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गुरुवार, 29 फ़रवरी 2024

टाइगर श्राफ

नये जमाने के अभिनेता टाइगर श्रॉफ के जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनाएं

टाइगर श्रॉफ़ (जन्म ; जय हेमन्त श्रॉफ़ ; 2 मार्च 1990 ) एक भारतीय फ़िल्म अभिनेता तथा मार्शल आर्टिस्ट है।  इन्होंने अपने फ़िल्मी कैरियर की शुरुआत साजिद नाडियाडवाला की एक्सन रोमेंटिक फ़िल्म हीरोपंती से 2014 में की थी। इस फ़िल्म के तौर पर इन्हें फ़िल्मफेयर अवॉर्ड फॉर बेस्ट मेल डेब्यू के लिए चुना गया था।  इसके बाद एक बार फिर साजिद नाडियाडवाला ने बागी (2016) फ़िल्म का ऑफर दिया , फ़िल्म में इनकी को-स्टार श्रद्धा कपूर है। बागी फ़िल्म ने ₹1 बिलियन (US$14.6 मिलियन) कमाए है।

टाइगर श्रॉफ का जन्म 2 मार्च 1990 को जैकी श्रॉफ के घर हुआ ,इनके बचपन का नाम जय हेमन्त श्रॉफ़ था जो बाद में बदल दिया। इनके पिता का नाम जैकी श्रॉफ है जो कि स्वयं फ़िल्म अभिनेता है और माता का नाम आयेशा दत्त है।टाइगर अपनी बहिन कृष्णा श्रॉफ से तीन साल बड़े है।श्रॉफ गुजराती वैश्य बनिया परिवार से है। और अगर ममेरे रिश्ते के हिसाब से देखें तो बंगाली है। 

इन्होंने अपनी विद्यालयी शिक्षा अमेरिकन स्कूल ऑफ़ बॉम्बे ,मुम्बई से की थी फिर बाद में एमिटी यूनिवर्सिटी में पढ़ना शुरू किया। श्रॉफ ने धूम 3 फ़िल्म में आमिर ख़ान का अच्छी बॉडी बनाने में मदद की थी इन्होंने मार्शल आर्ट में कई डिग्रीयां ली है।

बाग़ी फ़िल्म के प्रचार के दौरान श्रद्धा कपूर के साथ
सितम्बर 2009 में श्रॉफ ने कहा था की वो फ़ौजी धारावाहिक में मुख्य किरदार निभाएंगे I जनवरी 2010 में एक रिपोर्ट के अनुसार सुभाष घई हीरो 1983 की पुनर्निमित फ़िल्म करेंगे जिसमें टाइगर को मौका मिल सकता है। लेकिन टाइगर श्रॉफ ने यह ऑफर ठुकरा दिया था। अंततः जून 2012 में श्रॉफ ने साजिद नाडियाडवाला की फ़िल्म हीरोपंती के लिए हस्ताक्षर कर दिए थे जो कि टाइगर की पहली फ़िल्म थीं। हीरोपंती जो कि 23 मई 2014 को सिनेमाघरों में प्रदर्शित हुई थी और बॉक्स ऑफिस पर भी सफल रही थी। उस फ़िल्म में टाइगर की को-स्टार कृति सैनॉन थी। 

टाइगर श्रॉफ नृत्य तथा अपने करतब अर्थात स्टंट काफी अच्छे से करते है , हीरोपंती तथा बागी दोनों फ़िल्मों में देखने को मिला है।इस कारण बॉलीवुड हंगामा टीवी के तरुण आदर्श ने इन्हें (टाइगर रजिस्टर्स एन इम्पेक्ट इन सेवरल सीक्वेंस) कहा है।इनकी लेटेस्ट फ़िल्म बागी जिसका निर्देशन भी साजिद नाडियाडवाला ने किया है जो कि 100 करोड़ के क्लब में शामिल हुई।

गुरुवार, 2 मार्च 2023

कल्याण जी आनंद जी


कल्याण जी आनंद जी

*प्रसिद्ध संगीतकार जोड़ी कल्याणजी आनंदजी के आनंदजी के जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनाएं*

आनंदजी वीरजी शाह हिन्दी सिनेमा के प्रसिद्ध संगीतकार थे। वे भारतीय हिन्दी फ़िल्मों की प्रसिद्ध संगीतकार जोड़ी 'कल्याणजी आनंदजी' में से एक थे। 

