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गुरुवार, 30 मार्च 2023

मीना कुमारी

आज के फनकार
नाम:- मीना कुमारी
जन्म नाम :- बेगम महजबीन बक्स
निक नेम :- मंजू
जन्म तिथि :- 1 अगस्त 1933
जन्म स्थान :- बॉम्बे, महाराष्ट्र, भारत
ऊंचाई :- 1.6 मी
जीवनसाथी :- अर्रे
मिनी बायो:- महजबीन का जन्म 1 अगस्त, 1932 को बॉम्बे, भारत में डॉ। गद्रे के क्लिनिक में एक मुस्लिम पिता, अली बक्स और एक हिंदू मां, इकबाल बेगम (नी प्रभावती टैगोर) के घर हुआ था। उनकी दो बहनें खुर्शीद और मधु हैं। महजबीन स्कूल में पढ़ना चाहती थी, लेकिन एक बाल कलाकार के रूप में हिंदी फिल्मों में अभिनय करने के लिए मजबूर हो गई, और परिवार की एकमात्र रोटी कमाने वाली बन गई। वह पहली बार 1939 की फिल्म 'लेदरफेस' में दिखाई दी थीं और उन्हें ब्रिटिश भारत में मुख्य रूप से हिंदू फिल्म उद्योग में बेबी मीना के रूप में कास्ट किया गया था, जिसे अभी बॉलीवुड के रूप में देखना बाकी था। मीना कुमारी ने कुल 94 फिल्मों में अभिनय किया, जिनमें से एक करियर जो 1939 से 1972 तक चला। वह 'बैजू बावरा', 'परिणीता', 'साहिब बीवी और गुलाम', 'काजल' में अपने अभिनय के साथ-साथ 'सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री' का पुरस्कार प्राप्त करने के बाद एक घरेलू नाम बन गईं। इन उपाधियों के लिए पुरस्कार। 1952 में उन्होंने कमाल अमरोही से शादी कर ली। शादी सामंजस्यपूर्ण थी और इसके परिणामस्वरूप 'दायरा' और 'पाकीज़ा' नामक संयुक्त फिल्म उद्यम हुआ। न ही यह पता था कि बाद को पूरा होने में 14 साल लगेंगे। शादी के कुछ साल बाद, कमल और मीना के बीच मतभेद होने लगे, और अलग होने लगे, और आखिरकार 1964 के दौरान तलाक हो गया, जिससे 'पाकीज़ा' अधूरी रह गई। 'पाकीज़ा' आखिरकार बन गई 4 फरवरी 1972 को पूरी हुई और रिलीज़ हुई, लेकिन बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप रही। कुछ सप्ताह बाद मीना को सेंट एलिजाबेथ के नर्सिंग होम में अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन 31 मार्च, 1972 को लीवर की समस्या के कारण उनका निधन हो गया। उनके निधन के कुछ ही समय बाद, जनता ने 'पाकीज़ा' में नए सिरे से दिलचस्पी ली और बाद में फिल्म बन गई। एक हिट। शादी सामंजस्यपूर्ण थी और इसके परिणामस्वरूप 'दायरा' और 'पाकीज़ा' नामक संयुक्त फिल्म उद्यम हुआ। न ही यह पता था कि बाद को पूरा होने में 14 साल लगेंगे। शादी के कुछ साल बाद, कमल और मीना के बीच मतभेद होने लगे, और अलग होने लगे, और आखिरकार 1964 के दौरान तलाक हो गया, जिससे 'पाकीज़ा' अधूरी रह गई। 'पाकीज़ा' आखिरकार बन गई 4 फरवरी 1972 को पूरी हुई और रिलीज़ हुई, लेकिन बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप रही। कुछ सप्ताह बाद मीना को सेंट एलिजाबेथ के नर्सिंग होम में अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन 31 मार्च, 1972 को लीवर की समस्या के कारण उनका निधन हो गया। उनके निधन के कुछ ही समय बाद, जनता ने 'पाकीज़ा' में नए सिरे से दिलचस्पी ली और बाद में फिल्म बन गई। एक हिट। शादी सामंजस्यपूर्ण थी और इसके परिणामस्वरूप 'दायरा' और 'पाकीज़ा' नामक संयुक्त फिल्म उद्यम हुआ। न ही यह पता था कि बाद को पूरा होने में 14 साल लगेंगे। शादी के कुछ साल बाद, कमल और मीना के बीच मतभेद होने लगे, और अलग होने लगे, और आखिरकार 1964 के दौरान तलाक हो गया, जिससे 'पाकीज़ा' अधूरी रह गई। 'पाकीज़ा' आखिरकार बन गई 4 फरवरी 1972 को पूरी हुई और रिलीज़ हुई, लेकिन बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप रही। कुछ सप्ताह बाद मीना को सेंट एलिजाबेथ के नर्सिंग होम में अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन 31 मार्च, 1972 को लीवर की समस्या के कारण उनका निधन हो गया। उनके निधन के कुछ ही समय बाद, जनता ने 'पाकीज़ा' में नए सिरे से दिलचस्पी ली और बाद में फिल्म बन गई। एक हिट। न ही यह पता था कि बाद को पूरा होने में 14 साल लगेंगे। शादी के कुछ साल बाद, कमल और मीना के बीच मतभेद होने लगे, और अलग होने लगे, और आखिरकार 1964 के दौरान तलाक हो गया, जिससे 'पाकीज़ा' अधूरी रह गई। 'पाकीज़ा' आखिरकार बन गई 4 फरवरी 1972 को पूरी हुई और रिलीज़ हुई, लेकिन बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप रही। कुछ सप्ताह बाद मीना को सेंट एलिजाबेथ के नर्सिंग होम में अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन 31 मार्च, 1972 को लीवर की समस्या के कारण उनका निधन हो गया। उनके निधन के कुछ ही समय बाद, जनता ने 'पाकीज़ा' में नए सिरे से दिलचस्पी ली और बाद में फिल्म बन गई। एक हिट। न ही यह पता था कि बाद को पूरा होने में 14 साल लगेंगे। शादी के कुछ साल बाद, कमल और मीना के बीच मतभेद होने लगे, और अलग होने लगे, और आखिरकार 1964 के दौरान तलाक हो गया, जिससे 'पाकीज़ा' अधूरी रह गई। 'पाकीज़ा' आखिरकार बन गई 4 फरवरी 1972 को पूरी हुई और रिलीज़ हुई, लेकिन बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप रही। कुछ सप्ताह बाद मीना को सेंट एलिजाबेथ के नर्सिंग होम में अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन 31 मार्च, 1972 को लीवर की समस्या के कारण उनका निधन हो गया। उनके निधन के कुछ ही समय बाद, जनता ने 'पाकीज़ा' में नए सिरे से दिलचस्पी ली और बाद में फिल्म बन गई। एक हिट। पाकीज़ा' आखिरकार पूरी हुई और 4 फरवरी 1972 को रिलीज़ हुई, लेकिन बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप रही। कुछ सप्ताह बाद मीना को सेंट एलिजाबेथ के नर्सिंग होम में अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन 31 मार्च, 1972 को लीवर की समस्या के कारण उनका निधन हो गया। उनके निधन के कुछ ही समय बाद, जनता ने 'पाकीज़ा' में नए सिरे से दिलचस्पी ली और बाद में फिल्म बन गई। एक हिट। पाकीज़ा' आखिरकार पूरी हुई और 4 फरवरी 1972 को रिलीज़ हुई, लेकिन बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप रही। कुछ सप्ताह बाद मीना को सेंट एलिजाबेथ के नर्सिंग होम में अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन 31 मार्च, 1972 को लीवर की समस्या के कारण उनका निधन हो गया। उनके निधन के कुछ ही समय बाद, जनता ने 'पाकीज़ा' में नए सिरे से दिलचस्पी ली और बाद में फिल्म बन गई। एक हिट।

मीना कुमारी

महान अभिनेत्री ट्रेजेडी क्वीन  महजबीं बानो उर्फ मीना कुमारी की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि
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मीना कुमारी (1 अगस्त, 1933)- 31 मार्च, 1972) (असल नाम-महजबीं बानो) भारत की एक मशहूर हिन्दी फिल्मों की अभिनेत्री थीं। इन्हें खासकर दुखांत फ़िल्मों में इनकी यादगार भूमिकाओं के लिये याद किया जाता है। मीना कुमारी को भारतीय सिनेमा की ट्रैजेडी क्वीन (शोकान्त महारानी) भी कहा जाता है। अभिनेत्री होने के साथ-साथ मीना कुमारी एक उम्दा शायारा एवम् पार्श्वगायिका भी थीं। इन्होंने वर्ष 1939 से 1972 तक फ़िल्मी पर्दे पर काम किया।

