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शुक्रवार, 12 मई 2023

पुनीत मल्होत्रा

*🕯️Date Of Birth : 13 May 1982*
*Birth Place : Mumbai*
*पुनीत मल्होत्रा एक भारतीय फिल्म निर्देशक हैं।* 

पुनीत मल्होत्रा का जन्म 13 मई 1982 को मुंबई के बांद्रा में हुआ था। वह हिंदी सिनेमा मशहूर फैशन डिजाइनर मनीष मल्होत्रा के भतीजे हैं। 
पुनीत मल्होत्रा (जन्म: 13 मई 1982) हिन्दी सिनेमा में काम करने वाले भारतीय फिल्म निर्देशक हैं। उनकी पहली फ़िल्म आई हेट लव स्टोरिज जुलाई 2010 को जारी हुई।
उनके नाना राम दयाल सबरवाल एक निर्माता थे जिन्होंने रेखा को लॉन्च किया था । उनके पहले चचेरे भाई फिल्म निर्माता सुनील और धर्मेश दर्शन हैं ; जाने-माने निर्देशक डेविड धवन उनके पिता के चचेरे भाई हैं; और प्रसिद्ध डिजाइनर मनीष मल्होत्रा , जो उनकी पहली फिल्म आई हेट लव स्टोरीज (2010) के कॉस्ट्यूम डिजाइनर भी थे , उनके मामा हैं।


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मल्होत्रा ​​​​ने करण जौहर की कभी खुशी कभी गम (2001), हंसल मेहता की ये क्या हो रहा है में सहायक निर्देशक के रूप में काम किया ? (2002), निखिल आडवाणी की कल हो ना हो (2003), अमोल पालेकर की पहेली (2005) और तरुण मनसुखानी की दोस्ताना (2008)। अंत में उन्होंने आई हेट लव स्टोरीज़ (2010) के साथ एक निर्देशक के रूप में अपनी शुरुआत की , जिसे उन्होंने लिखा भी था।

मल्होत्रा ​​​​की दूसरी फिल्म गोरी तेरे प्यार में थी, जो करण जौहर के धर्मा प्रोडक्शंस के तहत निर्मित थी , जिसमें करीना कपूर और इमरान खान ने अभिनय किया था, जिन्हें पहले एक मैं और एक तू में जोड़ा गया था ।

2019 में उन्होंने टाइगर श्रॉफ , तारा सुतारिया और अनन्या पांडे अभिनीत फिल्म स्टूडेंट ऑफ द ईयर 2 का निर्देशन किया ऐसा भी बताते है

2020 में उन्होंने टाइगर श्रॉफ की विशेषता वाले संगीत वीडियो "अविश्वसनीय" और "कैसानोवा" का निर्देशन किया ।

बेनी दयाल

*🎂जन्म 13 मई*

बेनी दयाल एक भारतीय गायक है जिनका जन्म 13 मई 1984में केरल राज्य में हुआ था। बेनी दयाल एस म्यूजिक बैंड के सदस्य है। इन्होंने अपने फ़िल्मी कैरियर की शुरुआत मलयालम फ़िल्म "बाई द पीपल" के साथ की थी।
जन्म की तारीख और समय: 13 मई 1984 (आयु 39 वर्ष), अबू धाबी, संयुक्त अरब अमीरात
पत्नी: कैथरीन थंगम (विवा. 2016)
माता-पिता: एम॰ पी॰ दयाल, स्यामा दयाल
भाई: डेनिस दयाल
बैनी दयाल एक भारतीय पार्श्व गायक और संगीतकार हैं। वह हिंदी सिनेमा में अपनी बेहतरीन गायकी के लिए जाने जाते हैं। वह एस 5 बैंड के मेंबर हैं, इस बैंड को संचालन एसएस म्यूजिक ने किया था। 

पृष्ठभूमि
बैनी दयाल का जन्म 13 मई 1984 को अबुधाबी में हुआ था। बैनी का परिवार मुख्यतः केरल के कोल्लम जिले से है। 