जन्म

आनंदजी वीरजी शाह (जन्म 2 मार्च 1933) एक भारतीय संगीत निर्देशक हैं।  अपने भाई के साथ मिलकर उन्होंने कल्याणजी-आनंदजी की जोड़ी बनाई और कोरा कागज़ के लिए सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक के लिए 1975 का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार जीता।  वह पद्म श्री (1992) के नागरिक सम्मान के प्राप्तकर्ता हैं।

आनंदजी का जन्म 2 मार्च 1933 को वीरजी शाह के घर हुआ था। उनके पिता एक कच्छी व्यवसायी थे, जो किराना (प्रावधान स्टोर) शुरू करने के लिए कच्छ से बॉम्बे चले गए थे।  उनके छोटे भाई और भाभी पति और पत्नी की जोड़ी बबला और कंचन हैं।  दोनों भाइयों ने एक संगीत शिक्षक से संगीत सीखना शुरू किया।  उनके चार दादा-दादी में से एक किसी प्रतिष्ठित लोक संगीतकार थे।  उन्होंने अपने अधिकांश प्रारंभिक वर्षों को मराठी और गुजराती क्षेत्रों में गिरगांव (बॉम्बे का एक जिला) के गांव में बिताया।

संगीत_की_दुनिया_से_जुड़ाव

हिन्दी फ़िल्म जगत् की सफल संगीतकार जोड़ियों में से एक कल्याणजी आनंदजी अपनी किराने की दुकान पर नून तेल बेचते हुए ही जिंदगी गुजार देते, अगर एक तंगहाल ग्राहक ने उधारी चुकाने के बदले दोनों को संगीत की तालीम देने की पेशकश न की होती। वीरजी शाह का परिवार कच्छ से मुंबई आ गया था और आजीविका चलाने के लिए किराने की दुकान खोल ली। एक ग्राहक दुकान से सामान तो लेता था, लेकिन पैसे नहीं चुका पाता था।

वीरजी ने एक दिन जब उससे तकाजा किया तो उसने उधारी चुकाने के लिए वीरजी के दोनों बेटों कल्याणजी और आनंदजी को संगीत सिखाने का जिम्मा संभाला और इस तरह उधारी के पैसे से एक ऐसी संगीतकार जोड़ी की नींव पड़ी, जिसने अपने संगीत से हिन्दी फ़िल्म जगत् को हमेशा के लिए अपना कर्जदार बना लिया। हालाँकि उधारी के संगीत के उन गुरुजी को सुर और ताल की समझ कुछ खास नहीं थी, लेकिन उन्होंने वीरजी के पुत्रों कल्याणजी और आनंदजी में संगीत की बुनियादी समझ ज़रूर पैदा कर दी। इसके बाद संगीत में दोनों की रुचि बढ़ने लगी और दोनों भाई संगीत की दुनिया से जुड़ गए।

हेमंत_कुमार_के_सहायक

कल्याणजी आनंदजी ने हेमंत कुमार के सहायक के तौर पर फ़िल्मी दुनिया में कदम रखा था और वर्ष 1954 में आई फ़िल्म ‘नागिन’ के गीतों के कुछ छंद संगीतबद्ध किए थे। भारतीय फ़िल्मों में इलेक्ट्रॉनिक संगीत की शुरुआत करने का श्रेय भी कल्याणजी आनंदजी को ही जाता है। कल्याणजी-आनंदजी की जोड़ी ने लगातार तीन दशकों 1960, 1970 और 1980 तक हिन्दी सिनेमा पर राज किया।