मीना कुमारी का असली नाम महजबीं बानो था और ये बंबई में पैदा हुई थीं। उनके पिता अली बक्श पारसी रंगमंच के एक मँझे हुए कलाकार थे और उन्होंने फ़िल्म "शाही लुटेरे" में संगीत भी दिया था। उनकी माँ प्रभावती देवी (बाद में इकबाल बानो), भी एक मशहूर नृत्यांगना और अदाकारा थी। मीना कुमारी की बड़ी बहन खुर्शीद जुनियर और छोटी बहन मधु (बेबी माधुरी) भी फिल्म अभिनेत्री थीं। कहा जाता है कि दरिद्रता से ग्रस्त उनके पिता अली बक़्श उन्हें पैदा होते ही अनाथाश्रम में छोड़ आए थे चूँकि वे उनके डाॅक्टर श्रीमान गड्रे को उनकी फ़ीस देने में असमर्थ थे।हालांकि अपने नवजात शिशु से दूर जाते-जाते पिता का दिल भर आया और तुरंत अनाथाश्रम की ओर चल पड़े।पास पहुंचे तो देखा कि नन्ही मीना के पूरे शरीर पर चीटियाँ काट रहीं थीं।अनाथाश्रम का दरवाज़ा बंद था, शायद अंदर सब सो गए थे।यह सब देख उस लाचार पिता की हिम्मत टूट गई,आँखों से आँसु बह निकले।झट से अपनी नन्हीं-सी जान को साफ़ किया और अपने दिल से लगा लिया।अली बक़्श अपनी चंद दिनों की बेटी को घर ले आए।समय के साथ-साथ शरीर के वो घाव तो ठीक हो गए किंतु मन में लगे बदकिस्मती के घावों ने अंतिम सांस तक मीना का साथ नहीं छोड़ा।

टैगोर_परिवार_से_संबंध

मीना कुमारी की नानी हेमसुन्दरी मुखर्जी पारसी रंगमंच से जुड़ी हुईं थी। बंगाल के प्रतिष्ठित टैगोर परिवार के पुत्र जदुनंदन टैगोर (1840-62) ने परिवार की इच्छा के विरूद्ध हेमसुन्दरी से विवाह कर लिया। 1862 में दुर्भाग्य से जदुनंदन का देहांत होने के बाद हेमसुन्दरी को बंगाल छोड़कर मेरठ आना पड़ा। यहां अस्पताल में नर्स की नौकरी करते हुए उन्होंने एक उर्दू के पत्रकार प्यारेलाल शंकर मेरठी (जो कि ईसाई था) से शादी करके ईसाई धर्म अपना लिया। हेमसुन्दरी की दो पुत्री हुईं जिनमें से एक प्रभावती, मीना कुमारी की माँ थीं।

शुरुआती_फिल्में_1939_52

महजबीं पहली बार 1939 में फिल्म निर्देशक विजय भट्ट की फिल्म "लैदरफेस" में बेबी महज़बीं के रूप में नज़र आईं। 1940 की फिल्म "एक ही भूल" में विजय भट्ट ने इनका नाम बेबी महजबीं से बदल कर बेबी मीना कर दिया। 1946 में आई फिल्म बच्चों का खेल से बेबी मीना 13 वर्ष की आयु में मीना कुमारी बनीं। मार्च 1947 में लम्बे समय तक बीमार रहने के कारण उनकी माँ की मृत्यु हो गई। मीना कुमारी की प्रारंभिक फिल्में ज्यादातर पौराणिक कथाओं पर आधारित थीं जिनमें हनुमान पाताल विजय, वीर घटोत्कच व श्री गणेश महिमा प्रमुख हैं।

उभरती_सितारा_1952_56

1952 में आई फिल्म बैजू बावरा ने मीना कुमारी के फिल्मी सफ़र को नई उड़ान दी। मीना कुमारी द्वारा अभिनीत गौरी के किरदार ने उन्हें घर-घर में प्रसिद्धि दिलाई। फिल्म 100 हफ्तों तक परदे पर रही और 1954 में उन्हें इसके लिए पहले फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

1953 तक मीना कुमारी की तीन फिल्में आ चुकी थीं जिनमें : दायरा, दो बीघा ज़मीन और परिणीता शामिल थीं। परिणीता से मीना कुमारी के लिये एक नया युग शुरु हुआ। परिणीता में उनकी भूमिका ने भारतीय महिलाओं को खास प्रभावित किया था चूँकि इस फिल्म में भारतीय नारी की आम जिंदगी की कठिनाइयों का चित्रण करने की कोशिश की गयी थी। उनके अभिनय की खास शैली और मोहक आवाज़ का जादू छाया रहा और लगातार दूसरी बार उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के पुरस्कार के लिए चयनित किया गया।

1954 से 1956 के बीच मीना कुमारी ने विभिन्न प्रकार की फिल्मों में काम किया। जहाँ चाँदनी चौक (1954) और एक ही रास्ता (1956) जैसी फिल्में समाज की कुरीतियों पर प्रहार करती थीं, वहीं अद्ल-ए-जहांगीर (1955) और हलाकू (1956) जैसी फिल्में तारीख़ी किरदारों पर आधारित थीं। 1955 की फ़िल्म आज़ाद, दिलीप कुमार के साथ मीना कुमारी की दूसरी फिल्म थी। ट्रेजेडी किंग और ट्रेजेडी क्वीन के नाम से प्रसिद्ध दिलीप और मीना के इस हास्य प्रधान फ़िल्म ने दर्शकों की खूब वाहवाही लूटी। मीना कुमारी के उम्दा अभिनय ने उन्हें फ़िल्मफ़ेयर ने फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार के लिए नामांकित भी किया। फ़िल्म आज़ाद के गाने "अपलम चपलम" और "ना बोले ना बोले" आज भी प्रचलित हैं।

ट्रैजेडी_क्वीन

1957 में मीना कुमारी दो फिल्मों में पर्दे पर नज़र आईं। प्रसाद द्वारा कृत पहली फ़िल्म मिस मैरी में कुमारी ने दक्षिण भारत के मशहूर अभिनेता जेमिनी गणेशन और किशोर कुमार के साथ काम किया। प्रसाद द्वारा कृत दूसरी फ़िल्म शारदा ने मीना कुमारी को भारतीय सिनेमा की ट्रेजेडी क्वीन बना दिया। यह उनकी राज कपूर के साथ की हुई पहली फ़िल्म थी। जब उस ज़माने की सभी अदाकाराओं ने इस रोल को करने से मन कर दिया था तब केवल मीना कुमारी ने ही इस रोल को स्वीकार किया था और इसी फिल्म ने उन्हें उनका पहला बंगाल फ़िल्म जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का खिताब दिलवाया।

1958:फिल्म सहारा के लिए (लेखराज भाखरी द्वारा निर्देशित), मीना कुमारी को फिल्मफेयर नामांकन मिला। फ़िल्म यहूदी, बिमल रॉय द्वारा निर्देशित थी जिसमें मीना कुमारी, दिलीप कुमार, सोहराब मोदी, नजीर हुसैन और निगार सुल्ताना ने अभिनय किया। यह रोमन साम्राज्य में यहूदियों के उत्पीड़न के बारे में, पारसी - उर्दू रंगमंच में एक क्लासिक, आगा हाशर कश्मीरी द्वारा यहूदी की लड़की पर आधारित थी। यह फ़िल्म मुकेश द्वारा गाए गए प्रसिद्ध गीत "ये मेरा दीवानापन है" के साथ बॉक्स ऑफिस पर हिट रही। फरिश्ता - मुख्य नायक के रूप में अशोक कुमार और मीना कुमारी ने अभिनय किया। फिल्म को औसत से ऊपर दर्जा दिया गया था। फ़िल्म सवेरा सत्येन बोस द्वारा निर्देशित की गई, जिसमें मीना कुमारी और अशोक कुमार प्रमुख भूमिकाओं में थे।

1959: देवेन्द्र गोयल द्वारा निर्देशित और निर्मित, चिराग कहाँ रोशनी कहाँ में राजेंद्र कुमार और हनी ईरानी के साथ मीना कुमारी दिखीं। यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर हिट रही और मीना कुमारी को उनके अभिनय के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के लिए फिल्मफेयर नामांकन मिला। चार दिल चार राहें का निर्देशन ख्वाजा अहमद अब्बास ने किया, जिसमें स्टार मीना कुमारी, राज कपूर, शम्मी कपूर, कुमकुम और निम्मी थे। फिल्म को आलोचकों से गर्म समीक्षा मिली। शरारात - एक 1959 की रोमांटिक ड्रामा फिल्म थी, जिसे हरनाम सिंह रवैल द्वारा लिखा और निर्देशित किया गया था, जिसमें मीना कुमारी, किशोर कुमार, राज कुमार और कुमकुम मुख्य भूमिकाओं में थे। किशोर कुमार द्वारा गाए गया यादगार गीत "हम मतवाले नौजवान" आज भी याद किया जाता है।