पढ़ाई
बैनी ने अपनी शुरूआती पढ़ाई अबुधाबी के इंडियन स्कूल से पूरी की। उन्होंने अपनी स्नातक की पढ़ाई मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज से की है। उन्होंने स्नातक के बाद उसी कॉलेज जर्नलिज्म के डिप्लोमा की पढ़ाई पूरी की। म्यूजिक में करियर बनाने से पहले यह एक कम्पनी में बतौर इवेंट कोर्डिनेटर के तौर कार्यरत थे। 

करियर
बेनी दयाल को हिंदी सिनेमा में पहला ब्रेक आ.आर रहमान के जरिये मिला। उन्होंने अपना पहला गाना भी ए.आर रहमान के साथ कम्पोज किया था। उन्होंने अपने अब तक के करियर में हिंदी के अलावा तमिल, तेलगु,कन्नड़, मलयालम, और बंगाली में भी गाने गाये हैं। उन्हें  फिल्म गजनी के गाने कैसे तू मुझे के फिल्मफेयर के अवार्ड से भी नवाजा जा चुका हैं


अमृत लाल ओझा


गुजरे जमाने के पार्श्वगायक ए आर ओझा की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि

अमृतलाल आर ओझा गुजरात के नगर ब्राह्मण थे।  वह रंजीत मूवीटोन में शामिल हो गए जब खेमचंद प्रकाश, ज्ञान दत्त और बुलो सी रानी को वहाँ वेतन भोगी संगीतकारों  के रूप पर रखा गया  उनका पहला गाना पुजारी -46 में आया था।

वह बुलो सी रानी और हंसराज बहल के बहुत घनिष्ट मित्र थे उन्होंने उनके लिए ज़्यादातर गीत गाने गाए।  उसी समय उन्होंने गुजराती फिल्मों में गाना गाया और वे वहां बहुत प्रसिद्ध और लोकप्रिय हो गए।

कुछ हिंदी फिल्में जिनमें उन्होंने गाने गाये है, लाखो में एक -47, ननद भौजाई -48, बिछड़े बालम -49 ​​(उन्होंने मीनाकुमारी के साथ भी गाया), भूल भुलैया -49, नीली -50 आदि उन्होंने 23 हिंदी फिल्मों में 39 गाने गाए  , लेकिन उन्होंने गुजराती में बहुत अधिक गाने गाये   सेवानिवृत्ति के बाद वह अहमदाबाद में बस गए, जहां 13 मई 1985 को उनका निधन हो गया

हसरत मोहानी


*🎂जन्म 1 जनवरी 1875*, 

*🕯️मृत्यु 13 मई 1951,*
*दल: भारतीय कोमनिष्ट पार्टी*
*शिक्षा: अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी*
*राष्ट्रीयता: भारतीय*
मशहूर व मारूफ शायर इंक़लाब ज़िंदाबाद का नारा ईजाद करने वाले हसरत मोहानी की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि

चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है 
हम को अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है 

बा-हज़ाराँ इज़्तिराब ओ सद-हज़ाराँ इश्तियाक़ 
तुझ से वो पहले-पहल दिल का लगाना याद है 

बार बार उठना उसी जानिब निगाह-ए-शौक़ का 
और तिरा ग़ुर्फ़े से वो आँखें लड़ाना याद है 

तुझ से कुछ मिलते ही वो बेबाक हो जाना मिरा 
और तिरा दाँतों में वो उँगली दबाना याद है 

खींच लेना वो मिरा पर्दे का कोना दफ़अतन 
और दुपट्टे से तिरा वो मुँह छुपाना याद है 

जान कर सोता तुझे वो क़स्द-ए-पा-बोसी मिरा 
और तिरा ठुकरा के सर वो मुस्कुराना याद है 

