बुधवार, 26 जुलाई 2023

रिंकी खन्ना


*🎂जन्म*

*27 जुलाई 1977*
मुम्बई ,महाराष्ट्र ,भारत
कार्यकाल
१९९९-२००४
जीवनसाथी
समीर सरण


रिंकी खन्ना एक भारतीय बॉलीवुड अभिनेत्री है, जो कि ट्विंकल खन्ना की बहन है और अक्षय कुमार की साली है।रिंकी खन्ना अभिनेता राजेश खन्ना व डिम्पल कपाड़िया की बेटी है।इनका विवाह २००३ में समीर सरन के साथ हुआ था।इन्होने बॉलीवुड को बहुत सारी फिल्मे दी है जैसे गोविंदा के साथ जिस देश में गंगा रहता ताततथ झंकार बीट्स आदि मुख्य है।

फिल्में

वर्ष फ़िल्म चरित्र टिप्पणी
2003 झंकार बीट्स
2003 चमेली नेहा
2002 ये है जलवा
2001 मुझे कुछ कहना है
2000 जिस देश में गंगा रहता है टीना
1999 प्यार में कभी कभी खुशी


सोमवार, 24 जुलाई 2023

BR Ishara

BR इशारा
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🎂जन्म : 7 सितंबर 1934, माँ चिंतपूर्णी मंदिर, चिंतपूर्णी
मृत्यु: 25 जुलाई 2012, मुम्बई
पत्नी: रेहाना सुल्तान (विवाह 1984–2012)


*Ş₳ŦเŞ𝓱👸🏻◣🍁💜⃝🇱♥︎2*
बाबू राम इशारा (अंग्रेज़ी: Babu Ram Ishara, मूल नाम: रोशन लाल शर्मा, जन्म: 7 सितम्बर, 1934; मृत्यु: 25 जुलाई, 2012) प्रसिद्ध लेखक और फ़िल्म निर्देशक थे। उन्होंने एक लम्बा संघर्षशील जीवन जीया। वे हिमाचल प्रदेश के ऊना ज़िले में किसी पहाड़ी गांव के रहने वाले थे। किशोर उम्र में ही भागकर मुम्बई आ गए थे।
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बाबू राम इशारा (अंग्रेज़ी: Babu Ram Ishara, मूल नाम: रोशन लाल शर्मा, जन्म: 07 सितम्बर, 1934; मृत्यु: 25 जुलाई, 2012) प्रसिद्ध लेखक और फ़िल्म निर्देशक थे। उन्होंने एक लम्बा संघर्षशील जीवन जीया। वे हिमाचल प्रदेश के ऊना ज़िले में किसी पहाड़ी गांव के रहने वाले थे। किशोर उम्र में ही भागकर मुम्बई आ गए थे। यह भी कहा जाता है कि उन्होंने एक फ़िल्म स्टुडियो में चाय देने का काम भी किया। फिर बाद में फ़िल्म से जुड़े और अनेक छोटे-मोटे काम किए और निर्देशक को सहयोग देने की भूमिका तक पहुंचे। उन्होंने बासु भट्टाचार्य के अलावा दुलाल गुहा को निर्देशकीय सहयोग दिया। अपनी फ़िल्मों में नए लोगों को ब्रेक देने वाले बी.आर. इशारा ने अमिताभ बच्चन की फ़िल्म ‘एक नज़र’ का निर्देशन भी किया था। यह अमिताभ का सुपर सितारे से पहले का दौर था।
 भूमिका तक पहुंचे। उन्होंने बासु भट्टाचार्य के अलावा दुलाल गुहा को निर्देशकीय सहयोग दिया। अपनी फ़िल्मों में नए लोगों को ब्रेक देने वाले बी.आर. इशारा ने अमिताभ बच्चन की फ़िल्म ‘एक नज़र’ का निर्देशन भी किया था। यह अमिताभ का सुपर सितारे से पहले का दौर था।
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बी. आर. इशारा  
बी. आर. इशारा
बाबू राम इशारा
पूरा नाम रोशन लाल शर्मा
प्रसिद्ध नाम बाबू राम इशारा
जन्म 7 सितम्बर, 1934
जन्म भूमि ऊना, हिमाचल प्रदेश
मृत्यु 25 जुलाई, 2012
मृत्यु स्थान मुम्बई, महाराष्ट्र
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र फ़िल्म निर्देशक
मुख्य फ़िल्में 'हम दो हमारे दो', 'चेतना', 'चरित्र', 'औरत' आदि।
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी परवीन बॉबी को फ़िल्मी दुनिया में सबसे पहले अवसर बी. आर. इशारा ने ही दिया था।
बाबू राम इशारा (अंग्रेज़ी: Babu Ram Ishara, मूल नाम: रोशन लाल शर्मा, जन्म: 7 सितम्बर, 1934; मृत्यु: 25 जुलाई, 2012) प्रसिद्ध लेखक और फ़िल्म निर्देशक थे। उन्होंने एक लम्बा संघर्षशील जीवन जीया। वे हिमाचल प्रदेश के ऊना ज़िले में किसी पहाड़ी गांव के रहने वाले थे। किशोर उम्र में ही भागकर मुम्बई आ गए थे। यह भी कहा जाता है कि उन्होंने एक फ़िल्म स्टुडियो में चाय देने का काम भी किया। फिर बाद में फ़िल्म से जुड़े और अनेक छोटे-मोटे काम किए और निर्देशक को सहयोग देने की भूमिका तक पहुंचे। उन्होंने बासु भट्टाचार्य के अलावा दुलाल गुहा को निर्देशकीय सहयोग दिया। अपनी फ़िल्मों में नए लोगों को ब्रेक देने वाले बी.आर. इशारा ने अमिताभ बच्चन की फ़िल्म ‘एक नज़र’ का निर्देशन भी किया था। यह अमिताभ का सुपर सितारे से पहले का दौर था।

जीवन परिचय
हिमाचल प्रदेश के ऊना ज़िले में जन्मे लेखक और फ़िल्म निर्देशक बी. आर. इशारा मुम्बई के जुहु इलाके में रहा करते थे। हिमाचल प्रदेश से छोटी उम्र में ही मुंबई आ गए बी. आर. इशारा ने पहले छोटे-मोटे काम किए। शब्दों और विचारों के धनी बी. आर. इशारा ने शुरू में लेखकों की मदद की और बाद में स्वयं लेखक बन गए। उन्होंने हिंदी फ़िल्मों की लीक छोड़ी और नए ढंग के सिनेमा को लेकर आगे बढ़े। कहते हैं उनका मूल नाम रोशन लाल शर्मा था। मुंबई आने पर उन्होंने जहां पहली नौकरी की, उस निर्माता ने उन्हें बाबू नाम दिया। वह उन्हें अपने गुरु के नाम रोशन लाल से नहीं पुकारना चाहता था। बाबू ने पहले अपने नाम में राम जोड़ा। फिर लेखक बने तो अपना तखल्लुस इशारा रख लिया। हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री के राइटर्स एसोशिएसन के सक्रिय सदस्य थे। उन्होंने चेतना की हिरोइन रेहाना सुल्तान से शादी की थी।
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बी. आर. इशारा  
बी. आर. इशारा
बाबू राम इशारा
पूरा नाम रोशन लाल शर्मा
प्रसिद्ध नाम बाबू राम इशारा
जन्म 7 सितम्बर, 1934
जन्म भूमि ऊना, हिमाचल प्रदेश
मृत्यु 25 जुलाई, 2012
मृत्यु स्थान मुम्बई, महाराष्ट्र
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र फ़िल्म निर्देशक
मुख्य फ़िल्में 'हम दो हमारे दो', 'चेतना', 'चरित्र', 'औरत' आदि।
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी परवीन बॉबी को फ़िल्मी दुनिया में सबसे पहले अवसर बी. आर. इशारा ने ही दिया था।
बाबू राम इशारा (अंग्रेज़ी: Babu Ram Ishara, मूल नाम: रोशन लाल शर्मा, जन्म: 7 सितम्बर, 1934; मृत्यु: 25 जुलाई, 2012) प्रसिद्ध लेखक और फ़िल्म निर्देशक थे। उन्होंने एक लम्बा संघर्षशील जीवन जीया। वे हिमाचल प्रदेश के ऊना ज़िले में किसी पहाड़ी गांव के रहने वाले थे। किशोर उम्र में ही भागकर मुम्बई आ गए थे। यह भी कहा जाता है कि उन्होंने एक फ़िल्म स्टुडियो में चाय देने का काम भी किया। फिर बाद में फ़िल्म से जुड़े और अनेक छोटे-मोटे काम किए और निर्देशक को सहयोग देने की भूमिका तक पहुंचे। उन्होंने बासु भट्टाचार्य के अलावा दुलाल गुहा को निर्देशकीय सहयोग दिया। अपनी फ़िल्मों में नए लोगों को ब्रेक देने वाले बी.आर. इशारा ने अमिताभ बच्चन की फ़िल्म ‘एक नज़र’ का निर्देशन भी किया था। यह अमिताभ का सुपर सितारे से पहले का दौर था।

जीवन परिचय
हिमाचल प्रदेश के ऊना ज़िले में जन्मे लेखक और फ़िल्म निर्देशक बी. आर. इशारा मुम्बई के जुहु इलाके में रहा करते थे। हिमाचल प्रदेश से छोटी उम्र में ही मुंबई आ गए बी. आर. इशारा ने पहले छोटे-मोटे काम किए। शब्दों और विचारों के धनी बी. आर. इशारा ने शुरू में लेखकों की मदद की और बाद में स्वयं लेखक बन गए। उन्होंने हिंदी फ़िल्मों की लीक छोड़ी और नए ढंग के सिनेमा को लेकर आगे बढ़े। कहते हैं उनका मूल नाम रोशन लाल शर्मा था। मुंबई आने पर उन्होंने जहां पहली नौकरी की, उस निर्माता ने उन्हें बाबू नाम दिया। वह उन्हें अपने गुरु के नाम रोशन लाल से नहीं पुकारना चाहता था। बाबू ने पहले अपने नाम में राम जोड़ा। फिर लेखक बने तो अपना तखल्लुस इशारा रख लिया। हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री के राइटर्स एसोशिएसन के सक्रिय सदस्य थे। उन्होंने चेतना की हिरोइन रेहाना सुल्तान से शादी की थी।

कैरियर
इशारा को बोल्ड और समाज के बर्निंग इशूज पर फ़िल्में बनाने के लिए जाना जाता था। उन्होंने हिंदी फ़िल्मों में बोल्ड फ़िल्मों की शुरुआत की थी। ज़रूरत और चेतना जैसी फ़िल्मों से उन्होंने आठवें दशक के आरंभ में हिंदी फ़िल्मों के पारंपरिक दर्शकों को झकझोर दिया था। वे अक्सर नए कलाकारों को लेकर बोल्ड फ़िल्म बनाते थे। उन्होंने सबसे पहले एफटीआईआई से ग्रेजुएट होकर आए कलाकारों पर भरोसा किया और उन्हें अपनी फ़िल्मों में प्रतिभा दिखाने का मौका दिया। उनके द्वारा बनाई गई प्रमुख फ़िल्मों में हम दो हमारे दो, चेतना, चरित्र, औरत जैसी फ़िल्में हैं। उन्होंने प्रसिद्ध क्रिकेटर सलीम दुर्रानी को लेकर ‘चरित्र’ बनाई थी जो बॉक्स ऑफिस पर असफल रही थी। बाबू राम इशारा ने रेहाना सुल्तान, परवीन बॉबी जैसे कलाकारों का पेश करने के साथ अमिताभ बच्चन, जया भादुड़ी, रीना रॉय, अनिल धवन, शत्रुघ्न सिन्हा, रजा मुराद, डैनी, विजय अरोड़ा, राज किरण जैसे कलाकारों के करिअर के आरंभ में बड़े मौके दिए। परवीन बॉबी को सबसे पहले अवसर बी. आर. इशारा ने ही दिया था।
बी. आर. इशारा का निधन 25 जुलाई 2012 को मुम्बई के क्रिटिकेयर अस्पताल में हुआ था।

रविवार, 23 जुलाई 2023

महमूद

महान हास्य अभिनेता महमूद की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि
🎂29 सितम्बर,1932

⚰️23 जुलाई, 2004
महमूद  फ़िल्म जगत के प्रसिद्ध हास्य अभिनेता थे। उनका पूरा नाम महमूद अली था। तीन दशक लम्बे चले उनके कैरियर में उन्होंने 300 से ज़्यादा हिन्दी फ़िल्मों में काम किया। अपने बहुरंगीय किरदारों से दर्शकों को हँसाने और गंभीर भूमिका कर रुलाने वाले महमूद अभिनय के प्रति समर्पित थे। अपने बहुमुखी अभिनय और कला के प्रति समर्पण ने उन्हें बुलंदियाँ दी और उनको फ़िल्मफ़ेयर सहित कई पुरस्कारों का सम्मान मिला। उन्होंने कई फ़िल्मों में गीत ही नहीं गाये बल्कि फ़िल्मों का निर्माण और निर्देशन भी किया।

#जन्म_और_परिवार

महमूद का जन्म 29 सितंबर, 1932, मुम्बई, भारत में हुआ था। महमूद मशहूर नृतक मुमताज़ अली के बेटे और चरित्र अभिनेत्री मिन्नो मुमताज़ अली के भाई थे। महमूद ने अभिनेत्री मीना कुमारी की बहन मधु से विवाह किया था। आठ संतानों के पिता महमूद के दूसरे बेटे मक़सूद लकी अली जाने-माने गायक और अभिनेता हैं। निर्देशक के रूप में महमूद की अंतिम फ़िल्म थी 'दुश्मन दुनिया का'। 1996 में बनी इस फ़िल्म में उन्होंने अपने बेटे मंज़ूर अली को पर्दे पर उतारा था।

#पहली_फ़िल्म

महमूद को पहला ब्रेक 1958 की फ़िल्म 'परवरिश' में मिला था, जिसमें उन्होंने राज कपूर के भाई की भूमिका निभाई थी। 1961 की "ससुराल" उनके कैरियर की अहम फ़िल्म थी, जिसके जरिए बतौर हास्य कलाकार स्थापित होने में उन्हें मदद मिली। 60 के दशक के हास्य कलाकारों की टीम की सफल शुरुआत के लिए भी "ससुराल" को अहम माना जाता है, क्योंकि इस फ़िल्म में महमूद के साथ-साथ शुभा खोटे जैसी हास्य अभिनेत्री ने भी अपनी कला के जौहर दिखाए।