1960: दिल अपना और प्रीत पराई, किशोर साहू द्वारा लिखित और निर्देशित एक हिंदी रोमांटिक ड्रामा थी। इस फिल्म में मीना कुमारी, राज कुमार और नादिरा ने मुख्य भूमिका निभाई। फिल्म एक सर्जन की कहानी बताती है जो एक पारिवारिक मित्र की बेटी से शादी करने के लिए बाध्य है, जबकि उसे एक सहकर्मी नर्स से प्यार है, जिसे मीना कुमारी ने निभाया है। यह मीना कुमारी के करियर के प्रसिद्ध पात्रों में से एक है। फिल्म का संगीत शंकर जयकिशन द्वारा दिया गया है, और हिट गीत, "अजीब दास्तान है ये" लता मंगेशकर द्वारा गाया गया है। 1961 के फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड्स में इसने सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक श्रेणी के लिए नौशाद के लोकप्रिय संगीत महाकाव्य मुग़ल-ए-आज़म को हराकर खलबली मचा दी। बहाना - कुमार द्वारा निर्देशित, मीना कुमारी, सज्जन, अनवर की स्टार कास्ट थी। कोहिनूर - एस. यू. सनी द्वारा निर्देशित मीना कुमारी, दिलीप कुमार, लीला चिटनिस और कुमकुम के साथ बनाई गई फ़िल्म थी। यह एक मज़ाइया फ़िल्म थी और काफी हिट रही। 1961: भाभी की चूड़ीयां एक पारिवारिक ड्रामा थी जिसका निर्देशन सदाशिव कवि ने मीना कुमारी और बलराज साहनी के साथ किया था। यह मीना कुमारी के प्रसिद्ध फिल्मों में से एक है। यह फिल्म लता मंगेशकर के प्रसिद्ध गीत "ज्योति कलश छलके" के साथ भारतीय बॉक्स ऑफिस पर वर्ष की सबसे अधिक कमाई वाली फिल्मों में से एक थी। ज़िन्दगी और ख्वाब - मीना कुमारी और राजेंद्र कुमार अभिनीत एस. बनर्जी निर्देशित भारतीय बॉक्स ऑफ़िस पर हिट रही। प्यार का सागर का निर्देशन मीना कुमारी और राजेंद्र कुमार के साथ देवेंद्र गोयल ने किया था।

1962_और_उसके_बाद

1962: साहिब बीबी और गुलाम, गुरु दत्त द्वारा निर्मित और अबरार अल्वी द्वारा निर्देशित फिल्म थी। यह बिमल मित्र के बंगाली उपन्यास "साहेब बीबी गोलम" पर आधारित है। फिल्म में मीना कुमारी, गुरु दत्त, रहमान, वहीदा रहमान और नाज़िर हुसैन हैं। इसका संगीत हेमंत कुमार का है और गीत शकील बदायुनी के हैं। इस फिल्म को वी. के. मूर्ति और गीता दत्त द्वारा गाए गए प्रसिद्ध गीत "ना जाओ सईयां छुड़ा के बइयां" और "पिया ऐसो जिया में" के लिए भी जाना जाता है। फिल्म ने चार फिल्मफेयर पुरस्कार जीते, जिसमें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार भी शामिल है। इस फिल्म को 13 वें बर्लिन अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में गोल्डन बियर के लिए नामित किया गया था, जहाँ मीना कुमारी को एक प्रतिनिधि के रूप में चुना गया था। साहिब बीबी और गुलाम को ऑस्कर में भारत की आधिकारिक प्रविष्टि के रूप में चुना गया था। फणी मजूमदार द्वारा निर्देशित आरती में मीना कुमारी, अशोक कुमार, प्रदीप कुमार और शशिकला निर्णायक भूमिका में हैं। कुमारी को इस फिल्म के लिए बंगाल फिल्म जर्नलिस्ट एसोसिएशन की ओर से सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार मिला। मैं चुप रहुंगी - ए. भीमसिंह द्वारा निर्देशित मीना कुमारी और सुनील दत्त के साथ मुख्य भूमिका में, वर्ष की सबसे बड़ी हिट फिल्मों में से एक थी और मीना कुमारी को उनके प्रदर्शन के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के लिए फिल्मफेयर नामांकन मिला।

1963: दिल एक मंदिर, सी. वी. श्रीधर द्वारा निर्देशित थी जिसमें मीना कुमारी, राजेंद्र कुमार, राज कुमार और महमूद मुख्य भूमिका में हैं। फिल्म का संगीत शंकर जयकिशन द्वारा दिया गया है। यह बॉक्स ऑफिस पर एक बड़ी हिट थी। फ़िल्म अकेली मत जाइयो को नंदलाल जसवंतलाल ने निर्देशित किया था। यह मीना कुमारी और राजेंद्र कुमार के साथ एक रोमांटिक कॉमेडी फिल्म है। किनारे किनारे को चेतन आनंद ने निर्देशित किया था और इसमें मीना कुमारी, देव आनंद और चेतन आनंद ने मुख्य भूमिकाओं थे।

1964: सांझ और सवेरा - हृषिकेश मुखर्जी द्वारा निर्देशित एक रोमांटिक ड्रामा फिल्म है, जिसमें मीना कुमारी, गुरुदत्त और महमूद ने अभिनय किया था। यह फ़िल्म गुरु दत्त की अंतिम फ़िल्म थी। बेनज़ीर - एस. खलील द्वारा निर्देशित एक मुस्लिम सामाजिक फिल्म थी, जिसमें मीना कुमारी, अशोक कुमार, शशि कपूर और तनुजा ने अभिनय किया था। मीरा कुमारी, अशोक कुमार और प्रदीप कुमार द्वारा अभिनीत और किदार शर्मा द्वारा निर्देशित चित्रलेखा 1934 के हिंदी उपन्यास पर आधारित थी, जो इसी नाम से भगवती चरण वर्मा द्वारा मौर्य साम्राज्य के अंतर्गत आने वाले बीजगुप्त और राजा चंद्रगुप्त मौर्य (340 ईसा पूर्व -298 ईसा पूर्व) के बारे में थी। फिल्म का संगीत और बोल रोशन और साहिर लुधियानवी के थे और "संसार से भीगे फिरते हो" और "मन रे तू कहे" जैसे गीतों के लिए प्रसिद्ध थे। मीना कुमारी और सुनील दत्त द्वारा अभिनीत वेद-मदन द्वारा निर्देशित गजल एक मुस्लिम सामाजिक फिल्म थी, इसमें साहिर लुधियानवी के गीतों के साथ मदन मोहन का संगीत था, जिसमें मोहम्मद रफ़ी द्वारा गाए गए "रंग और नूर की बारात", लता मंगेशकर द्वारा गाया गया "नगमा ओ ​शेर की सौगात" जैसे उल्लेखनीय फ़िल्म-ग़ज़ल शामिल हैं। मैं भी लड़की हूँ का निर्देशन ए. सी. तिरूलोकचंदर ने किया था। फिल्म में मीना कुमारी नवोदित अभिनेता धर्मेंद्र के साथ हैं।

1965: काजल ने राम माहेश्वरी द्वारा निर्देशित जिसमें मीना कुमारी, धर्मेंद्र, राज कुमार, पद्मिनी, हेलेन, महमूद और मुमताज़ हैं। यह फिल्म 1965 की शीर्ष 20 फिल्मों में सूचीबद्ध थी। मीना कुमारी ने काजल के लिए अपना चौथा और आखिरी फिल्मफेयर पुरस्कार जीता। फिल्म मूल रूप से गुलशन नंदा के उपन्यास "माधवी" पर आधारित थी। मीना कुमारी, अशोक कुमार और प्रदीप कुमार के साथ कालिदास के निर्देशन में बनी भीगी रात, लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी द्वारा दो अलग-अलग संस्करणों में गाए गए प्रसिद्ध गीत "दिल जो ना कह सका" के साथ वर्ष की सबसे बड़ी हिट में से एक थी। । नरेंद्र सूरी द्वारा निर्देशित फिल्म पूर्णिमा में मुख्य भूमिकाओं में मीना कुमारी और धर्मेंद्र थे।

1966: फूल और पत्थर, ओ. पी. रल्हन द्वारा निर्देशित फ़िल्म, जिसमें मीना कुमारी और धर्मेंद्र ने मुख्य भूमिकाओं में अभिनय किया। यह फिल्म एक स्वर्ण जयंती हिट बन गई और धर्मेंद्र के फिल्मी सफर में मील का पत्थर साबित हुई यह फ़िल्म उस वर्ष की सबसे अधिक कमाई वाली फिल्म थी। फिल्म में मीना कुमारी के प्रदर्शन ने उन्हें उस वर्ष के लिए फिल्मफेयर पुरस्कारों में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री की श्रेणी में नामांकित किया। फिल्म पिंजरे की पंछी का निर्देशन सलिल चौधरी ने किया था, जिसमें मुख्य भूमिकाओं में मीना कुमारी, बलराज साहनी और महमूद थे।

