सट्टा बाजार', 'राज', 'जंजीर', 'उपकार', 'विश्वास', 'परिवार', 'कस्मे वादे', 'सत्ते पे सत्ता', 'अगर तुम न होते', 'हाथ की सफाई', 'पुकार', 'सनम तेरी कसम', 'हकीकत', 'ये वादा रहा', 'झूठा कहीं का', 'जुल्मी' आदि प्रमुख हैं। गुलशन बावरा ने पंचम दा के साथ उनकी फिल्म 'पुकार' और 'सत्ते पे सत्ता' में गानों में भी सुर मिलाए।

गुलशन जी के प्रसिद्ध गीतों में शामिल हैं-

तुमको मेरे दिल ने पुकारा है
किसी पे दिल अगर आ जाए तो क्या होता है
सनम तेरी कसम
आती रहेंगी बहारें
यारी है ईमान मेरा यार मेरी ज़िंदगी
मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे-मोती
हमें और जीने की चाहत न होती, अगर तुम न होते
तू तो है वही
कसमे वादे निभाएंगे हम
वादा कर ले साजना
पीने वालों को पीने का बहाना चाहिए
दीवाने हैं दीवानों को न घर चाहिए
प्यार हमें किस मोड़ पे ले आया
कितने भी तू कर ले सितम

गुलशन बावरा दिखने में दुबले-पतले शरीर के थे। उनका व्यक्तित्व हंसमुख था, हांलाकि बचपन में विभाजन के समय उन्होंने जो त्रासदी झेली थी वह अविस्मर्णीय है, लेकिन उनके व्यक्तित्व में उसकी छाप कहीं दिखाई नहीं देती थी। वे कवि से ज्यादा कॉमेडियन दिखाई देते थे। इस गुण के कारण कई निर्माताओं ने उनसे अपनी फ़िल्मों में छोटी-छोटी भूमिकाएं भी अभिनीत करवायीं। विभाजन का दर्द उन्होंने कभी जाहिर नहीं होने दिया। राहुल देव बर्मन उनके करीबी मित्र थे। राहुल जी के संगीत कक्ष में प्राय: सभी मित्रों की बैठक होती थी और खूब ठहाके लगाये जाते थे। गुलशन बावरा उस सर्कस के स्थायी 'जोकर' थे। यहीं से उनकी मित्रता किशोर कुमार से हुई। फिर क्या था अब तो दोनों लोग मिलकर हास्य की नई-नई स्तिथियाँ गढ़ते थे। गुलशन बावरा को उनके अंतिम दिनों में जब 'किशोर कुमार' सम्मान के लिए चुना गया तो उनके चहरे पर अद्भुद संतोष के भाव उभरते दिखाई दिए। उनके लिए यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण क्षण था। एक तरफ़ यह पुरस्कार उनके लिए विभाजन की त्रासदी से लेकर जीवन पर्यंत किये गए संघर्ष का इनाम था, दूसरी ओर अपने पुराने मित्र की स्मृति में मिलने वाला पुरस्कार एक अनमोल तोहफे से कम नहीं था।

सारा जीवन गुलशन कुमार चुस्त-दुरुस्त रहे। कोई बीमारी न हुई। सुबह-शाम घूमने का खूब शौक था। रात को समय पर खाना खाकर सो जाते थे। उनकी पत्नी अंजू उनका बड़ा ख्याल भी रखती थीं। कैंसर जैसी बीमारी उनको बमुश्किल छः माह पहले हुई और देखते ही देखते इस बीमारी ने उनके जीवन को अचानक ऐसा संक्षिप्त कर दिया कि वे सुबह अचानक चले गये। 7 अगस्त, 2009 को बीमारी के चलते उनका देहांत हो गया। उनकी इच्छानुसार उनके पार्थिव शरीर को जे. जे. अस्पताल को दान कर दिया गया। हिन्दी सिनेमा ही नहीं हिन्दी साहित्य भी गुलशन बावरा जी के अद्भुद योगदान को कभी नहीं भूल पायेगा।

गुलशन बावरा ने एक साक्षात्कार में कहा था- "मैं गाने लिख-लिखकर रखता था। फिर कहानी सुनने के बाद सिचुएशन के अनुसार गीतों का चयन करता था। कहानी के साथ चलना जरूरी है तभी गाने हिट होते हैं। आज किसे फुर्सत है कहानी सुनने की? और कहानी है कहाँ? विदेशी फ़िल्मों की नकल या दो-चार फ़िल्मों का मिश्रण। कहानी और विजन दोनों ही गायब हैं फ़िल्मों से।" गुलशन जी आज के गीत-संगीत से भी विचलित थे। वे कहा करते थे- "गीतों में भावना नहीं है और संगीत में आत्मा। पहले श्रोताओं को ध्यान में रखकर रचना बनती थी। आजकल दर्शकों को जेहन में रखा जाता है। उस जमाने में गीत-संगीत और दृश्यों का उम्दा तालमेल होता था। आजकल मात्र दृश्यों को प्रभावी बनाया जाता है। पंजाबी फ़िल्म 'पुन्नो' में बतौर नायक अभिनय कर चुके गुलशन फ़िल्मों में और अधिक लेखन करना चाहते थे, किन्तु इस शर्त पर कि डायरेक्टर और फ़िल्म अच्छी हो। अंतिम वक्त में उनकी पीड़ा थी- "अब हमें पूछने वाला कौन है? जो प्रतिष्ठा और सम्मान मैंने पुराने गीतों को रचकर हासिल किया था, क्या वह आज चल रहे सस्ते गीत और घटिया धुनों के साथ बरकरार रखा जा सकता है?" लेखन से उनका रिश्ता आजीवन जुड़ा रहा। चाहे फ़िल्मों के लिए नहीं, अपने रचनाकार मन के लिए ही सही। नई फ़िल्मों पर उनकी तल्ख टिप्पणी कि "मेरी बर्दाश्त से बाहर हैं नई फ़िल्में" सोचने को विवश करती हैं।

आशा भोसले

आशा भोसले 🎂08 सितंबर 1933 ⚰️12 अप्रैल 2026 जन्म की तारीख और समय: 8 सितंबर 1933, सांगली मृत्यु की जगह और तारीख: 12 अप्रैल 2026 ब...