#प्रमुख_भूमिका

1965 की फ़िल्म "जौहर महमूद इन गोवा" में उन्हें कॉमेडियन के साथ-साथ प्रमुख भूमिका निभाने का भी मौक़ा मिला। "प्यार किए जा" (1966) और "पड़ोसन" (1968) महमूद की दो सर्वाधिक यादगार भूमिकाओं वाली फ़िल्में हैं। "प्यार किए जा" में महमूद ने एक ऐसे युवक का किरदार निभाया, जो फ़िल्म निर्देशक बनना चाहता है और अपने बैनर 'वाह वाह प्रोडक्शन' के लिए वह अपने पिता (ओम प्रकाश) से आर्थिक मदद की उम्मीद रखता है। वहीं "पड़ोसन" में दक्षिण भारतीय गायक के किरदार में भी महमूद ने दर्शकों को खूब लुभाया।

#प्रतिभाशाली_व्यक्तित्व

अपनी बहुरंगीय किरदारों से दर्शकों को हँसाने और गंभीर भूमिका कर रूलाने वाले महमूद अभिनय के प्रति समर्पित थे। अपने बहुमुखी अभिनय और कला के प्रति समर्पण ने उन्हें बुलंदियाँ दी और उनको फ़िल्मफ़ेयर सहित कई पुरस्कारों का सम्मान मिला। उन्होंने कई फ़िल्मों में गीत ही नहीं गाये बल्कि फ़िल्मों का निर्माण और निर्देशन भी किया। जिसमें "छोटे नवाब", "भूतबंगला", "पड़ोसन", "बांबे टू गोवा", "दुश्मन दुनिया का", "सबसे बड़ा रुपैया" आदि शामिल है। जबकि विकलांगों पर बनी फ़िल्म "कुँवारा बाप" में किया गया उनका अभिनय आज भी उनकी यादों को ताजा करता है।[3] महमूद के व्यक्तित्व में तमाम रंग थे। इनमें से एक था, नए लोगों को मौक़ा देना। उन्होंने 'छोटे नवाब' फ़िल्म में संगीतकार राहुल देव बर्मन को पहली बार मौक़ा देकर फ़िल्म उद्योग को एक बेहतरीन तोहफा दिया था। इसी प्रकार महमूद ने सुपर स्टार अमिताभ बच्चन की उस समय मदद की थी, जब वह संघर्ष के दौर से गुजर रहे थे। उनके कैरियर को बल देने के लिए महमूद ने 'बांबे टु गोवा' फ़िल्म बनाई थी।

#निधन

अपने जीवन के आख़िरी दिनों में महमूद का स्वास्थ्य ख़राब हो गया। वह इलाज के लिए अमेरिका गए, जहाँ 23 जुलाई, 2004 को उनका निधन हो गया। दुनिया को हंसाकर लोट-पोट करने वाला यह महान् कलाकार नींद के आगोश में बड़ी खामोशी से इस दुनिया से विदा हो गया।

मनोज कुमार

महान अभिनेता निर्माता निर्देशक मनोज कुमार उर्फ भारत कुमार के जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनाएं

मनोज कुमार पूरा नाम: हरिकिशन गिरि गोस्वामी, जन्म: 24 जुलाई, 1937 फ़िल्म जगत् के प्रसिद्ध भारतीय अभिनेता, निर्माता व निर्देशक हैं। अपनी फ़िल्मों के जरिए मनोज कुमार ने लोगों को देशभक्ति की भावना का गहराई से एहसास कराया। मनोज कुमार शहीद-ए-आजम भगत सिंह से बेहद प्रभावित हैं और इसी भावना ने उन्हें 'शहीद' जैसी कालजई फ़िल्म में देश के इस अमर सपूत के किरदार को जीवंत करने की प्रेरणा दी थी। 1992 में मनोज कुमार को भारत सरकार द्वारा पद्मश्री से सम्मानित किया गया।

मनोज कुमार का जन्म 24 जुलाई 1937 को पाकिस्तान के एबटाबाद में हुआ था। उनका असली नाम हरिकिशन गिरि गोस्वामी है। देश के बंटवारे के बाद उनका परिवार राजस्थान के हनुमानगढ़ ज़िले में बस गया था। मनोज ने अपने करियर में शहीद, उपकार, पूरब और पश्चिम और 'क्रांति' जैसी देशभक्ति पर आधारित अनेक बेजोड़ फ़िल्मों में काम किया। इसी वजह से उन्हें भारत कुमार भी कहा जाता है।

शहीद के दो साल बाद उन्होंने बतौर निर्देशक अपनी पहली फ़िल्म 'उपकार' का निर्माण किया। उसमें मनोज ने भारत नाम के किसान युवक का किरदार निभाया था जो परिस्थितिवश गांव की पगडंडियाँ छोड़कर मैदान-ए-जंग का सिपाही बन जाता है। जय जवान जय किसान के नारे पर आधारित वह फ़िल्म उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के विशेष आग्रह पर बनाई थी। उस फ़िल्म में गांव के आदमी के शहर की तरफ भागने, फिर वापस लौटने और उससे जुड़े सामाजिक रिश्तों की कहानी थी जिसमें उस वक्त के हालात को ज़्यादा से ज़्यादा समेटने की कोशिश की गई थी।

उपकार खूब सराही गई और उसे सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म, सर्वश्रेष्ठ निर्देशक, सर्वश्रेष्ठ कथा और सर्वश्रेष्ठ संवाद श्रेणी में फ़िल्मफेयर पुरस्कार मिला था। फ़िल्म को द्वितीय सर्वश्रेष्ठ फ़ीचर फ़िल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार तथा सर्वश्रेष्ठ संवाद का बीएफजेए अवार्ड भी दिया गया

मनोज को शहीद के लिए सर्वश्रेष्ठ कहानीकार का राष्ट्रीय पुरस्कार दिया गया था। मनोज कुमार ने शहीद फ़िल्म में सरदार भगत सिंह की भूमिका को जी कर उस किरदार के फ़िल्मी रूपांतरण को भी अमर बना दिया था।

मनोज कुमार दिलीप कुमार से बेहद प्रभावित थे और उन्होंने अपना नाम फ़िल्म शबनम में दिलीप के किरदार के नाम पर मनोज रख लिया था। मनोज कुमार ने वर्ष 1957 में बनी फ़िल्म फ़ैशन के जरिए बड़े पर्दे पर क़दम रखा। प्रमुख भूमिका की उनकी पहली फ़िल्म कांच की गुडि़या (1960) थी। उसके बाद उनकी दो और फ़िल्में पिया मिलन की आस और रेशमी रुमाल आई लेकिन उनकी पहली हिट फ़िल्म हरियाली और रास्ता (1962) थी। मनोज कुमार ने वो कौन थी, हिमालय की गोद में, गुमनाम, दो बदन, पत्थर के सनम, यादगार, शोर, सन्न्यासी, दस नम्बरी और क्लर्क जैसी अच्छी फ़िल्मों में काम किया। उनकी आखिरी फ़िल्म मैदान-ए-जंग (1995) थी। बतौर निर्देशक उन्होंने अपनी अंतिम फ़िल्म ‘जय हिंद’ 1999 में बनाई थी।

मनोज कुमार अपनी देशभक्तिपूर्ण फ़िल्मों की वजह से जाने जाते हैं। उन्होंने अपनी फ़िल्मों में भारतीयता की खोज की। उन्होंने दर्शकों को देशप्रेम और देशभक्ति के बारे में बताया। उन्होंने आँसूतोड़ फ़िल्में बनाईं और मुनाफे से ज़्यादा अपना नाम कमाया जिसके कारण वे भारत कुमार कहलाए। फ़िल्म जगत् में मनोज कुमार अपनी देशभक्तिपूर्ण फ़िल्मों के कारण जाने जाते हैं, अपने अभिनय के कारण नहीं।

मनोज कुमार अकसर बंद गले के कपड़े पहनना पसंद करते हैं। फिर चाहे वह कुर्ता हो या शर्ट। इसके अलावा आप मनोज कुमार के एक हाथ को अकसर उनके अपने मुंह पर रखा पाएंगे। मनोज कुमार को फ़िल्मों में रोमांस के बजाय देशभक्ति फ़िल्में करना ज्यादा भाया। मनोज कुमार ने वर्ष 1957 में बनी फ़िल्म 'फ़ैशन' के जरिए बड़े पर्दे पर क़दम रखा। प्रमुख भूमिका की उनकी पहली फ़िल्म 'कांच की गुडि़या' (1960) थी। बाद में उनकी दो और फ़िल्में पिया मिलन की आस और रेशमी रुमाल आई लेकिन उनकी पहली हिट फ़िल्म 'हरियाली और रास्ता' (1962) थी। मनोज कुमार ने वो कौन थी, हिमालय की गोद में, गुमनाम, दो बदन, पत्थर के सनम, यादगार, शोर, सन्न्यासी, दस नम्बरी और क्लर्क जैसी अच्छी फ़िल्मों में काम किया। उनकी आखिरी फ़िल्म मैदान-ए-जंग (1995) थी। बतौर निर्देशक उन्होंने अपनी अंतिम फ़िल्म ‘जय हिंद’ 1999 में बनाई थी।

मनोज कुमार आज़ादी से पहले के क्रांतिकारियों पर आधारित फ़िल्म 'आख़िरी गोली' बना रहे हैं। मनोज कुमार के अनुसार, यह दो तरह के क्रांतिकारियों के दर्शन और सोच पर आधारित फ़िल्म है जिसकी कहानी उन्होंने स्वयं लिखी है। उपकार और क्रांति जैसी देशभक्तिपूर्ण फ़िल्मों में जानदार अभिनय से लोगों को मंत्रमुग्ध करने वाले इस अभिनेता ने बताया कि इस फ़िल्म के लिए सभी नए कलाकार नामांकित किये गए थे

मनोज कुमार को वर्ष 1972 में फ़िल्म बेईमान के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता और वर्ष 1975 में रोटी कपड़ा और मकान के लिए सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का फ़िल्मफेयर अवार्ड दिया गया था। बाद में वर्ष 1992 में उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया। मनोज कुमार को फालके रत्न पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया।

उत्तम कुमार

हिंदी फिल्मो के अभिनेता एवम् बंगला फिल्मो के महानायक उत्तम कुमार की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रधांजलि
🎂जन्म 03 सितम्बर, 1926
जन्म भूमि कोलकाता, बंगाल
⚰️मृत्यु 24 जुलाई, 1980
मृत्यु स्थान पश्चिम बंगाल
उत्तम कुमार  भारतीय सिनेमा में हिन्दी और बांग्ला फ़िल्मों के प्रसिद्ध अभिनेता थे। उनका मूल नाम 'अरुण कुमार चटर्जी' था। मुख्य रूप से बंगाली सिनेमा में काम करने वाले उत्तम कुमार एक अभिनेता होने के साथ-साथ फ़िल्म निर्देशक, निर्माता, गायक और संगीतकार भी
थे। जिस तरह हिन्दी सिनेमा में राज कपूर और नरगिस की जोड़ी याद की जाती है, उसी तरह बंगाली सिनेमा में उत्तम कुमार और सुचित्रा सेन का कोई मुकाबला नहीं था। बंगाली सिनेमा में उत्तम कुमार को 'महानायक' की पदवी दी गई है।

बंगाली फ़िल्मों के महानायक उत्तम कुमार का जन्म ब्रिटिश कालीन भारत में 3 सितम्बर , 1926 को भवानीपुर, कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता ) में उनके गिरीश मुखर्जी मार्ग स्थित पुश्तैनी मकान में हुआ था। उन्होंने कोलकाता के ही 'साउथ सबर्बन स्कूल (मेन)' से स्कूली शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद उच्च शिक्षा के लिए 'कोलकाता विश्वविद्यालय ' से सम्बद्ध'गोयेनका कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स एंड बिजनेस ऐडमिनिस्ट्रेशन' में दाखिला ले लिया। लेकिन उत्तम कुमार अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर पाए और उन्होंने'कलकत्ता पोर्ट ट्रस्ट' में एक लिपिक की
नौकरी प्राप्त कर ली।

अभिनेता उत्तम कुमार की बतौर नायक पहली फ़िल्म 'दृष्टिदान' थी, जिसे मशहूर निर्देशक नितिन बोस ने निर्देशित किया था। सुचित्रा सेन के साथ उनकी जोड़ी खूब पसंद की गई। सुचित्रा के साथ उनकी 'सप्तपदी', 'पौथे होलो देरी', 'हारानो सुर', 'चावा पावा', 'बिपाशा', 'जीवन तृष्णा' और 'सागरिका' जैसी फ़िल्में बेहद लोकप्रिय रहीं। बंगाली के साथ-साथ उन्होंने कई हिन्दी फ़िल्मों में भी अभिनय किया, जैसे- 'छोटी सी मुलाक़ात' - 1967 (स्वयं निर्माता)
'अमानुष' - 1975
'आनंद आश्रम' - 1977
'क़िताब' - 1979
'दूरियां' - 1979

जिस प्रकार हिन्दी सिनेमा में राज कपूर और नरगिस की जोड़ी याद की जाती है, उसी तरह बंगाली सिनेमा में उत्तम कुमार और सुचित्रा सेन का कोई मुकाबला नहीं था। प्रेम को इस तीव्रता से वे अपने अभिनय में व्यक्त करते थे कि दर्शक दंग रह जाते थे। यही वजह रही कि दर्शक इस जोड़ी से कभी बोर नहीं हुए। दो दशक तक तीस फ़िल्मों में दोनों ने अपने अभिनय के रंग बिखेरे और इनमें से ज्यादातर फिल्में बॉक्स ऑफिस पर सफल रहीं। उत्तम कुमार और सुचित्रा सेन बंगाली सिनेमा के व्यवसाय को एक बार फिर ऊपर की ओर ले गए, क्योंकि जब उन्होंने बंगाली सिनेमा में कदम रखा था, तब वहां के फ़िल्म उद्योग की हालत खस्ता थी। ऐसे में उत्तम कुमार और सुचित्रा सेन के स्टारडम ने दर्शकों के बीच पहचान बनाई और बंगाली फ़िल्में फिर सफल होने लगीं।फ़िल्म 'अग्निपरीक्षा' से उत्तम कुमार और सुचित्रा सेन की जोड़ी सफल हुई थी। दोनों ने फ़िल्म में इस कदर डूब कर रोमांस किया कि कई लोग उन्हें पति-पत्नी मानने लगे।फ़िल्मी पर्दे पर जिस तरह से वे रोमांस करते थे, उस कारण आज भी कई लोग मानते हैं कि उत्तम कुमार और सुचित्रा सेन में प्रेम था। पर्दे पर दर्शक दोनों को खुशहाल जोड़ी के रूप में देखना पसंद करते थे। फ़िल्म 'शिल्पी' में उत्तम कुमार के किरदार की आखिर में मौत दिखाई गई और इस कारण फ़िल्म फ्लॉप हो गई थी। सुचित्रा और उत्तम कुमार बेहतरीन कलाकार थे। दोनों साथ काम करते तो उनका अभिनय और निखर जाता था। उन्होंने कई अलग-अलग भूमिकाएं अभिनीत कीं और अपने बेहतरीन अभिनय से यादगार बनाया। बिना कहे दोनों बहुत कुछ कह जाते थे और दोनों के रोमांटिक सीन में पर्दा जगमगाने लगता था। उन पर फ़िल्माए गए गीत सुपरहिट रहे। 

