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बुधवार, 31 मई 2023

आनंद मिलंद

प्रसिद्ध संगीतकार जोड़ी आनंद मिलिंद के मिलिंद श्रीवास्तव के जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनाएं

आनंद और मिलिंद एक भारतीय संगीत निर्देशक-जोड़ी हैं जिसमें आनंद श्रीवास्तव और उनके छोटे भाई मिलिंद शामिल हैं।  उन्होंने 200 से अधिक बॉलीवुड फिल्मों के लिए संगीत तैयार किया है और वे 60 के दशक के संगीत निर्देशक चित्रगुप्त के बेटे हैं।  उन्होंने `अब आएगा मजा` (1984) में शुरुआत की और `कयामत से कयामत तक` (1988) की सफलता के बाद उनकी प्रसिद्धि काफी बढ़ गयी  उसी वर्ष हॉरर फ्लिक `वो फिर आएगी` की मध्यम सफलता भी देखी गई।  'लाल दुपट्टा मलमल का' ने 1989 में म्यूजिक स्टैंड पर धूम मचा दी।

 दोनों ने सलमान खान की फिल्म 'बागी: ए रिबेल फॉर लव' के लिए गाने तैयार किए, इसके बाद बॉक्स ऑफिस पर 'दिल', 'बेटा' (1992) और 'लव' (1991) जैसी हिट फिल्में दीं।  1994 में उन्होंने राहुल रवैल की `अंजाम` के लिए भी संगीत तैयार किया, जिसमें माधुरी दीक्षित और शाहरुख खान ने अभिनय किया।  `सुहाग` (1994), अजय देवगन, अक्षय कुमार करिश्मा कपूर और नगमा अभिनीत, एक और फिल्म है जिसने उस वर्ष काफी सफ़लताये हासिल की  1994 में उनके सबसे अच्छे एल्बमों में से एक विक्रम भट्ट निर्देशित रोमांटिक फिल्म `मदहोश` थी, जिसने आमिर खान के भाई फैसल खान को लॉन्च किया था।  90 के दशक के अंत में उन्होंने मिथुन चक्रवर्ती की कई फिल्मों के लिए संगीत तैयार किया मगर वह संगीत ज़्यादा लोकप्रिय नही हुआ

उन्होंने कुछ भोजपुरी फिल्मों के लिए संगीत भी तैयार किया है।  आनंद-मिलिंद ने `कयामत से कयामत तक` में आमिर खान और जूही चावला सहित कई बॉलीवुड सितारों को लॉन्च करने में भूमिका निभाई;  बागी में सलमान खान और नगमा;  सौगंध में अक्षय कुमार और प्रेम कैदी में करिश्मा कपूर  उन्होंने गायकों उदित नारायण, अभिजीत, पूर्णिमा, गायत्री अय्यर और परवेज के गॉड-फादर की भूमिका निभाई।

पेशा:संगीत

जन्म:1 जनवरी, 1900

जन्म स्थान:भारत

आनंद श्रीवास्तव और उनके छोटे भाई, मिलिंद श्रीवास्तव की संगीतकार जोड़ी, 200 से अधिक बॉलीवुड फिल्मों के लिए संगीत रचना के लिए प्रसिद्ध है । वे 1960 के दशक के पूर्व संगीत निर्देशक चित्रगुप्त के पुत्र हैं। 1984 में अब आएगा मज़ा के साथ अपनी शुरुआत करने के बाद, यह जोड़ी ब्लॉकबस्टर कयामत से कयामत तक (1988) से प्रसिद्ध हुई, जिसके लिए उन्होंने फिल्मफेयर पुरस्कार जीता। उनके उल्लेखनीय फिल्म क्रेडिट में बेटा (1992), जिगर (1992), राजा बाबू (1993), क्रांतिवीर (1994), अजय (1996) और दिल्लगी (1999) शामिल हैं।

प्रमुख फ़िल्में आनंद मिलंद

आई मिलन की रात १९९१,
आज़माइश १९९५,
अधर्म १९९२,
अनाड़ी १९९३,
अंजाम १९९४,
आर्मी १९९६,
बागी - ए रेबेल फॉर लव १९९०,
बेताज बादशाह १९९४,
बोल राधा बोल १९९२,
छुपा रुस्तम २००१,
छोटे सरकार १९९६,
दीदार १९९२,
दीवाना मुझ सा नहीं १९९०,
दिल १९९०,
दिल आशना है १९९२,
एक लड़का एक लड़की १९९२,
गेम १९९३,
घर जमाई १९९२,
हीरो नं॰ 1 १९९७,
होगी प्यार की जीत १९९९,
इन्साफ १९९७,
जान १९९६,
जानी दुश्मन २००२,
जानवर १९९९,
लाड़ला १९९४,
लाल दुपट्टा मलमल का १९८९,
लोफर १९९६,
लुटेरे १९९३,
प्लेटफॉर्म १९९२,
क़यामत से क़यामत तक १९८८,
राजा बाबू १९९४,
रक्षक १९९६,
सनम १९९७,
गोपी किशन १९९४,
सौतन २००६,
सुहाग १९९४,
तीसरा कौन १९९४,
तुम मेरे हो १९९०,
वंश १९९२,
ये तेरा घर ये मेरा घर २००१
गैर १९९९
कुली नं॰ 1 १९९५

गायक KK

*🎂जन्म की तारीख और समय: 23 अगस्त 1968, दिल्ली*
*🕯️मृत्यु की जगह और तारीख: 31 मई 2022, कोलकाता*

प्रसिद्ध पार्श्वगायक के के की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि

कृष्णकुमार कुन्नथ (जन्म- 23 अगस्त, 1968, केरल; मृत्यु- 31 मई, 2022, कोलकाता) प्रसिद्ध भारतीय पार्श्वगायक थे। उन्हें उनके संक्षिप्त नाम 'केके' से अधिक जाना जाता था। वह हिंदी, तेलुगु, मलयालम, कन्नड़ और तमिल फिल्मों में प्रमुख गायक रहे। केके ने अपने दोस्तों के साथ एक रॉक बैंड का भी गठन किया था। मशहूर गायक किशोर कुमार और संगीत निर्देशक आर. डी. प्रधान ने केके को बहुत प्रभावित किया था। विख्यात फिल्म निर्देशक विशाल भरद्वाज ने केके को बॉलीवुड में गाने का पहला मौका दिया था। उन्होंने बॉलीवुड में अपना कार्यकाल फ़िल्म 'माचिस' के 'छोड़ आये हम वो गलियाँ' से शुरू किया। केके 31 मई, 2022 की आधी रात को कोलकाता के नजरुल मंच पर परफॉर्म कर रहे थे कि अचानक उनकी तबीयत बिगड़ी और कुछ ही पलों में उनकी मौत हो गई।

कृष्णकुमार कुन्नथ उर्फ़ केके का जन्म 23 अगस्त, 1968 को केरल में हुआ था। उनके पिता का नाम सी. एस. नायर और माता का कनाकवाल्ली है। हिंदी सिनेमा में एंट्री लेने से पहले ही केके करीबन 35000 ऐड जिंगल्स कर चुके थे। उन्होंने 1999 क्रिकेट विश्व कप के दौरान भारतीय क्रिकेट टीम के समर्थन के लिए 'जोश ऑफ़ इंडिया' गाना गाया। इसके बाद उन्होंने 'पल' नामक एलबम निकाला जिसे सर्वश्रेष्ठ सोलो एल्बम के लिए स्टार स्क्रीन पुरस्कार मिला। इस एल्बम के दो गाने 'पल' और 'यारों' काफी लोकप्रिय थे।

शिक्षा

केके का पूरा बचपन दिल्ली में बीता। उन्होंने दिल्ली के माउंट सेंट मैरी स्कूल शुरुआती शिक्षा पूरी की। उन्होंने अपनी ग्रेजुएशन दिल्ली विश्वविद्यालय के करोड़ीमल कॉलेज से पूरी की थी।

विवाह

साल 1991 में उन्होंने अपनी बचपन की दोस्त ज्योति से शादी रचाई। केके एक बहुत ही जिम्मेदार व्यक्ति थे। जब भी उनके पास वक्त होता वो वह अपने परिवार के साथ रहते थे। एक इंटरव्यू के दौरान केके ने कहा था, "मेरा परिवार ही मेरी ताकत है, वो मुझे हर कजोरी से लड़ने की ताकत देता है।" उनके एक बेटा और बेटी हैं। उनका बीटा नकुल जिसने एल्बम 'हमसफ़र' में एक गीत मस्ती गाया है। केके की एक बेटी भी है जिसका नाम तामारा है।

कॅरियर

केके कभी भी एक गायक नहीं बनना चाहते थे, उनका बचपन से सपना डॉक्टर बनने का था। केके किशोर कुमार, आर. डी. बर्मन को अपना गुरु मानते थे और उन्हीं को ध्यान में रखकर संगीत को अपना कॅरियर बनाया। कॉलेज के दिनों के दौरान उन्होंने अपने दोस्त के साथ मिलकर एक बैंड किया था। केके को पहला ब्रेक यूटीवी ने दिया था। उन चार सैलून की अवधि में केके ने 11 भारतीय भाषाओं में 3,500 से अधिक विज्ञापनों में काम किया। केके लेस्ली लेविस को अपना गुरु मानते थे, क्योंकि, उन्होंने ही केके को पहली बार विज्ञापन में गाने का मौका दिया था। केके ने हिंदी में 250 से भी अधिक गाने गाये एवं तमिल और तेलुगु में 50 से भी अधिक गाने गाये।

विख्यात फिल्म निर्देशक विशाल भरद्वाज ने केके को बॉलीवुड में गाने का पहला मौका दिया। उन्होंने बॉलीवुड में अपना कार्यकाल फ़िल्म 'माचिस' के 'छोड़ आये हम' से शुरू किया और आगे चलकर कई और लोकप्रिय गाने गाये। उन्हें अपना पहला सोलो गाना भी विशाल भरद्वाज ने ही दिया। पर यह 'हम दिल दे चुके सनम' के 'तड़प तड़प के' में उनका भावपूर्ण गायन ही था जिससे उन्हें प्रसिद्धि मिली।

टीवी कॅरियर

साल 1999 में सोनी म्यूजिक लॉन्च हुआ तो वे एक नए गायक को लॉन्च करना चाहते थे। इस काम के लिए केके को चयनित किया गया। उस दौरान उन्होंने 'पल' नमक एक सोलो एल्बम निकाला जिसके संगीत निर्देशक लेस्ली लेविस थे। उनका दूसरा एल्बम 'हमसफ़र' 24 जनवरी 2008 को रिलीज किया गया। केके सिंगिंग बेस्ड शो फेम गुरुकुल में बतौर जज नज़र आ चुके थे। हालंकि वह इसके बाद दुबारा छोटे शो में नज़र नहीं आये। उनका कहना था कि यह माध्यम उन्हें प्रतिबंधित रखती है।

प्रसिद्ध गाने

पल, तड़प-तड़प के इस दिल से, सच कह रहा है दीवाना, आवारापन बंजारापन, आशाएं, तू ही मेरी शब है, क्या मुझे प्यार है, लबों को, जरा सा, खुदा जानें, दिल इबादत, है जूनून, जिंदगी दो पल की, मै क्या हूँ, हां तू है, अभी-अभी, तुझे सोचता हूँ, इंडिया वाले, तो जो मिला।

मृत्यु

गायक केके की मृत्यु 21 मई, 2022 को कोलकाता, पश्चिम बंगाल में हुई। एक कॉलेज द्वारा दक्षिण कोलकाता स्थित नजरुल मंच में एक समारोह का आयोजन किया गया था। जहाँ करीब एक घंटे तक गाने के बाद जब केके वापस अपने होटल पहुंचे तो वह अस्वस्थ महसूस कर रहे थे। उनको दक्षिण कोलकाता के एक निजी अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। अस्पताल के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना था कि 'केके को रात करीब 10 बजे अस्पताल लाया गया। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हम उनका उपचार नहीं कर सके।' अस्पताल के चिकित्सकों ने कहा कि उन्हें आशंका है कि गायक की मौत हार्ट अटैक के कारण हुई थी



कल्पना लाजमी

कल्पना लाजमी
*🎂जन्म की तारीख और समय: 31 मई 1954*
*🕯️मृत्यु की जगह और तारीख: 23 सितंबर* 

फ़िल्म मेकर कल्पना लाजमी के जन्मदिन पर हार्दिक श्रधांजलि

समझने के लिए, वे हिंदी सिनेमा की सबसे ज़रूरी महिला डायरेक्टर्स में से एक थीं. वैसे कल्पना लाजमी को पसंद नहीं था कि उनको ‘महिला फिल्ममेकर’ कहा जाए. वे बस फिल्ममेकर थीं. जीवन में उन्होंने सिर्फ 6 फीचर फिल्में डायरेक्ट कीं. लोग ‘रुदाली’ और ‘दमन’ से आगे नहीं जा पाते मगर उनकी पहली ही फिल्म ऐसी औरत की कहानी थी जो शादी के बाहर एक पुरुष से संबंध बनाती है और उसे पाप नहीं मानती. कल्पना ने ख़ुद का जीवन भी ऐसे ही जिया. 17 की उमर में जब ज़ेवियर्स जैसे ग्लैमरस कॉलेज पढ़ रही थीं, तब वामपंथी विचारों वाले एक क्षेत्रीय गायक और कलाकार को देखकर सम्मोहित हो गईं. और अगले 40 बरस उनका रिश्ता चला. दोनों ने जीवनपर्यन्त विवाह नहीं किया. सहूलियत की जिंदगी जीने वाली इस लड़की को कई तकलीफें आईं, लेकिन उन्होंने जीवन का सारा ज़हर पिया. सदा किया वही जो उनको करना था. रविवार, 23 सितंबर 2018 के भोर अंधेरे वे चली गईं
 जो उन्हें नहीं जानते उनके लिए कुछ बातें और कल्पना की याद.