तुझ को जब तन्हा कभी पाना तो अज़-राह-ए-लिहाज़ 
हाल-ए-दिल बातों ही बातों में जताना याद है 

जब सिवा मेरे तुम्हारा कोई दीवाना न था 
सच कहो कुछ तुम को भी वो कार-ख़ाना याद है 

ग़ैर की नज़रों से बच कर सब की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ 
वो तिरा चोरी-छुपे रातों को आना याद है 

आ गया गर वस्ल की शब भी कहीं ज़िक्र-ए-फ़िराक़ 
वो तिरा रो रो के मुझ को भी रुलाना याद है 

दोपहर की धूप में मेरे बुलाने के लिए 
वो तिरा कोठे पे नंगे पाँव आना याद है 

आज तक नज़रों में है वो सोहबत-ए-राज़-ओ-नियाज़ 
अपना जाना याद है तेरा बुलाना याद है 

मीठी मीठी छेड़ कर बातें निराली प्यार की 
ज़िक्र दुश्मन का वो बातों में उड़ाना याद है 

देखना मुझ को जो बरगश्ता तो सौ सौ नाज़ से 
जब मना लेना तो फिर ख़ुद रूठ जाना याद है 

चोरी चोरी हम से तुम आ कर मिले थे जिस जगह 
मुद्दतें गुज़रीं पर अब तक वो ठिकाना याद है 

शौक़ में मेहंदी के वो बे-दस्त-ओ-पा होना तिरा 
और मिरा वो छेड़ना वो गुदगुदाना याद है 

बावजूद-ए-इद्दिया-ए-इत्तिक़ा 'हसरत' मुझे 
आज तक अहद-ए-हवस का वो फ़साना याद है 

मौलाना हसरत मोहानी भारत की आज़ादी की लड़ाई के सच्चे सिपाही होने के साथ-साथ शायर, पत्रकार, राजनीतिज्ञ और ब्रिटिश भारत के सांसद थे।

मौलाना हसरत मोहानी 'इन्कलाब ज़िन्दाबाद' का नारा देने वाले आज़ादी के सच्चे सिपाही थे, उनका वास्तविक नाम 'सैयद फ़ज़्लुल्हसन' और उपनाम 'हसरत' था। वे उत्तर प्रदेश के ज़िला उन्नाव के मोहान गांव में पैदा हुये थे इसलिये 'मौलाना हसरत मोहानी' के नाम से मशहूर हुए। इनका उपनाम इतना प्रसिद्ध हुआ कि लोग इनका वास्तविक नाम भूल गए।

इनकी आरंभिक शिक्षा घर पर ही हुई थी। ये बहुत ही होशियार और मेहनती विद्यार्थी थे और उन्होंने राज्य स्तरीय परीक्षा में टॉप किया था। बाद में उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी में पढ़ाई की जहाँ उनके कालेज के साथी मौलाना मोहम्मद अली जौहर और मौलाना शौक़त अली आदि थे। अलीगढ़ के छात्र दो दलों में बँटे हुए थे। एक दल देशभक्त था और दूसरा दल स्वार्थभक्त था। ये प्रथम दल में सम्मिलित होकर उसकी प्रथम पंक्ति में आ गए। यह तीन बार कॉलेज से निर्वासित हुए। उन्होंने सन 1903 ई. में बी. ए. परीक्षा उत्तीर्ण की थी। इसके अंर्तगत इन्होंने एक पत्रिका 'उर्दुएमुअल्ला' भी निकाली और नियमित रूप से स्वतंत्रता के आंदोलन में भाग लेने लगे। यह कई बार जेल गए तथा देश के लिए बहुत कुछ बलिदान किया। उन्होंने एक खद्दर भण्डार भी खोला, जो खूब चला।