उत्तम कुमार का निधन 24 जुलाई , 1980 को पश्चिम बंगाल में हुआ। कोलकाता में हाजरा अंचल में उनके नाम पर 'उत्तम थियेटर' है तथा टालीगंज ट्रामडिपो के समक्ष उनका विशाल पुतला सड़क के चौक पर लगाया गया है। वर्ष 2009 में टालीगंज मेट्रो स्टेशन का नामकरण
'महानायक उत्तम कुमार' हो गया है। उत्तम कुमार के एकमात्र पुत्र गौतम कुमार चटर्जी (दिवंगत) एक व्यवसायी थे। फ़िल्मों में उनकी रुचि नहीं थी, लेकिन उत्तम के पौत्र गौरव ने बांग्ला फ़िल्मों में अभिनय किया। उनकी ख़्वाहिश थी कि अभिनय करते हुए उनका दम निकले और हुआ भी ऐसा ही।1980 में 'ओ गो बोधु शुंदरी' की शूटिंग के दौरान हृदयाघात से उनका निधन हो गया।

अमन धालीवाल (मानसा)

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*Ş₳ŦเŞ𝓱👸🏻◣🍁💜⃝🇱♥︎2*
अमन सिंह धालीवाल
 जन्म 24 जुलाई 1986
 एक अंतरराष्ट्रीय मॉडल से अभिनेता बने हैं, जो पंजाबी सिनेमा में काम करते हैं, जहां उन्हें एक्शन हीरो के रूप में जाना जाता है।
वह पंजाब के एक छोटे से ग्रामीण शहर, मनसा से ताल्लुक रखते हैं।
प्रत्येक भूमिका के साथ अपने बदलते लुक के लिए जाने जाने वाले, उन्होंने बिग ब्रदर (बॉलीवुड, 2007) जोधा अकबर
 (बॉलीवुड, 2008), कॉफी हाउस
 (बॉलीवुड, 2009), विरसा 
(पाकिस्तानी, 2010), इक कुड़ी पंजाब दी
 (पंजाबी सिनेमा, 2010), खलेजा 
(तेलुगु, 2010), इंडियन पुलिस 
(तेलुगु, 2011) और अज दे सहित बॉलीवुड, पॉलीवुड, पाकिस्तानी और तेलुगु फिल्मों में काम किया है। 
रांझे (रिलायंस प्रोडक्शन पंजाबी सिनेमा, 2012) लेदर लाइफ (पंजाबी हिंदी, अंग्रेजी)जट्ट बॉयज पुट्ट जट्टां दे "(पंजाबी) साका (शहीद) (पंजाबी, अंग्रेजी)
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पंजाबी अभिनेता अमन धालीवाल अमेरिका में चाकू से हुए हमले में गंभीर रूप से घायल हुए थे. यह हमला उस समय हुआ जब वह जिम में थे. इस घटना का सीसीटीवी फुटेज भी सामने आया है. हमले का कारण अभी तक पता नहीं चल सका है.

शनिवार, 22 जुलाई 2023

मोहन अगाशे

मोहन अगाशे
जन्म मोहन महादेव अगाशे 23 जुलाई 1947 भोर, बॉम्बे प्रेसिडेंसी, ब्रिटिश भारत
आवास पुणे
राष्ट्रीयता भारतीय
पेशा अभिनेता, मनोचिकित्सक
मोहन आगाशे का जन्म महाराष्ट्र के भोर में हुआ था। वह भोर में प्रारंभिक शिक्षा के बाद अपनी शिक्षा पूरी करने के लिए पुणे आ गए। मोहन आगाशे ने बीबी जे मेडिकल कॉलेज, पुणे से एमबीबीएस डिग्री के लिए अध्ययन किया। बाद में वह मनोचिकित्सा में स्नातकोत्तर पूरा करने के लिए कॉलेज वापस आए। उन्होंने डॉ डीएन नंदी के तहत प्रशिक्षण प्राप्त किया जोकि देश में सबसे अच्छे मनोचिकित्सकों में से एक माने जाते हैं। पुणे में अपने मेडिकल कॉलेज के वर्षों के दौरान, उन्हें उत्पल दत्त द्वारा नाटक-कला के सम्पर्क में आये और उन्हें उससे प्यार हो गया।
मोहन आगाशे ने बीजे मेडिकल कॉलेज और पुणे में ससून अस्पताल में मनोचिकित्सा के अध्यापक के रूप में कार्य किया। अपने मेडिकल कैरियर के अलावा, उन्होंने नैदानिक मनोविज्ञान और मनोविज्ञान के क्षेत्र में भी काम किया। आगाशे ने पुणे के सरकारी अस्पताल में काम करने का विकल्प चुनकर अपना प्रारंभिक करियर शुरू किया था। उन्हें सशस्त्र बल मेडिकल कॉलेज, पुणे में आयोजित भारतीय मनोवैज्ञानिक सोसाइटी के वार्षिक राष्ट्रीय सम्मेलन के लिए आयोजन समिति की बैठकों की अध्यक्षता करने का सम्मान मिला।

आगाशे, महाराष्ट्र मानसिक स्वास्थ्य संस्थान के संस्थापक निदेशक है। उनके पढ़ाये छात्र भारत, ब्रिटेन और संयुक्त राज्य अमेरिका में मनोचिकित्सक के रुप में प्रसिद्ध है।

1991 में पुणे इंस्टीट्यूट ऑफ मानसिक स्वास्थ्य की स्थापना में भी आगशे ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। पुणे, भारत में स्थित मानसिक स्वास्थ्य विज्ञान में एक राज्य स्तरीय प्रशिक्षण और अनुसंधान संस्थान है।

1993 के लातूर भूकंप के बाद भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद ने एक शोध परियोजना शुरू की थी, और आगाशे को घटना के मानसिक स्वास्थ्य प्रभाव को समझने के लिए प्रमुख जांचकर्ता नियुक्त किया गया था।

1998 में, मानसिक स्वास्थ्य शिक्षा और सेवा में सुधार करने के लिए आगाशे की परियोजना ने महाराष्ट्र सरकार द्वारा मानसिक शिक्षा पर एक नई नीति के गठन की शुरुआत की। उन्होंने मानसिक स्वास्थ्य शिक्षा और सेवा पर महाराष्ट्र सरकार के सलाहकार के रूप में भी कार्य किया है।

आगाशे वर्तमान में थकान और कमजोरियों के सांस्कृतिक विकारों पर एक भारत-यूएस संयुक्त परियोजना के लिए मुख्य जाँचकर्ता हैं।
अगाशे का अभिनय के प्रति प्यार ने उन्हें अपने व्यस्त कार्यक्रम से नाटक में काम करने के लिये समय निकाल्ने मे मदद की। उन्होंने नाटकों में काम करके अभिनय में अपने करियर की शुरूआत की। अप्रैल 1997 में उन्हें भारतीय फिल्म और टेलिविज़न संस्थान, पुणे का महानिदेशक भी बनाया गया था, हालांकि 2002 उन्होंने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया था।
अगाशे ने मुख्यत: मराठी और हिन्दी फ़िल्मो में काम किया है, इसके अलावा उन्होंने कुछ बंगाली, मलयाली और तमिल फ़िल्मों में भी अभिनय किया है।
पुरुस्कार
1990: पद्मश्री
1996: मनोनीत: फिल्मफेयर बेस्ट विलेन अवॉर्ड त्रिमुर्ती (फिल्म)
2002: ऑर्डर ऑफ मेरिट ऑफ द फेड्रल रिपब्लिक ऑफ जर्मनी
2004: गोएथे पदक

शुक्रवार, 21 जुलाई 2023

ध्वनि गोतम

ध्वनि गौतम 
🎂जन्म 22 जुलाई 1985
फिल्म निर्माता, निर्देशक और लेखक हैं जो मुख्य रूप से गुजराती फिल्म उद्योग और बॉलीवुड में काम करते हैं
धवानी गौतम का जन्म गुजरात में हुआ था । उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा द एशियन स्कूल से की है और मारवाह स्टूडियो नोएडा से फिल्म निर्माण में डिग्री हासिल की है । यह सब तब शुरू हुआ जब वह 13 साल के थे जब उन्होंने यश चोपड़ा की दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे देखी । तभी से उन्होंने फिल्म निर्देशक बनने का फैसला कर लिया। मध्यमवर्गीय परिवार से आने के कारण मनोरंजन उद्योग में करियर बनाना काफी कठिन था। शुरुआती दिनों में उन्होंने नई दिल्ली में रेडियो जॉकी के रूप में काम किया है । उनका संघर्ष तब शुरू हुआ जब वह अपना करियर बनाने के लिए मुंबई चले गए।
दिल्ली स्थित एक मध्यमवर्गीय परिवार से आने वाले गौतम ने कुछ समय के लिए आरजे बनने तक छोटी-छोटी नौकरियाँ कीं। बाद में वह मुंबई चले गये। उन्हें पारिवारिक नाटक, बा बहू और बेबी के लिए सहायक निर्देशक के रूप में नियुक्त किया गया था । बाद में उन्होंने तीन और धारावाहिकों के लिए काम किया। बाद में उन्होंने सनी देयोल अभिनीत हीरोज़ और बॉबी देयोल अभिनीत नन्हे जैसलमेर में काम किया । निर्देशन और लेखन में अनुभव हासिल करने के बाद, वह पंजाबी फिल्म उद्योग के लिए काम करने लगे।

2015 में, उन्होंने अपनी खुद की फिल्म रोमांस कॉम्प्लिकेटेड पर काम शुरू किया , जो उनके निर्देशन की पहली फिल्म थी। जो उनका ड्रीम प्रोजेक्ट था और यह गुजराती सिनेमा की पहली फिल्म थी जिसे विदेशों में शूट किया गया था।उस फिल्म से उन्होंने नकारात्मक किरदार भी निभाया है।ध्वनि गौतम ने रोमांस कॉम्प्लिकेटेड के लिए संगीत निर्देशक के रूप में भारत के रॉ स्टार विजेता दर्शन रावल पर भरोसा किया

उन्होंने 2018 में ग्रेट गुजराती कुकिंग कॉम्पिटिशन नामक कुकिंग शो के साथ टेलीविजन पर वापसी की।
2019 में वह फिर से मिस्टर डी शो - गेट फनी विद ध्वनि लेकर आए, जहां 60 से अधिक कलाकार जैसे मल्हार ठाकर , पार्थिव गोहिल , मानसी पारेख , पूजा झावेरी , रौनक कामदार और कई अन्य शो में आए। यह शो शेमारू एंटरटेनमेंट के ओटीटी प्लेटफॉर्म ShemarooMe पर प्रसारित हुआ।

2020 में महामारी की शुरुआत से पहले उन्होंने मल्हार ठाकर , अंशुल त्रिवेदी और रितु भगवानी के साथ केसरिया नाम से अपना एक ड्रीम प्रोजेक्ट शुरू किया है।अफवाह आई कि फंड की कमी के कारण फिल्म बंद हो गई है और ध्वनि गौतम ने इसका खंडन किया है।

लॉक डाउन के बाद उन्होंने परदेसिया नाम के गाने के लिए गीता रबारी के साथ स्वतंत्र गुजराती संगीत गीत की शूटिंग की है।  और वालमिया 2.0। उन्होंने शमा सिकंदर के साथ हवा करदा पंजाबी गीत नामक स्वतंत्र गीत का भी निर्देशन किया है । 2021 के अंत में उन्होंने भरत चावड़ा , पूजा जोशी और ओजस रावल के साथ "हूं तारी हीर" नाम से अपना ड्रीम प्रोजेक्ट शुरू किया । पूजा जोशी , अंशुल त्रिवेदी और पूजा झावेरी अभिनीत उनकी आगामी परियोजना "लव अतरंगी" बहुत जल्द फ्लोर पर आई।
1।  2014 द लास्ट डॉन
2।   2016 रोमांस जटिल
3।  2016 तू तो गायो
4।  2018 मेनका के साथ आधी रातें
5।  2019 ऑर्डर ऑर्डर आउट ऑफ ऑर्डर
6।  2020 गोलकेरी गुजराती
7।  2022 हूं तारी हीर
8।  2023 दयारो
9।  2023 शुभ सांझ
10।  2023 पटेल बनाम की कहानी पैट्रिक
11।2023 केसरिया
12। 2023 अतरंगी से प्यार है

सी वी श्रीधरचित्रमूर विजयरागवलु श्रीधरकृष्णन

सी वी श्रीधर
चित्रमूर विजयरागवलु श्रीधरकृष्णन
🎂22 जुलाई 1933चिथामुर, चेंगलपट्टू , मद्रास प्रेसीडेंसी , ब्रिटिश भारत
⚰️20 अक्टूबर 2008 (आयु 75 वर्ष)
चेन्नई

फ़िल्म निर्देशक,निर्माता,पटकथा लेखक
श्रीधर को नव-रस-निर्देशक के रूप में जाना जाता था, 

क्योंकि उन्होंने कॉमेडी काधलिका नेरामिलई से लेकर गंभीर कलई-कोविल और नेन्जिल या आलयम तक कई शैलियों में फिल्में बनाईं । बाद को हिंदी में राजेंद्र कुमार और मीना कुमारी के साथ दिल एक मंदिर के रूप में बनाया गया , जिसने उन्हें फिल्मफेयर पुरस्कार , सर्वश्रेष्ठ निर्देशक और सर्वश्रेष्ठ कहानी श्रेणियों में दो नामांकन दिलाए। उन्होंने टीआर रामचंद्रन , केए थंगावेलु और नागेश में सर्वश्रेष्ठ हास्य कलाकार सामने लाए और मूर्ति और निर्मला को व्यापक दर्शकों से परिचित कराने में मदद की।वेन्नीरा अदाई । मूर्ति, निर्मला, जो अब एक टीवी और फिल्म हास्य कलाकार हैं, को फिल्म में उनके प्रदर्शन से मिली प्रसिद्धि के बाद अभी भी वेनिरा अदाई मूर्ति के रूप में जाना जाता है। यहां तक ​​कि अभिनेत्रियों जयललिता और निर्मला को भी वेन्नीरा आदाईजयललिता और वेन्नीरा आदाई निर्मला कहा जाता था 