पेंटर ललिता लाजमी की बेटी थीं. वही जो ‘तारे जमीं पर’ (2007) में बच्चों की पेंटिंग प्रतियोगिता की जज बनकर आती हैं.

कागज़ के फूल’ (1959) और ‘प्यासा’ (1957) जैसी महान फिल्में बनाने वाले गुरु दत्त उनके सगे मामा थे.

वे 31 मई 1954 को पैदा हुईं. बंबई में बड़ी हुई. घर में उनके अलावा उनका भाई देवदास था. सभ्रांत वर्ग से थीं. परिवार प्रगतिशील था. लेकिन कल्पना का कहना था कि उनका बचपन पीड़ा भरा रहा. उनके पिता शराब बहुत पीते थे और इससे वे बहुत परेशान होती थीं.

उनके जीवन में दो ही पुरुष थे जिनसे वो सबसे ज्यादा प्रभावित हुई. पहले थे उनके पिता गोपी लाजमी जो नेवी में कैप्टन थे. और दूसरे सिंगर, गीतकार और आर्टिस्ट भूपेन हजारिका.

शुरू से कल्पना बाग़ी और आक्रामक नहीं थीं. वे मासूम और अवाक आंखों वाली थीं. मिल्स एंड बून रोमैंस नॉवेल पढ़कर जवानी में कदम रखे. लेकिन बाद में उन्होंने अपनी फिल्मों में ठोस, ज़मीनी और मुश्किल महिला पात्र रचे.

कल्पना ने 1971 में बंबई के सेंट ज़ेवियर्स कॉलेज से साइकोलॉजी की पढ़ाई की. वहां उनकी मुलाकात भूपेन हज़ारिका से हुई जो कल्पना के ही अंकल आत्मा राम की फिल्म ‘आरोप’ के लिए म्यूजिक बना रहे थे. तब कल्पना सिर्फ 17 साल की थीं. वे भूपेन की रचनात्मकता, आवारगी, बाग़ीपन और बेतरतीब व्यक्तित्व से बहुत आकृष्ट हो गईं. पांच साल रिश्ते में रहने के बाद वे सबकुछ छोड़ कलकत्ता में भूपेन के फ्लैट में रहने लगीं. शुरू में उनके पिता को लगा कि ये आकर्षण जल्द ही खत्म हो जाएगा. लेकिन ऐसा नहीं हो पाया और उनका-भूपेन का रिश्ता 40 साल चला. उन दोनों ने कभी शादी नहीं की. लंबे समय तक असम के पारंपरिक समाज ने इस रिश्ते को स्वीकार नहीं किया. दोनों को दिक्कतें आईं. कल्पना की मां ललिता भी कभी उनके इस रिश्ते के पक्ष में नहीं थीं.

फिल्मों में उनकी शुरुआत श्याम बेनेगल को असिस्ट करने से हुई. उनकी फिल्म ‘भूमिका’ (1977) में वे कॉस्ट्यूम असिस्टेंट थीं. बाद में बेनेगल की फिल्म ‘मंडी’ (1983) में वो असिस्टेंट डायरेक्टर बन गईं. उन दिनों में देव बेनेगल (इंडियन ऑगस्ट, रोड़ मूवी) भी उनके साथ ही असिस्टेंट थे. देव याद करते हैं कि “वो ऊर्जा का भंडार थीं. वो अपने आस-पास के पुरुषों को असहज करती थीं क्योंकि अपने अधिकारों, अपने नजरिए और कहानी को अपने ढंग से कहने के लिए आक्रामक तरीके से खड़ी रहती थीं. वो दोस्तों की दोस्त थीं. सेंस ऑफ ह्यूमर था. खाने से प्यार था. फिल्मों का पैशन था.”

देव आनंद ने कल्पना को अपनी फिल्म ‘हीरा पन्ना’ (1973) में ज़ीनत अमान वाला रोल ऑफर किया था. पर उन्होंने मना कर दिया.

साल 1978 में कल्पना ने भूपेन ह़ज़ारिका के साथ मिलकर अपनी कंपनी शुरू की. उसी के अंतर्गत अपनी पहली डॉक्यूमेंट्री ‘डी. जी. मूवी पायोनियर’ (1978) डायरेक्ट की. ये फिल्म बंगाली फिल्ममेकर धीरेन गांगुली की लाइफ पर बेस्ड थी.

उन्होंने 1986 में अपनी पहली फीचर फिल्म ‘एक पल’ डायरेक्ट की. इसमें शबाना आज़मी, नसीरुद्दीन शाह, फारुख़ शेख़, दीना पाठक और श्रीराम लागू लीड रोल में थे. कल्पना और गुलज़ार ने इसकी स्क्रिप्ट लिखी थी. हज़ारिका ने म्यूजिक कंपोज किया था. ये अपने समय से काफी आगे की फिल्म थी. एक ऐसी औरत की कहानी थी जो शादीशुदा होने के बाद भी किसी दूसरे पुरुष के साथ संबंध बनाना स्वीकार करती है. और इसे लेकर उसे कोई पछतावा नहीं होता है. वो नतीजे भुगतने के लिए पूरी तरह तैयार होती है.

कल्पना ने 1988 में दूरदर्शन के लिए ‘लोहित किनारे’ नाम का सीरियल डायरेक्ट किया. इसमें तनवी आज़मी लीड रोल में थीं. इन्हीं तनवी ने ‘बाजीराव मस्तानी’ में पेशवा बाजीराव बने रणवीर सिंह की मां राधाबाई का रोल किया था.

वे और बॉलीवुड एक्ट्रेस दीपिका पादुकोण दूर के रिश्तेदार थे, लेकिन दीपिका को शायद ये पता नहीं था. कल्पना का कहना था – “दीपिका और मैं सारस्वत ब्राह्मण हैं. उनकी और मेरी फैमिली की जड़ें कश्मीर में हैं. हम कश्मीरी पंडित हैं जो वहां से बैंगलोर आकर बस गए थे. मेरे मामा गुरु दत्त बैंगलोर में रहते थे और दीपिका के पिता प्रकाश पादुकोण भी. दीपिका पक्का मेरी रिश्तेदार हैं, हालांकि उनको ये पता नहीं होगा.”

उनकी सबसे यादगार और अमर कर देने वाली फिल्म ‘रुदाली’ (1993) है जिसे बेस्ट एक्ट्रेस का नेशनल अवॉर्ड मिला था. इस साल फिल्म की रिलीज को 25 साल हो गए है. ये बंगाली लेखिका महाश्वेता देवी की लिखी लघु-कथा पर आधारित थी. फिल्म राजस्थान में बेस्ड ऐसी औरतों के बारे में थी जिनको किसी के मरने पर पैसा देकर रोने के लिए बुलाया जाता है. उन्हें रुदालियां (रुदन करने वाली) कहा जाता है. डिंपल कपाड़िया ने ऐसी ही ग्रामीण औरत शनीचरी का रोल किया था. शूटिंग के दौरान वे सख़्त हालात में रहीं. राजस्थान में शूटिंग के दौरान उनको निमोनिया हो गया था. उनके अलावा अभिनेत्री राखी फिल्म में बिनकी नाम की रुदाली बनी थीं. दुनिया जहान में इस फिल्म को सराहा गया, अवॉर्ड मिले. लेकिन राखी नाराज हो गई थीं. उनका कहना था कि डायरेक्टर कल्पना ने उनके सीन काट दिए और डिंपल कपाड़िया का रोल मजबूत कर दिया. जबकि ये दो हीरोइन वाली फिल्म थी और उनका रोल भी बराबरी का होना था. ख़ैर, इस फिल्म की विरासत ऐसी है कि लंबे समय तक बनी रहेगी. इसके गीत कभी भुलाए न जा सकेंगे.

उसके बाद कल्पना ने ‘दरमियान’ (1997) डायरेक्ट की. इसमें किरण खेर, आरिफ ज़कारिया, तबु और सयाजी शिंदे जैसे एक्टर्स थे. ये 1940 और 50 के हिंदी फिल्म उद्योग में सेट कहानी है. इसमें एक एक्ट्रेस है जिसका करियर उतार पर है. उसे एक बेटा पैदा होता है. जिसे हर्माफ्रोडाइट (hermaphrodite) नाम की मेडिकल कंडीशन है. वो पुरुष और स्त्री दोनों के सम्मिलित, अविकसित जननांगों के साथ पैदा होता है. इस स्थिति वालों को समाज मोटे तौर पर हिजड़ा कहने लगता है लेकिन दोनों अलग-अलग होते हैं. कहानी में आगे मां और बेटे का एक जटिल रिश्ता नजर आता है. ये भी कि तब का फिल्म उद्योग कैसा था और तब हिजड़ों की स्थिति कैसी थी. पहले इस रोल में शाहरुख खान को लिया गया था. लेकिन बाद में उन्होंने मना कर दिया. तब दूसरे एक्टर्स को ट्राई किया गया. अंत में आरिफ ज़कारिया ने ये रोल किया.

उसके बाद ‘दमन’ (2001) आई. शादी के बाद पति द्वारा पत्नी का रेप यानी मैरिटल रेप इसका विषय था. ये एक तरह की घरेलू हिंसा और रेप है जिससे न जाने कितनी पत्नियां उत्पीड़ित होती हैं. लेकिन ज्यादातर इसे लेकर जागरूक नहीं होतीं और होती हैं तो चुप रहती हैं. भारत सरकार के परिवार कल्याण विभाग ने इस सामाजिक विषय पर कुछ करने के लिए कल्पना लाजमी से संपर्क किया था. उन्होंने ‘दमन’ की कहानी लिखी. कहानी परिवार कल्याण विभाग को पसंद आई और उन्होंने इसमें पैसा लगाया. रवीना टंडन ने इसमें दुर्गा नाम की युवती का रोल किया जिसका हिंसक पति (सयाजी शिंदे) उसके साथ मैरिटल रेप करता है. कल्पना की इस फिल्म से रवीना को बेस्ट एक्ट्रेस का नेशनल अवॉर्ड मिला था.

उन्होंने ‘सिंहासन’ नाम से एक स्क्रिप्ट लिखी हुई थी. ये एक पोलिटिकल ड्रामा होनी थी. कल्पना इसमें ऐश्वर्या राय को लीड रोल में लेना चाहती थीं. अगर ऐसा हो पाता तो ऐश्वर्या के करियर की पहली फिल्म होती जिसमें वे किसी राजनेता का रोल करतीं.

बतौर डायरेक्टर उनकी अंतिम दो फिल्में ‘क्यों’ (2003) और ‘चिंगारी’ (2006) थीं. ‘चिंगारी’ में सुष्मिता सेन ने एक गांव की वेश्या बसंती का रोल किया था जिसके साथ गांव का मुख्य पुजारी (मिथुन चक्रवर्ती) रेप करता है. गांव में नया आया डाकिया चंदन (अनुज साहनी) बसंती से प्यार करने लगता है. उनकी शादी होने वाली होती है लेकिन पुजारी उसकी हत्या कर देता है. अंत में बसंती उसका संहार करती है. कल्पना की इन दो फिल्मों को छोड़ दें तो बाकी सब प्रशंसनीय थीं.

काफी वर्षों से वे किडनी के कैंसर का इलाज करवा रही थीं. इस कठिन समय में उनकी पक्की दोस्त सोनी राजदान उनके साथ खड़ी थीं. जो लाखों रुपये का खर्चा आता रहा, उसमें मदद करती रहीं. उनके अलावा आलिया भट्ट, रोहित शेट्टी, आमिर खान, सलमान खान, जावेद अख़्तर, शबाना आज़मी, नीना गुप्ता और उनके पुराने दोस्तों ने भी वित्तीय मदद की. उनकी दोनों किडनी निकाली जा चुकी थी और वे डायलसिस पर थीं इसके बावजूद उनको यकीन था कि वे ठीक हो जाएंगी. कल्पना ने याद किया था कि इस वक्त में उनकी मां ललिता लाजमी उनके लिए सबसे बड़ा सपोर्ट रहीं.

उन्होंने कहा था कि वे फिर से फिल्में बनाने के लिए बेचैन हो रही हैं. जैसे ही पैरों पर खड़ी होंगी, लौटेंगी. उन्होंने अपने जीवनसाथी भूपेन हजारिका पर बुक भी लिखी – Bhupen Hazarika – The Way I Knew Him. वे भूपेन के जीवन पर ‘द टेम्पेस्ट’ नाम से फिल्म बनाने की प्लानिंग भी कर चुकी थी, कास्टिंग भी चल रही थी. उनसे पहले पूजा भट्ट ये फिल्म बनाना चाहती थीं.