कल्याणजी ने कल्याणजी वीरजी के नाम से अपना ऑर्केस्ट्रा ग्रुप शुरू किया और मुंबई तथा उससे बाहर अपने संगीत शो आयोजित करने लगे। इसी दौरान वे फ़िल्म संगीतकारों के संपर्क में भी आए। इसके बाद दोनों भाई हिन्दी फ़िल्म जगत् के उस क्षेत्र में पहुँच गए, जहाँ सचिन देव बर्मन, मदन मोहन, हेमंत कुमार, नौशाद और रवि जैसे संगीतकारों के नाम की तूती बोलती थी। शुरू में कल्याणजी ने कल्याणजी वीरजी शाह के नाम से फ़िल्मों में संगीत देना शुरू किया और 'सम्राट चंद्रगुप्त' (1959) उनके संगीत से सजी पहली फ़िल्म थी। इसी साल आनंदजी भी उनके साथ जुड़ गए और कल्याणजी आनंदजी नाम से एक अमर संगीतकार जोड़ी बनी। कल्याणजी आनंदजी ने 1959 में फ़िल्म ‘सट्टा बाज़ार’ और ‘मदारी’ का संगीत दिया, जबकि 1961 में ‘छलिया’ का संगीत दिया। फ़िल्म 'छलिया' में उनके संगीत से सजा गीत "डम डम डिगा डिगा" और "छलिया मेरा नाम" श्रोताओं के बीच आज भी लोकप्रिय हैं।

वर्ष 1965 में प्रदर्शित संगीतमय फ़िल्म 'हिमालय की गोद में' की सफलता के बाद कल्याणजी-आनंदजी शोहरत की बुलंदियों पर जा पहुंचे। मनोज कुमार की फ़िल्म 'उपकार' में उन्होंने 'कसमे वादे प्यार वफा' जैसा दिल को छू लेने वाला संगीत देकर श्रोताओं को भावविभोर कर दिया। इसके अलावा मनोज कुमार की ही फ़िल्म 'पूरब और पश्चिम' के लिए भी कल्याणजी ने 'दुल्हन चली वो पहन चली तीन रंग की चोली' और 'कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे' जैसा सदाबहार संगीत देकर अलग ही समां बांध दिया। 1970 में विजय आनंद निर्देशित फ़िल्म 'जॉनी मेरा नाम' में 'नफरत करने वालों के सीने में प्यार भर दूं' और 'पल भर के लिए कोई हमें प्यार कर ले' जैसे गीतों के लिए रूमानी संगीत देकर कल्याणजी-आनंदजी ने श्रोताओं का दिल जीत लिया। मनमोहन देसाई के निर्देशन में फ़िल्म 'सच्चा झूठा' के लिये कल्याणजी-आनंदजी ने बेमिसाल संगीत दिया। 'मेरी प्यारी बहनियाँ बनेगी दुल्हनियाँ' को आज भी शहरों और देहातों में विवाह आदि के मौके पर सुना जा सकता है।

पुरस्कार_तथा_सम्मान

वर्ष 1968 में प्रदर्शित फ़िल्म 'सरस्वती चंद्र' के लिए कल्याणजी आनंदजी को सर्वश्रेष्ठ संगीतकार के 'राष्ट्रीय पुरस्कार' के साथ-साथ 'फ़िल्म फेयर पुरस्कार' भी दिया गया। इसके अलावा 1974 में प्रदर्शित फ़िल्म 'कोरा काग़ज़' के लिए भी कल्याणजी आनंदजी को सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का 'फ़िल्म फेयर पुरस्कार' मिला। कल्याणजी ने अपने सिने करियर में लगभग 250 फ़िल्मों में संगीत दिया। वर्ष 1992 में संगीत के क्षेत्र में बहुमूल्य योगदान के लिए उन्हें भारत सरकार ने 'पद्मश्री' से सम्मानित किया।

बुधवार, 1 मार्च 2023

प्रसिद्ध अभिनेता,गायक,लेखक एवं पत्रकार रंजन के जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धाजंलि


रंजन  प्रसिद्ध अभिनेता, गायक, पत्रकार और लेखक थे। उन्होंने तमिल फ़िल्म 'अशोक कुमार' (1941) से फ़िल्मी दुनिया में पदार्पण किया था, लेकिन उन्हें पहचान एस.एस. वासन की फ़िल्म 'चन्द्रलेखा' (1948) से मिली। रंजन ने तमिल फ़िल्मों के साथ ही हिन्दी फ़िल्मों में भी काम किया। वह हरफनमौला व्यक्ति थे।

#परिचय

अभिनेता रंजन का जन्म 2 मार्च, 1918 में मयलापुर, मद्रास में हुआ था। उनका परिवार श्रीरंगम, तमिलनाडु का रहने वाला था। वह अपने पिता आर.एन. शर्मा की दस संतानों में चौथी संतान थे। उन्होंने मद्रास स्कूल से अपनी स्कूली शिक्षा प्राप्त की और 1938 में भौतिक विज्ञान में स्नातक की डिग्री पाई। वह अपने कॉलेज के दिनों से ही नाटकों में अभिनय करते थे।