श्रीधर की काधलिका नेरामिलई तमिल फिल्म इतिहास की सबसे बड़ी ब्लॉकबस्टर फिल्मों में से एक थी । बाद में इसे अभिनेता किशोर कुमार और शशि कपूर ने ही हिंदी में बनाया। श्रीधर ने तमिल सिनेमा में कई मशहूर हस्तियों के करियर को लॉन्च करने में मदद की, जैसे कल्याण पेरिसु में सरोजा देवी, नेन्जिल या आलयम में आर. मुथुरमन और देविका , वेन्नीरा अदाई ( व्हाइट ड्रेस ) में श्रीकांत , जे. जयललिता , वेन्नीरा आदाई निर्मला और वेन्नीरा अदाई मूर्ति , रविचंद्रन , कंचना ।और काधलिका नेरामिल्लई में राजश्री , इलमई ओन्जल आदिगिराथु में कमल और रजनी, निनैवेल्लम निथ्या में कार्तिक और गीगी, थेंड्राले एन्नाई थोडु में जयश्री और थंथु विट्टेन एन्नाई में विक्रम ।

उनकी बॉलीवुड फिल्मों में नजराना (1961), दिल एक मंदिर (1963), प्यार किये जा (1966) और गहरी चाल (1973) शामिल हैं। राज कपूर , वैजयंती माला , उषा किरण और जेमिनी गणेशन की अतिथि भूमिका वाली फिल्म ' नजराना ' ने उन्हें सर्वश्रेष्ठ कहानी के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार दिलाया । ऐतिहासिक फिल्म 'नई रोशनी'हिंदी में उनके द्वारा निर्देशित इस फिल्म में अशोक कुमार, पी. भानुमती, माला सिन्हा, बिवाजीत और राजकुमार मुख्य भूमिका में थे और यह हिंदी में वर्ष 1967 की 7वीं सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म बन गई। इसके बाद, दादा मिरासी द्वारा निर्देशित इस फिल्म को तमिल में पूवम पोट्टम के नाम से बनाया गया।

शिवाजी गणेशन के साथ श्रीधर की फिल्मों में ऊटी वरई उरावु , नेन्जिरुक्कम वरई , सिवांथा मान शामिल हैं । सिवान्थमन तमिल की पहली रंगीन फिल्म थी जो विदेशी स्थानों पर फिल्माई गई थी। धरती , हिंदी संस्करण 1970 में राजेंद्र कुमार , वहीदा रहमान और शिवाजी गणेशन के साथ रिलीज़ हुई थी ।

1973 में जब वह अचानक वित्तीय समस्याओं से गुज़रे, तो राजेंद्र कुमार के आग्रह पर उन्होंने एमजी रामचंद्रन से संपर्क किया , जिन्होंने सुझाव दिया कि एक फिल्म बनाई जाए और इससे उनकी वित्तीय समस्याएं हल हो जाएंगी। इसके बाद श्रीधर ने उरीमाई कुरल बनाई जो 1974 में व्यावसायिक रूप से सफल रही और फिर उन्होंने मीनावा नानबन में एमजीआर का निर्देशन किया जो 1977 में रिलीज़ हुई थी।

1978 में, उन्होंने रोमांटिक फिल्म इलमाई ऊँजल आडुगिरथु के लिए कमल हसन, रजनीकांत, श्रीप्रिया को एक साथ लाया। फिर उन्होंने इसे 1982 में हिंदी में दिल-ए-नादान के रूप में बनाया, जिसमें राजेश खन्ना , शत्रुघ्न सिन्हा और जया प्रदा ने मुख्य भूमिकाएँ निभाईं। दोनों संस्करण सफल रहे.

अपनी सभी फिल्मों में उन्होंने सितारों, मेलोड्रामा और मधुर गीतों का संयोजन किया। उन्होंने तमिल , हिंदी और तेलुगु में फिल्मों का निर्देशन किया है । श्रीधर को गीत चित्रण में विशेषज्ञ माना जाता था क्योंकि वह किसी भी गीत को कविता में बदल सकते थे। श्रीधर- कन्नदासन - एमएस विश्वनाथन के जबरदस्त संयोजन ने दर्शकों पर जादू कर दिया और गानों ने उन फिल्मों की जबरदस्त सफलता में योगदान दिया। बाद में उन्होंने संगीत के लिए उस्ताद इलियाराजा की ओर रुख किया और इलियाराजा के संगीत वाली उनकी सभी फिल्में अपने गीतों के लिए जानी गईं

सुमित्रा देवी

सुमित्रा देवी 
🎂22 जुलाई 1923
  ⚰️28 अगस्त 1990
एक भारतीय अभिनेत्री थीं, जिन्हें 1940 और 1950 के दशक के दौरान हिंदी के साथ-साथ बंगाली सिनेमा में उनके काम के लिए पहचाना जाता है।
उन्हें दादा गुंजल द्वारा निर्देशित 1952 की हिंदी फिल्म ममता में उनकी भूमिका के लिए सबसे ज्यादा याद किया जाता है।
वह दो बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के लिए बीएफजेए पुरस्कार की प्राप्तकर्ता थीं।
वह अपने समय की उत्कृष्ट सुंदरियों में से एक थीं और प्रदीप कुमार और उत्तम कुमार जैसे दिग्गजों द्वारा उन्हें अपने समय की सबसे खूबसूरत महिला माना जाता था। सुमित्रा देवी का जन्म 1923 में पश्चिम बंगाल के बीरभूम के शिउरी में एक अमीर ब्राह्मण परिवार में हुआ था।
अपनी किशोरावस्था में, वह दिग्गज अभिनेत्री कानन देवी की सुंदरता और कद से बेहद प्रभावित थीं और एक अभिनेत्री बनने की ख्वाहिश रखती थीं।
1943 में उन्हें न्यू थिएटर्स के कार्यालय में एक साक्षात्कार और लुक टेस्ट के लिए बुलाया गया और अंततः उन्हें के के सामने कास्ट किया गया।
एल
हेमचंदर चंदर की 'मेरी बहन' (1944) में सहगल।
इस फिल्म के निर्माण के दौरान उन्हें अपूर्व मित्रा की बंगाली फिल्म संधि (1944) में मुख्य भूमिका निभाने की पेशकश की गई, जो उनकी पहली फिल्म थी।
फिल्म ने जबरदस्त सफलता हासिल की और उन्हें 1945 में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का बीएफजेए पुरस्कार मिला।
1940 के दशक के अंत में उन्होंने वसीयतनामा (1945), भाई दूज (1947), ऊंची नीच (1948) और विजय यात्रा (1948) जैसी फिल्मों में भूमिकाओं के साथ खुद को बॉलीवुड की एक अग्रणी अभिनेत्री के रूप में स्थापित किया।
गुंजल की फिल्म ममता (1952) में एकल माँ की भूमिका के लिए उनकी सराहना की गई।
फ़िल्मज़ैक ने लिखा, "उसने अपनी भूमिका को जीवंत बनाने के लिए अपनी सभी शानदार विशेषताओं में हेरफेर किया; उसकी शांति, उसकी कोमलता, दर्द और पीड़ा और सभी को एक में समाहित कर दिया गया।" उन्हें दीवाना (1952), घुंघरू (1952), मयूरपंख (1954), चोर बाजार (1954) और जागते रहो (1956) जैसी फिल्मों में उनकी भूमिका के लिए सराहा गया। उन्होंने अभिजोग (1947), पाथेर डाबी (1947), प्रतिबाद (1948), जॉयजात्रा (1948), स्वामी (1949), देवी चौधुरानी जैसी फिल्मों के साथ बंगाली सिनेमा में भी अपना करियर बनाए रखा। (1949), समर (1950), दस्यु मोहन (1955)।
कार्तिक चट्टोपाध्याय की क्लासिक क्लासिक साहेब बीबी गोलम (1956) में एक जमींदार की खूबसूरत शराबी पत्नी की भूमिका के लिए उन्हें आदर्श माना गया है, जो बिमल मित्रा के इसी नाम के क्लासिक उपन्यास का रूपांतरण है।
हरिदास भट्टाचार्य की राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता बंगाली फिल्म 'आंधारे आलो' (1957) में शोकग्रस्त दिल वाली एक बदसूरत लड़की बिजली के उनके चित्रण को जबरदस्त आलोचनात्मक प्रतिक्रिया मिली।
उन्होंने एकदिन रात्रे (1956), निलाचले महाप्रभु (1957), जौटुक (1958) और किनू गोवालर गली (1964) जैसी बंगाली फिल्मों में अपनी भूमिकाओं के लिए प्रशंसा हासिल की।
पचास के दशक के अंत में, उन्हें भारत से एक प्रतिनिधि के रूप में चीन में एशियाई फिल्म महोत्सव में आमंत्रित किया गया था।

मजहर खान

मजहर खान (अभिनेता, जन्म 1955), जन्म तिथि, जन्म स्थान, मृत्यु तिथि
🎂जन्मतिथि: 22-जुलाई -1955
जन्म स्थान: मुंबई, महाराष्ट्र, भारत
⚰️मृत्यु तिथि: 16 सितम्बर 1998
मजहर खान (मृत्यु: 16 सितंबर 1998) एक भारतीय फिल्म और टेलीविजन अभिनेता, निर्माता और निर्देशक थे।
खान ने फिल्म संपर्क (1979) से अपनी शुरुआत की, जिसमें उन्होंने बृंदावन की भूमिका निभाई, लेकिन उन्हें शान (1980) में अब्दुल की सड़क पर भिखारी की भूमिका के लिए अधिक सराहना मिली।
उन्होंने फिल्म बॉम्बे फैंटेसी (1983) के साथ एक निर्माता के रूप में अपनी शुरुआत की, और 1998 में खान की मृत्यु के बाद रिलीज़ हुई फिल्म गैंग (2000) के साथ अपने निर्देशन की शुरुआत की।
मजहर ने 1979 में फिल्म संपर्क से डेब्यू किया था । उन्हें 1980 की फिल्म शान से पहचान मिली , जिसका निर्देशन रमेश सिप्पी ने किया था और इसमें सह-कलाकार अमिताभ बच्चन और शशि कपूर थे । फिल्म का गाना "नाम अब्दुल है मेरा" खान पर फिल्माया गया और लोकप्रिय हो गया। 1980 और 1990 के दशक की शुरुआत में उन्होंने 40 से अधिक हिंदी फिल्मों में खलनायक और सहायक भूमिकाएँ निभाईं। वह टर्मिनल एंट्री (1987) नामक हॉलीवुड साइंस फिक्शन फिल्म में भी दिखाई दिए , जहां उन्होंने मुख्य खलनायक में से एक की भूमिका निभाई। 1984 में उन्होंने माधुरी दीक्षित के साथ टेलीविजन धारावाहिक "बॉम्बे मेरी जान" में भी अभिनय कियालेकिन प्रभावशाली स्टारकास्ट न होने के कारण उस सीरियल को दूरदर्शन ने रिजेक्ट कर दिया था। उन्हें टेलीविजन धारावाहिक बुनियाद (1987) में उनकी भूमिका के लिए भी जाना गया, जिसने उन्हें निर्देशक रमेश सिप्पी के साथ फिर से जोड़ा। 1989 में उन्होंने ब्रिटिश मिनी-सीरीज़ ट्रैफिक में अभिनय किया ।

उनकी आखिरी फिल्म 1992 की फिल्म अंगार में थी जिसके बाद उन्होंने अभिनय छोड़ दिया। उन्होंने मल्टी-स्टारर फिल्म गैंग का निर्माण और निर्देशन करना शुरू कर दिया, जिसका निर्माण 1990 में शुरू हुआ और कई वर्षों तक विलंबित रहा। यह फिल्म उनकी मृत्यु के दो साल बाद रिलीज़ हुई थी।
खान की शादी दिलीप कुमार की भतीजी रुबैना से हुई थी, जिनसे उन्हें एक बेटा है। उनसे अलग होने के बाद उन्होंने अभिनेत्री जीनत अमान से शादी की , जिनसे उन्हें दो बेटे हुए। 16 सितंबर 1998 को मज़हर की किडनी फेल होने से मृत्यु हो गई ।
1979 संपर्क बृंदावन बिहारीलाल 
1980 शान अब्दुल 
1981 धनवान ट्रक चालक 
रूही विजय 
दर्द अजीत सक्सैना 
एक ही भूल 
1982 हाथकड़ी रॉबर्ट 
अर्थ नफरत 
मैंने जीना सीख लिया सूरज 
1983 कालका कामू 
1984 धर्म और क़ानून भुर्रे 
बिंदिया चमकेगी राकेश 
सोहनी महिवाल राशिद 
इच्छित नथिया 
1985 भवानी जंक्शन राकेश (रिकी) 
शिव का इन्साफ रहीम 
गुलामी ठाकुर जसवन्त सिंह 
आँधी-तूफ़ान बलबीर का गुर्गा 
बेपनाह जैक 
रहेम दिल जल्लाद 
मुझे कसम है मंगल सिंह 
1986 नफरत अजय 
1987 टर्मिनल प्रवेश अब्दुल 
बुनियाद रोशनलाल 
रात के अँधेरे मैं 
डाक बंगला 
1988 एक नया रिश्ता संजय कुमार 
1989 यातायात 
1990 एक नंबर का चोर एसीपी विशाल 
1992 अंगार फरीद खान 
2000 गिरोह

एडविना लियोन

पूर्व नृत्यांगना, जो आज 77 वर्ष की हो गई हैं, ने पिछले साल हमसे अपने अब के जीवन के बारे में बात की थी और एक विशेष बातचीत में हिंदी फिल्मों के सुनहरे युग को याद किया था।

नृत्यांगना एडविना वायलेट, नी ल्योंस को देखकर, आपको विश्वास नहीं होगा कि वह सत्तर के दशक के आसपास की है। एडविना 1950 से 1970 के दशक तक हिंदी फिल्म दृश्यों में एक नर्तकी के रूप में दिखाई दीं।

अब भी, वह अपनी ऊर्जा में युवा हैं और उनकी धूप भरी मुस्कान वसई के पास नायगांव में उनके घर में हमारा स्वागत करती है। हमने पिछले साल एडविना से मुलाकात की थी जब वह यूके से भारत का दौरा कर रही थी जहां वह 1960 के दशक से रह रही है।