अपने जीवन को लेकर उनका कहना था कि तमाम कष्टों के बीच उन्होंने जो भी जीवन जिया उसे उसकी संपूर्णता में जिया और हरेक दिन को आनंद लेकर जिया. बीमारी ने जब उनको पूरी तरह तोड़ दिया था तो भी उनका कहना था – “मेरी किडनीज़ फेल हुई हैं, मैं नहीं.”


मंगलवार, 30 मई 2023

अनिल विश्वास



🔛अनिल कृष्ण विश्वास

*🎂7 जुलाई 1914*
* 🕯️31 मई 2003*

जिन्हें पेशेवर रूप से अनिल विश्वास के नाम से जाना जाता है , 1935 से 1965 तक एक भारतीय फिल्म संगीत निर्देशक और पार्श्व गायक थे, जो पार्श्व गायन के अग्रदूतों में से एक होने के अलावा , पहले के लिए भी श्रेय दिया जाता है। भारतीय सिनेमा में बारह टुकड़ों का भारतीय ऑर्केस्ट्रा और आर्केस्ट्रा संगीत और पूर्ण-रक्त वाले कोरल प्रभाव पेश करना ।  पश्चिमी स्वर संगीत में एक मास्टर भारतीय शास्त्रीय या लोक तत्वों, विशेष रूप से अपने संगीत में बाउल और भटियाली के लिए जाना जाता था ।उनकी 90 से अधिक फिल्मों में से सबसे यादगार फिल्में थीं, रोटी (1942), किस्मत (1943), अनोखा प्यार (1948), तराना (1951), वारिस (1954), परदेसी (1957) और चार दिल चार राहेन (1959)।

*फिल्मोग्राफी*

धरम की देवी (1935)
फ़िदा-ए-वतन (उर्फ तस्वीर-ए-वफ़ा ) (1935, झंडे खान के साथ सह-संगीतकार )
पिया की जोगन (उर्फ खरीदी हुई दुल्हन )
प्रतिमा (उर्फ प्रेम मूर्ति )
प्रेम बंधन (उर्फ विक्टिम्स ऑफ लव ) (1936, झंडे खान के साथ सह-संगीतकार )
संगदिल समाज
शेर का पंजा
शोख दिलरुबा (1936, सुंदर दास के साथ)
बुलडॉग (1936)
दुखियारी (उर्फ ए टेल ऑफ़ सेल्फलेस लव ) (1936, मधुलाल दामोदर मास्टर के साथ)
जेंटलमैन डाकू (1937)
जागीरदार (1937)
कोकिला (1937)
महागीत (1937)
वतन (1938)
तीन सौ दिन के बाद (1938)
हम तुम और वो (1938)
ग्रामोफोन सिंगर (1938)
डायनामाइट (1938)
अभिलाषा (1938)
जीवन साथी (1939)
एक ही रास्ता (1939)
पूजा (1940)
औरत (1940)
अलीबाबा (1940/आई)
बहन (1941)
आसरा (1941)
विजय (1942)
जवानी (1942)
किस्मत (1943)
हमारी बात (1943)
ज्वार भाटा (1944)
पहली नज़र (1945)
भूख (1947)
मांझधर (1947)
वीना (1948)
गजरे (1948)
अनोखा प्यार (1948)
लाडली (1949)
जीत (1949)
लड़कियों का स्कूल (1949)
बेकसूर (1950)
आरजू (1950)
लाजवाब (1950)
तराना (1951)
दो सितारे (1951)
आराम (1951)
दो राह (1952)
राही (1952)
मेहमान (1953)
जलियांवाला बाग की ज्योति (1953)
फरेब (1953)
आकाश (1953)
वारिस (1954)
नाज़ (1954)
महात्मा कबीर (1954)
मान (1954)
जासूस (1957)
जलती निशानी (1955)
फरार (1955)
दू-जने (1955)
पैसा ही पैसा (1956)
हीर (1956)
परदेसी (1957 फ़िल्म) (1957)
अभिमान (1957)
संस्कार (1958)
चार दिल चार राहें (1959)
मिस्टर सुपरमैन की वापसी (उर्फ मिस्टर सुपरमैन की वापसी ) (1960)
अंगुलिमाल (1960)
सौतेला भाई (1962)
छोटी छोटी बातें (1965)
📌वह फिल्म के स्कोर में काउंटर मेलोडी का उपयोग करने में भी अग्रणी थे, पश्चिमी संगीत की तकनीक, 'कंटाला' को नियोजित करते थे, जहां एक पंक्ति दूसरे को कॉन्ट्रा-मेलोडी में ओवरलैप करती थी, रोटी (1942) के रूप में गद्य गीत, इसके अलावा वह पहले थे एक रागमाला का बड़े पैमाने पर उपयोग शुरू करने के लिए । एक अन्य महत्वपूर्ण तत्व जो उन्होंने पेश किया, वह पश्चिमी आर्केस्ट्रा था, जिसमें गीतों के साथ-साथ उनके मधुर अंतर्संबंधों में स्वदेशी वाद्ययंत्रों का उपयोग किया गया था, एक प्रवृत्ति जो आज भारतीय सिनेमा के संगीत के लिए जल्द ही पकड़ी और मार्ग प्रशस्त किया। 

उन्हें 1986 में संगीत नाटक अकादमी , भारत की संगीत, नृत्य और नाटक की राष्ट्रीय अकादमी द्वारा दिए गए संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। 

वनराज भाटिया


वनराज भाटिया

*🎂जन्म- 31 मई, 1927;*

*🕯️मृत्यु- 7 मई, 2021*

*भारतीय हिन्दी फ़िल्मों के प्रसिद्ध संगीतकार थे। उन्होंने अमिताभ बच्चन और ऋषि कपूर के अअभिनय से सजी फ़िल्म 'अजूबा' का संगीत दिया था। 'तमस', 'अंकुर', 'मंथन', 'मंडी', 'जुनून' और 'कलयुग' जैसी फिल्मों में भी वनराज भाटिया ने संगीत दिया।*

*भाटिया टेलीविजन फिल्म तमस (1988) के लिए सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशन के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार , रचनात्मक और प्रायोगिक संगीत के लिए संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1989) और भारत के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान, पद्म श्री (2012) के प्राप्तकर्ता थे ।*

🔛प्रारंभिक जीवन और शिक्षा



कच्छी व्यवसायियों के परिवार में जन्मे, भाटिया ने बॉम्बे में न्यू एरा स्कूल में पढ़ाई की और देवधर स्कूल ऑफ़ म्यूज़िक में एक छात्र के रूप में हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत सीखा। एक किशोर के रूप में त्चैकोव्स्की के पियानो कॉन्सर्टो नंबर 1 को सुनने पर , उन्हें पश्चिमी शास्त्रीय संगीत में दिलचस्पी हो गई और उन्होंने चार साल तक डॉ मानेक भगत के साथ पियानो का अध्ययन किया।

1949 में एल्फिंस्टन कॉलेज , बॉम्बे विश्वविद्यालय से अपना एमए (अंग्रेजी ऑनर्स) अर्जित करने के बाद , भाटिया ने रॉयल एकेडमी ऑफ म्यूजिक , लंदन में हावर्ड फर्ग्यूसन , एलन बुश और विलियम अल्विन के साथ रचना का अध्ययन किया , जहां वे सर माइकल कोस्टा छात्रवृत्ति के प्राप्तकर्ता थे। (1951-54)। 1954 में स्वर्ण पदक के साथ स्नातक होने के बाद, भाटिया ने एक रॉकफेलर छात्रवृत्ति (1954-58) और साथ ही एक फ्रांसीसी सरकार छात्रवृत्ति (1957-58) जीती, जिसने उन्हें पांच साल के लिए कंसर्वेटोएरे डे पेरिस में नादिया बूलैंगर के साथ अध्ययन करने की अनुमति दी। .

🔛आजीविका

1959 में भारत लौटने पर, भाटिया भारत में एक विज्ञापन फिल्म (शक्ति सिल्क साड़ियों के लिए) के लिए संगीत बनाने वाले पहले व्यक्ति बने, और लिरिल ,  गार्डन वरेली और 7,000 से अधिक जिंगल्स की रचना की। डुलक्स । इस दौरान वे 1960 से 1965 तक दिल्ली विश्वविद्यालय में पश्चिमी संगीतशास्त्र के रीडर भी रहे।

भाटिया की पहली फीचर फिल्म स्कोर श्याम बेनेगल के निर्देशन में बनी अंकुर (1974) के लिए थी, और उन्होंने बेनेगल के लगभग सभी कामों को स्कोर किया, जिसमें फिल्म मंथन (1976) का गीत "मेरो गाम कथा पारे" भी शामिल था। भाटिया ने मुख्य रूप से भारतीय न्यू वेव आंदोलन में फिल्म निर्माताओं के साथ काम किया , जैसे गोविंद निहलानी ( तमस , जिसने भाटिया को सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशन के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीता ), कुंदन शाह ( जाने भी दो यारो ), अपर्णा सेन ( 36 चौरंगी लेन ), सईद अख्तर मिर्जा ( मोहन जोशी हाजिर हो! ),कुमार शाहनी ( तरंग ), विधु विनोद चोपड़ा ( खामोश ), विजया मेहता ( पेस्टोंजी ) और प्रकाश झा ( हिप हिप हुर्रे )।

भाटिया ने जवाहरलाल नेहरू की द डिस्कवरी ऑफ इंडिया पर आधारित खानदान , यात्रा , वागले की दुनिया , बनेगी अपनी बात और 53-एपिसोड भारत एक खोज जैसे टेलीविज़न शो के साथ-साथ कई वृत्तचित्र बनाए हैं। उन्होंने म्यूजिक टुडे लेबल पर आध्यात्मिक संगीत के एल्बम भी जारी किए हैं, और एक्सपो '70, ओसाका और एशिया 1972, नई दिल्ली जैसे व्यापार मेलों के लिए संगीत तैयार किया है।

भाटिया भारत में पश्चिमी शास्त्रीय संगीत के सबसे प्रसिद्ध संगीतकार हैं। पियानो के लिए फंतासिया और फ्यूग्यू इन सी , स्ट्रिंग्स के लिए सिनफ़ोनिया कॉन्सर्टेंटे और गीत चक्र सिक्स सीज़न उनकी सबसे अधिक बार की जाने वाली रचनाएँ हैं । उनका रेवेरी जनवरी 2019 में मुंबई में एक संगीत कार्यक्रम में यो-यो मा द्वारा प्रदर्शित किया गया था , और गिरीश कर्नाड के इसी नाम के नाटक पर आधारित उनके ओपेरा अग्नि वर्षा के पहले दो कृत्यों का न्यूयॉर्क शहर में प्रीमियर हुआ था। 2012 में सोप्रानो जूडिथ केलॉक द्वारा प्रोडक्शन में।

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मौत


भाटिया का 7 मई, 2021 को वृद्धावस्था के कारण मुंबई में उनके घर पर निधन हो गया।

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🔛एकल पियानो के लिए संगीत

राग बहार में टोकाटा नंबर 1 (सी। 1950)
सोनाटा (1952)
परिचय और प्रतिगामी (1959)
फंटासिया और फ्यूग्यू इन सी (1999)
"अग्नि वर्षा" पर रैप्सोडी (2007)
गुजराती नर्सरी (2010

🔛टेलीविजन स्कोर
संपादन करना
खानदान (1985)
कथा सागर (1986) - चयनित एपिसोड
यात्रा (1986)
तमस (1987)
भारत एक खोज (1988)
नकाब (1988)
वागले की दुनिया (1988)
लाइफलाइन (1991)
बैंगन राजा (सी. 1990 के दशक)
बाइबिल की कहानियां (1993) - चयनित एपिसोड
बनेगी अपनी बात (1994)
संक्रांति (1997)

रितुपर्णो घोष


*🎂जन्म की तारीख और समय: 31 अगस्त 1963, कोलकाता*
*,🕯️मृत्यु की जगह और तारीख: 30 मई 2013, कोलकाता*

फ़िल्म निर्देशक ऋतुपर्णो घोष की पुण्यतिथि पर  हार्दिक श्रद्धांजलि

ऋतुपर्णो घोष बंगाली फ़िल्मों के प्रसिद्ध निर्देशक, लेखक और अभिनेता थे। 'चोखेर बाली', 'रेनकोट' और 'अबोहोमन' जैसी फ़िल्मों के लिए 'राष्ट्रीय पुरस्कार' विजेता ऋतुपर्णो घोष की ख्याति राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय जगत् में थी। उन्होंने और उनकी फ़िल्मों ने रिकॉर्ड बारह 'राष्ट्रीय पुरस्कार' जीते थे। ऋतुपर्णो घोष उन निर्देशकों में से एक थे, जो फ़िल्म को एक कला मानते थे। व्यवसाय या बॉक्स ऑफिस को ध्यान में रखकर उन्होंने कभी फ़िल्में नहीं बनाईं। उनकी अपनी सोच थी, शैली थी और अपने मिजाज के अनुरूप ही ‍वे फ़िल्में बनाते थे। बहुत कम समय में ही उन्होंने अपनी एक ख़ास पहचान बना ली थी। घोष ने विज्ञापन की दुनिया से अपना व्यवसाय प्रारम्भ किया था और जल्द ही फ़िल्मों की ओर मुड़ गए थे। अपने 19 साल के फ़िल्मी करियर में ऋतुपर्णो घोष ने 19 फ़िल्मों का निर्देशन और तीन फ़िल्मों में अभिनय किया।