हसरत मोहानी ने लखनऊ के प्रसिद्ध शायर और अपने उस्ताद तसलीम लखनवी और नसीम देहलवी से शायरी की शिक्षा हासिल की। हसरत ने उर्दू ग़ज़ल को एक नितांत नए तथा उन्नतिशील मार्ग पर मोड़ दिया है। उर्दू कविता में स्त्रियों के प्रति जो शुद्ध और लाभप्रद दृष्टिकोण दिखलाई देता है, प्रेयसी जो सहयात्री तथा मित्र रूप में दिखाई पड़ती है तथा समय से टक्कर लेती हुई अपने प्रेमी के साथ सहदेवता तथा मित्रता दिखलाती ज्ञात होती है, वह बहुत कुछ हसरत ही की देन है। उनकी कुछ खास किताबें 'कुलियात-ए-हसरत, 'शरहे कलामे ग़ालिब, 'नुकाते-ए-सुखन, 'मसुशाहदाते ज़िन्दां'आदि बहुत मशहूर हुयीं। उस्ताद ग़ुलाम अली द्वारा गाई गई उनकी ग़ज़ल 'चुपके चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है' भी बहुत मशहूर हुई जिसे बाद में फिल्म निकाह में फिल्माया गया। उन्होंने ग़ज़लों में ही शासन, समाज तथा इतिहास की बातों का ऐसे सुंदर ढंग से उपयोग किया है कि उसका प्राचीन रंग अपने स्थान पर पूरी तरह बना हुआ है। उनकी ग़ज़लें अपनी पूरी सजावट तथा सौंदर्य को बनाए रखते हुए भी ऐसा माध्यम बन गई हैं कि जीवन की सभी बातें उनमें बड़ी सुंदरता से व्यक्त की जा सकती है। उन्हें सहज में 'उन्नतशील ग़ज़लों का प्रवर्तक कहा जा सकता है। हसरत ने अपना सारा जीवन कविता करने तथा स्वतंत्रता के संघर्ष में प्रयत्न एवं कष्ट उठाने में व्यतीत किया। साहित्य तथा राजनीति का सुंदर सम्मिलित कराना कितना कठिन है, ऐसा जब विचार उठता है, तब स्वत: हसरत की कविता पर दृष्टि जाती है। इनकी कविता का संग्रह 'कुलियात-ए-हसरत' के नाम से प्रकाशित है।

हमारे देश की आज़ादी की लड़ाई में इस देश में रहने वाली हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख आदि सभी क़ौमों के लोगों ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था और न सिर्फ हिस्सा लिया बल्कि कुरबानियँ भी दीं। इन आज़ादी के सिपाहियों ने जंग में ख़ास भूमिका ही अदा नहीं की बल्कि बहुत भारी क़ीमत अदा की। हालांकि इस जंग ने हिन्दुस्तानी आवाम को नीचे से ऊपर तक, आम आदमी से लेकर असरदार तबकों तक को एक प्लेटफार्म पर इकट्ठा कर जोड़ने का काम किया और इस एकता ने भारत की ब्रिटिश सरकार के सामने बहुत बड़ी चुनौती खड़ी कर दी थी, लेकिन हमारे देश के उस समय के बादशाहों और राजाओं, आम किसान और मजदूरों, धर्मगुरुओं, साधु सन्तों, धार्मिक विद्वानों और मौलानाओं को, जंगे आज़ादी में हिस्सा लेने की वजह से, सख्त सजाएं भुगतनी पड़ी। सैंकड़ों ज़ागीरदारों की जागीरें छीन ली गई और उलेमाओं यानि इस्लामी धर्म गुरुओं को माल्टा के ठन्डे इलाक़ों की जेलों में और अंडमान निकोबार द्वीप समूह के निर्जन स्थानों में सजा भुगतने के लिये मजबूर होना पड़ा। मौलाना हसरत मोहानी ने भी अंग्रेजों से कभी समझौता नहीं किया और इन आज़ादी के सिपाहियों की तरह खुशी-खुशी तकलीफें और सजाएं भुगतीं।