बहुत हंसी के बीच हुई बातचीत में, पूर्व नर्तक और सामयिक अभिनेत्री ने खुलासा किया कि कैसे उन्हें कम उम्र से ही नृत्य और संगीत पसंद था, उन्होंने पृष्ठभूमि नर्तक के रूप में फिल्मों में अपने प्रवेश को याद किया, और बताया कि कैसे अभिनेता शम्मी कपूर सेवानिवृत्त होने के बाद भी संपर्क में रहे।

एडविना लगभग चार दशकों से किसी फिल्मी गाने में नजर नहीं आई हैं, लेकिन इंटरनेट पर उनके प्रशंसक बहुतायत में हैं। उसका यूट्यूब पर एक चैनल है, द एडविना चैनल, जिसमें वह गाने पेश करता है (ज्यादातर बिना श्रेय के)। और 2015 में, अमेरिका के भौतिकी के एक सेवानिवृत्त प्रोफेसर सुरजीत सिंह ने उन पर एक किताब लिखी, एडविना: एन अनसंग बॉलीवुड डांसर ऑफ द गोल्डन एरा।

फिल्मों और नृत्य में आने का अवसर उनके भाई टेड लियोन्स के माध्यम से आया, जो खुद फिल्मों में एक नर्तक थे। एक युवा लड़की के रूप में, एडविना को संगीत और नृत्य पसंद था लेकिन उन्होंने कभी नृत्य की कोई शिक्षा नहीं ली।

उनके आधे अंग्रेज, आधे आयरिश पिता जॉन, जिनकी मुलाकात उनकी मां एलिजाबेथ से इराक में हुई थी, ब्रिटिश सेना में थे। एक कीटनाशक कंपनी में अपनी नौकरी के दौरान बीमार पड़ने के बाद वह सेवानिवृत्त हो गए। एडविना और उनके भाई-बहनों ने कम उम्र में ही काम करना शुरू कर दिया था। उसकी बहनों आइरीन और फिलोमेना ने उसे ऑफिस में नौकरी दिलाने की कोशिश की, लेकिन उसे इसमें कोई दिलचस्पी नहीं थी।

एडविना याद करती हैं, "जब मैंने काम करना शुरू किया था तब मैं 16 साल की थी। मैंने वर्ली में ग्लैक्सो [प्रयोगशालाओं] के लिए काम किया था। मैंने झूठ बोला और कहा कि मैं 18 साल का हूं, क्योंकि आप 18 साल के होने से पहले काम नहीं कर सकते। लेकिन उन्हें तीन महीने बाद पता चला और उन्होंने मुझे बाहर निकाल दिया।

ग्लैक्सो वह जगह थी जहां उसकी मुलाकात उस आदमी से हुई जो उसका पति बनने वाला था। उन्होंने हंसते हुए कहा, "मैं अपने जन्मदिन पर शामिल हुई, काफी मजेदार है, और वह 29 जुलाई को शामिल हुए और मैं अपने वाटरलू से मिली।"

जब एडविना ने अपनी ऑफिस की नौकरी खो दी, तो उन्होंने फिल्म लाइन में जाने का फैसला किया। उन्होंने पूनम (1952) और लाइटहाउस (1958) जैसी फिल्मों से नृत्य करना शुरू किया। समय के साथ, वह दिल देके देखो (1959), लव इन शिमला (1960), जंगली (1961) और चाइना टाउन (1962) जैसी हिट फिल्मों का हिस्सा रहीं।

“मैंने सोचा कि यह बहुत उबाऊ था - टाइपिंग और सब कुछ। मैं कुछ और करना चाहती थी,'' उन्होंने कहा, ''तब तक मेरा भाई भी फिल्म लाइन में शामिल हो गया था, लेकिन वह शूटिंग के लिए इंडस्ट्री में विदेशियों को सप्लाई कर रहा था। वे तब विदेशी चाहते थे। एक बार जब वह इसमें शामिल हो गए, तो उन्होंने काम करना शुरू कर दिया, फिर मेरी बहन मैरी ने हाई स्कूल की पढ़ाई पूरी की और फिल्म लाइन में चली गईं। और तभी मैंने सोचा, 'ठीक है, अब यही मेरा मौका है'।"

इसके अलावा, उन्होंने कहा, वह खुश थीं कि वह अभिनय में नहीं आईं क्योंकि, जैसा कि उन्होंने खुद स्वीकार किया था, वह एक अच्छी अभिनेत्री नहीं थीं। एडविना को याद आया कि सभी नर्तक एक बड़े खुशहाल परिवार की तरह थे। “हम अपना लंच ब्रेक लेते थे और सेट पर जाते थे, थोड़ा जैम सेशन करते थे, मेकअप रूम में जाते थे, कार्ड खेलते थे (फ्लश, रम्मी), खुशमिजाज लोग, हम सभी! मुझे याद है कि मैंने उनमें से बहुतों को अपना भाई कहा था।”

उन्होंने कहा, कभी-कभी पुराने नंबर दोबारा देखने पर थोड़ा दुख होता है। “जब मैं [गाने] देखता हूं, तो मेरी आंखों में आंसू आ जाते हैं। हर कोई बहुत करीब था. वे दिन हमेशा के लिए चले गए,'' उसने कहा।

सभी नर्तक पेशेवर थे और एडविना ने कहा कि आमतौर पर सितारे ही सेट पर गलतियाँ करते थे। वे सभी केवल तीसरी मंजिल (1966) जैसे बड़े गाने के दृश्यों के लिए अभ्यास करते थे। अधिकांश समय, वे बस अपना काम करते रहे। उनके द्वारा फिल्माए गए गानों में से, उन्हें दिल अपना और प्रीत पराई (1960), तेरे घर के सामने (1963), और तीसरी मंजिल (1966) के गाने बहुत याद हैं। उन्होंने 'अजीब दास्तां है ये' का अचानक प्रस्तुतीकरण किया।

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❤️हिन्दी फिल्मों की बैकग्राउंड डांसर एडविना वॉयलेट के जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनाएं

एडविना वायलेट का जन्म एडविना लियोन के रूप में जॉन और कैथरीन लियोन के घर 22 जुलाई, 1941 को बॉम्बे में हुआ था।  उनकी शिक्षा भायखला, बॉम्बे और पूना में कॉन्वेंट ऑफ जीसस एंड मैरी में हुई थी।  उनके भाई टेरेंस, नेविल और बहन मैरी पहले से ही फिल्मों में काम कर रहे थे, उन्होंने उनका अनुसरण करने का फैसला किया।  उन्होंने 1957 से 1967 तक मुख्य रूप से हिंदी फिल्मों में बैकग्राउंड डांसर के रूप में काम किया।

उन्होंने पूनम (1952) और लाइटहाउस (1958) जैसी फिल्मों से नृत्य करना शुरू किया।  समय के साथ, वह दिल देके देखो (1959), लव इन शिमला (1960), जंगली (1961) और चाइना टाउन (1962) उस्तादों के उस्ताद (1963), वल्लाह क्या बात है (1962) और दो उस्ताद (1959) जैसी फिल्मों में डांसर की भूमिका निभाई

कभी-कभी पुराने गीतों को फिर से देखते हुए, उन्होंने कहा, थोड़ा उदास हो जाती हूँ "जब मैं गाने देखती हूं, तो मेरी आंखों में आंसू आ जाते हैं।  सब इतने करीब थे।  वे दिन हमेशा के लिए चले गए, 
उन्होंने कहा नर्तक सभी पेशेवर थे और एडविना ने कहा कि आमतौर पर सितारे ही सेट पर गलतियाँ करते थे।  वे सभी केवल तीसरी मंजिल (1966) जैसे बड़े गाने के दृश्यों के लिए ही पूर्वाभ्यास करते थे।  ज्यादातर समय, उन्होंने सिर्फ अपना काम किया।  उनके द्वारा फिल्माए गए गानों में से, वह दिल अपना और प्रीत पराई (1960), तेरे घर के सामने (1963), और तीसरी मंजिल (1966) के गानों को याद करती हैं। वह अजीब दास्तान है ये' जैसे गानों का हिस्सा बनी

फिल्म उद्योग में अपने लगभग दो दशक के करियर में, एडविना ने देव आनंद से लेकर शशि कपूर तक ए-लिस्ट सितारों के साथ नृत्य किया।  संयोग से, उन्होंने तीनों कपूर भाइयों - राज, शम्मी और शशि के साथ काम किया दोनों के फिल्मों में काम करना बंद करने के बाद भी शम्मी संपर्क में रहे।

उन्होंने बताया कि मैंने शम्मी को ईमेल पर लिखा उन्होंने  कहा कि वह एक शादी के लिए इंग्लैंड आ रहे है और उन्होंने मेरा टेलीफोन नंबर लिया और कहा, 'जब मैं वहां पहुंचूंगा, तो मैं तुम्हें फोन करूंगा।'

मैंने कहा, 'क्या मैं आपको याद हूँ ' शम्मी कपूर ने कहा, 'मैं तुम्हें कैसे भूल सकता हूँ, पोनीटेल वाली छोटी लड़की?' (हंसते हुए) अंत में, हम अपने पति के साथ मालाबार हिल में उनके घर गए  मैं उनकी पत्नी नीला देवी से भी मिली

एडविना अब भी हिंदी फिल्में देखती हैं और अगली पीढ़ी के सितारों को पसंद करती हैं, खासकर शाहरुख खान और रानी मुखर्जी को।

वास्तव में, मुझे लगता है कि वे प्यारी, कितनी आधुनिक और कितनी खूबसूरत लड़कियां हैं, क्या फिगर है उन सभी नये कलाकारों का " उन्होंने कहा"लेकिन जहां तक कहानी का सवाल है, मैं पुराने फिल्मों को पसंद करती हूं।  मैं पुराने दिनों को नहीं भूल सकती  लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मैं युवाओं की सराहना नहीं करती  वे सुंदर हैं और हां, मैं उनका आनंद लेती हूं।"

उन्होंने 26 नवंबर, 1960 को कीथ वायलेट से शादी की। वे 60 के दशक में यूके चले गए और तब से वहीं रह रहे हैं।  कई नौकरियों में काम करने के बाद, वह लंदन के सेंट पैनक्रास अस्पताल में वित्त अधिकारी के रूप में सेवानिवृत्त हुईं।
वह हर्टफोर्डशायर में रहती है और अपने बच्चों और पोते-पोतियों की संगति का आनंद लेती है।  वह फेसबुक पर सक्रिय है और उसके हजारों दोस्त और अनुयायी हैं।
बेक ग्राउंड नृतक 1952,से 1968 तक

गुरुवार, 20 जुलाई 2023

सावनी रविंद्र

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               सावनी रविंद्र 
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             🎂जन्म: २२ जुलाई १९८९, पुणे, महाराष्ट्र, भारत
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भारतीय संगीतसृष्टी,विशेषतःमराठी संगीतक्षेत्र,की नामवंत गायिका है। "होणार सून मी या घरची" इस लोकप्रिय धारावाहिक मे गाये हुये "तू मला,मी तुला गुणगुणू लागलो पांघरु लागलो सावरू लागलो " इस गीत की वजह से उनकी आवाज घरघर मे पहुच चुकी है। इस गाने ने चाहताओ के दिल जीत लिये है। 'होनार सून मी ह्या घरची'इस धारावाहिक के 'नाही कळले कधी', 'तुझे माझे गाव', 'तुझ्यासवे' ये तीन गाने सावनीजी के नाम पर है। इसी धारावाहिक मे गाये हुये गीत 'तुझ्यासवे' के सोलो व्हर्जन के साथ एक व्हिडीओ प्रसिद्ध हुआ है,इस व्हिडीओ मे सावनीजीने नायिका आणि गायिका की दोहरी भूमिका निभाई है। कोकनी भाषा मे भी उन्होने गाने गाये है। अभी अभी उन्होने तमिल गायन क्षेत्र मे प्रवेश किया है। अबतक उन्होने चार तमिल गाने गाये है। २०११ मे संपन्न हुये "आयडीया सा रे ग म पा" कार्यक्रम के अंतिम पाच स्पर्धको मे सावनीजी का समावेश था। 
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सावनी को असंख्य पुरस्कारो से सन्मानित किया गया है। इन मे बालकलाकारो को दिये जानेवाले शाहू मोडक पुरस्कार, मोरया फ़ाऊंडेशन तर्फ़े मोरया गोसावी पुरस्कार आणि रतिलाल भावसार पुरस्कार,अजितदादा पवार फ़ाऊंडेशन पुरस्कार इन पुरस्कारो का समावेश है।
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अरमान मलिक

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अरमान मलिक
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🎂जन्म : 22 जुलाई 1995मुम्बई
भाई: अमाल मलिक
माता-पिता: डब्बू, ज्योति
अरमान मलिक एक भारतीय गायक हैं। यह सा रे गा मा पा लिटिल चेम्प्स में सार्वजनिक मतों के अनुसार आठवें स्थान पर रहे। यह गायक और संगीत निर्देशक डबू मलिक के बेटे और गीतकार अमाल मलिक के भाई हैं। वर्तमान में यह कलाकार अपने गानों की वजह से सुप्रसिद्ध है। 