#जन्म_तथा_शिक्षा

ऋतुपर्णो घोष का जन्म 31 अगस्त, 1963 को कोलकाता, पश्चिम बंगाल में हुआ था। इनके पिता का नाम सुनील घोष था। सुनील घोष डॉक्युमेंट्री फ़िल्म मेकर और पैंटर थे। ऋतुपर्णो घोष को फ़िल्म मेकिंग की प्रेरणा अपने पिता से ही मिली थी। ऋतुपर्णो घोष ने अपनी प्रारम्भिक स्कूली शिक्षा 'साउथ पॉइंट हाईस्कूल' से प्राप्त की। उन्होंने अपनी अर्थशास्त्र की डिग्री 'जादवपुर यूनिवर्सिटी', कोलकाता से प्राप्त की थी। आगे चलकर अपने आधुनिक विचारों को उन्होंने फ़िल्मों के जरिये पेश किया और जल्दी ही अपनी पहचान एक ऐसे फ़िल्म मेकर के रूप में बना ली, जिसने 'भारतीय सिनेमा' को समृद्ध किया।

#फ़िल्म_निर्माण

विज्ञापन की दुनिया से अपना कैरियर शुरू करने वाले ऋतुपर्णो घोष ने अपने फ़िल्मी कैरियर की शुरुआत बाल फ़िल्मों के निर्माण से की। वर्ष 1994 में बाल फ़िल्म 'हिरेर आंग्टी' के निर्देशन से उन्हें शोहरत मिलने लगी थी। इसके बाद 'उनिशे एप्रिल' के लिए उन्हें 1995 में 'राष्ट्रीय पुरस्कार' से नवाज़ा गया था। यह फ़िल्म प्रख्यात फ़िल्म निर्देशक इंगमार बर्गमन की 'ऑटम सोनाटा' से प्रेरित थी। इस फ़िल्म में ऋतुपर्णो घोष ने माँ-बेटी के तनावपूर्ण रिश्तों को बारीकी से रेखांकित किया था। एक कामकाजी महिला अपने व्यावसायिक कैरियर में सफल है, लेकिन अपनी पारिवारिक ज़िंदगी में वह असफल रहती है। इसका असर उसकी बेटी पर होता है और बेटी अपनी माँ से इस बात को लेकर नाराज है कि वह अपने व्यवसाय को कुछ ज़्यादा ही महत्त्व देती है। इस फ़िल्म में अपर्णा सेन, देबश्री राय और प्रसन्नजीत चटर्जी ने अभिनय किया था। इस फ़िल्म को सिने प्रेमियों ने खूब सराहा था। उनके जानने-पहचानने वाले लोग उन्हें 'ऋतु दा' के नाम से पुकारने लगे थे।

#लोकप्रियता

अपनी फ़िल्मों के माध्यम से ऋतुपर्णो घोष ने बहुत लोकप्रियता प्राप्त की। सारे बड़े फ़िल्मी कलाकार उनके साथ काम करने के लिए तुरंत राजी हो जाते थे, क्योंकि उनकी फ़िल्मों में काम करना गर्व की बात थी। रिश्तों की जटिलता और लीक से हट कर विषय उनकी फ़िल्मों की ख़ासियत होते थे। बांग्ला उनकी मातृभाषा थी और इस भाषा में वे सहज महसूस करते थे। इसलिए अधिकतर फ़िल्में उन्होंने बांग्ला भाषा में ही बनाईं। फ़िल्म फेस्टिवल में सिनेमा देखने वाले दर्शक और ऑफबीट फ़िल्मों के शौकीन ऋतु दा की फ़िल्मों का बेसब्री से इंतज़ार करते थे।

#राष्ट्रीय_पुरस्कार

फ़िल्म 'हिरेर आंग्टी', जो कि एक बाल फ़िल्म थी, उसकी सफलता के बाद से ही ऋतुपर्णो घोष की फ़िल्मों को 'राष्ट्रीय पुरस्कार' मिलना आम बात हो गई। कभी कलाकारों को, कभी लेखकों तो कभी फ़िल्म को 'राष्ट्रीय पुरस्कार' मिलता। वर्ष 1999 में ऋतुपर्णो घोष द्वारा निर्देशित फ़िल्म 'बारीवाली' के लिए अभिनेत्री किरण खेर ने श्रेष्ठ अभिनेत्री का 'राष्ट्रीय पुरस्कार' हासिल किया था। 'बारीवाली' एक ऐसी महिला की कहानी थी, जिसके होने वाले पति की विवाह के एक दिन पहले ही मौत हो जाती है और इसके बाद वह एकांकी जीवन बिताती है। ऋतुपर्णो घोष ने कुल 19 फ़िल्में बनाईं और 12 'राष्ट्रीय पुरस्कार' जीते। ये पुरस्कार उनकी काबलियत को जाहिर करते हैं।

#उल्लेखनीय_तथ्य

'उत्सव' (2000), 'तितली' (2002), 'शुभो महुर्त' (2003) जैसी ‍बांग्ला भाषा में बनी फ़िल्मों ने ऋतुपर्णो घोष की ख्याति को बढ़ाया। इसके बाद ऋतुपर्णो ने हिन्दी फ़िल्मों की मशहूर अभिनेत्री ऐश्वर्या राय को लेकर 'चोखेर बाली' (2003) बनाई। यह फ़िल्म रवीन्द्रनाथ टैगोर के उपन्यास पर आधारित थी। इस फ़िल्म में महिला किरदारों को बखूबी पेश किया गया था।
वर्ष 2004 में ऋतुपर्णो घोष ने हिन्दी भाषा में फ़िल्म 'रेनकोट' बनाई। 'रेनकोट' ऐसे दो प्रेमियों की कहानी है, जो वर्षों बाद बरसात की एक रात में मिलते हैं। इस फ़िल्म को ऐश्वर्या राय के कैरियर की श्रेष्ठ फ़िल्मों में से एक माना जाता है। अभिनेता अजय देवगन ने भी इस फ़िल्म में शानदार अभिनय किया।
वर्ष 2007 में ऋतुपर्णो घोष ने सिनेमा के दिग्गज अभिनेता अमिताभ बच्चन के साथ किया और फ़िल्म 'द लास्ट लियर' बनाई।
ऋतुपर्णो घोष की दूसरी हिन्दी फ़िल्म 'सनग्लास' थी, जो 2012 में रिलीज हुई थी।

#प्रमुख_फ़िल्में

1994 हिरेर आंग्टी बंगाली
1995 उनिशे एप्रिल बंगाली
1997 दहन बंगाली
1999 बेरीवाली बंगाली
2003 चोखेर बाली बंगाली
2004 रेनकोट  हिन्दी
2005 अंतरमहल बंगाली
2006 दोसर  बंगाली
2007 द लास्ट लीअर  अंग्रेज़ी
2008 शोभ चरित्रो काल्पोनिक  बंगाली
2010 अबोहोमन बंगाली
2010 नौकाडूबी बंगाली
2012 चित्रांगदा  बंगाली
2012 सनग्लास  हिन्दी

#समलैंगिक_फ़िल्में

चाहे हिन्दी फ़िल्म 'रेनकोट' में ऐश्वर्या राय और अजय देवगन से संवेदनशील अभिनय करवाना हो या फिर बांग्ला और हिन्दी में 'चोखेरबाली' हो, ऋतुपर्णो घोष ने न केवल महिलाओं से जुड़े मुद्दों को उठाया, बल्कि समलैंगिक मुद्दों को भी वे उठाते रहे। उनकी फ़िल्मों में समलैंगिक विषयों का काफ़ी संजीदा तरीके से चित्रण हुआ है। सर्वश्रेष्ठ अंग्रेज़ी फ़िल्म के लिए 'राष्ट्रीय पुरस्कार' जीतने वाली फ़िल्म 'मेमरीज़ इन मार्च' भी समलैंगिक विषय पर बनाई गई थी, जिसमें ऋतुपर्णो के अभिनय को काफ़ी सराहा गया था। अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त ऋतुपर्णो ने कभी भी बॉलीवुड की मुख्य धारा का रुख नहीं किया और कोलकाता में ही रह कर अलग-अलग विषयों पर अर्थपूर्ण फ़िल्में बनाते रहे। इस बात का अंदाजा़ इसी से लगाया जा सकता है कि उन्हें सिर्फ 49 वर्ष की आयु में ही बारह 'राष्ट्रीय पुरस्कार' और कई अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके थे। सिर्फ़ 21 वर्ष में बहुत कम ही फ़िल्मकारों को इतने पुरस्कार नसीब हुए हैं, लेकिन ऋतुपर्णो घोष अपने आप में ख़ास किस्म के निर्देशक और अभिनेता रहे थे।

#पुरस्कार_व_सम्मान

ऋतुपर्णो घोष ने कई श्रेणियों में बारह 'राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार' जीते थे। उन्हें 'चोखेर बाली', 'उन्नीशे अप्रैल', 'रेनकोट' और 'द लास्ट लीअर' जैसी फ़िल्मों के लिए याद किया जाता है। वर्ष 2012 में आई उनकी आखिरी फ़िल्म 'चित्रांगदा' के लिए उन्हें 60वें 'राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार' समारोह में 'स्पेशल ज्यूरी अवार्ड' दिया गया था। घोष ने अपनी फ़िल्मों 'अरेक्ती प्रेमेर गोल्पो' 'मेमोरीज इन मार्च' और 'चित्रांगदा' में अपना अभिनय कौशल भी दिखाया था।

#निधन

'भारतीय सिनेमा' को अपनी सूझबूझ और फ़िल्मों के माध्यम से समृद्ध बनाने वाले ऋतुपर्णो घोष पैन्क्रियाटाइटिस से पीड़ित थे। 30 मई, 2013 को कोलकाता में सुबह के समय साढ़े सात बजे उन्हें दिल का दौरा पड़ा और उनका निधन हो गया। उनकी आखिरी फ़िल्म 'चित्रांगदा' थी, जो हाल ही में मुंबई में हुए समलैंगिक फ़िल्म महोत्सव की क्लोज़िग फ़िल्म थी। इस महोत्सव के निर्देशक श्रीधर रंगायन का कहना था कि- "हमने एक ऐसा निर्देशक खोया है, जो समलैंगिक विषयों पर खुलकर, बिना डरे और बेहद ही संजीदगी से फ़िल्में बनाता था।"

पंडित मुखराम शर्मा

पण्डित मुखराम शर्माभारतीय सिनेमा 

*🎂जन्म की तारीख और समय: 13 मई 1909*
*🕯️मृत्यु की जगह और तारीख: 25 अप्रैल 2000, मेरठ*
*इनके जन्म की सही जानकारी इसी ब्लॉग में टिपणी के रूप में देने की कृपा करें 🙏
धूल का फूल साधना वचन हमजोली जैसी फिल्मो के पटकथा एवम् संवाद लेखक पंडित मुखराम शर्मा के जन्मदिन पर हार्दिक श्रधांजलि

पण्डित मुखराम शर्माभारतीय सिनेमा ' में अपने समय के ख्यातिप्राप्त पटकथा लेखक थे। वे मेरठ से साधारण शख्स के तौर पर मायानगरी मुंबई पहुँचे थे और फ़िल्मी दुनिया में कथा, पटकथा और संवाद लेखक के तौर पर एक महान हस्ती का दर्जा पाया था। पूरे भारत से फ़िल्म वितरक मुखराम शर्मा को फ़ोन करके पूछा करते थे कि उनकी अगली फ़िल्म कौन-सी है और किसके साथ है। उस समय मुखरामजी का जवाब किसी फ़िल्म के सभी अधिकार रातों-रात बिकवाने की गारंटी हुआ करता था। वे जो लिख रहे होते थे,उसका ट्रैक रखने के लिए वितरक और निर्माता उनके घर के नियमित चक्कर लगाते रहते थे। उनके पास अपनी पसंद के निर्माता और निर्देशकों को अपनी कहानियाँ को बेचने का विशेष अधिकार प्राप्त था।

पंडित मुखराम शर्मा का जन्म 13 मई, 1909 में मेरठ के क़िला परीक्षितगढ़ क्षेत्र के एक गाँव पूठी में हुआ था। उन्होंने अपने व्यावसायिक जीवन की शुरुआत हिन्दी और संस्कृत के शिक्षक के रूप में की थी। मुखरामजी मेरठ में ही शिक्षक के पद पर नियुक्त हुए थे,लेकिन शिक्षण कार्य से प्यार करने के बावजूद भी वे अपने भीतर एक कमी महसूस करते थे। उन्होंने महसूस किया कि शिक्षण उनका असली व्यवसाय नहीं था।