हसरत मोहानी आज़ादी के बहुत बड़े दीवाने थे और ख़ासकर भारत की आज़ादी से उन्हें बहुत प्यार था। वे बालगंगाधर राव को बड़े सम्मान से तिलक महाराज कहते थे और उनके बहुत बड़े प्रशंसक थे क्योंकि उन्होंने कहा था कि आज़ादी मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है। उनकी पत्नी निशातुन्निसा बेगम, जो हमेशा परदे में रहती थीं, ने भी अपने पति के साथ आज़ादी की लड़ाई में हिस्सा लिया था। मौलाना हसरत मोहानी आज़ादी की लड़ाई में इस तरह घुलमिल गये थे कि उनके लिये कि इस राह में मिलने वाले दुख-दर्द, राहत-खुशी एक जैसे थे। वे हर तरह के हालात में अपने आप को खुश रखना जानते थे। उन्होंने बहुत थोड़ी सी आमदनी से, कभी कभी बिना आमदनी के, गुज़ारा किया। वे अंग्रेजों द्वारा कई बार जेल में डाले गये लेकिन उफ़ तक न की और अपना रास्ता नहीं बदला। उनकी सबसे बड़ी ख़ासियत यह थी कि वे अंजाम की फ़िक्र किये बिना, जो सच समझते थे कह देते थे। सच की क़ीमत पर वह कोई समझौता नहीं करते थे।

मौलाना हसरत मोहानी कालेज के ज़माने में ही आज़ादी की लड़ाई में शामिल हो गये थे। किसी तरह का समझौता न करने की आदत और नजरिये की वजह से उन्हें कालेज के दिनों में काफ़ी परेशानियों का सामना करना पड़ा। कालेज से निकलने के बाद उन्होंने एक उर्दू मैगजीन 'उर्दू ए मोअल्ला' निकालना शुरू की जिसमें वे जंगे आज़ादी की हिमायत में सियासी लेख लिखा करते थे। सन 1904 में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हो गये और सूरत सत्र 1907 में प्रतिनिधि के रूप में उपस्थित रहे। वे कांग्रेस के अधिवेषणों और सत्रों की रिपोर्ट और समाचार अपनी मैगजीन उर्दू ए मुअल्ला में प्रकाशित करते रहते थे। उन्होंने कलकत्ता, बनारस, मुम्बई आदि में आयोजित होने वाले कई कांग्रेसी सत्रों की रिपोर्ट अपनी मैगजीन उर्दू ए मुअल्ला में प्रकाशित की थीं। सूरत के कांग्रेस सेशन 1907 में जब शान्तिपसन्द लोगों के नरम दल और भारत की पूरी आज़ादी की हिमायत करने वाले गरम दल का विवाद उठ खड़ा हुआ तो उन्होंने तिलक के साथ कांग्रेस छोड़ दी और वे मुस्लिम लीग की तरह कांग्रेस से भी नफरत करने लगे।

एक दिलचस्प बात यह है कि मौलाना हसरत मोहानी ने अहमदाबाद में 1921 के सत्र में भारत के पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव रखा जबकि महात्मा गाँधी उस वक्त इसके लिये तैयार नहीं थे और अंग्रेजों के अधीन होम रूल के समर्थक थे। इस वजह से मौलाना अपना प्रस्ताव पास कराने में कामयाब नहीं हुये। इसी प्रकार मुस्लिम लीग के अहमदाबाद सेशन में उन्होंने अपने भाषण के दौरान पूर्ण स्वराज का का प्रस्ताव पेश किया था हालांकि इसे मंजूर कराने में वे कामयाब नहीं हुये। बीसवीं सदी के शुरू में हसरत मोहानी ने अलीगढ़ में सविनय अवज्ञा आन्दोलन की हिमायत में स्वदेशी स्टोर शुरू किया। उन्होंने यह स्टोर उस वक्त शुरू किया जब ब्रिटिश सरकार ने उनकी मैगजीन पर पाबन्दी लगा दी। मौलाना स्वदेशी आन्दोलन के इतने बड़े हिमायती थे कि उन्होंने दिसम्बर की ठन्डी रात में भी, अपने साथी मौलाना सुलेमान नदवी के ऑफिस में निवास के दौरान, विदेशी कम्बल इस्तेमाल करने से मना कर दिया। मौलाना सुलेमान नदवी ने खुद इस घटना का वर्णन किया।