1967: मझली दीदी का निर्देशन हृषिकेश मुखर्जी और मीना कुमारी के साथ धर्मेंद्र ने अभिनय किया। यह फिल्म सर्वश्रेष्ठ विदेशी भाषा फिल्म के लिए 41 वें अकादमी पुरस्कारों में भारत की प्रविष्टि थी। फिल्म बहू बेगम का निर्देशन एम. सादिक ने किया था, जिसमें मीना कुमारी, प्रदीप कुमार और अशोक कुमार थे। फिल्म में संगीत रोशन और गीत साहिर लुधियानवी द्वारा दिया गया है। नूरजहाँ, मोहम्मद सादिक द्वारा निर्देशित, मीना कुमारी और प्रदीप कुमार अभिनीत एक ऐतिहासिक फिल्म थी, जिसमें हेलन और जॉनी वॉकर छोटी भूमिकाओं में थे। इसमें महारानी नूरजहाँ और उनके पति, मुगल सम्राट जहाँगीर की महाकाव्य प्रेम कहानी का वर्णन किया गया है। फिल्म चंदन का पलना इस्माइल मेमन द्वारा निर्देशित किया गया, जिसमें मीना कुमारी और धर्मेंद्र ने अभिनय किया। ग्रहण के बाद (English: After the Eclipse), एस सुखदेव द्वारा निर्देशित 37 मिनट की एक रंगीन डॉक्यूमेंट्री थी जो वाराणसी के उपनगरीय इलाके में शूट की गई, इसमें अभिनेता शशि कपूर की आवाज के साथ मीना कुमारी की आवाज भी थी।

1968: बहारों की मंज़िल एक सस्पेंस थ्रिलर है जिसका निर्देशन याकूब हसन रिज़वी ने किया, जिसमें मीना कुमारी, धर्मेंद्र, रहमान और फरीदा जलाल शामिल हैं। यह फिल्म साल की प्रमुख हिट फिल्मों में से एक थी। फिल्म अभिलाषा का निर्देशन अमित बोस ने किया था। कलाकारों में मीना कुमारी, संजय खान और नंदा शामिल हैं।

70_का_दशक 

70 के दशक की शुरुआत में, मीना कुमारी ने अंततः अपना ध्यान अधिक 'अभिनय उन्मुख' या चरित्र भूमिकाओं पर केन्द्रित कर दिया। उनकी अंतिम छह फिल्में- जबाव, सात फेरे, मेरे अपने, दुश्मन, पाकीज़ा और गोमती के किनारे में से केवल पाकीज़ा में उनकी मुख्य भूमिका थी। मेरे अपने और गोमती के किनारे में, हालांकि उन्होंने एक मुख्य नायिका की भूमिका नहीं निभाई, लेकिन उनकी भूमिका वास्तव में कहानी का केंद्रीय चरित्र थी।

1970: फ़िल्म जवाब मीना कुमारी, जीतेंद्र, लीना चंदावरकर और अशोक कुमार द्वारा अभिनीत, रमन्ना द्वारा निर्देशित फिल्म थी। सात फेरे का निर्देशन सुधीर सेन ने किया था, जिसमें मीना कुमारी, प्रदीप कुमार और मुकरी मुख्य भूमिकाओं में थे।

1971: गुलज़ार द्वारा लिखित और निर्देशित, मेरे अपने में मीना कुमारी, विनोद खन्ना और शत्रुघ्न सिन्हा के साथ देवेन वर्मा, पेंटाल, असित सेन, असरानी, ​​डैनी डेन्जोंगपा, केश्टो मुखर्जी, ए. के. हंगल, दिनेश ठाकुर, महमूद और योगिता बाली हैं। दुलाल गुहा द्वारा निर्देशित दुश्मन, जिसमें मुख्य भूमिकाओं में मुमताज के साथ मीना कुमारी, रहमान और राजेश खन्ना हैं। फिल्म बॉक्स ऑफिस पर "सुपर-हिट" रही।

1972: सावन कुमार टाक द्वारा निर्देशित गोमती के किनारे में मीना कुमारी, संजय खान और मुमताज़ ने अभिनय किया। यह फ़िल्म मीना कुमारी की मृत्यु के बाद 22 नवंबर 1972 को रिलीज हुई।

कमाल_अमरोही_से_विवाह 

वर्ष 1951 में फिल्म तमाशा के सेट पर मीना कुमारी की मुलाकात उस ज़माने के जाने-माने फिल्म निर्देशक कमाल अमरोही से हुई जो फिल्म महल की सफलता के बाद निर्माता के तौर पर अपनी अगली फिल्म अनारकली के लिए नायिका की तलाश कर रहे थे।मीना का अभिनय देख वे उन्हें मुख्य नायिका के किरदार में लेने के लिए राज़ी हो गए।दुर्भाग्यवश 21 मई 1951 को मीना कुमारी महाबलेश्वरम के पास एक सड़क दुर्घटना का शिकार हो गईं जिससे उनके बाहिने हाथ की छोटी अंगुली सदा के लिए मुड़ गई। मीना अगले दो माह तक बम्बई के ससून अस्पताल में भर्ती रहीं और दुर्घटना के दूसरे ही दिन कमाल अमरोही उनका हालचाल पूछने पहुँचे। मीना इस दुर्घटना से बेहद दुखी थीं क्योंकि अब वो अनारकली में काम नहीं कर सकती थीं। इस दुविधा का हल कमाल अमरोही ने निकाला, मीना के पूछने पर कमाल ने उनके हाथ पर अनारकली के आगे 'मेरी' लिख डाला।इस तरह कमाल मीना से मिलते रहे और दोनों में प्रेम संबंध स्थापित हो गया।

14 फरवरी 1952 को हमेशा की तरह मीना कुमारी के पिता अली बख़्श उन्हें व उनकी छोटी बहन मधु को रात्रि 8 बजे पास के एक भौतिक चिकित्सकालय (फिज़्योथेरेपी क्लीनिक) छोड़ गए। पिताजी अक्सर रात्रि 10 बजे दोनों बहनों को लेने आया करते थे।उस दिन उनके जाते ही कमाल अमरोही अपने मित्र बाक़र अली, क़ाज़ी और उसके दो बेटों के साथ चिकित्सालय में दाखिल हो गए और 19 वर्षीय मीना कुमारी ने पहले से दो बार शादीशुदा 34 वर्षीय कमाल अमरोही से अपनी बहन मधु, बाक़र अली, क़ाज़ी और गवाह के तौर पर उसके दो बेटों की उपस्थिति में निक़ाह कर लिया। 10 बजते ही कमाल के जाने के बाद, इस निक़ाह से अपरिचित पिताजी मीना को घर ले आए।इसके बाद दोनों पति-पत्नी रात-रात भर बातें करने लगे जिसे एक दिन एक नौकर ने सुन लिया।बस फिर क्या था, मीना कुमारी पर पिता ने कमाल से तलाक लेने का दबाव डालना शुरू कर दिया। मीना ने फैसला कर लिया की तबतक कमाल के साथ नहीं रहेंगी जबतक पिता को दो लाख रुपये न दे दें।पिता अली बक़्श ने फिल्मकार महबूब खान को उनकी फिल्म अमर के लिए मीना की डेट्स दे दीं परंतु मीना अमर की जगह पति कमाल अमरोही की फिल्म दायरा में काम करना चाहतीं थीं।इसपर पिता ने उन्हें चेतावनी देते हुए कहा कि यदि वे पति की फिल्म में काम करने जाएँगी तो उनके घर के दरवाज़े मीना के लिए सदा के लिए बंद हो जाएँगे। 5 दिन अमर की शूटिंग के बाद मीना ने फिल्म छोड़ दी और दायरा की शूटिंग करने चलीं गईं।उस रात पिता ने मीना को घर में नहीं आने दिया और मजबूरी में मीना पति के घर रवाना हो गईं। अगले दिन के अखबारों में इस डेढ़ वर्ष से छुपी शादी की खबर ने खूब सुर्खियां बटोरीं।

पति से अलगाव और शराब की लत संपादित करें
अपनी शादी के बाद, कमाल अमरोही ने मीना कुमारी को अपने फ़िल्मी करियर को जारी रखने की अनुमति दी, लेकिन इस शर्त पर कि वे अपने मेकअप रूम में उनके मेकअप आर्टिस्ट के अलावा किसी और पुरूष को नहीं बुलाएंगी और हर शाम 6:30 बजे तक केवल अपनी कार में ही घर लौटेंगी| मीना कुमारी सभी शर्तों से सहमत थीं, लेकिन समय बीतने के साथ वे उन्हें तोड़ती रहीं। साहिब बीबी और गुलाम के निर्देशक अबरार अल्वी ने सुनाया कि कैसे कमाल अमरोही अपने जासूस और दाएं हाथ के आदमी बाकर अली को मेकअप रूम में मीना पर निगाह रखने के लिए रखते थे, और एक शाम जब एक शॉट पूरा करने के लिए शेड्यूल से परे काम कर रही थी, तब उन्हें बिलखती हुई मीना का सामना करना पड़ा था।