फ़िल्में देखना मुखराम शर्मा जी बहुत पसंद करते थे और "प्रभात फ़िल्म कंपनी" और "न्यू थियेटर" द्वारा बनाई गई फ़िल्मों के बड़े शौकीन तथा प्रशंसक थे। पत्रिकाओं के लिए लघु कहानियाँ और कविताएँ लिखने वाले मुखराम शर्मा ने निश्चय किया कि अब वे फ़िल्मों के लिए भी लिखना शुरू करेंगे। वह मेरठ में अपने एक मित्र के पास गए, जो हिन्दी फ़िल्म उद्योग के साथ जुड़ा हुआ था और मुम्बई आता-जाता रहता था।उन्होंने उसे अपनी एक कहानी सुनाई। दोस्त उनसे इतना प्रभावित हुआ कि उसने मुखरामजी से अपने साथ मुम्बई आने को कहा।इस प्रकार वर्ष 1939 में मुखराम शर्मा सपनों के शहर मुम्बई आ गये।

शुरुआत में मुखराम शर्मा जी को सफलता प्राप्त नहीं हुई। फ़िल्म निर्माताओं ने इस प्रतिभाशाली लेखक का स्वागत नहीं किया और मुखराम बहुत ही हताशा और निराशा में अपनी पत्नी और बच्चों के साथ, जो उनके साथ ही मुंबई रहने आ गये थे, पुणे चले गए। वे 'प्रभात फ़िल्म्स', जिसे वी. शांताराम चला रहे थे, पहुँचे और वहाँ चालीस रुपया प्रति माह पर कलाकारो को मराठी सिखाने की जिम्मेदारी स्वीकार कर ली।

वर्ष 1942 में उन्हें राजा नेने द्वारा निर्देशित फ़िल्म "दस बजे" के गीत लिखने का मौका मिला, जिसमें उर्मिला और परेश बनर्जी अदाकारी कर रहे थे। फ़िल्म 'दस बजे' एक सुपर हिट साबित हुई। इस प्रारंभिक सफलता के चलते मुखराम शर्मा को राजा हरिश्चंद्र और तारामती की प्रेम
कहानी पर आधारित शोभना समर्थ अभिनीत राजा नेने की अगली फ़िल्म "तारामती" लिखने का अवसर मिला। यह फ़िल्म न सिर्फ़ एक बड़ी हिट सबित हुई बल्कि मुखरामजी द्वारा इसके तुरंत बाद लिखी गईं अगली दो फ़िल्मों 'विष्णु भगवान' और 'नल दमयंती' को भी
सफ़लता मिली। किंतु अब मुखराम शर्मा एक बदलाव चाहते थे और उनकी कामना सामाजिक समस्याओं के विषयों पर भी कहानी लिखने की थी।यह अवसर भी मुखराम शर्मा को जल्द ही मिल गया। उन्हें यह मौका तब मिला, जब राजा नेने ने अज्ञात मराठी अभिनेताओ के साथ उनकी एक शुरूआती कहानी पर फ़िल्म बनायी। लेकिन यह फ़िल्म असफल रही। इसके बाद उनकी अगली मराठी फ़िल्म "स्त्री जन्मा तुझी कहानी" को भारी सफ़लता मिली। यह फ़िल्म निर्देशक दत्ता धर्माधिकारी के साथ थी, जिन्होंने मुखरामजी की एक लघु कथा को
मराठी में बना डाला था। इस फ़िल्म की सफलता यादगार रही और बाद में इसे "औरत तेरी यही कहानी"फ़िल्म के रूप में हिन्दी में पुनर्निर्मित भी किया गया। इसके बाद हालाँकि उनके पुणे स्थित घर में निर्माताओं का तांता बंध गया था, किंतु मुखरामजी उसकी अनदेखी करके मुंबई लौट आए। अब सफलता उनके क़दम चूम रही थी।

पंडित मुखराम शर्मा की मुम्बई में फ़िल्म 'औलाद' थी। जब वर्ष 1954 में यह फ़िल्म परदे पर आई तो इसकी सफलता के बाद मुखरामजी ने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। 1955 में अपनी कहानी के लिए पहला 'फ़िल्म फेयर पुरस्कार' मिला      

मुखराम शर्मा जी ने वर्ष 1958 में एक निर्माता के तौर पर 'तलाक़' और 'संतान' सहित आधा दर्जन फ़िल्में बनाई थीं। सामाजिक समस्याओं पर प्रकाश डालने और अपनी कहानियों के द्वारा उनका हल ढूँढने में उनकी रुचि ने उनके लेखन के पीछे की असली ताकत के रूप में काम किया। उनकी लगभग सभी फ़िल्में अपनी सामाजिक टिप्पणी और सुधार की दिशा में दिए गए सुझावों के कारण पसंद की जाती थीं। फ़िल्म 'एक ही रास्ता' विधवाओं की समस्याओं पर आधारित थी।'वचन' एक अविवाहित बेटी की कहानी थी, जो अपने परिवार का लालन-पालन करती है। फ़िल्म 'स्वप्न सुहाने' भाइयों और उनके पारस्परिक संबंधों की कहानी थी, जबकि 'पतंगा' में मालिक और नौकर के बीच के संवेदनशील रिश्ते को प्रमुखता के साथ प्रस्तुत किया गया था।

मुखरामजी की सबसे मशहूर फ़िल्मों में से एक 'साधना' गहरी अंतर्दृष्टि के साथ एक वेश्या के जीवन पर प्रकाश डालती है। यह वकालत करती है कि वेश्यावृत्ति एक ऐसी सामाजिक प्रथा है, जहाँ पुरुष भी समान रूप से ज़िम्मेदार है और कोई भी वेश्या सबसे पहले एक स्त्री
है फिर कुछ और। अपनी इस फ़िल्म के माध्यम से मुखरामजी जी ने समाज के समक्ष यह बात रखी कि एक वेश्या को समाज द्वारा स्वीकार किया जाना चाहिए। उन्होंने फ़िल्म के माध्यम से दर्शकों को विश्वास दिलाया कि यह न सिर्फ़ संभव है बल्कि सही भी है। बॉक्स-ऑफिस पर 'साधना' फ़िल्म की सफलता ने यह
साबित कर दिखाया कि मुखरामजी समय के साथ थे और उन्हें अपने दर्शकों की नब्ज़ की पूरी तरह समझ थी।

फ़िल्म 'साधना' के निर्माण के बारे में एक दिलचस्प किस्सा भी है। इस फ़िल्म की कहानी को पूरा करने के बाद मुखरामजी बिमल रॉय के पास गये और उनसे
इसका निर्देशन करने के लिए आग्रह किया। बिमल रॉय ने 'मोहन स्टूडियो' में मिलने का सुझाव दिया और कार यात्रा के दौरान मुखरामजी से 'साधना' की कहानी सुनाने को कहा। कहानी सुनते ही बिमल रॉय इसके बोल्ड विषय से प्रभावित होकर तुरंत इसे बनाने पर सहमत हो गये। लेकिन वे एक उलझन में थे कि इस कहानी को दर्शकों द्वारा स्वीकार किया जाएगा या नहीं। उन्होंने फ़िल्म का अंत बदलने के लिए एक सुझाव दिया। उनका दावा था कि 'रजिनी' (उर्फ़ चम्पाबाई, अभिनेत्री वैजयंती माला द्वारा निभाया गया चरित्र) चूँकि एक बदनाम औरत है, लोग उसे बहू के रूप में स्वीकार नहीं करेंगे। इसलिए कहानी को उसकी मौत के साथ समाप्त करना बेहतर होगा। मुखरामजी ने बिमल दा को सुना और ड्राइवर से गाड़ी रोकने को कहा। वे कार से बाहर आ गये, बिमल दा को लगा कि मुखरामजी शंका निवारण अथवा किसी और आवश्यक कार्य हेतु उतरे हैं, परन्तु उनके आश्चर्य का ठिकाना ना रहा, जब मुखरामजी वहाँ से चल दिए। उन्होंने एक टैक्सी ली और सीधे बी. आर. चोपड़ा के पास पहुँचे,जो कहानी को जस का तस फ़िल्माने के लिए राज़ी थे। पण्डित मुखराम शर्मा और बी. आर. चोपड़ा ने लम्बे अरसे तक एक साथ काम किया। बी. आर.चोपड़ा उनके अंतिम दिनों तक गहरे दोस्त भी बने रहे। चोपड़ा ने हमेशा अपनी फ़िल्मों में मुखरामजी के योगदान को भरपूर सराहा तथा उन्हें हमारी सफलता का लेखक (ऑथर ऑफ़ ऑवर सक्सेस) कह कर उनका सम्मान किया।

पण्डित मुखराम शर्मा ने आने वाले वर्षों में एक शानदार सितारे का दर्ज़ा हासिल किया और उनका महत्व इस बात से पता चलता है कि वे अपनी लिखी फ़िल्म में कहानी, पटकथा और संवाद के लिए अलग-अलग क्रेडिट्स लिया करते थे। बाद में वे नायडू की फ़िल्म 'देवता' लिखने के लिए दक्षिण भारत की ओर चले गए। फिर एक के बाद एक एल. वी. प्रसाद की 'दादी माँ','जीने की राह', 'मैं सुंदर हूँ', 'राजा और रंक'; एवीएम स्टूडियो की 'दो कलियाँ'; जैमिनी फ़िल्म्स की 'घराना,'गृहस्थी' तथा अन्य निर्माताओं के लिए 'प्यार किया तो डरना क्या' और 'हमजोली' जैसी अनेकों फ़िल्में लिखते चले गये। ये सभी फ़िल्में उस समय की बड़ी हिट्स थीं। प्रसिद्धि और सौभाग्य की वर्षा से बिना डिगे पण्डित मुखराम शर्मा ने 70 वर्ष की उम्र में एक लम्बी फ़िल्मी पारी खेलने के बाद लेखन कार्य से सेवानिवृत्त होने का फैसला कर लिया। वर्ष 1980 में फ़िल्म 'नौकर' और 'सौ दिन सास के' प्रदर्शित होने के बाद वे मेरठ वापस लौट आए।

पंडित मुखराम शर्मा ने अपने बेहतरीन काम के लिए कई पुरस्कार भी जीते। वर्ष 1950 से 1970 तक उनके उल्लेखनीय पुरस्कारों में तीन 'फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार'
भी थे, जो उन्हें फ़िल्म 'औलाद', 'वचन' और 'साधना' के लिए मिले थे। वर्ष 1961 में उन्हें प्रतिष्ठित 'संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार 'भी मिला, जिसे उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद से ग्रहण किया था। मुखरामजी 'मेरठ रत्न पुरस्कार' से भी नवाज़े गये, जो उन्हें मेरठ को दिए गये अपने उत्कृष्ट योगदान के लिए प्रदान किया गया था। फ़िल्मों में उनके योगदान के लिए उन्हें "इम्पा और
'टीवी कलाकार एसोसिएशन' से भी सम्मान हासिल हुए। फ़रवरी 2000 में उनके निधन से थोड़ा पहले उन्हें 'ज़ी
लाइफ़टाइम अचीवमेंट पुरस्कार' से भी सम्मानित किया गया था। 

पण्डित मुखराम शर्मा हमेशा ज़मीन से जुड़े व्यक्ति रहे। वे कड़ी मेहनत की सराहना करते थे और समय के महत्व को भली-भाँति समझते थे। उन्हें नयी कारों का शौक़ था और उन दिनों में उन्होंने एम्बैसैडर कार का नवीनतम मॉडल भी अपने लिए ख़रीदा था, किंतु सफ़लता ने इस साधारण आदमी को नहीं बदला। हालाँकि वे मुंबई फ़िल्म सर्किट की बड़ी से बड़ी हस्ती के साथ उठते-बैठते थे, लेकिन उन्होंने इसकी ख़ुमारी को कभी अपने पर हावी नहीं होने दिया। उनकी दुनिया उनके कमरे तक ही सीमित थी, जो उनका ऑफ़िस भी था। वे अपनी प्रेरणा ढूँढने के लिए होटल या शहर के बाहर जाना पसंद नहीं करते थे। अपने कमरे में अपने दीर्घकालिक सहयोगी विष्णु मेहरोत्रा के साथ बैठ कर, मुखरामजी रोज़ सवेरे नियमित तौर पर लेखन करते थे। दोपहर के भोजन बाद वे निर्माताओं से मिलना पसंद करते थे। सफलता ने उन्हें और अधिक विनम्र बनाने और अपनी जड़ों से बांधे रखने में ही सहयोग दिया। 5000 रुपये की वह धनराशि, जो उन्होंने 'साधना' फ़िल्म के लिए 'फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार' द्वारा प्राप्त की थी, पूथी की कन्या पाठशाला को दान कर दिये थे।

अपनी बढ़ती हुई उम्र में भी मुखरामजी ने लिखने का सिलसिला जारी रखा और कई कहानियाँ तथा आधा दर्जन से भी अधिक उपन्यास प्रकाशित करवाये। अपने बाद के वर्षों में मुखरामजी, जिनका नाम दर्शक फ़िल्म के पोस्टर्स पर देखने के मुरीद थे, प्रसिद्धि और पैसे की तरफ़ मुड़ने में ज़रा भी दिलचस्पी नहीं रखता था। उन्होंने अपने प्रियजनों के बीच अपने शहर में 25 अप्रैल , 2000 को मेरठ में अपनी अंतिम साँस ली। यद्यपि उनके बेटे रामशरण ने 'स्वप्न सुहाने', 'देवर भाभी', 'बहनें' और 'पतंगा' जैसी फ़िल्मों के निर्माण के ज़रिये अपने पिता के पदचिह्नों पर चलने का प्रयास किया, पर मुखरामजी अपने बच्चों को फ़िल्म उद्योग में लाने के लिए उत्सुक नहीं थे। इसका मुख्य कारण था-उनका अपना प्रारंभिक वर्षों का कठिनतम संघर्ष।