रंजन का विवाह मुस्लिम महिला लक्ष्मी के साथ हुआ, लेकिन उन्होंने पूरा परिवार हिन्दू रीति-रिवाजों के साथ चलाया। रंजन को पढ़ाने का बहुत शौक था। मौका मिलते ही वह यूरोप और अमेरिका के विश्वविद्यालयों में फ़िल्म के विषय पर लेक्चर देने जाते रहते थे। संगीत पर उन्होंने मद्रास यूनिवर्सिटी की फेलोशिप पर शोधकार्य किया। समर स्कूल में उन्होंने संगीत-नृत्य सिखाया और शानदार होटल चलाया।

#फ़िल्मी_शुरुआत

रंजन ने अपने फ़िल्मी कॅरियर की शुरुआत 1941 में फ़िल्म 'अशोक कुमार' से की थी। उनके फ़िल्मकार मित्र आचार्य ने उनके आकर्षक व्यक्तित्व को देखकर अपनी फ़िल्म 'दिव्य सिंगार' में नायक की भूमिका दी, जिसमें हिरोइन वैजयंती माला की मां वसुंधरा थीं। इसके बाद उनकी फ़िल्म 'नारद' रिलीज हुई, जिसमें कथकली और भरतनाट्यम के कई दृश्य थे। उनकी फ़िल्म 'चंद्रलेखा' अपने दौर की सबसे महंगी फ़िल्म थी। उत्तर भारत में प्रदर्शित होने वाली दक्षिण भारत की यह पहली फ़िल्म थी, जिसे दर्शकों की जबरदस्त प्रतिक्रियाएँ मिलीं। तमिल के बाद इसके हिन्दी संस्करण को लेकर रंजन बॉलीवुड आए।

#प्रसिद्ध_फ़िल्में

चन्द्रलेखा (1948)
मंगला (1951)
सपेरा (1961)
मदारी (1959)
राम बलराम (1980)

#विशेष

तमिल सिनेमा का सुपर स्टार बनने पर उन्होंने टाइगर माउथ विमान खरीद लिया और अपने शूटिंग लोकेशन पर वह हवाई जहाज़ उड़ाकर जाते थे। वह पहले अभिनेता थे, जिन्होंने रॉल्स रॉयस कार खरीदी थी। इसके अलावा वह पहले अभिनेता थे, जिन्होंने फ़िल्म में विग का इस्तेमाल किया। जेमिनी के. एस. एस. वासन ने अपनी फ़िल्म चंद्रलेखा में रंजन को तमिल-हिन्दी संस्करण का नायक बनाया। उसी दौरान रंजन ने अपने बाल कटवा दिए, जिससे वासन बहुत नाराज़ हुए। इस पर रंजन ने उन्हें विग लगाने का सुझाव दिया। चंद्रलेखा का भव्य नगाड़ा डांस दर्शक आज भी नहीं भूले हैं। इसकी परिकल्पना और कोरियोग्राफी रंजन ने ही की थी।

#प्रतिभावान

रंजन को उनके पिता संगीतज्ञ बनाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने रंजन को स्कूल भेजने के बजाय सात साल की उम्र में वॉयलिन सीखने के लिए भेज दिया। जब उनके पिता को समझाया गया कि बच्चे को औपचारिक शिक्षा दिलाना ज़रूरी है। तब उन्होंने इस शर्त के साथ उन्हें स्कूल जाने की अनुमति दी कि वह दिन में स्कूल जाएं, लेकिन स्कूल से लौटने के बाद आठ घंटे तक वॉयलिन का अभ्यास करें। यह सब करते हुए रात के दो बज जाते थे और रंजन तीन-चार घंटे ही सो पाते थे।