1963 में, साहिब बीबी और गुलाम को बर्लिन फिल्म समारोह में भारतीय प्रविष्टि के रूप में चुना गया और मीना कुमारी को एक प्रतिनिधि के रूप में चुना गया। तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री सत्य नारायण सिन्हा ने दो टिकटों की व्यवस्था की, एक मीना कुमारी के लिए और दूसरा उनके पति के लिए, लेकिन कमाल अमरोही ने अपनी पत्नी के साथ जाने से इनकार कर दिया जिस कारण बर्लिन की यात्रा कभी नहीं हुई। इरोस सिनेमा में एक प्रीमियर के दौरान, सोहराब मोदी ने मीना कुमारी और कमाल अमरोही को महाराष्ट्र के राज्यपाल से मिलवाया। सोहराब मोदी ने कहा "यह प्रसिद्ध अभिनेत्री मीना कुमारी हैं, और यह उनके पति कमाल अमरोही हैं"। बधाई देने से पहले, कमाल अमरोही ने कहा, "नहीं, मैं कमाल अमरोही हूं और यह मेरी पत्नी, प्रसिद्ध अभिनेत्री मीना कुमारी हैं"। यह कहते हुए कमाल अमरोही सभागार से चले गए। मीना कुमारी ने अकेले प्रीमियर देखा। मीना कुमारी को उनकी शादी में शारीरिक शोषण का शिकार होना पड़ा। उनकी जीवनी के लेखक विनोद मेहता बताते हैं कि हालांकि अमरोही ने इस तरह के आरोपों से बार-बार इनकार किया, उन्होंने छह अलग-अलग स्रोतों से जाना कि वह वास्तव में एक पीड़ित थी। 1972 में उनकी मृत्यु के बाद, साथी अभिनेत्री नरगिस ने उनके बारे में एक निबंध लिखा, जो एक उर्दू पत्रिका में प्रकाशित हुआ था। नरगिस ने उल्लेख किया कि मैं चुप राहुंगी के एक आउटडोर शूट पर, जब वे दोनों बगल के कमरे साझा कर रहीं थीं, उन्होंने स्वयं भी बगल के कमरे से शोर सुना। अगले दिन, वह एक सूजी हुई आंखों वाली कुमारी से मिली, जो शायद पूरी रात रोई थी। इस तरह की अफवाहों को फ़िल्म पिंजरे के पंछी के मूहर्त पर उनका आधार मिला। 5 मार्च 1964 को, कमाल अमरोही के सहायक, बाकर अली ने मीना कुमारी को थप्पड़ मार दिया जब उन्होंने गुलज़ार को अपने मेकअप रूम में प्रवेश करने की अनुमति दी। कुमारी ने तुरंत अमरोही को फिल्म के सेट पर आने के लिए बुलाया लेकिन वह कभी नहीं आए। इसके बजाय, अमरोही ने मीना को घर आने के लिए कहा ताकि वे तय कर सकें के आगे क्या करना है। इसने न केवल मीना कुमारी को नाराज़ किया बल्कि उनके पहले से तनावपूर्ण संबंधों में अंतिम तिनके के रूप में भी काम किया। मीना सीधे अपनी बहन मधु के घर गईं। जब कमाल अमरोही उन्हें वापस लाने के लिए वहां गए, तो बार-बार मनाने के बाद भी उन्होंने अमरोही से बात करने से इनकार कर दिया। उसके बाद, न तो अमरोही ने मीना वापस लाने की कोशिश की और न ही मीना कुमारी वापस लौटीं। कुमारी की मृत्यु के बाद अपने कार्यक्रम फूल खिले हैं गुलशन गुलशन पर जब तबस्सुम ने कमाल अमरोही से मीना कुमारी के बारे में पूछा तब अमरोही ने मीना को "एक अच्छी पत्नी नहीं बल्कि एक अच्छी अभिनेत्री के रूप में याद किया, जो खुद को घर पर भी एक अभिनेत्री मानती थी।"

लेकिन स्वछंद प्रवृति की मीना अमरोही से 1964 में अलग हो गयीं। उनकी फ़िल्म पाक़ीज़ा को और उसमें उनके रोल को आज भी सराहा जाता है। शर्मीली मीना के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं कि वे कवियित्री भी थीं लेकिन कभी भी उन्होंने अपनी कवितायें छपवाने की कोशिश नहीं की। उनकी लिखी कुछ उर्दू की कवितायें नाज़ के नाम से बाद में छपी।

मृत्यु 

फ़िल्म पाक़ीज़ा के रिलीज़ होने के तीन हफ़्ते बाद मीना कुमारी की तबीयत बिगड़ने लगी। 28 मार्च 1972 को उन्हें बम्बई के सेंट एलिज़ाबेथ अस्पताल में दाखिल करवाया गया।

31 मार्च 1972, गुड फ्राइडे वाले दिन दोपहर 3 बजकर 25 मिनट पर महज़ 38 वर्ष की आयु में मीना कुमारी ने अंतिम सांस ली। पति कमाल अमरोही की इच्छानुसार उन्हें बम्बई के मज़गांव स्थित रहमताबाद कब्रिस्तान में दफनाया गया। मीना कुमारी इस लेख को अपनी कब्र पर लिखवाना चाहती थीं:

"वो अपनी ज़िन्दगी को
एक अधूरे साज़,

एक अधूरे गीत,

एक टूटे दिल,

परंतु बिना किसी अफसोस

के समाप्त कर गयी

मीना के पति कमाल अमरोही की GB 11 फरवरी 1993 को मृत्यु हुई और उनकी इच्छनुसार उन्हें मीना के बगल में दफनाया गया।

सम्मान_और_श्रद्धांजलि 

उनकी मृत्यु के कुछ समय बाद, साथी अभिनेत्री नरगिस ने एक उर्दू पत्रिका में एक निजी निबंध लिखा - शमा , जिसका शीर्षक है मीना - मौत मुबारक हो । अक्टूबर 1973 में, उन्होंने मीनाजी की याद में मीना कुमारी मेमोरियल फॉर द ब्लाइंड की स्थापना की और इस ट्रस्ट की वे अध्यक्ष भी थीं।

1979 में, मीना कुमारी की अमर कहानी , दिवंगत अभिनेत्री को समर्पित एक फिल्म थी। सोहराब मोदी द्वारा इसे निर्देशित किया गया था और राज कपूर और राजेंद्र कुमार जैसे विभिन्न फिल्मी हस्तियों के विशेष साक्षात्कार लिए गए थे। फिल्म के लिए संगीत खय्याम द्वारा संगीतबद्ध किया गया था।

अगले वर्ष, शायरा (वैकल्पिक रूप से साहिरा शीर्षक) जारी की गई थी। यह मीना कुमारी पर एक लघु वृत्तचित्र थी और एस सुख देव द्वारा गुलज़ार के साथ निर्देशित की गई थी। इस डॉक्यूमेंट्री का निर्माण कांता सुखदेव ने किया था।

उनके सम्मान में अंकित मूल्य 500 पैसे का एक डाक टिकट 13 फरवरी 2011 को भारतीय डाक द्वारा जारी किया गया था।

मई 2018 में, जयपुर के जवाहर कला केंद्र के रंगायन सभागार में, मीना कुमारी के जीवन को दर्शाने वाले नाटक, अजीब दास्तां है ये का मंचन किया गया था।

आत्मकथाएँ 

मीना कुमारी पर पहली जीवनी अक्टूबर 1972 में विनोद मेहता द्वारा उनकी मृत्यु के बाद लिखी गई थी। कुमारी की आधिकारिक जीवनी, इसे मीना कुमारी - द क्लासिक बायोग्राफी शीर्षक दिया गया था। जीवनी मई 2013 में फिर से प्रकाशित हुई थी।
मोहन दीप द्वारा लिखा गया निंदनीय सिम्पली सकेन्डलॉस लेख 1998 में प्रकाशित एक अनौपचारिक जीवनी थी। यह मुंबई के हिंदी दैनिक दोपहर का सामना में एक धारावाहिक के रूप में प्रकाशित किया गया था।
मीना कुमारी की एक और जीवनी, आखरी अधाई दिन को मधुप शर्मा ने हिंदी में लिखा था। पुस्तक 2006 में प्रकाशित हुई थी।

मीना कुमारी हमेशा बड़े पैमाने पर फिल्म निर्माताओं के बीच रुचि का विषय रही हैं। 2004 में, उनकी फिल्म साहिब बीबी और गुलाम का एक आधुनिक रूपांतर प्रीतीश नंदी कम्युनिकेशंस द्वारा किया जाना था, जिसमें ऐश्वर्या राय और बाद में प्रियंका चोपड़ा को उनकी छोटी बहू की भूमिका को चित्रित करना था। हालांकि, फिल्म को निर्देशक ऋतुपॉर्नो घोष द्वारा बाद में इसे एक धारावाहिक के रूप में बनाया गया, जिसमें अभिनेत्री रवीना टंडन ने इस भूमिका को निभाया।

2015 में, यह बताया गया कि तिग्मांशु धूलिया को हिंदी सिनेमा की ट्रेजेडी क्वीन पर एक फिल्म बनानी थी, जो विनोद मेहता की किताब "मीना कुमारी - द क्लासिक बायोग्राफी" का स्क्रीन रूपांतरण होना था। अभिनेत्री कंगना रनौत को कुमारी को चित्रित करने के लिए संपर्क किया गया था, लेकिन प्रामाणिक तथ्यों की कमी और मीना कुमारी के सौतेले बेटे ताजदार अमरोही के कड़े विरोध के बाद फिल्म को फिर से रोक दिया गया था।