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अरमान मलिक (जन्म 22 जुलाई 1995) एक भारतीय गायक, गीतकार, रिकॉर्ड निर्माता, वॉयस-ओवर, कलाकार और अभिनेता हैं। वह हिंदी, तेलुगु, अंग्रेजी, बंगाली, कन्नड़, मराठी, तमिल, गुजराती, पंजाबी, उर्दू और मलयालम सहित कई भाषाओं में अपने गायन के लिए जाने जाते हैं। 2006 में, उन्होंने सारेगामापा लिटिल चैंप्स में हिस्सा लिया लेकिन 8वें स्थान पर रहकर बाहर हो गए। वह संगीतकार अमाल मलिक के भाई हैं । पहले यूनिवर्सल म्यूजिक इंडिया और टी-सीरीज़ द्वारा प्रतिनिधित्व किया गया था , अब उनका प्रतिनिधित्व अरिस्टा रिकॉर्ड्स द्वारा किया जाता है । साझेदारी में ऑलवेज म्यूजिक ग्लोबल नाम से उनका अपना रिकॉर्ड लेबल हैवार्नर म्यूजिक इंडिया । उनकी पहली ऑन-स्क्रीन उपस्थिति 2011 में फिल्म कच्चा लिंबू में थी ।

maanyta

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🎂जन्म : 22 जुलाई 1978

●▬दिलनवाज़ शेख भारतीय उद्यमी हैं जिन्हें मान्यता दत्त या केवल मान्यता के नाम से भी जाना जाता है। वो पूर्व अभिनेत्री और संजय दत्त प्रोडक्शंस के वर्तमान सीईओ हैं। उन्होंने २००८ में बॉलीवुड अभिनेता संजय दत्त से शादी की। वो प्रकाश झा की 2003 की हिट गंगाजल में अपने आइटम नंबर के लिए सबसे ज्यादा जानी जाती हैं।
जन्म की तारीख और समय: 22 जुलाई 1978  मुम्बई
पति: संजय दत्त ( 2008)
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मान्यता दत्त का जन्म 22 जुलाई 1978 को एक मुस्लिम परिवार में हुआ था ;  मुंबई में ।उनका पालन-पोषण दुबई में हुआ । फिल्म इंडस्ट्री में उन्हें सारा खान के नाम से जाना जाता था। 2008 में कमाल राशिद खान की देशद्रोही में लॉन्च होने के बाद , उन्हें झा द्वारा स्क्रीन नाम "मान्यता" दिया गया था, लेकिन स्टार बनने की उनकी आकांक्षाएं तब समाप्त हो गईं जब उनके पिता की मृत्यु हो गई, जिससे पारिवारिक व्यवसाय की जिम्मेदारी उन पर आ गई।

उन्होंने 7 फरवरी 2008 को गोवा में एक निजी शादी में संजय दत्त से शादी की । दो साल बाद वह 21 अक्टूबर 2010 को जुड़वां बच्चों की मां बनीं, एक लड़के का नाम शहरान और एक लड़की का नाम इकरा था।
अपनी शादी से पहले और दत्त से मिलने से पहले, मान्यता ने अभिनेता निमित वैष्णव के साथ लवर्स लाइक अस जैसी हिंदी फिल्मों में काम किया था। फिल्म के अधिकार बाद में संजय दत्त ने रुपये में खरीद लिये। 20 लाख.me

प्रसिद्ध अभिनेता शिवाजी गणेशन की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि


जन्म🎂01अक्तूबर 1927
मृत्यु ⚰️21 जुलाई 2001
विल्लुपुरम चिन्नैयापिल्लई गणेशन  मुख्य रूप से शिवाजी गणेशन के नाम से प्रसिद्ध हैं। तमिल सिनेमा की प्रमुख हस्तियों में से एक शिवाजी गणेशन संवाद अदायगी से दर्शकों को मुग्ध कर देने वाले सुपरस्टार थे। शिवाजी गणेशन ने रंगमंच के साथ-साथ फ़िल्मों में भी अपने अभिनय से दर्शकों का मन मोह लिया। वहीं बाद की पीढ़ी के अभिनेताओं को भी अपनी अभिनय शैली से प्रेरित किया। दक्षिण भारत के कई सितारों ने स्वीकार किया है कि उनकी अभिनय शैली शिवाजी गणेशन से प्रभावित थी। शिवाजी गणेशन का मूल नाम विल्लुपुरम चिन्नैयापिल्लई गणेशन था और उन्होंने सी. एन. अन्नादुराई द्वारा लिखित,' शिवाजी कांड हिन्दू राज्यम' नाटक में छत्रपति शिवाजी की भूमिका निभायी। इस नाटक में उनके अभिनय की काफ़ी सराहना हुई और उन्हें 'शिवाजी गणेशन' का नाम मिल गया।  

जीवन_परिचय

1 अक्तूबर 1927 को पैदा हुए शिवाजी गणेशन का फ़िल्मों में प्रवेश 1952 में हुआ और 'पराशक्ति' उनकी पहली फ़िल्म थी। दर्शकों ने उन्हें हाथों-हाथ लिया और उनकी अभिनय शैली ख़ासकर संवाद अदायगी से मुग्ध हो गए। 1954 में प्रदर्शित उनकी फ़िल्म 'अंधानाल' तमिल सिनेमा की दिशा तय करने वाली साबित हुई। इसमें एक ओर कोई गाना नहीं था वहीं गणेशन एंटी हीरो की भूमिका में थे। बचपन से ही उनकी याददाश्त काफ़ी अच्छी थी और वह लंबे-लंबे संवाद बिना किसी मदद के दर्शकों के सामने बखूबी पेशकर देते थे। दर्शक उनकी इस अदा से भाव विभोर हो जाते थे बाद में जब वह बड़े पर्दे की दुनिया में आ गए तो यहां भी उन्हें इस प्रतिभा का काफ़ी फायदा हुआ और उनका यह अंदाज़विशेष रूप से लोकप्रिय हुआ।

फ़िल्मी_सफर

शिवाजी गणेशन ने अपने क़रीब पांच दशक के लंबे फ़िल्मी सफर में लगभग 300 फ़िल्मों में काम किया। उन्होंने तमिल के अलावा तेलुगू, कन्नड़, मलयालम और हिंदी फ़िल्मों में भी काम किया। 1970 में प्रदर्शित हिंदी फ़िल्म 'धरती' में भी उन्होंने अभिनय किया। यह फ़िल्म उनकी मूल फ़िल्म 'सिवांध मान' की रीमेक थी। उनकी कई फ़िल्मों का रीमेक अन्य भाषाओं में भी हुआ। ऐसी ही एक फ़िल्म नवरातिरि थी जिसमें उन्होंने नौ किरदार निभाए थे। बाद में हिंदी में इसी आधार पर 'नया दिन नयी रात' फ़िल्म बनी जिसमें संजीव कुमार ने नौ भूमिकाएँ की थी। उनकी फ़िल्मों का सिंघली भाषा में भी रीमेक हुआ है।

राजनीति_में

शिवाजी गणेशन अपने फ़िल्मी सफर में व्यावसायिक, पौराणिक और प्रयोगधर्मी फ़िल्मों के बीच संतुलन स्थापित करने में काफ़ी हद तक कामयाब रहे। बाद में वह राजनीति में भी आए और द्रमुक से जुड़ गए। लेकिन द्रमुक के साथ उनका सफर लंबा नहीं चला और वह कांग्रेस समर्थक हो गए। उन्हें राज्यसभा के लिए भी चुना गया। उन्होंने अपनी एक पार्टी भी बनायी थी।  

सम्मान_और_पुरस्कार

शिवाजी गणेशन को दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित होने के अलावा दो बार राष्ट्रीय पुरस्कारों से भी नवाजा गया था। इनको भारत सरकार द्वारा सन 1984 में कला के क्षेत्र में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था

निधन

तमिल फ़िल्मों के सुपरस्टार शिवाजी गणेशन का 21 जुलाई 2001 को 74 साल की उम्र में निधन हो गया।

मुकेश

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🎂जन्म : 22 जुलाई 1923, दिल्ली
⚰️: 27 अगस्त 1976, डेट्रायट, मिशिगन, संयुक्त राज्य अमेरिका
पत्नी: सरला (विवा. 1946–1976)
बच्चे: नितिन मुकेश, मोहनीश, नम्रता, नलिनी, रीता
पोता या नाती: नील नितिन मुकेश
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मुकेश चंद माथुर जुलाई २२, १९२३, दिल्ली, भारत - अगस्त २७, १९७६, लोकप्रिय तौर पर सिर्फ मुकेश के नाम से जाने वाले, हिन्दी सिनेमा के एक प्रमुख पार्श्व गायक थे। मुकेश की आवाज बहुत मधुर थी लेकिन उनके एक दूर के संबंधी मोतीलाल ने उन्हें तब पहचाना जब उन्होंने उसे अपनी बहन की शादी में गाते हुए सुना।
↔️मुकेश हिंदू भगवान शिव का एक विशेषण है, और इसका शाब्दिक अर्थ है "मुका दानव का विजेता"। इसका अर्थ 3 लोकों, स्वर्ग, नर्क और पृथ्वी के देवता भी हैं, जो बदले में हिंदू भगवान शिव का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह आमतौर पर भारत में पुरुष प्रदत्त नाम के रूप में उपयोग किया जाता है। मुकेश नाम वाले लोगों में शामिल हैं: मुकेश (गायक) (1923-1976), 1940-1970 के दशक के हिंदी सिनेमा के भारतीय पार्श्व गायक मुकेश (अभिनेता) (जन्म 1956), भारतीय फिल्म अभिनेता और निर्माता मुकेश अंबानी (जन्म 1957), रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक मुकेश बत्रा (जन्म 1951), होम्योपैथी व्यवसायी मुकेश भट्ट (जन्म 1952), भारतीय फिल्म निर्माता मुकेश छाबड़ा, बॉलीवुड में कास्टिंग निर्देशक मुकेश चौधरी (क्रिकेटर) मुकेश चौधरी (राजनेता) मुकेश देसाई, भारतीय क्रिकेटर जो गुजरात के लिए खेले मुकेश गौड़ (जन्म 1959), भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से संबंधित भारतीय राजनीतिज्ञ मुकेश हाइकरवाल (जन्म 1960), जनरल प्रैक्टिशनर और ऑस्ट्रेलियन मेडिकल एसोसिएशन के पूर्व संघीय अध्यक्ष मुकेश जगतियानी (जन्म 1952), दुबई स्थित भारतीय व्यवसायी, लैंडमार्क इंटरनेशनल ग्रुप के अध्यक्ष मुकेश कपिला (जन्म 1958), ब्रिटिश सिविल सेवक और संयुक्त राष्ट्र के अधिकारी मुकेश खन्ना (जन्म 1958), भारतीय टेलीविजन और फिल्म अभिनेता मुकेश कुमार (फील्ड हॉकी) (जन्म 1970), भारतीय फील्ड हॉकी खिलाड़ी मुकेश कुमार (गोल्फर) (जन्म 1965), भारतीय गोल्फर मुकेश कुमार (क्रिकेटर) ) (1993), भारतीय क्रिकेट खिलाड़ी मुकेश कुमार चावला (जन्म 1974), पाकिस्तानी राजनीतिज्ञ मुकेश नरूला (जन्म 1962), भारतीय क्रिकेट खिलाड़ी और कोच मुकेश ऋषि, भारतीय फिल्म अभिनेता मुकेश सिंह हास्य पुस्तक कलाकार मुकेश तिवारी (जन्म 1962), भारतीय अभिनेता मुकेश (जन्म 2001)। मुकेश कुमार सॉफ्टवेयर प्रोफेशनल।

बुधवार, 19 जुलाई 2023

अमर सिंह चमकिला

अमर सिंह चमकीला 
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 🎂21 जुलाई 1960 
⚰️08 मार्च 1988 दुपहर 02 बजे 🔫खालिस्तान मूमेंट में गोलियों से भून कर 🎤पंजाबियत गायकी की हत्या करदी गई😭
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पंजाबी संगीत के एक भारतीय गायक और संगीतकार थे। चमकिला और उनकी पत्नी अमरजोत की उनके बैंड के दो सदस्यों के साथ 8 मार्च 1988 को एक हत्या में हत्या कर दी गई थी, जो अनसुलझी है।

अमर सिंह चमकिला को पंजाब के अब तक के सबसे अच्छे लाइव स्टेज परफॉर्मर्स में से एक माना जाता है और वे गांव के दर्शकों के बीच बेहद लोकप्रिय हैं। उनकी मासिक बुकिंग नियमित रूप से महीने में दिनों की संख्या से अधिक हो गई। चमकिला को आमतौर पर अब तक के सबसे महान और प्रभावशाली पंजाबी कलाकारों में से एक माना जाता है।

उनका संगीत पंजाबी गाँव के जीवन से काफी प्रभावित था, जिससे वे बड़े हुए थे। उन्होंने आमतौर पर विवाहेतर संबंधों, उम्र बढ़ने, शराब पीने, नशीली दवाओं के उपयोग और पंजाबी पुरुषों के गर्म मिजाज के बारे में गीत लिखे। उन्होंने अपने अश्लील संगीत के बारे में अपने विरोधियों और पंजाबी संस्कृति और समाज पर एक सच्ची टिप्पणी के बारे में अपने समर्थकों के साथ एक विवादास्पद प्रतिष्ठा अर्जित की।

उनकी सबसे प्रसिद्ध हिट में "पहले ललकरे नाल" और उनके भक्ति गीत "बाबा तेरा ननकाना" और "तलवार मैं कलगीधर दी" शामिल हैं। हालाँकि उन्होंने इसे खुद कभी रिकॉर्ड नहीं किया, लेकिन उन्होंने व्यापक रूप से लोकप्रिय "जट दी दुश्मनी" लिखी, जिसे कई पंजाबी कलाकारों ने रिकॉर्ड किया है। वह अपने पहले रिकॉर्ड किए गए गीत "ताकुए ते तकुआ" के परिणामस्वरूप प्रसिद्ध हुए।
मेहसमपुर, पंजाब में प्रदर्शन करने के लिए आने के बाद, चमकिला और अमरजोत दोनों को 8 मार्च 1988 को लगभग 2 बजे अपने वाहन से बाहर निकलते ही गोलियों से भून दिया गया था। मोटरसाइकल सवारों के एक गिरोह ने कई राउंड फायरिंग की, जिससे दंपती और उनके दल के अन्य सदस्य घायल हो गए। हालांकि, शूटिंग के सिलसिले में कभी कोई गिरफ्तारी नहीं की गई और मामला कभी सुलझा नहीं पाया गया।

जसपाल सिंह

जसपाल सिंह 

🎂जन्म 23 मार्च, 1943

एक भारतीय गायक हैं जिन्होंने 1970 और 1980 के दशक के विभिन्न बॉलीवुड अभिनेताओं को अपनी आवाज दी। उनका जन्म अमृतसर में हुआ था और अपने स्कूल और कॉलेजों के दिनों में, वह विभिन्न गायन प्रतियोगिताओं में गाते थे। गायन के अपने जुनून को आगे बढ़ाने के लिए वह मुंबई गए जहां उनकी बहन रहती थी। उनकी प्रतिभा सबसे पहले और सबसे प्रसिद्ध महिला गायक ऊषा खन्ना द्वारा 1968 के दौरान मान्यता प्राप्त थी। उन्हें व्यावसायिक स्तर पर गाने का मौका प्रदान किया गया था, हालांकि उन्हें वह पहचान नहीं मिली जिसके वह हकदार थे। उन्होंने गायन में अपना करियर बनाने के लिए संघर्ष किया और वे बार-बार अमृतसर, दिल्ली और मुंबई आए। अपने पिता के दबाव के कारण उन्होंने कानून का अभ्यास शुरू किया और मुंबई में रहने लगे। कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने कभी हार नहीं मानी। और फिर, एक प्रसिद्ध संगीत संगीतकार, रवींद्र जैन ने उन्हें 1975 में 'गीत गाता चल' नामक फिल्म में एक गीत के लिए बड़ा ब्रेक दिया। इस गीत के बाद, वे एक घरेलू नाम बन गए। उनकी आवाज़ अद्वितीय थी और किसी भी अन्य के विपरीत थी और उन्होंने 'नदिया के पार', अंखियां के झरोखों से ',' सावन को जाने करो 'जैसी हिट फिल्मों के लिए गाया। 