मधुमती अभिनेत्री और डांसर


*अभिनेत्री डांसर मधुमती के जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनाएं*

*🎂 जन्म 30 मई 1938*


मधुमती का जन्म 30 मई 1938 में महाराष्ट्र के पास एक सुदूर गांव में पारसी परिवार में हुआ था। उनके पिता जज थे  उन्होंने 1957 में एक रिलीज़ नहीं हुई मराठी फिल्म में एक नर्तकी के रूप में अपनी शुरुआत की।  मधुमती ने 19 साल की कम उम्र में मनोहर दीपक से शादी कर ली।  उन्होंने 1960 के दशक में पंजाबी, मराठी, हिंदी, भोजपुरी और दक्षिण भारतीय फिल्मों में नृत्य करके खुद को व्यस्त रखा।  उनकी नृत्य क्षमताओं और रूप के मामले में उनकी तुलना अक्सर महान नर्तक हेलेन से की जाती थी।  उन्होंने 1977 में बाहर किया और 2001 में वापसी की। 2002 में अपने पति के निधन के बाद, वह अब मुंबई में मधुमती नृत्य अकादमी चलाकर खुद को संभालती हैं।
मधुमती को बचपन से ही डांस का शौक था और इसी के चलते पढ़ाई- लिखाई में उनका मन नहीं लगता था, लेकिन उन्होंने 10वीं तक अपनी पढ़ाई पूरी की। इसके साथ- साथ वो डांस भी सीखती रहीं। वो भारतनाट्यम, कथक, मनिपुरी और कथकली के अलावा फिल्मी डांस भी करती थीं। 
स्कूल में पढ़ते हुए ही मधुमती ने स्टेज डांस करना शुरू कर दिया और इसके बाद उन्हें फिल्मों में ऑफर मिलने लगे। मधुमती फिल्मों में करियर नहीं बनाना चाहती थीं लेकिन फिर भी उन्होंने एक मराठी फिल्म का ऑफर स्वीकार कर लिया। मधुमती के पिता ने उन्हें फिल्मों में यह कहकर काम करने की इजाजत दी कि वो केवल डांस से जुड़े ऑफर को ही स्वीकार करेंगी और एक्टिंग के ऑफर से दूर रहेंगी। इसके बाद उन्होंने कई बड़ी व सुपरहिट फिल्मों में काम किया
एक्टर सुनील दत्त और उनकी पत्नी नरगिस एक्ट्रेस मधुमती के बहुत करीबी थे और उन्हें पसंद करते थे। इसकी वजह थी कि मधुमती सुनील दत्त को राखी बांधती थीं। 
एक्टिंग के अलावा मधुमती स्कूल में डांस भी सिखाती थीं और बाद में उन्होंने महिलाओं के साथ एक डांस ग्रुप बनाया। वहीं दूसरी तरफ मनोहर दीपक भी जाना पहचाना नाम बन गए थे और उन्होंने मधुमती को अपने साथ काम करने के लिए कहा। शुरुआत में तो उन्होंने इसके लिए मना कर दिया लेकिन बाद में दोनों साथ काम करने लगे। 
मनोहर दीपक उम्र में मधुमती से बहुत बड़े थे और शादीशुदा व चार बच्चों के पिता थे। उनकी पत्नी को दिल की बीमारी थी जिसके चलते उनका निधन हो गया। मधुमती की मां दीपक को पसंद तो करती थीं लेकिन उनसे अपनी बेटी की शादी करवाने के लिए तैयार नहीं थीं। लेकिन फिर भी मधुमती ने दीपक मनोहर से 19 साल की उम्र में शादी कर ली। 

मधुमती की तुलना एक्ट्रेस हेलेन से होती थी। इस बारे में मधुमती ने कहा था, 'हम दोनों दोस्त थे लेकिन हेलेन जी सीनियर थी। हां, फिल्म फ्रेटरनिटी को हम दोनों के लुक्स एक जैसे लगते थे और कुछ लोग हमेशा हमारी तुलना करते रहते थे लेकिन हम कभी इससे परेशान नहीं हुए। मैंने हेलेन जी के साथ कुछ गानों में काम भी किया जिसमें फिल्म ये रात फिर ना आएगी का गाना हुजूर ए आला शामिल है।
25 साल तक मधुमती और मनोहर दीपक ने हिंदी व पंजाबी फिल्मों में काम किया। मधुमती की आखिरी फिल्म का नाम है अमर अकबर एंथनी। इसके बाद उन्होंने फिल्मों में काम करना बंद कर दिया और अपना डांस स्कूल शुरू कर दिया। उनके डांस स्कूल में कई नामी बॉलीवुड एक्टर्स ने उनसे डांस सीखा जिसमें अक्षय कुमार, गोविंदा, तबू और अमृता सिह का नाम शामिल है। डांस के साथ- साथ उन्होंने अपना एक्टिंग स्कूल भी शुरू कर लिया। लेकिन साल 2002 में उनके पति मनोहर दीपक का निधन हो गया।

सोमवार, 29 मई 2023

कृष्णा अभिषेक

कृष्णा अभिषेक


*कृष्णा अभिषेक शर्मा*
🎂जन्म
*कृष्णा अभिषेक*
*30 मई 1983*
*मुंबई*
*राष्ट्रीयता भारत*
*व्यवसाय अभिनेता, हास्यकलाकार*
🔛  *उन्होंने ये कैसी मोहब्बत है (2002) के साथ अपनी फिल्म की शुरुआत की, और 2005 में हम तुम और मां जैसी फिल्मों में अभिनय करने गए।जहां जाएगा हमन पायेगा (2007), और और पप्पू पास हो गया एक ही वर्ष में। बाद में वह भोजपुरी फिल्म में शिफ्ट हो गए। उन्होंने २००७ में टीवी श्रृंखला, सौतेला (दूरदर्शन) में मुख्य भूमिका निभाई।*

*उन्होंने स्टैंड-अप कॉमेडी शो, कॉमेडी सर्कस के विभिन्न सत्रों में भाग लिया, जिसमें कॉमेडी सर्कस 2 (2008), कॉमेडी सर्कस 3 (2009) शामिल हैं, जहां वे थे। सुदेश लहरी के साथ कॉमेडी सर्कस 3 (2009) में वाइल्ड कार्ड एंट्री। उन्होंने नच बलिए (सीजन ३) (२००७) से शुरू होने वाले सेलिब्रिटी युगल नृत्य-रियलिटी शो में भाग लिया।और कभी कभी प्यार कभी यार (2008) गर्ल फ्रेंड कश्मीरा शाह के साथ और अंततः बाद में जीत हासिल की। वह इसी तरह के एक शो, जलवा फोर 2 का 1 (2008) में भी दिखाई दिए। 2010 में, उन्होंने कोरियोग्राफर रॉबिन मर्चेंट के साथ डांस रियलिटी शो, झलक दिखला जा (सीजन 4) में भाग लिया।इससे पहले वह डीडी नेशनल, क्रेजी किया रे पर सुधा चंद्रन के साथ रियलिटी डांस शो में जज के रूप में भी दिखाई दिए थे।*

*एक सेलिब्रिटी जोड़े के रूप में उन्होंने और कश्मीरा शाह ने फरवरी २०११ में यूटीवी बिंदास पर रियलिटी शो लव लॉक अप में भाग लिया।जिसमें अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा ने शांति निर्माता की भूमिका निभाई। 2020 में, उन्होंने भारती सिंह और अन्य के साथ अपने नए शो फनहिट में जारी में अभिनय किया।*

🔛🎥। फ़िल्में

हम तुम और मदर
और पप्पू पास हो गया
जहाँ जाएगा हमें पाएगा
ओ पुष्पा आई हेट टीयर्स (2020)
देशद्रोही
हुक या क्रूक
बोल बच्चन
मिस्टर मनी
एंटर्टेंमेंट
क्या कुल हैं हम 3
सीता

🔛📺। धारावाहिक

कभी कभी प्यार कभी कभी यार
कहानी कॉमेडी सर्कस की
एंटर्टेंमेंट के लिए कुछ भी करेगा
कॉमेडी सर्कस
कॉमेडी नाईटस बचाओ
कांमेडी नाईटस लाइव

धृतिमान चटर्जी


*धृतिमान चटर्जी*

*जन्म*
30 मई 1945 
कलकत्ता , बंगाल प्रेसीडेंसी , ब्रिटिश भारत
व्यवसाय
फिल्म, टीवी और स्टेज अभिनेता, विज्ञापन और लघु फिल्म निर्माता, साहित्य कलाकार और वाचक

धृतिमान उनका स्क्रीन नाम है। उन्हें अन्यथा सुंदर चटर्जी के रूप में जाना जाता है और चेन्नई में अंग्रेजी मंच पर काफी सक्रिय हैं। 30 मई 1945 को जन्मे, उन्होंने कोलकाता के सेंट जेवियर्स कॉलेजिएट स्कूल और प्रेसीडेंसी कॉलेज और दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में शिक्षा प्राप्त की थी। चटर्जी ने विज्ञापन , सामाजिक संचार और वृत्तचित्र फिल्म निर्माण में एक समानांतर करियर बनाया ।

2019 में, चटर्जी ने इफ नॉट फॉर यू में कथन के लिए अपनी आवाज दी ,महान गायक-गीतकार बॉब डायलन के साथ कोलकाता के लंबे समय तक चलने वाले प्रेम संबंध के बारे में एक वृत्तचित्र. अपने अभिनय गुणों के बारे में, सत्यजीत रे ने एक बार टिप्पणी की थी, "मुझे नहीं पता कि ये फिल्म निर्माता किस स्टार की परिभाषा का उपयोग कर रहे हैं, लेकिन मेरा कुछ ऐसा है। एक स्टार स्क्रीन पर एक ऐसा व्यक्ति है जो बाद में भी अभिव्यक्तिपूर्ण और दिलचस्प बना रहता है। उसने कुछ भी करना बंद कर दिया है। यह परिभाषा उस दुर्लभ और भाग्यशाली नस्ल को बाहर नहीं करती है जिसे प्रति फिल्म लाखों रुपये मिलते हैं; और इसमें हर कोई शामिल है जो कैमरे के सामने शांत रहता है, एक व्यक्तित्व पेश करता है और सहानुभूति पैदा करता है। यह एक दुर्लभ नस्ल है भी लेकिन हमारी फिल्मों में यह मिला है। प्रतिद्वंदी के धृतिमान चटर्जी ऐसे ही एक स्टार हैं। - ( हमारी फिल्में उनकी फिल्में ) 

कभी मुख्यधारा के "बॉलीवुड" का हिस्सा नहीं रहे, उन्होंने आश्चर्यजनक रूप से बहुत कम संख्या में फिल्में बनाई हैं। हाल के वर्षों में उन्होंने जेन कैंपियन जैसे विविध फिल्म निर्माताओं और बेहद सफल मुंबई निर्देशकों संजय लीला भंसाली और मणिरत्नम के साथ भूमिकाएँ निभाईं।  धृतिमान को भारत में कई अभिनय पुरस्कार मिले हैं और वह भारतीय राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की जूरी में रहे हैं।

वह वर्तमान में 14 दिसंबर 2013 से एबीपी आनंद पर बंगाली में प्रधानमंत्री के एंकर हैं ।

धृतिमान चटर्जी एक भारतीय अभिनेता हैं। उन्होंने अपने अभिनय करियर की शुरुआत 1970 में सत्यजीत रे की प्रतिवंडी ( द एडवर्सरी ) के नायक के रूप में की थी । उनका अधिकांश अभिनय कार्य भारत के "समानांतर", या स्वतंत्र सिनेमा में रहा है, जिसमें सत्यजीत रे , मृणाल सेन और अपर्णा सेन जैसे फिल्म निर्माता शामिल हैं और अपने अभिनय कौशल के लिए विख्यात हैं। उन्होंने दीपा मेहता और जेन कैंपियन जैसे प्रसिद्ध फिल्म निर्माताओं के साथ अंग्रेजी फिल्मों में भी काम किया है ।

परेश रावल


*परेश रावल*

*🎂जन्म की तारीख और समय: 30 मई 1955, मुम्बई*
*पत्नी: स्वरूप संपत (विवा. 1987)*
*बच्चे: अदित्य रावल, अनिरुद्ध रावल, आदित्य रावल*

*दल: भारतीय जनता पार्टी*
*इनाम: फिल्मफेयर पुरस्कार - सर्वश्रेष्ठ परफॉरमेंस इन ए कॉमिक रोल*

रावल ने अभिनय की शुरूआत 1984 में की थी। तब यह होली नामक फ़िल्म में एक सहायक किरदार निभाया था। इसके बाद 1986 में नाम नामक फ़िल्म से उनके अभिनय का गुण लोगों को पता चला। इसके बाद वह 1980 से 1990 के मध्य 100 से अधिक फ़िल्मों में खलनायक की भूमिका में नजर आए। इसमें कब्जा, किंग अंकल, राम लखन, दौड़, बाज़ी और कई फ़िल्मों में कार्य किया।