2017 में, निर्देशक करण राजदान ने भी उन पर एक आधिकारिक बायोपिक निर्देशित करने का फैसला किया। इसके लिए, उन्होंने माधुरी दीक्षित और विद्या बालन से फ़िल्मी पर्दे पर मीना कुमारी की भूमिका निभाने के लिए संपर्क किया, लेकिन कई कारणों के कारण, दोनों ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। बाद में उन्होंने अभिनेत्री सन्नी लियोन की ओर रुख किया, जिन्होंने इस किरदार में बहुत दिलचस्पी दिखाई। ऋचा चड्ढा, जया प्रदा और जान्हवी कपूर सहित कई अन्य अभिनेत्रियों ने भी शानदार आइकन की भूमिका निभाने की इच्छा व्यक्त की।

2018 में, निर्माता और पूर्व बाल कलाकार कुट्टी पद्मिनी ने गायक मोहम्मद रफ़ी और अभिनेता-निर्देशक जे पी चंद्रबाबू के साथ एक वेब श्रृंखला के रूप में मीना कुमारी पर एक बायोपिक बनाने की घोषणा की। पद्मिनी ने मीना कुमारी के साथ फिल्म दिल एक मंदिर में काम किया है और इस बायोपिक के साथ दिवंगत अभिनेत्री को सम्मानित करना चाहती हैं।

अभिशेक चोबे

अभिषेक चौबे एक भारतीय फिल्म निर्देशक, पटकथा लेखक हैं। वह हिंदी सिनेमा में फिल्म इश्किया के निर्देशन के लिए जाने जातें हैं।  

पृष्ठभूमि: 
      अभिषेक चौबे का जन्म 30 मार्च 1977 को फ़ैजाबाद उत्तर-प्रदेश में हुआ था। उनके पिता का नाम आनंद मोहन चौबे और माँ का नाम शीला चौबे है। 

पढ़ाई:  
      अभिषेक चौबे ने अपनी शुरुआती पढ़ाई सेंट जेवियर स्कूल रांची से की है। उन्होंने स्नातक की पढ़ाई अंग्रेजी साहित्य में दिल्ली यूनिवर्सिटी से पूरी की है। इसके अलावा उन्होंने फिल्म एंड टेलीविजन प्रोडक्शन का कोर्स ज़ेवियर इंस्‍टीट्यूट ऑफ़ कम्युनिकेशन से पूरी की है। 

करियर: 
         अभिषेक चौबे ने अपने करियर की शुरुआत विशाल भरद्वाज के साथ बतौर एसोसिएट डायरेक्टर, सह-लेखक फिल्म मकड़ी की थी। उसके बाद उन्होंने निर्देशक विशाल की ओमकारा, कमीने जैसी फिल्मों में बतौर सहायक निर्देशक काम किया। 

साल 2010 में उन्होंने उन्होंने विशाल भरद्वाज के साथ मिलकर फिल्म इश्किया निर्देशित की। इस फिल्म में नसीरुद्दीन शाह, विद्या बालन और अरशद वारसी मुख्य भूमिका में नजर आये थे। इस फिल्म ने बॉक्स-ऑफिस पर काफी अच्छा व्यापर किया था। दर्शकों और आलोचकों से भी इस फिल्म को काफी अच्छी प्रतिक्रियाएं मिली थी। इस फिल्म की सफलता के बाद अभिषेक ने इसका सीक्वल निर्देशित किया।  

फिल्म के सीक्वल डेढ़ इश्किया में माधुरी दीक्षित, नसीरुद्दीन शाह, अरशद वारसी और हुमा कुरैशी मुख्य भूमिका में नजर आये थे। इस फिल्म ने भी पहली फिल्म की तरह आलोचकों की खूब तारीफ बटोरी। फिल्म बॉक्स-ऑफिस पर सफल साबित हुई थी। हाल ही में आई फिल्‍म सोन-चिडिया को भी अभिषेक ने निर्देशित किया है। 

Date Of Birth : 30 Mar 1977
Birth Place : Faizabaad
अभिषेक चौबे एक भारतीय फिल्म निर्देशक, पटकथा लेखक हैं। वह हिंदी सिनेमा में फिल्म इश्किया के निर्देशन के लिए जाने जातें हैं।  


आनंद बख्शी


महान गीतकार आनंद बक्शी की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रधांजलि
🥀आनंद बख़्शी एक लोकप्रिय भारतीय कवि और गीतकार थे आनंद बख़्शी का जन्म पाकिस्तान के रावलपिंडी शहर में 21 जुलाई 1930 को हुआ था। आनंद बख़्शी को उनके रिश्तेदार प्यार से नंद या नंदू कहकर पुकारते थे। बख़्शी उनके परिवार का उपनाम था, जबकि उनके परिजनों ने उनका नाम 'आनंद प्रकाश' रखा था, लेकिन फ़िल्मी दुनिया में आने के बाद'आनंद बख़्शी' के नाम से उनकी पहचान बनी। आनंद बख़्शी के दादाजी सुघरमल वैद बख़्शी रावलपिण्डी में ब्रिटिश राज के दौरान सुपरिंटेंडेण्ट ऑफ़ पुलिस थे। उनके पिता मोहन लाल वैद बख़्शी रावलपिण्डी में एक बैंक मैनेजर थे, और
जिन्होंने देश विभाजन के बाद भारतीय सेना को सेवा प्रदान की। नेवी में बतौर सिपाही उनका कोड नाम था 'आज़ाद'। आनंद बख़्शी ने केवल 10 वर्ष की आयु में अपनी माँ सुमित्रा को खो दिया और अपनी पूरी ज़िंदगी मातृ प्रेम के पिपासु रह गए। उनकी सौतेली माँ ने उनके साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया। इस तरह से आनंद अपनी दादीमाँ के और क़रीब हो गए। आनंद बख़्शी साहब ने अपनी माँ के प्यार को सलाम करते हुए कई गानें भी लिखे जैसे कि "माँ तुझे सलाम" (खलनायक), "माँ मुझे अपने आंचल में छुपा ले" (छोटा भाई), "तू कितनी भोली है" (राजा और रंक) और "मैंने माँ को देखा है" (मस्ताना)।

'मोम की गुड़िया' सन् 1972 की फ़िल्म थी। यह मोहन कुमार की फ़िल्म थी जिसमें मुख्य कलाकार थे रतन चोपड़ा और तनूजा। यह कम बजट की फ़िल्म थी, जिसमें संगीतकार थे लक्ष्मीकांत प्यारेलाल। यही वह फ़िल्म थी जिसमें पहली बार आनंद बख़्शी को गीत गाने का मौका मिला था। एक बार मोहन कुमार ने बख़्शी साहब को एक चैरिटी फ़ंक्शन में गाते हुए सुन लिया था। उसके बाद उन्होंने लक्ष्मीकांत प्यारेलाल को राज़ी करवाया कि वो कम से कम एक गीत बख़्शी साहब से गवाए 'मोम की गुड़िया' में। और इस तरह से बख़्शी साहब ने एक एकल गीत गाया "मैं ढूंढ रहा था सपनों में"। यह गीत सब को इतनी पसंद आया कि मोहन कुमार ने सब को आश्चर्य चकित करते हुए घोषणा कर दी कि आनंद बख़्शी एक डुएट भी गाएँगे लता मंगेशकर के साथ। और इस तरह से बना "बाग़ों में बहार आई"। इस गीत के रिकार्डिंग के बाद बख़्शी साहब ने उनके साथ युगल गीत गाने के लिए लता जी को फूलों का एक गुलदस्ता उपहार में दिया। फ़िल्म के ना चलने से ये गानें भी ज़्यादा सुनाई नहीं दिए, लेकिन इस युगल गीत को आनंद बख़्शी पर केन्द्रित हर कार्यक्रम में शामिल किया जाता है।

आनंद बख़्शी बचपन से ही फ़िल्मों में काम करके शोहरत की बुंलदियों तक पहुंचने का सपना देखा करते थे, लेकिन लोगों के मज़ाक उड़ाने के डर से उन्होंने अपनी यह मंशा कभी ज़ाहिर नहीं की थी। वह फ़िल्मी दुनिया में गायक के रूप में अपनी पहचान बनाना चाहते थे। आनंद बख़्शी अपने सपने को पूरा करने के लिए 14 वर्ष की उम्र में ही घर से भागकर फ़िल्म नगरी मुंबई आ गए, जहाँ उन्होंने 'रॉयल इंडियन नेवी' में कैडेट के तौर पर 2 वर्ष तक काम किया। किसी विवाद के कारण उन्हें वह नौकरी छोड़नी पड़ी। इसके बाद 1947 से 1956 तक उन्होंने ' भारतीय सेना ' में भी नौकरी की।बचपन से ही मज़बूत इरादे वाले आनंद बख़्शी अपने सपनों को साकार करने के लिए नए जोश के साथ फिर मुंबई पहुंचे, जहाँ उनकी मुलाकात उस जमाने के मशहूर अभिनेता भगवान दादा से हुई। शायद नियति को यही मंजूर था कि आनंद बख़्शी गीतकार ही बने। भगवान दादा ने उन्हें अपनी फ़िल्म 'बड़ा आदमी' में गीतकार के रूप में काम करने का मौक़ा दिया। इस फ़िल्म के जरिए वह पहचान बनाने में भले ही सफल नहीं हो पाए, लेकिन एक गीतकार के रूप में उनके सिने कैरियर का सफर शुरू हो गया। अपने वजूद को तलाशते आनंद बख़्शी को लगभग सात वर्ष तक फ़िल्म इंडस्ट्री में संघर्ष करना पड़ा। वर्ष 1965 में 'जब जब फूल खिले' प्रदर्शित हुई तो उन्हें उनके गाने 'परदेसियों से न अंखियां मिलाना..', 'ये समां समां है ये प्यार का..', 'एक था गुल और एक थी बुलबुल..' सुपरहिट रहे और गीतकार के रुप में उनकी पहचान बन गई। इसी वर्ष फ़िल्म 'हिमालय की गोद में' उनके गीत 'चांद सी महबूबा हो मेरी कब ऐसा मैंने सोचा था..' को भी लोगों ने काफ़ी पसंद किया। वर्ष 1967 में प्रदर्शित सुनील दत्त और नूतन अभिनीत फ़िल्म 'मिलन' के गाने'सावन का महीना पवन कर शोर..', 'युग युग तक हम गीत मिलन के गाते रहेंगे..', 'राम करे ऐसा हो जाए..' जैसे सदाबहार गानों के जरिए उन्होंने गीतकार के रूप में नई ऊंचाइयों को छू लिया। चार दशक तक फ़िल्मी गीतों के बेताज बादशाह रहे आनंद बख़्शी ने 550 से भी ज़्यादा फ़िल्मों में लगभग 4000 गीत लिखे।