जिन वक़्तों मे उनके पास सबसे अधिक काम होने चाहिए उनही दिनो  फिल्मी संगीत के पतन का दौर शुरू हुआ। फिल्मों में बढ़ती हिंसा ने संगीत के लिए मौके बहुत कम कर दिए, साथ ही किसी भी तरह के गाने गाना इनको पसंद नहीं था  ऐसे में जसपाल के लिये काम मिलना  मुश्किल हो गया और ये हिन्दी सिनेमा से दूर होते चले गए ,पर अपनी अलग आवाज के मालिक जसपाल को आज भी स्टेज के माध्यम से सुना जा रहा है

यहां भारतीय फिल्मों के जसपाल सिंह के हिट गानों की सूची दी गई है

देखो लोगो, ये कैसा जमाना, संभालो संभालो


बेटा खेल मत मटकाओ


धरती मेरी माता पिता आसमान

गीत गाता चल ओ साथी गुनगुनाता चल

मंगल भवन अमंगल हारी द्रवहु सुदसरथ अजर बिहारी

चौपाइयां रामायण
श्याम तेरी बंसी पुकारे राधा नाम


मोहे छोटा मिला भरतार


आंगन में आई बहार भौजी


बड़े ना करे ना बोले बोल


बस एक यही वरदान आज हम मांग रहे करतार से

गगन ये समझे चाँद सुखी है
जब जब तू मेरे सामने आये
जिनखोजा तिन पाइयां घरे पानी पैठा 
कौन दिसा में लेके चला रे बटुहिया

ओ साथी दुख में ही सुख है छिपा रे
अरे रे बबुआ


रंग लेके दीवाने आ गये रंगों में
साथी रे कभी अपना साथ ना छूटे
 
सावन को आने दो

तेरी पलकों के तले ये जो दीपक जले

जमुना किनारे बाजे श्याम की बांसुरिया

जोगी जी धीरे धीरे

जूही बबर

🎂जन्म  20 जुलाई 1979 , लखनऊ
पति: अनूप सोनी बीजॉय नांबियार
माता-पिता: राज बब्बर, नादिरा बब्बर
भाई: आर्य बब्बर, प्रतीक बब्बर
जूही बब्बर एक भारतीय फिल्म और टेलीविजन अभिनेत्री हैं। उन्होंने एक अभिनेता और निर्देशक दोनों के रूप में थिएटर में भी योगदान दिया है। वह प्रसिद्ध बॉलीवुड अभिनेता राज बब्बर की बेटी और भारतीय टीवी अभिनेता और एंकर अनूप सोनी की दूसरी पत्नी हैं ।
जूही के पहले पति बेजॉय नांबियार एक पटकथा लेखक थे, जिनसे उन्होंने 27 जून 2007 को शादी की थी।दोनों ने जनवरी 2009 में तलाक ले लिया। इसके बाद उन्हें टीवी अभिनेता अनूप सोनी से प्यार हो गया , जिनसे उनकी मुलाकात हुई। जब वे दोनों जूही की मां नादिरा बब्बर द्वारा निर्मित एक नाटक में काम कर रहे थे। उस समय सोनी की शादी रितु से हुई थी और वह उससे दो बेटियों के पिता थे। 14 मार्च 2011 को उनका तलाक फाइनल होने के बाद जूही और अनूप सोनी की शादी हो गई।  जूही और सोनी का एक बेटा है, जिसका जन्म 2012 में हुआ। 
जूही ने अपने फ़िल्मी करियर की शुरुआत सोनू निगम के साथ 'काश आप हमारे होते' से की थी । 2005 में, उन्होंने जिमी शेरगिल के साथ एक पंजाबी फिल्म यारा नाल बहारां में काम किया । फिल्म ने पंजाब में और विदेशी पंजाबी दर्शकों के साथ अच्छा प्रदर्शन किया। इसके बाद जूही ने मलयालम में एक मूक फिल्म की अभिनेता मोहनलाल । 2006 में वह अभिनेता संजय कपूर और रितुपर्णा सेनगुप्ता के साथ फिल्म उन्न्स में नजर आई थीं ।वह अपनी अगली फिल्म इट्स माई लाइफ में सोनिया जयसिंह के रूप में अभिनेता हरमन बावेजा के साथ दिखाई दीं ।जेनेलिया डिसूजा और नाना पाटेकर । 2009 में, जूही ने शाहरुख खान द्वारा निर्मित टीवी कॉमेडी घर की बात है में एक गृहिणी की भूमिका निभाई ।

कुछ फिल्मे

2003 काश आप हमारे होते अमृता सिंह 
2005 याराँ नाल बहाराँ हरमन कौर पंजाबी फिल्म
कुछ विचार महिला नेतृत्व मूक फ़िल्म
2006 उन्न्स: प्यार...हमेशा के लिए वकील नताशा पटेल 
2013 इट्स माई लाइफ सोनिया जयसिंह 
2018 अय्यारी कर्नल अभय सिंह की पत्नी 
2023 फ़राज़ फ़राज़ की माँ

राजिंद्र कुमार

जुबली कुमार यानी राजिंद्र कुमार

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महान अभिनेता, निर्माता निर्देशक राजेंद्र कुमार की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रधांजलि
🎂: 20 जुलाई 1929,
⚰️: 12 जुलाई 1999, 
पत्नी: शुक्ला कुमार
बच्चे: कुमार गौरवडिंपल पटेलकाजल तुली
नातिन या पोतियां: साची कुमारसिया कुमार
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राजेंद्र कुमार एक फ़िल्म अभिनेता थे। राजेन्द्र कुमार 1960 और 1970 के दशक में फ़िल्मों में सक्रिय थे। राजेंद्र कुमार ने फ़िल्मों में अभिनय करने के अलावा कई फ़िल्मों का निर्माण और निर्देशन भी किया था। हिन्दी फ़िल्मों में अपने सफल अभिनय और बेमिसाल अदाकारी की वजह से राजेन्द्र कुमार ने जो स्थान बनाया है वहां तक पहुंचना हर अभिनेता का सपना होता है। राजेन्द्र
कुमार की हर फ़िल्म इतनी हिट होती थी कि वह कई सालों तक बेहतरीन बिजनेस किया करती थी और यही वजह थी कि लोग उन्हें ‘जुबली कुमार’ के नाम से पुकारते थे। अपने रोमांटिक व्यक्तित्व की उन्होंने सिनेमा जगत में ऐसी छटा बिखेरी की उनकी फ़िल्में एक यादगार बन गईं। फ़िल्म 'आरजू' हो या 'आई मिलन की बेला'हर फ़िल्म में राजेन्द्र कुमार का एक अलग ही स्वरूप दर्शकों ने देखा।
पश्चिम पंजाब के सियालकोट में 20 जुलाई , 1929 को जन्मे राजेन्द्र कुमार बचपन से ही अभिनेता बनने की चाह रखते थे। एक मध्यम वर्गीय परिवार से होने के बावजूद उन्होंने उम्मीदों का दामन नहीं छोड़ा। मुंबई में अपनी किस्मत आजमाने के लिए उन्होंने पिता द्वारा दी गई घड़ी को बेचा था पर मुंबई आकर अपनी किस्मत बदलने का हौसला उन्होंने किसी से नहीं लिया था।राजेन्द्र कुमार सुंदर होने के साथ साथ मानसिक रुप से भी बहुत ही दृढ़ अभिनेता थे। 21 साल की उम्र में ही उन्हें फ़िल्मों में काम करने का पहला मौका मिला। एक अभिनेता के तौर पर पहली बार उन्हें दिलीप कुमार अभिनीत फ़िल्म "जोगन" में एक छोटा-सा किरदार निभाने को मिला था। यहीं से वह लगातार सफलता प्राप्त करते गए। पहली बार फ़िल्म ‘जोगन’ में उन्होंने अभिनय किया और उसके बाद अपने हर रोल में वह खुद ब खुद फिट होते चले गए। इसके बाद ‘गूंज उठी शहनाई’ में पहली बार वह एक अभिनेता के तौर पर दिखे। वर्ष 1957 में प्रदर्शित महबूब खान की फ़िल्म ‘ मदर इंडिया’ में राजेंद्र कुमार ने जो अभिनय किया उसे देख आज भी लोग प्रफुल्लित हो उठते हैं। मदर इंडिया के बाद राजेन्द्र कुमार ने‘धूल का फूल’, ‘मेरे महबूब’, ‘आई मिलन की बेला’, ’संगम’, ‘आरजू’ , ‘सूरज’ आदि जैसे सफल फ़िल्मों में काम किया।
राजेन्द्र कुमार बचपन से ही अभिनेता बनने का सपना देखा करते थे। अपने इसी सपने को साकार करने के लिये पचास के दशक में वह मुंबई आ गये। मुंबई पहुंचने पर उनकी मुलाकात सेठी नाम के एक व्यक्ति से हुयी जिन्होंने उनका परिचय सुनील दत्त से कराया। जो उन दिनों स्वयं अभिनेता बनने के लिए संघर्ष कर रहे थे। इस बीच राजेन्द्र कुमार की मुलाकात जाने माने गीतकार राजेन्द्र कृष्ण से हुई जिनकी मदद से वह 150 रपए मासिक वेतन पर निर्माता, निर्देशक एच.एस. रवेल के सहायक निर्देशक बनगए। बतौर सहायक निर्देशक राजेन्द्र कुमार ने रवेल के साथ प्रेमनाथ और मधुबाला अभिनीत 'साकी' तथा प्रेमनाथ और सुरैया अभिनीत 'शोखियां' के लिए काम किया। वर्ष 1950 में प्रदर्शित फ़िल्म 'जोगन' बतौर अभिनेता राजेन्द्र कुमार के सिने कैरियर की पहली फ़िल्म साबित हुयी। इस फ़िल्म में उन्हें दिलीप कुमार के साथ अभिनय करने का मौका मिला। इसके बावजूद राजेन्द्र कुमार दर्शकों के बीच अपनी पहचान बनाने में कामयाब रहे। दर्शकों के मध्य राजेन्द्र कुमार का स्थान महबूब ख़ान की फ़िल्म मदर इंडिया (1957) से बना। फ़िल्म मदर इंडिया में राजेन्द्र कुमार ने नरगिस के बेटे का रोल किया था। मदर इंडिया के बाद राजेन्द्र कुमार ने धूल का फूल (1959), मेरे महबूब (1963), आई मिलन की बेला (1964), संगम (1964), आरजू (1965), सूरज (1966) आदि जैसे सफल फ़िल्मों में काम किया।
यद्यपि राजेन्द्र कुमार 1960 के दशक में भारतीय रजत पट पर छाये रहे,इनकी अनेक फ़िल्मों ने लगातार रजत
जयंती (सिल्वर जुबली) की इसलिए उन्हें जुबली कुमार कहा जाने लगा। (1970 का दशक उनके लिये प्रतिकूल रहा क्योंकि उस दशक में राजेन्द्र कुमार की गंवार
(1970), तांगेवाला (1972), ललकार (1972), गाँव हमारा शहर तुम्हारा (1972), आन बान (1972) आदि फ़िल्में बॉक्स आफिस पर पिट गईं और उनकी मांग घटने लग गई। सन् 1970 से 1977 तक का समय उनके लिये अत्यंत दुष्कर रहा। सन् 1978 में बनी फ़िल्म साजन बिना सुहागन, जिसमें उनके साथ नूतन ने काम किया था, ने फिर से एक बार राजेन्द्र कुमार का समय पलट दिया और वे फिर से दर्शकों के चहेते बन गये। राज कपूर ने अपनी फ़िल्में संगम (1964) और मेरा नाम जोकर (1970) में बतौर सहायक हीरो के उन्हें रोल दिया था। राज कपूर के साथ उन्होंने फ़िल्म दो जासूस (1975) में भी काम किया और उन्हें दर्शकों की सराहना मिली। उनके दौर की फ़िल्मों के शौकीन लोगों के लिए राजेन्द्र कुमार भी उतने ही बड़े ट्रैजेडी किंग थे, जितने बड़े ट्रैजेडी किंग दिलीप कुमार को माना जाता है।

भारतीय फ़िल्म इतिहास में सत्तर के दशक में राजेन्द्र कुमार सबसे सफल अभिनेता साबित हुए। गायक मोहम्मद रफ़ी राजेन्द्र कुमार की पर्दे पर आवाज़ बन गये थे। यह एक ऐसा वक्त था जब एक साथ उनकी छः से ज्यादा फ़िल्में सिल्वर जुबली सप्ताह की सफलता मना
रही थीं। यह एक ऐसी सफलता थी जिसने उन्हें हिंदी फ़िल्मों का 'जुबली कुमार' बना दिया। फ़िल्म 'गूंज उठी शहनाई' के बाद 1959 में यश चोपड़ा निर्देशित 'धूल का फूल' भी बहुत पसंद की गयी। यह यश चोपड़ा के निर्देशन पारी की शुरुआत थी। 1963 में 'मेरे महबूब' के बाद राज कपूर द्वारा निर्देशित और अभिनीत फ़िल्म 'संगम' में भी राजेन्द्र कुमार के अभिनय को पसंद किया गया। इस फ़िल्म के लिए उन्हें फ़िल्म फेयर अवार्ड के लिए नामांकित किया गया। इसके बाद फ़िल्म 'आरजू', 'सूरज', 'गंवार' जैसी फ़िल्म भी उनके कैरियर में अहम् भूमिका निभाई। 