आज भी हिन्दुस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश में अगर कोई आन्दोलन या मूवमेंट चलता है तो 'इंक़लाब ज़िन्दाबाद' का नारा उसका खास हिस्सा होता है। हमारे देश की कोई भी सियासी पार्टी या कोई संगठन अपनी मांगों के लिये मुजाहरे और प्रदर्शन करता हैं तो इस नारे का इस्तेमाल आन्दोलन में जान फूंक देता है। भारत की आज़ादी की लड़ाई में तो यह नारा उस लड़ाई की जान हुआ करता था और जब भी, जहाँ भी यह नारा बुलन्द होता था आज़ादी के दीवानों में जोश का तू़फ़ान भर देता था। इन्कलाब जिन्दाबाद का यह नारा आज़ादी के अज़ीमुश्शान सिपाही मौलाना हसरत मोहानी का दिया हुआ है। भारत की आज़ादी में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेने वाले हिन्दुस्तानी रहनुमाओं और मुजाहिदों की फेहरिस्त में मौलाना हसरत मोहानी का नाम सरे फेहरिस्त शामिल है। उन्होंने इंक़लाब ज़िन्दाबाद का नारा देने के अलावा टोटल फ्रीडम यानि पूर्ण स्वराज्य यानि भारत के लिये पूरी तरह से आज़ादी की मांग की हिमायत की थी।

हकीकत में, देशभक्त होने के साथ-साथ, मौलाना हसरत मौलाना बहुत सारी खूबियों के मालिक थे। वे साहित्यकार, शायर, पत्रकार, इस्लामी विद्वान, समाजसेवक और उसूलपरस्त राजनीतिज्ञ थे। वे बहुत काबिल, ईमानदार और सच्चे मुसलमान थे लेकिन उन्होंने कम्युनिस्ट विचारधारा को भी आगे बढ़ाया। वे भारत में कम्युनिस्ट पार्टी के फाउन्डर मेम्बरों में से एक थे। वे भगवान श्रीकृष्ण के भी प्रशंसक थे। हिन्दुस्तान पाकिस्तान के बंटवारे के बाद उन्होंने पाकिस्तान के बजाय हिन्दुस्तान में रहना पसन्द किया, किन्तु पाकिस्तान में भी लोग उन्हें उसी सम्मान से देखते हैं जिस तरह हिन्दुस्तान में उन्हें सम्मान दिया जाता है।

हसरत मोहानी की मृत्यु 13 मई, सन 1951 ई. को कानपुर में हुई थी। इनके इन्तक़ाल के बाद 1951 में कराची पाकिस्तान में हसरत मोहानी मेमोरियल सोसायटी, हसरत मोहानी मेमोरियल लाईब्रेरी और ट्रस्ट बनाये गये। उनके वर्षी पर हर साल इस ट्रस्ट और हिन्दुस्तान पाकिस्तान के अन्य संगठनों द्वारा उनकी याद में सभायें और विचार गोश्ठियॉ आयोजित की जाती हैं। कराची पाकिस्तान में हसरत मोहानी कालोनी, कोरांगी कालोनी हैं और कराची के व्यवसायिक इलाके में बहुत बडे़ रोड का नाम उनके नाम पर रखा गया है

मनहर उधास

*🎂जन्म की तारीख और समय: 13 मई 1943 (आयु 79 वर्ष), सावरकुंडला🎂*
*(गुजरात)*
भाई: पंकज उधास, निर्मल उधास