यह सुनहरा दौर था जब गीतकार आनन्द बख़्शी ने संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के साथ काम करते हुए 'फ़र्ज़ (1967)', 'दो रास्ते (1969)', 'बॉबी(1973'), 'अमर अकबर एन्थॉनी (1977)', 'इक दूजे के लिए (1981)' और राहुल देव बर्मन के साथ 'कटी पतंग (1970)', 'अमर प्रेम (1971)', हरे रामा हरे कृष्णा (1971)' और 'लव स्टोरी (1981)' फ़िल्मों में
अमर गीत दिये। फ़िल्म 'अमर प्रेम' (1971) के 'बड़ा नटखट है किशन कन्हैया', 'कुछ तो लोग कहेंगे', 'ये
क्या हुआ', और 'रैना बीती जाये' जैसे उत्कृष्ट गीत हर दिल में धड़कते हैं और सुनने वाले के दिल की सदा में बसते हैं। अगर फ़िल्म निर्माताओं के साक्षेप चर्चा की जाये तो राज कपूर के लिए 'बॉबी (1973)', 'सत्यम् शिवम् सुन्दरम् (1978)'; सुभाष घई के लिए 'कर्ज़ (1980)', 'हीरो (1983)', 'कर्मा (1986)', 'राम-लखन (1989)', 'सौदाग़र (1991)', 'खलनायक (1993)', 'ताल (1999)' और 'यादें(2001)'; और यश चोपड़ा के लिए 'चाँदनी (1989)', 'लम्हें (1991)', 'डर (1993)', 'दिल तो पागल है (1997)'; आदित्य चोपड़ा के लिए 'दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे (1995)', 'मोहब्बतें (2000)' फ़िल्मों में सदाबहार गीत लिखे।

आनंद बख़्शी ने शैलेंद्र सिंह, उदित नारायण, कुमार सानू, कविता कृष्णमूर्ति और एस. पी. बालसुब्रय्मण्यम जैसे अनेक गायकों के पहले गीत का बोल भी लिखा है।

आनंद बख़्शी 40 बार 'फ़िल्मफेयर पुरस्कार' के लिए नामित किये गये और चार बार यह पुरस्कार उनके खाते में आया। अंतिम बार 1999 में सुभाष घई की 'ताल' के गीत 'इश्क बिना क्या जीना' के लिए उन्हें फ़िल्मफ़ेयर से नवाजा गया था। इसके अलावा भी उन्होंने कई पुरस्कार प्राप्त किए थे।

सिगरेट के अत्यधिक सेवन की वजह से वह फेफड़े तथा दिल की बीमारी से ग्रस्त हो गए। आखिरकार 72 साल की उम्र में अंगों के काम करना बंद करने के कारण 30 मार्च, 2002 को उनका निधन हो गया।


देवकी रानी

देवकी रानी

महान अभिनेत्री देविका रानी के जन्मदिन पर हार्दिक श्रधांजलि
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देविका रानी भारतीय रजतपट की पहली स्थापित नायिका जो अपने युग से कहीं आगे की सोच रखने वाली अभिनेत्री थीं और उन्होंने अपनी फ़िल्मों के माध्यम से जर्जर सामाजिक रूढ़ियों और मान्यताओं को चुनौती देते
हुए नए मानवीय मूल्यों और संवेदनाओं को स्थापित करने का काम किया था। कवि शिरोमणि गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर के ख़ानदान से ताल्लुक रखने
वाली देविका ने दस वर्ष के अपने फ़िल्मी कैरियर में कुल 15 फ़िल्मों में ही काम किया, लेकिन उनकी हर
फ़िल्म को क्लासिक का दर्जा हासिल है। विषय की गहराई और सामाजिक सरोकारों से जुड़ी उनकी फ़िल्मों ने अंतरराष्ट्रीय और भारतीय फ़िल्म जगत में नए मूल्य और मानदंड स्थापित किए। हिंदी फ़िल्मों की
पहली स्वप्न सुंदरी और ड्रैगन लेडी जैसे विशेषणों से अलंकृत देविका को उनकी ख़ूबसूरती,शालीनता धाराप्रवाह अंग्रेज़ी और अभिनय कौशल के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जितनी लोकप्रियता और सराहना मिली उतनी कम ही अभिनेत्रियों को नसीब हो पाती है

देविका रानी का जन्म 30 मार्च 1908 में वाल्टेयर ( विशाखापटनम ) में हुआ था। वे विख्यात कवि श्री रवीन्द्रनाथ टैगोर के वंश से सम्बंधित थीं, श्री टैगोर उनके चचेरे परदादा थे। देविका रानी के पिता कर्नल एम.एन. चौधरी मद्रास (अब चेन्नई ) के पहले 'सर्जन जनरल' थे। उनकी माता का नाम श्रीमती लीला चौधरी था। स्कूल की शिक्षा समाप्त करने के बाद 1920 के दशक के आरंभिक वर्षों में देविका रानी नाट्य शिक्षा ग्रहण करने के लिये लंदन चली गईं और वहाँ वे 'रॉयल एकेडमी आफ ड्रामेटिक आर्ट' (RADA) और रॉयल 'एकेडमी आफ म्युजिक' नामक संस्थाओं में भर्ती हो गईं। वहाँ उन्हें 'स्कालरशिप' भी प्रदान किया गया। उन्होंने 'आर्किटेक्चर','टेक्सटाइल' एवं 'डेकोर डिजाइन' विधाओं का भी अध्ययन किया और 'एलिजाबेथ आर्डन' में काम करने लगीं।

पढ़ाई पूरी करने के बाद देविका रानी ने निश्चय किया कि वह फ़िल्मों में अभिनय करेगी लेकिन परिवार वाले इस बात के सख्त ख़िलाफ़ थे क्योंकि उन दिनों संभ्रान्त परिवार की लड़कियों को फ़िल्मों में काम नहीं करने दिया जाता था। इंग्लैंड में कुछ वर्ष रहकर देविका रानी ने रॉयल अकादमी ऑफ ड्रामेटिक आर्ट में अभिनय की विधिवत पढ़ाई की। इस बीच उनकी मुलाकात सुप्रसिद्ध निर्माता हिमांशु राय से हुई। हिमांशु राय मैथ्यू अर्नाल्ड की कविता लाइट ऑफ एशिया के आधार पर इसी नाम से एक फ़िल्म बनाकर अपनी पहचान बना चुके थे। हिमांशु राय देविका रानी की सुंदरता पर मुग्ध हो गए और उन्होंने देविका रानी को अपनी फ़िल्म "कर्मा" में काम देने की पेशकश की जिसे देविका ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। यह वह समय था जब मूक फ़िल्मों के निर्माण का दौर समाप्त हो रहा था और रुपहले पर्दे पर कलाकार बोलते नजर आ रहे थे। हिमांशु राय ने जब वर्ष 1933 में फ़िल्म
कर्मा का निर्माण किया तो उन्होंने नायक की भूमिका स्वयं निभायी और अभिनेत्री के रूप में देविका रानी का चुनाव किया। फ़िल्म देविका रानी ने हिमांशु राय के साथ लगभग चार मिनट तक "लिप टू लिप" दृश्य देकर उस समय के समाज को अंचभित कर दिया। इसके लिए देविका रानी की काफ़ी आलोचना भी हुई और फ़िल्म को प्रतिबंधित भी किया गया। इसके बाद हिमांशु राय ने देविका रानी से शादी कर ली और मुंबई आ गए