1970 के शुरूआती दशक में आई फ़िल्मों ने अच्छा व्यवसाय नहीं किया। यह वह समय था जब हिंदी फ़िल्मों में राजेश खन्ना का आगमन हुआ था। राजेन्द्र कुमार के कैरियर का यह कठिन समय था जिसमें 'गंवार' (1970), 'तांगेवाला' (1972), 'गांव हमारा शहर तुम्हारा' (1972), 'आन बान' (1972) आदि फ़िल्में बॉक्स ऑफिस पर असफल हो गयी। इस असफल और मुश्किल भरे वक्त को एक बार राजेन्द्र कुमार ने इंटरव्यू में स्वीकार किया था। यह मुश्किल भरा समय भी बीत गया था। 1978 में उनकी फ़िल्म 'साजन बिना सुहागन' ने बड़ी सफलता हासिल की। इस फ़िल्म में उनकी नायिका नूतन थी। यह फ़िल्म बहुत ही सफल रही। इसके बाद राजेन्द्र कुमार ने मुख्य किरदार के साथ ही चरित्र किरदार भी निभाने लगे। उन्होंने कुछ पंजाबी फ़िल्मों में भी काम किया,जिसमें 'तेरी मेरी एक ज़िंदगी' काफ़ी लोकप्रिय फ़िल्म है। आखिरी बार दीपा मेहता की फ़िल्म 'अर्थ' (1998) में राजेंद्र कुमार नजर आए थे। 

राजेन्द्र कुमार और सुनील दत्त में काफ़ी गहरी दोस्ती थी। इसी दोस्ती को निभाते हुए और अपने बेटे कुमार गौरव के कैरियर को संवारने के लिए उन्होंने सन 1987 में फ़िल्म 'नाम' का निर्माण किया। फ़िल्म बहुत ही सफल रही लेकिन इस फ़िल्म में संजय दत्त के कैरियर को फायदा मिला। राजेन्द्र कुमार के बारे में एक बार सुनील दत्त जी ने इंटरव्यू में कहा कि आज तक राजेन्द्र कुमार को भले ही किसी फ़िल्म के लिए पुरस्कार नहीं मिला है लेकिन वह एक मानवतावादी व्यक्ति हैं। उन दिनों जब संजय दत्त को गिरफ्तार किया गया था और प्रतिदिन हमारे घर की तलाशी होती थी। तब राजेन्द्र कुमार हमारे घर पर आकर रहते थे और इस बात की सांत्वना देते थे कि यह सिर्फ जांच का हिस्सा है। उनको दुनिया की अच्छी समझदारी थी।अपने फ़िल्म स्टार्स के साथ उदारता से पेश आते थे।अपनी इसी विशेष दोस्ती को रिश्ते में बदलते हुए उन्होंने कुमार गौरव का विवाह सुनील दत्त की बेटी नम्रता के साथ किया था। 

बतौर निर्माता-निर्देशक उनकी पहली फ़िल्म थी- लव स्टोरी, जो अपने समय की बड़ी हिट मानी जाती है, इसमें उन्होंने अपने सुपुत्र कुमार गौरव को लिया था। साथ ही उन्होंने फूल, जुर्रत, नाम,लवर्स आदि फ़िल्मों का निर्माण भी किया। उन्होंने मानद मजिस्ट्रेट के तौर पर भी अपनी सेवाएं दीं।

राजेंद्र कुमार ने (1950 और (1960 के दशक में कई कामयाब फ़िल्में दी। इनमें धूल का फूल, मेरे महबूब, संगम और आरजू प्रमुख रहीं। राजेंद्र कुमार को फ़िल्मफेयर पुरस्कार के सर्वश्रेष्ठ अभिनेता की श्रेणी में तीन बार नामांकन मिला, हालांकि उन्हें कभी यह पुरस्कार नहीं मिल पाया क्योंकि वह दौर कई महान अभिनेताओं का था, जो कुछ मामलों में उनसे बीस नजर आए। 1969 में उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया गया। हिन्दी फ़िल्म 'क़ानून' और गुजराती फ़िल्म 'मेंहदी रंग लाग्यो' के लिए उन्हें पं. जवाहरलाल नेहरू के कर-कमलों द्वारा
राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

12 जुलाई 1999 को कैंसर के कारण मुम्बई में राजेंद्र कुमार का निधन हो गया। राजेंद्र कुमार बहुत ही अनुशासित और आरोग्य दिनचर्या के लिए जाने जाते हैं। उनसे जुड़े लोगों का कहना है कि उन्होंने कभी भी जीवन में दवाइयां नहीं लीं।

मंगलवार, 18 जुलाई 2023

gurprit ghugi

गुरप्रीत घुग्गी पंजाबी अभिनेता
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*Ş₳ŦเŞ𝓱👸🏻◣🍁💜⃝🇱♥︎2*
गुरप्रीत घुग्गी

भारतीय अभिनेता

🎂जन्मतिथि: 19-जुलाई -1971

जन्म स्थान: गुरदासपुर, पंजाब, भारत

पेशा: अभिनेता
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गुरप्रीत सिंह वड़ैच (जन्म 19 जुलाई 1971), जिन्हें आमतौर पर गुरप्रीत घुग्गी के नाम से जाना जाता है, एक भारतीय अभिनेता, हास्य अभिनेता और राजनीतिज्ञ हैं।
उन्हें पंजाबी और हिंदी फिल्मों में उनके काम के लिए जाना जाता है।
घुग्गी ने अपने करियर की शुरुआत 1990 के दशक की शुरुआत में थिएटर में अभिनय से की, जिसके बाद उन्हें रोनक मेला और सोप ओपेरा पारछावेन जैसी टेलीविजन श्रृंखलाओं में बार-बार भूमिकाएँ मिलीं।
आसा नू मान वतना दा (2004) में पटवारी झिलमिल सिंह के रूप में अभिनय करके अपने फिल्मी करियर की शुरुआत करने से पहले, उन्होंने अपने वीडियो घुग्गी जंक्शन (2003) और घुग्गी शू मंतर (2004) के माध्यम से हास्य प्रमुख भूमिकाओं के साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सार्वजनिक पहचान हासिल की।
उन्होंने फिल्म कैरी ऑन जट्टा (2012) में अभिनय किया, और अरदास (2015) में उनकी सार्थक प्रमुख भूमिका के लिए उनकी प्रशंसा की गई।
↔️पहले सुच्चा सिंह छोटेपुर के साथ रहे फिर आम आदमी पार्टी में
इसके द्वारा सफ़ल हुए
भगवंत मान
गुरप्रीत सिंह वड़ैच
राजनीतिक दल
आम आदमी पार्टी (2014-2017)
जीवनसाथी
कुलजीत कौर
बच्चे
2
अल्मा मेटर
गुरु नानक देव विश्वविद्यालय
पेशा
अभिनेताहास्य अभिनेताराजनीतिक
कॉमेडी करियर
शैलियां
फिल्मेंस्टैंड - अप कॉमेडीटेलीविजन
उल्लेखनीय कार्य एवं भूमिकाएँ
कैरी ऑन जट्टाघुग्गी खोल पिटारीघुग्गी छू मंतरघुग्गी यार गुप्प ना मारघुग्गी दे बाराती

भूपेंद्र

🎂जन्म की तारीख और समय: 6 फ़रवरी 1940
⚰️मृत्यु की जगह और तारीख: 18 जुलाई 2022
अपने करियर की शुरुआत में, भूपिंदर ने ऑल इंडिया रेडियो, दिल्ली पर प्रदर्शन किया। वह दिल्ली दूरदर्शन केंद्र, दिल्ली से भी जुड़े रहे। उन्होंने गिटार और वायलिन बजाना सीखा। 1964 में, संगीत निर्देशक मदन मोहन ने उन्हें आकाशवाणी पर सुना, और उन्हें बॉम्बे बुलाया। उन्होंने उन्हें चेतन आनंद की हकीकत में मोहम्मद रफी के साथ होके मजबूर मुझे उसे बुलाया होगा गाना गाने का मौका दिया। हालांकि गाना हिट रहा, लेकिन भूपिंदर को ज्यादा पहचान नहीं मिली। उन्होंने कुछ कम बजट की फिल्मों में कुछ और गाने गाए।

बाद में, भूपेन्द्र सिंह राहुल देव बर्मन के ऑर्केस्ट्रा में शामिल हो गए और दम मारो दम सहित अपने कई लोकप्रिय गीतों के लिए गिटार बजाया। वह आर डी बर्मन के अच्छे दोस्त बन गए, जिन्होंने उन्हें गुलज़ार की परिचय (1972) में गाने का मौका दिया। भूपिंदर ने फिल्म में दो गाने, बेटी ना बीताई रैना और मितवा बोले मीठे बाई गाए, जिसने उन्हें एक गायक के रूप में पहचान दिलाई। भूपिंदर ने गुलजार की फिल्मों में कुछ और लोकप्रिय गाने गाए। इनमें से कुछ गानों में मौसम का “दिल ढूंढता है”, “नाम गम जाएगा” और “एक अकेला इस शहर में” शामिल हैं।

धीरे-धीरे, भूपेन्द्र सिंह ने निजी एल्बम जारी करना शुरू कर दिया। उनके पहले एलपी में तीन स्व-रचित गाने थे और 1968 में रिलीज़ हुए थे। 1978 में, उन्होंने ग़ज़लों का अपना दूसरा एल.पी. जारी किया, जिसमें उन्होंने स्पेनिश गिटार, बास और ड्रम को ग़ज़ल शैली में पेश किया। 1980 में, उन्होंने वो जो शायर था शीर्षक से अपना तीसरा एलपी रिलीज़ किया, जिसके लिए गीत गुलज़ार ने लिखे थे।

ब्रिटिश राज के दौरान गायक भूपिंदर सिंह का जन्म 6 फरवरी 1940 को पंजाब प्रांत के अमृतसर रियासत में हुआ था। उनके पिता का नाम प्रोफेसर नाथ सिंह था। उनके पिता भी एक कुशल संगीतकार थे।

भूपिंदर सिंह ने बचपन में ही अपने पिता से गाना सीखा था। शिक्षा के मामले में उनके पिता बेहद सख्त थे। अपने पिता के सख्त आचरण के कारण, युवा भूपिंदर सिंह ने शुरू में संगीत को तुच्छ जाना। भूपिंदर सिंह और उन्हें संगीत में बिल्कुल भी दिलचस्पी नहीं थी।

भूपिंदर सिंह ने 1980 के दशक में बांग्लादेशी हिंदू गायिका मिताली सिंह से शादी की। शादी के बाद उन्होंने पार्श्व गायन छोड़ दिया। उनकी पत्नी मिताली सिंह भी एक शानदार गायिका हैं।

मिताली सिंह और भूपिंदर सिंह ने कई बेहतरीन युगल संगीत कार्यक्रम किए हैं। फलस्वरूप उसकी ख्याति चार चन्द्रमाओं से बढ़ गई। निहाल सिंह मिताली सिंह और भूपिंदर सिंह के बेटे हैं।

एक समय था जब भूपिंदर सिंह सामान्य रूप से संगीत से घृणा करते थे। उन्हें संगीत में कोई दिलचस्पी नहीं थी। हालाँकि, उन्होंने धीरे-धीरे गायन में रुचि विकसित की और ग़ज़लों का प्रदर्शन करना शुरू कर दिया। अपने करियर के शुरुआती दिनों में गायक भूपिंदर सिंह का ऑल इंडिया रेडियो पर अपना शो था।

आकाशवाणी पर उनके उत्कृष्ट प्रदर्शन के कारण उन्हें दूरदर्शन केंद्र दिल्ली में काम करने का अवसर मिला। उन्होंने वहां काम किया और वायलिन और गिटार भी सिखाया।

प्रसिद्ध संगीतकार मदन मोहन ने ऑल इंडिया रेडियो पर भूपिंदर सिंह का कार्यक्रम सुना और उन्हें 1968 में दिल्ली से तत्कालीन बॉम्बे बुलाया। (मुंबई)।

भूपेन्द्र सिंह को बॉम्बे आने के बाद बॉलीवुड फिल्मों में गाने का मौका दिया गया। बॉलीवुड फिल्म हकीकत एक एक सॉन्ग होके मजबूर मुझे उन बुला होगा में उन्होंने अपनी पहली ग़ज़ल गाया था।
यह ग़ज़ल बहुत हिट हुई, लेकिन गायक भूपिंदर सिंह को इसके परिणामस्वरूप कोई विशेष पहचान नहीं मिली। बावजूद इसके भूपेन्द्र सिंह हो ने कम बजट की फिल्मों में काम करना और गाना जारी रखा।

बॉलीवुड गायक भूपिंदर सिंह ने स्पेनिश गिटार और ड्रम पर गाते हुए अपनी कुछ ग़ज़लों का प्रदर्शन किया।
भूपेन्द्र सिंह ने ग़ज़लों की अपनी पहली एलपी जारी की और 1968 में अपनी लिखी, लेकिन यह उनकी दूसरी एलपी थी जिसने उन्हें प्रसिद्ध बना दिया।
उसके बाद, भूपिंदर सिंह ने 1978 में अपना तीसरा एलपी, “वो जो शहर था” जारी किया, जिसने उन्हें प्रसिद्धि दिलाई।
भूपिंदर सिंह ने राहुल देव बर्मन, जयदेव लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, बप्पी लाहिड़ी और खय्याम सहित भारत के कई बड़े संगीतकारों के लिए गाया। उनकी प्रतिष्ठित आवाज बॉलीवुड के इतिहास में सबसे ज्यादा पहचानी जाने वाली आवाज में से एक है।

भूपिंदर सिंह आर.डी. बर्मन के ऑर्केस्ट्रा और ‘दम मारो दम…’ और ‘एक ही ख्वाब…’ सहित आरडी के कई सबसे प्रसिद्ध गीतों पर गिटार बजाया, आरडी बर्मन उनके करीबी दोस्त बन गए। 1972 में परिचय की रिलीज के साथ, आरडी ने उन्हें अपनी पहली ‘ओरिजिनल’ हिट दी। परिचय में, भूपिंदर ने दो गाने गाए: ‘काटे ना बीताई रैना..’ और ‘मितवा बोले मीठी बाई..’ उन्हें पूरे देश से बहुत प्रशंसा मिली। परिचय ने उनके दृष्टिकोण को बदल दिया; अब उन्हें एक गंभीर आवाज के रूप में माना जाता था, और संगीतकारों ने उन्हें गंभीरता से लिया। भूपिंदर ने गायन की अपनी शैली विकसित की। ‘दिल झूठा है…’, ‘नाम गुम जाएगा…’ और ‘एक अकेला इस शहर में…’ जैसे गानों के साथ गुलजार की फिल्मों ने उनके लिए एक जगह बनाई।

उनकी बिगड़ती तबीयत के कारण 18 जुलाई, 2022 को शाम 7:45 बजे उनकी मृत्यु हो गई।

प्रीति गांगुली

●▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬●   ꧁ *जन्म की तारीख और समय: 17 मई 1953, मुम्बई* *मृत्यु की जगह और तारीख: 2 दिसंबर 2012, मुम्बई* *भाई: भारती जाफ़री, ...