यह एक हास्य फ़िल्म अंदाज़ अपना अपना में पहली बार दो किरदार में नजर आए। इसके बाद वर्ष 2000 में एक हिन्दी फ़िल्म "हेरा फेरी" में अपने अभिनय और किरदार के कारण वह इसके बाद कई फ़िल्मों में मुख्य किरदार भी निभा चूकें हैं। हेरा फेरी फ़िल्म में राजू (अक्षय कुमार) और श्याम (सुनील शेट्टी) उसके घर किराए पर रहते हैं। जबकि रावल उसमें मकान मालिक का किरदार निभाते हैं। इस किरदार को हेरा फेरी के सफलता का श्रेय दिया गया है। इसमें उनके कार्य के लिए वह फ़िल्मफेयर पुरस्कार (सर्वश्रेष्ठ हास्यकार) भी जीत चूकें हैं। उनका बाबुराव का किरदार उसके दूसरे भाग फिर हेरा फेरी (2006) में भी देखने को मिला, यह फ़िल्म भी सफल रही। रावल को सर्वश्रेष्ठ फिल्म पुरस्कार, सर्वश्रेष्ठ कॉमेडियन और लीड रोल के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार, सहायक भूमिका मिली है। परेश रावल सबसे लोकप्रिय और वाणिज्यिक सफल फिल्मों में क्षणाशन (1991), मनी (199 3), मनी मनी (1995), गोविंदा गोविंदा (1994), रिक्शावुडू (1995), बावागरु बागुनारा (1998), शंकर दादा एमबीबीएस (2004), और टीन मार (2011) इत्यादि। 2012 में आयी फिल्म omg में कांजिलाल मेहता के रूप में उनका किरदार आज भी विस्मरणीय है फिल्म जगत में ये एक ऐसे चेहरे में गिने जाते है जिनका अभिनय चाहे किसी भी किरदार में हो जान डाल देती है फिल्म में। वर्ष 2018 में राजकुमार हिरानी की फिल्म संजू (संजय दत्त की बायोपिक फिल्म) में सुनील दत्त (संजय दत्त के पिता) के रूप में उनका साक्षात् चित्रण किया जिससे उन्होंने फिल्म में काफी प्रसिद्धि मिली ।

*परेश रावल हिन्दी फ़िल्मों के एक अभिनेता हैं। 2014 में उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया गया। यह 1994 में राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार सहायक किरदार के लिए से सम्मानित हुए। इसके बाद इन्हें सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता का फ़िल्मफेयर पुरस्कार भी मिल चुका है*

जेनिफर विंगेट


*जेनिफर विंगेट*

*🎂30 मई 1985*

*जेनिफर विंगेट टेलीविजन और फ़िल्म अभिनेत्री हैं जो कई धारावाहिकों में दिख चुकी हैं। वेें खासकर सरस्वतीचंद्र, बेहद और बेपनाह जैैैसे धारावाहिको में अपनी बेहतरीन प्ररदर्शन के लिए जानी जाती हैं। इन्होंने 2012 में अपने दोस्त और दिल मिल गए के सह कलाकार करन सिंह ग्रोवर से शादी कर ली थी। नवम्बर 2014 में दोनों का तलाक हो गया।*
*जन्म की तारीख और समय: 30 मई 1985 (आयु 38 वर्ष), मुम्बई*
*पति: करन सिंह ग्रोवर (विवा. 2012–2014)*
*माता-पिता: हेमंत विंगेट, प्रभा विंगेट*
*भाई: मोसेस विनगेट*

..........


🎥फिल्मे
1995 अकेले हम अकेले तुम - युवा लड़की के रूप में
1997 राजा की आएगी बारात - स्कूल में एक बच्चे के रूप में
2000 राजा को रानी से प्यार हो गया - तनु के रूप में
2003 कुछ ना कहो - पूजा के रूप में

📺टेलीविजन

2003–04 शाका लाका बूम बूम - पिया के रूप में
2004–08 कसौटी जिंदगी की - स्नेहा बजाज के रूप में
2006-07 क्या होगा निम्मो का - नताशा के रूप में
2007-09 संगम - गंगा सागर भाटिया के रूप में
2009 देख इंडिया देख - मेजबान के रूप में
2009 लाफ्टर के पटाखे - मेजबान के रूप में
2009 कॉमेडी सर्कस 3 - प्रतियोगी के रूप में
2009 ज़रा नचके दिखा 2 - मेजबान के रूप में
2009 दिल मिल गए - डॉ रिद्धीमा गुप्ता मलिक के रूप में
2011 जोर का झटका: टोटल वाइपआउट प्रतियोगी के रूप में
2011 कॉमेडी का महा मुक़ाबला - मेजमान के रूप में
2011 नचलेवे विथ सरोज खान - समापन समारोह के मेजबान के रूप में
2013–14 सरस्वतीचंद्र कुमुद सरस्वतीचंद्र व्यास के रूप में
2014 स्टार होली मस्ती गुलाल की - मेजबान के रूप में
2016 बेहद - माया मेहरोत्रा के रूप में
2018 बेपनाह - ज़ोया सिद्दीकी के रूप में

रविवार, 28 मई 2023

अन्नुप्रिय



अनुप्रिया गोयनका


जन्म तिथि: 29-मई -1987

जन्म स्थान: लखनऊ, उत्तर प्रदेश, भारत

पेशा: अभिनेतरी, टेलीविजन अभिनेतरी

राष्ट्रीयता: भारतअनुप्रिया गोयनका एक भारतीय अभिनेत्री और मॉडल हैं जो हिंदी और तेलुगु फिल्मों में दिखाई देती हैं।
उन्होंने पहली बार 2013 में यूपीए सरकार के भारत निर्माण विज्ञापन अभियान के चेहरे के रूप में और ब्रांड Myntra के लिए भारत के पहले समलैंगिक विज्ञापन में समलैंगिक भूमिका निभाने के लिए प्रसिद्धि हासिल की।
गोयनका ने 2013 की तेलुगु फिल्म पोटुगाडु के साथ अपनी ऑन-स्क्रीन शुरुआत की, इससे पहले 2013 की लघु फिल्म वर्थ द किस में अभिनय किया था।
बाद में उन्होंने कॉमेडी-ड्रामा बॉबी जासूस (2013), ड्रामा पाठशाला (2014), एक्शन कॉमेडी ढिशूम (2016) और क्राइम-ड्रामा डैडी (2017) में अभिनय किया।
गोयनका ने एक्शन-थ्रिलर टाइगर ज़िंदा है (2017) और वॉर (2019), और महाकाव्य पीरियड ड्रामा पद्मावत (2018) में अभिनय किया, जो सभी समय की सबसे अधिक कमाई करने वाली भारतीय फिल्मों में से एक है।

पंकज कपूर


🎂जन्म 29 मई 1954

पंकज कपूर का (जन्म 29 मई 1954) मैं हुआ था। पंकज कपूर एक भारतीय अभिनेता हैं,जिन्होंने हिंदी थिएटर, टेलीविजन और फिल्मों में काम किया है। वह कई टेलीविजन धारावाहिकों और फिल्मों में दिखाई दिए हैं। वह कई पुरस्कारों के प्राप्तकर्ता हैं,जिनमें एक फिल्मफेयर पुरस्कार और तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार शामिल हैं। उनकी अब तक की सबसे प्रशंसित फिल्म भूमिकाएं इंस्पेक्टर पी.के.राख (1989) में, एक डॉक्टर की मौत (1991) में डॉ दीपांकर रॉय और अब्बा जी,(शेक्सपियर के राजा डंकन पर आधारित) विशाल भारद्वाज के मैकबेथ के रूपांतरण में;मकबूल (2004)

जन्म
29 मई 1954-05-29) (आयु 69)
शिक्षा प्राप्त की
National School of Drama
व्यवसाय
Actor, Story writer, Screenwriter, Director
कार्यकाल
1982–present
गृह स्थान
Ludhiana, Punjab, India
जीवनसाथी
Neelima Azeem (m.1979–1984)
Supriya Pathak (m.1988–present)

बच्चे और संबंधी

Dina Pathak (Mother-In-law)
Ratna Pathak (Sister-in-law)
Shahid Kapoor (Son)
Sanah Kapur (Daughter)

दूरदर्शन पर 80 के दशक में प्रसारित जासूसी धारावाहिक करमचंद
कर्मचंद

में निभाई शीर्षक भूमिका शायद उनकी सबसे मशहूर भूमिकाओं में से हैं। उनकी अन्य सराहनीय फ़िल्मों में एक डॉक्टर की मौत (1991) तथा विशाल भारद्वाज निर्देशित "मक़बूल" (2003) शामिल हैं। आस्कर अवार्ड विजेता रिचर्ड अटेनबरो निर्देशित और 1982 में निर्मित फ़िल्म गाँधी में पंकज ने प्यारेलाल की संक्षिप्त भूमिका अदा की थी पर फ़िल्म के हिन्दी संस्करण में गाँधी का किरदार निभा रहे बेन किंग्सले की डबिंग करने का उन्हें अवसर मिला।

पंकज बॉलीवुड के प्रसिद्ध युवा अभिनेता शाहिद कपूर के पिता हैं जो अभिनेत्री व नृत्यांगना नीलिमा अज़ीम से उनके पहले विवाह की संतान हैं। पंकज ने दूसरा विवाह अभिनेत्री सुप्रिया पाठक से किया।

प्रमुख फिल्में

वर्ष    फ़िल्म     चरित्र टिप्पणी

2007 हल्ला बोल
2005 दस जमवाल
2003 मकबूल जहाँगीर ख़ान
2003 मैं प्रेम की दीवानी हूँ सत्यप्रकाश
1995 राम जाने पन्नू टेक्नीकलर
1991 एक डॉक्टर की मौत
1989 राख इंस्पेक्टर पी के
1989 कमला की मौत सुधाकर पटेल
1987 ये वो मंज़िल तो नहीं रोहित
1986 चमेली की शादी कल्लूमल कोयलेवाला
1986 मुसाफ़िर
1985 अघात छोटेलाल
1984 कंधार दिपू
1983 जाने भी दो यारों तर्नेजा


योगेश गौड़

सुने मेरे ब्लाग पर

*🎂जन्म- 19 मार्च, 1943, लखनऊ, उत्तर प्रदेश; *

*🕯️मृत्यु- 29 मई, 2020, मुम्बई, महाराष्ट्र*

*प्रसिद्ध गीतकार योगेश की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि*



योगेश गौड़  प्रसिद्ध भारतीय गीतकार और लेखक थे। उन्हें विशेष रूप से फ़िल्म 'आनंद' के गीत 'कहीं दूर जब दिन ढल जाये' और 'ज़िन्दगी कैसी है पहेली हाए'; 'रिमझिम गिरे सावन' (फ़िल्म- मंज़िल), 'रजनीगंधा फूल तुम्हारे' (फ़िल्म- रजनीगंधा) जैसे सुपरहित गीतों के लिए प्रसिद्धि प्राप्त है। भारतीय हिंदी सिनेमा में उनके दिये योगदान के लिए उन्हें 'दादा साहब फाल्के पुरस्कार' के अलावा 'यश भारती पुरस्कार' भी दिया गया।

जीवन परिचय

हिन्दी फ़िल्मों के सुपरिचित गीतकार योगेश गौड उर्फ़ योगेश का जन्म लखनऊ, उत्तर प्रदेश में एक मध्यवर्गीय परिवार में हुआ। आरंभिक शिक्षा लखनऊ के संस्कृति संपन्न माहौल में हुई, इस तरह योगेश का बचपन और किशोरावस्था यहीं बीते। पिता की असामयिक मृत्यु के कारण पढाई बीच में ही रोक कर रोज़गार की तलाश में लग गए। परिवार, मित्रों की सलाह पर मायानगरी मुंबई का रुख किया, मकसद इतना था कि जल्द-से-जल्द कोई काम मिले। मुंबई फ़िल्म उद्योग में पहला लक्ष्य नहीं था, महानगर की परिस्थितियों में योगेश को समझ में नहीं आ रहा था कि किस तरह एक शुरुआत होगी। इस क्रम में उन्होंने कहानी लेखन को चुना और सफ़र पर निकल पड़े, धीरे-धीरे पटकथाएं और संवाद लिखकर सिने-जीवन का आगाज़ किया

गीत एवं पटकथा लेखन

योगेश जी के मुंबई में आरंभिक संघर्ष को मित्र व सहयोगी सत्यप्रकाश ने साथ दिया, दोनों में सच्ची दोस्ती सा रिश्ता बना। भाई सत्यप्रकाश योगेश के सलाहकार, प्रेरक और संकट-मोचक रहे। मित्र के साथ ‘चाल’ में गुज़रा यह वक्त प्रेरणा का वरदान सा बन गया। आत्म-निर्भर पहचान के लिए अपने नाम से ‘गौड’ हटाने का फ़ैसला उनके व्यक्तित्व विकास के लिए अवसरों के नए द्वार लेकर आया, कहानी, पटकथा, संवाद के बाद कविता और गीत-लेखन की ओर उन्मुख हुए। यहां पर बचपन में कविता लिख कर याद करने का अभ्यास काम आया। लखनऊ का साहित्य-सांस्कृतिक सांचा और आत्मबल योगेश को कवि-गीतकार रूप दे गया।