माता-पिता: जीतुबेन उधास, केशूभाई उधास

मनहर उधास भारतीय भजन गायक और पार्श्ववगायक है। वह हिन्दी के अलावा अपनी मातृभाषा गुजराती के लिये भी गाते हैं। वह पंकज उधास और निरमल उधास के बड़े भाई है। 1960 में यांत्रिक इंजीनियरी की पढ़ाई पूरी करने के बाद वह नौक्ररी की तलाश में मुम्बई गए। सबसे पहले उन्होंने 1969 की फिल्म विश्वास के लिये गीत गाया था।
खास बातें
फिल्म इंडस्ट्री के जाने- माने पाश्र्व गायक मनहर उधास ने अपनी मधुर आवाज में कई गानों को अपनी आवाज दी है। हिंदी के अलावा उन्होंने अपनी मातृभाषा गुजराती में भी गाने गाए हैं।
फिल्म इंडस्ट्री के जाने- माने पाश्र्व गायक मनहर उधास ने अपनी मधुर आवाज में कई गानों को अपनी आवाज दी है। हिंदी के अलावा उन्होंने अपनी मातृभाषा गुजराती में भी गाने गाए हैं। मशहूर गजल गायक पंकज उधास के बड़े भाई मनहर उधास का जन्म 13 मई 1943 हुआ गुजरात में हुआ था। मनहर, पंकज और निर्मल उधास तीनों भाईओं को बचपन से ही गाने और  बड़े-बड़े गायकों को सुनने का बेहद शौक था। 1960 में इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद मनहर नौकरी की तलाश में मुंबई गए।
तीनों भाईयों में सबसे पहले मुंबई आए मनहर उधास ने साल 1969 की फिल्म विश्वास के एक गीत से हिंदी फिल्मों में अपनी आवाज देने की शुरुआत की। इसके बाद मुंबई में एसडी बर्मन के संगीत निर्देशन में उन्हेंन फिल्म अभिमान में लता मंगेशकर के साथ ‘लूटे कोई मन का नगर’ गीत गाने का मौका मिला। इसके बाद तो मनहर ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और 450  के आस पास हिंदी फिल्मों के गीतों में अपनी आवाज दी।

अपनी बेहतरीन आवाज की वजह से मनहर उधास लोगों के बीच काफी मशहूर हो गए थे। एक समय ऐसा भी था जब उनका फिल्मी करियर ऊंचाई पर था। इसी दौरान उन्हें अचानक साईं भजन गाने का ऑफर मिला। उस समय उनका भजन गायन के प्रति रुझान नहीं था। लेकिन  फिर बाद में उन्होंने फिर साईं के भजनों की पहली एलबम ‘साईं अर्पण’ तैयार की। इसके बाद उन्होंने लगातार भजनों की 30 एलबम रिकार्ड की और भजन गायन में भी सफलता हासिल की।

प्रसिद्ध गीत व गजल गायक पंकज उधास और मनहर उधास दोनों भाई हैं। उनके गीत हमेशा से श्रोताओं को पसंद आए हैं। मनहर उधास ने एक से बढक़र एक गीत फिल्म इंडस्ट्री के लिए गाए हैं। उनकी आवाज में अलग ही अपनापन झलकता है। उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री के कई मशहूर गानों को अपने सुरों में पिरोया। मनहर उधास के गाए गानों में हम तुम्हें चाहते हैं ऐसे, प्यार करने वाले कभी डरते नहीं, तू मेरा जानू है, इलु-इलु, मेरा कर्मा तू मेरा धर्मा तू, तेरा नाम लिया जैसे मशहूर गीत शामिल हैं।

आशा भोसले

आशा भोसले 🎂08 सितंबर 1933 ⚰️12 अप्रैल 2026 जन्म की तारीख और समय: 8 सितंबर 1933, सांगली मृत्यु की जगह और तारीख: 12 अप्रैल 2026 ब...