रंजन हिन्दुस्तानी और पाश्चात्य संगीत के मर्मज्ञ होने के साथ ही कथकली तथा भरतनाट्यम नृत्य में भी निपुण थे और तलवारबाज़ी में पारंगत थे। फ़िल्मों में उनके तलवारबाज़ी के दृश्य हैरतअंगेज हुआ करते थे। विभिन्न विषयों में रंजन की निपुणता यहीं तक सीमित नहीं थी। वह सभी भारतीय भाषाएं बोलने, लिखने और पढ़ने में सिद्धहस्त थे। उन्हें चित्रकारी का भी शौक था और फुर्सत के क्षणों में उन्होंने जादू की कला भी सीखी। उन्होंने अंग्रेज़ी-तमिल नाट्य पत्रिका का सम्पादन किया था। रंजन ने हवाई जहाज़ उड़ाना भी सीखा।

#निधन

रंजन का निधन 12 सितम्बर, 1983 को न्यू जर्सी, अमेरिका में हृदयाघात के कारण हुआ तब वे मात्र 65 वर्ष के थे।

प्रसिद्ध फ़िल्म निर्माता,वितरक गुलशन राय के जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धांजलि

प्रसिद्ध फ़िल्म निर्माता,वितरक गुलशन राय के जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धांजलि
गुलशन राय (2 मार्च 1924 - 11 अक्टूबर 2004) एक भारतीय फिल्म निर्माता और वितरक थे। उन्होंने 1970 के दशक में यश चोपड़ा द्वारा निर्देशित और 1990 के दशक में अपने बेटे राजीव राय द्वारा निर्देशित कई सफल फिल्मों का निर्माण किया

गुलशन का जन्म 1924 में ब्रिटिश भारत (अब पाकिस्तान में) लाहौर, पंजाब में हुआ था। भारत के विभाजन के बाद वह 1947 में बॉम्बे (अब मुम्बई) चले गए। उन्होंने हिन्दी फिल्म उद्योग में एक वितरक के रूप में अपना करियर शुरू किया। 1970 में, उन्होंने अपनी उत्पादन कंपनी त्रिमूर्ति फिल्म्स की शुरुआत की और पहली फिल्म जॉनी मेरा नाम निर्मित की जो सफल रही थी। 1970 के दशक में, उनकी यश चोपड़ा निर्देशित फिल्मों ने अमिताभ बच्चन को एक सुपरस्टार बनाया और पटकथा लेखकों सलीम-जावेद के लिए सफल करियर प्रारंभ किया। उल्लेखनीय फिल्में दीवार (1975) और त्रिशूल (1978) थीं 1980 और 90 के दशक में, उन्होंने अपने बेटे राजीव राय द्वारा निर्देशित एक्शन शैली में फिल्मों का निर्माण किया, और वह उनके संगीत (कल्याणजी-आनंदजी और बाद में विजू शाह द्वारा रचित) के लिए उल्लेखनीय थीं। वह त्रिदेव (1989), विश्वात्मा (1992), मोहरा (1994) और गुप्त (1997) हैं।

हालांकि, 2000 के दशक में राजीव की फिल्में, प्यार इश्क और मोहब्बत और असंभव के साथ त्रिमूर्ति फिल्म्स को असफलताओं का सामना करना पड़ा। दोनों ही फिल्म अर्जुन रामपाल को नायक के रूप में शुरुआत करने का प्रयास थीं लेकिन फ्लॉप हो गई और सफल नायक होने में अर्जुन असमर्थ रहे। 80 की उम्र में लंबी बीमारी के बाद 11 अक्टूबर 2004 को मुंबई में गुलशन राय की मृत्यु हो गई। वह पद्मश्री प्राप्तकर्ता थे

फिल्में

1970 जॉनी मेरा नाम  पहली निर्मित फ़िल्म
1973 जोशीला 
1975 दीवार विजेता, फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म पुरस्कार
1977 ड्रीम गर्ल 
1978 त्रिशूल 
1982 विधाता सुभाष घई द्वारा निर्देशित
1985 युद्ध बेटे राजीव राय द्वारा निर्देशित
1989 त्रिदेव 
1992 विश्वात्मा 
1994 मोहरा 
1997 गुप्त 
2001 प्यार इश्क और मोहब्बत 
2004 असंभव

टाइगर श्राफ

आशा भोसले

आशा भोसले 🎂08 सितंबर 1933 ⚰️12 अप्रैल 2026 जन्म की तारीख और समय: 8 सितंबर 1933, सांगली मृत्यु की जगह और तारीख: 12 अप्रैल 2026 ब...