योगेश जी को सगीत निर्देशक की ‘धुनों’ पर गीत लिखना पसंद नहीं था। गीत-लेखन की तकनीकी मांगों से अपरिचित होकर फ़िल्मकार रोबिन बैनर्जी के पास काम मांगा। उस समय सगीत धुनों पर ही गीत लिखने का चलन था। रोबिन बैनर्जी उन दिनों फ़िल्म ‘मासूम’ (1963) पर काम कर रहे थे। योगेश को रोबिन जी ने इस फ़िल्म के गीत लिखने को कहा। इस अनुभव ने उनकी आँखें खोल दी। अब वह संगीत धुनों पर लिखने को समझ चुके थे। रोबिन बैनर्जी-योगेश का सफ़र सखी रौबिन, मारवेल मैन, फ़्लाइंग सर्कस, रौबिनहुड समेत लगभग दर्जन भर फ़िल्मों तक रहा।

फ़िल्म 'आनंद' से मिली सफलता

प्रसिद्ध संगीत निर्देशक सलिल चौधरी बहु-चर्चित फ़िल्म ‘आनंद’ (1971) पर काम कर रहे थे, उन्हें इस फ़िल्म के लिए एक सुलझे हुए गीतकार की तलाश थी। मशहूर शैलेन्द्र की कमी में योगेश का चयन किया। आनंद की सफ़लता से ‘योगेश’ देशभर में विख्यात होकर सलिल चौधरी के साथ अपने कैरियर की ‘सफ़लतम’ यात्रा पर निकल पड़े। सलिल दा-योगेश ने आनंद के अलावे ‘अनोखादान’, ‘अन्नदाता’, ‘आनंद महल’, ‘रजनीगंधा’ और ‘मीनू’ जैसी फ़िल्मों में साथ काम किया। सलिल दा की जलेबीदार, कठिन संगीत धुनों के लिए गीत लिखना योगेश के लिए बहुत ही ‘चुनौतीपूर्ण’ कार्य रहा। निस दिन, रजनीगंधा फूल तुम्हारे, प्यास लिए मनवा जैसे गीतों में गीतकार की ‘कविताई’ निखर कर सामने आई। इस तरह सलिल दा के मापदंडों पर एक गीतकार ‘कवि’ भी बन सका।

योगेश ने अपने कैरियर में संगीतकार घरानों के ‘पिता-पुत्र’ संगीतकारों के साथ काम किया, इस परम्परा में सलिल एवं संजय चौधरी और सचिन देव एवं राहुल देव बर्मन के लिए गीत लिखे। जाने-माने संगीतकार सचिन देव बर्मन की ‘उसपार’ तथा ‘मिली’ योगेश के यादगार ‘प्रोजेक्ट’ रहे, इन फ़िल्मों का जीवंत गीत-संगीत इस साथ की सुनहरी याद है। 'मिली' अभी पूरी भी न हुई थी कि सचिन देव बीच में ‘बीमार’ पड़ गए, पिता की आधी फ़िल्म को राहुल देव बर्मन ने ‘बडी सूनी-सूनी है ज़िंदगी’ और ‘मैने कहा फूलों से’ रिकार्ड कर पूरा किया। संगीतकार राहुल की ‘लिस्ट’ में योगेश का नम्बर पाँचवीं पायदान पर आता था, फिर भी राहुल देव-योगेश की जोड़ी 8 से 10 फ़िल्मों में साथ आई।

फ़िल्मकार ऋषिकेश मुखर्जी के निर्देशन मे बनी ‘आनंद’ (1971) के बाद योगेश को सिने जगत् में उचित सम्मान मिला, फ़िल्म के कभी ना भुलाए जा सकने वाले गीत आज भी लोकप्रिय बने हुए हैं। कहा जाता है कि ऋषिकेश जी को ‘आनंद’ बनाने की प्रेरणा मूलत: एक जापानी फ़िल्म से मिली, कहानी से इस क़दर प्रोत्साहित हुए कि केन्द्र में ‘महिला’ को रखकर ‘मिली’ भी बनाई। योगेश जी ने दोनों फ़िल्मों के गीत लिखकर ऋषिकेश दा की ‘सबसे बड़ा सुख’, ‘रंग-बिरंगी’ और ‘किसी से ना कहना’ के गीत समेत अनेक फ़िल्मों के गीत लिखे।[1]

प्रसिद्ध गीत

कहीं दूर जब दिन ढल जाये (आनंद)
रिमझिम गिरे सावन (मंज़िल)
रजनीगंधा फूल तुम्हारे (रजनीगंधा)
ज़िन्दगी कैसी है पहेली (आनंद)
ना बोले तुम, ना मैने कुछ कहा (बातों बातों में)
कई बार यूँ भी देखा है (रजनीगंधा)
कहा तक ये मन को अंधेरे छलेंगे (बातों बातों में)
आए तुम याद मुझे, गाने लगी हर धडकन (मिली)
न जाने क्यों होता है, ये जिंदगी के साथ (छोटी सी बात)

मृत्यु

गीतकार तथा लेखक योगेश का निधन 29 मई, 2020 को बसई, मुम्बई में हुआ।

हिंदी सिनेमा की महान कलाकार लता मंगेशकर ने उनके निधन पर लिखा- "मुझे अभी पता चला कि दिल को छूने वाले गीत लिखने वाले कवि योगेश जी का आज स्वर्गवास हो गया है। ये सुनकर मुझे बहुत दु:ख हुआ। योगेश जी के लिखे गीत मैंने गाए। योगेश जी बहुत शांत और मधुर स्वभाव के इंसान थे। मैं उनको विनम्र श्रद्धांजलि अर्पण करती हूं"। योगेश के साथ लता मंगेशकर ने कई फिल्मों में काम किया था।

बेला मुखर्जी


*🎂जन्म- 29 मई 1928* 
*🕯️मृत्यु 25 जून 2009*

महान संगीतकार हेमंत कुमार की पत्नी गायिका बेला मुखर्जी के जन्मदिन पर हार्दिक श्रधांजलि




बेला मुखर्जी (जन्म- 29 मई 1928 मृत्यु 25 जून 2009) एक भारतीय गायिका और गायक और संगीत निर्देशक हेमंत मुखर्जी की पत्नी थीं।  उसने अपने पति के साथ कई गाने रिकॉर्ड किए।

बेला मुखर्जी का जन्म 29 मई 1928 को पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद के बरहामपुर में हुआ था।  हाई स्कूल की पढ़ाई उन्होंने कलकत्ता में पूरी की संगीत की शिक्षा उन्होंने कमल दासगुप्ता से ग्रहण की

बेला मुखर्जी की छोटी बहन आभा मुखर्जी न्यू थिएटर में चाइल्ड आर्टिस्ट के रूप में गाना गाती थी एक दिन उन्होंने अपनी बहन बेला मुखर्जी की संगीत प्रतिभा के बारे में प्रसिद्ध संगीतकार पंकज मलिक को बताया

संगीतकार पंकज मलिक ने बेला मुखर्जी को फ़िल्म काशीनाथ (1943) में असित बरन के साथ तीन ड्यूएट्स गाने का मौका दिया उनका गीत  "ओ बन में पंछी " काफी लोकप्रिय हुआ

उनके गायन प्रतिभा से प्रभावित होकर संगीतकार खेमचन्द प्रकाश ने उन्हें बॉम्बे बुलाया जहाँ उन्होंने उनसे फ़िल्म श्री कृष्णा अर्जुन युद्ध मे गाना गवाया
महान संगीतकार हेमंत  कुमार बेला मुखर्जी को 17 साल की उम्र में संगीत की शिक्षा दी थी

हेमंत कुमार से शादी के बाद उन्होंने अपना पूरा ध्यान परिवार पर लगा दिया मगर वह अपने पति हेमंत कुमार के लिए गाना गाना जारी रखा उन्होंने अपने पति हेमन्त कुमार से साथ कुछ बेहतरीन गाने गाये
दे दे पेट को रोटी तन को कपड़ा फ़िल्म मालदार 1951
दूल्हा राम सिया दुल्हिरी फ़िल्म बंधन 1956 बड़े बड़े तूफानों के फ़िल्म फ़ैशन 1957 और हम दुखड़ा सहने वाली फिल्म सेहरा 1958 जैसे गीत शामिल हैं 
उन्होंने फिल्मी गानों के अलावा कुछ नॉन फिल्मी गाने भी गाये जैसे अगर गरज के कह सकता है देश हमारा हिन्दुस्तान

उन्होंने 1955 में महान संगीतकार रवि के साथ एक गाना गाया रवि साहब इसमे गायक के रूप में उनका साथ दिया फ़िल्म थी बहू इसके संगीतकार थे उनके पति हेमंत कुमार गाने के बोल थे दूर दूर से क्या जाता तुम

उन्होंने अपने पति से साथ गीतांजलि पिक्चर्स का मैनेजमेंट भी देखा इस प्रोडक्शन हाउस में उन्होंने 11 फिल्मों का निर्माण किया इस प्रोडक्शन हाउस की आखिरी फ़िल्म लव इन कनाडा (1979) थी

वह बाद में कलकत्ता लौट गयीं जहाँ वह अस्सिस्टेंट म्यूजिक डायरेक्टर बन गयी वहां उन्होंने कई प्रसिद्ध बंगाली फिल्मों में संगीत दिया जैसे नायिका संगबाद (1967) पंचशर (1968) निमन्त्रण (1971) श्रीमान पृथ्वी राज (1973) फुलेश्वरी (1974) ठगिनी (1974) गणदेवता (1979) दादर कीर्ति (1980) शहर ठेके दूरे (1981)  भालोबासा भालोबासा (1985) एवं आगमन (1988)
एक बार आर सी बोराल ने उनको अभिनेत्री बनने का प्रस्ताव दिया मगर पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण वह यह काम नही कर पायीं

बेला मुखर्जी का 89 वर्ष की आयु में 25 जून 2009  को दक्षिण कोलकाता के एक निजी अस्पताल में निधन हो गया।  उन्हें 15 जून 2009 को अस्पताल में भर्ती कराया गया था उनका अंतिम संस्कार केओराताला में किया गया उनके दो बच्चे है एक बेटे, जयंत जो प्रसिद्ध अभिनेत्री मौसमी चटर्जी के पति है और एक बेटी, रूमा मुखर्जी है

स्नेहल भटकर


स्नेहल भटकर (असली नाम वासुदेव गंगाराम भटकर, बी वासुदेव; 17जुलाई 1919-29 मई 2007)

। 29 मई 2007 को 87 वर्ष की आयु में उनके मुंबई आवास पर उनका निधन हो गया।

प्रसिद्ध संगीतकार स्नेहल भटकर की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रधांजलि

स्नेहल भटकर (असली नाम वासुदेव गंगाराम भटकर, बी वासुदेव; 17जुलाई 1919-29 मई 2007), मुंबई, भारत के एक प्रसिद्ध हिंदी और मराठी फिल्म संगीतकार थे।  वह वर्ष 2004 में महाराष्ट्र सरकार द्वारा स्थापित लता मंगेशकर पुरस्कार के प्राप्तकर्ता हैं। 

स्नेहल भटकर का जन्म 17 जुलाई 1919 को मुंबई में एक मराठी भाषी परिवार में हुआ था।  जब वे 18 महीने के थे तब उनके पिता का देहांत हो गया था।  उनकी माँ एक शिक्षिका थीं और एक गायिका भी थीं उन्होंने संगीत की मूल बातें अपनी माँ से सीखीं।  मैट्रिक पूरा करने के बाद उन्होंने दादर के एक संगीत विद्यालय में संगीत सीखा।  29 मई 2007 को 87 वर्ष की आयु में उनके मुंबई स्थित आवास पर उनका निधन हो गया।

आधिकारिक तौर पर एचएमवी के लिए काम करते हुए अनुबंध में किसी भी उल्लंघन से बचने के लिए, उन्होंने संगीतकार के रूप में विभिन्न छद्म नामों को अपनाया।  इनमें "बी. वासुदेव" और "स्नेहल" शामिल थे, लेकिन एक और विकल्प, "स्नेहल भटकर" तय हो गया।  यह नाम उनकी तत्कालीन नवजात बेटी स्नेहलता से लिया गया था। 

उन्होंने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत वर्ष 1947 में फिल्म नील कमल से की थी। भटकर और गीतकार केदार नाथ शर्मा ने कभी तन्हाईयों में हमारी याद आयेगी (हमारी याद आएगी) जैसे हिट गानों के लिए टीम बनाकर एक दूसरे के साथ काम किया  

उनके तीन बच्चों में प्रसिद्ध मराठी अभिनेता रमेश भटकर, अविनाश भटकर और बेटी स्नेहलता भटकर (अब रामकृष्ण बर्दे से शादी हुई) शामिल हैं।

प्रीति गांगुली

●▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬●   ꧁ *जन्म की तारीख और समय: 17 मई 1953, मुम्बई* *मृत्यु की जगह और तारीख: 2 दिसंबर 2012, मुम्बई* *भाई: भारती जाफ़री, ...