बांबे_टॉकीज_की_स्थापना

मुंबई आने के बाद हिमांशु राय और देविका रानी ने मिलकर बांबे टॉकीज बैनर की स्थापना की और फ़िल्म 'जवानी की हवा' का निर्माण किया। वर्ष 1935 में प्रदर्शित देविका रानी अभिनीत यह फ़िल्म सफल रही। बाद में देविका रानी ने बांबे टॉकीज के बैनर तले बनी कई फ़िल्मों में अभिनय किया। इन फ़िल्मों में से एक फ़िल्म थी अछूत कन्या। वर्ष 1936 में प्रदर्शित "अछूत कन्या" में देविका रानी ने ग्रामीण बाला की मोहक छवि को रुपहले पर्दे पर साकार किया

1933 में निर्मित कर्मा फ़िल्म देविका के कैरियर का अहम मोड़ साबित हुई। इस फ़िल्म ने अंतरराष्ट्रीय लोकप्रियता हासिल की और उन्हें प्रसिद्धि के शिखर पर पहुंचा दिया। यह यूरोप में रिलीज होने वाली अंग्रेज़ी भाषा में बनी पहली भारतीय फ़िल्म थी। जिसके लंदन में विशेष शो आयोजित किए गए और विंडसर पैलेस में शाही परिवार के लिए इसका विशेष प्रदर्शन भी किया गया। इस फ़िल्म की एक विशेष बात यह थी कि देविका ने उस दौर में चुंबन दृश्य देने का दुस्साहस किया था,
जब इस बारे में कोई सोच भी नहीं सकता था। उन्होंने अपने पति हिमांशु राय के साथ चार मिनट लंबा किसिंग सीन किया था, जो भारतीय फ़िल्म इतिहास के सबसे लंबे चुंबन दृश्यों में माना जाता है फ़िल्म "अछूत कन्या" में अपने अभिनय से देविका ने दर्शकों को अपना दीवाना बना दिया। फ़िल्म में अशोक कुमार एक ब्राह्मण युवक के किरदार मे थे जिन्हें एक अछूत लड़की से प्यार हो जाता है। सामाजिक पृष्ठभूमि पर बनी यह फ़िल्म काफ़ी पसंद की गई और इस फ़िल्म के बाद देविका रानी फ़िल्म इंडस्ट्री में "ड्रीम गर्ल" के नाम से मशहूर हो गई। "अछूत कन्या" के प्रदर्शन के बाद देविका रानी "फर्स्ट लेडी ऑफ इंडियन स्क्रीन"यानी भारतीय रजत पट की पहली पटरानी की उपाधि से सम्मानित किया गया। ड्रीम गर्ल और पटरानी जैसे सम्मान प्राप्त होने से देविका रानी के बारे में यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि उस दौर में वह
कितनी लोकप्रिय रही होंगी। फ़िल्म अछूत कन्या के देविका रानी ने अशोक कुमार के साथ कई फ़िल्मों में अभिनय किया। इन फ़िल्मों में वर्ष 1937 मे प्रदर्शित फ़िल्म"इज्जत" के अलावा फ़िल्म "सावित्री" (1938)और "निर्मला" (1938) जैसी फ़िल्में शामिल है।

प्रचलित सामाजिक मान्यताओं को स्वीकार नहीं करने वाली देविका रानी के साथ किस्मत ने भी क्रूर मजाक किया और 1940 में हिमांशु राय का निधन हो गया। इस विपदा को भी साहस के साथ झेलकर उन्होंने पति के स्टूडियो बांबे टाकीज पर नियंत्रण के लिए संघर्ष किया। 1945 में उन्होंने रूसी चित्रकार स्वेतोस्लाव रोरिक' से शादी कर स्थाई रूप से उनके साथ बेंगलूर में रहने लगी जहाँ वह 1994 में अपने निधन तक रही

सम्मान_और_पुरस्कार

देविका रानी को भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार और सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार सहित दर्जनों सम्मान मिले। फ़िल्मों से अलग होने के बाद भी वह विभिन्न कलाओं से जुड़ी रहीं। वह नेशनल एकेडमी के अलावा ललित कला अकादमी, राष्ट्रीय हस्तशिल्प बोर्ड तथा भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद जैसी संस्थाओं से संबद्ध रहीं इसके अलावा देविका रानी फ़िल्म इंडस्ट्री की प्रथम महिला बनी जिन्हें पद्मश्री से नवाजा गया।

अपने दिलकश अभिनय से दर्शकों के दिलो पर राज करने वाली देविका रानी का 9 मार्च , 1994 में बैंगलुरु में  निधन हो गया

पलक मुछल

नये जमाने की पार्श्वगायिका पलक मुच्छल के जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनाएं
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पलक मुच्छल (जन्म तारीख़: 30 मार्च 1992) एक भारतीय पार्श्व गायिका हैं। वे और उनके छोटे भाई पलाश मुच्छल भारत तथा विदेशो में सार्वजनिक मंच पर गाने गाकर ह्रदय पीड़ित छोटे बच्चो के इलाज के लिए चंदा इकट्ठा करते है। उन्होने मई 2013 तक ढाई करोड रुपयो का चंदा इकट्ठा कर 572 बच्चो की जान बचाने के लिये वित्तीय सहायता प्रदान की है। पलक के इस समाज सेवा में योगदान के लिये उनका नाम गिनीज़ बुक ऑफ रिकॉर्ड्स तथा लिम्का बुक ऑफ़ रिकार्ड्स में भी दर्ज है। भारत सरकार और विभिन्न सामाजिक संस्थाओं ने उन्हें कई पुरस्कारों से सम्मानित किया है। सन 2011 में पलक ने हिन्दी फिल्मों में पार्श्व गायिका के रूप में गाना शुरु किया। उनके खासकर एक था टाइगर और आशिकी 2 फिल्मों के गानों की काफी सराहना हुई।

पलक मुच्छल का जन्म 30 मार्च 1992 के दिन भारत के मध्य प्रदेश राज्य के इंदौर शहर में एक मध्यम वर्गीय माहेश्वरी मारवाड़ी परिवार में हुआ।उनके परिवार में उनकी माता अमिता मुच्छल, पिता राजकुमार मुच्छल और छोटे भाई पलाश मुच्छल शामिल हैं। उनके पिता एक निजी संस्था में लेखाकार के रूप में कार्यरत है। पलक इंदौर के क्विन्स कॉलेज में वाणिज्य स्नातक के आखरी साल की छात्रा है।पलक ने चार साल की उम्र में गाना शुरु किया। उन्होंने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा प्राप्त कि है और वे भारत कि 17 विभिन्न भाषाओं में गा सकती हैं।

पलक चार साल की उम्र में "कल्याणजी-आनंदजी लिटल स्टार", जो कि नवोदित गायको का इंदौर शहर में एक समूह था, उसकी सदस्य बनीं।जब 1999 में भारत का पाकिस्तान के साथ कारगिल युद्ध छिड़ा और भारतीय सैनिक अपने देश के लिए प्राणों की आहुति दे रहे थे तब सात साल की पलक ने शहिद सैनिको के परिवारो की मदद हेतु इंदौर शहर के बाज़ारों कि दुकानो की सामने गाने गाकर चंदा जमा करना शुरु किया। उनके इस प्रयास की भारतीय मिडिया में काफी चर्चा हुई। पलक ने उस वक्त पच्चीस हजार रुपयों का चंदा ईकट्ठा किया। उसी साल जब उड़ीसा राज्य चक्रवात के चपेट में आया तब उन्होंने पीड़ितों की सहायता के लिए चंदा ईकट्ठा किया।

जब पलक ने गरीब और असहाय छोटे बच्चो को अपने बदन के कपड़ों से रेलगाडी के डिब्बे साफ करते हुए देखा, तब उन्होंने गरीब बच्चो की मदद करने का मन बनाया।करीबन उसी वक्त इंदोर के निधी विनय मंदिर शाला के शिक्षको ने अपने छात्र लोकेश की मदद हेतु पलक से संपर्क किया। लोकेश ह्रदय कि बिमारी से पीड़ित था। एक दिन में महज 50 रुपये कमानेवाले लोकेश के पिता बहुत गरीब थे और लोकेश का दिल का ऑपरेशन का 80,000 रुपये खर्चा उठाने में असमर्थ थे। शिक्षकों ने पलक से अपने गानों के जरीये चंदा जमा करने कि विनंती की। उनका सम्मान करते हुए पलक ने मार्च 2000 में अपने गायिकी सार्वजनिक प्रदर्शनी का आयोजन किया और सड़क के एक ठेले को ही रंगमंच बनाकर अपने गानों से लोगो को लुभाया। एक ही प्रदर्शनी में पलक ने लोकेश के ऑपरेशन के लिए 51,000 रुपयो का चंदा इकट्ठा किया। पलक के इस प्रयास की टेलेविजन पर काफी चर्चा हुई और बंगलोर के एक डॉक्टर देवी प्रसाद शेट्टी ने लोकेश का ऑपरेशन मुफ्त कराने की पेशकश की। बचे चंदे का सदुपयोग करने हेतु पलक के माता-पिता ने अखबारों में इश्तिहार दिया ताकि लोकेश जैसे किसी बच्चे के दिल के ऑपरेशन हेतु चंदे का ऊपयोग हो सके। 33 बच्चो के पालकों ने पलक के माता-पिता से संपर्क किया।

इसके चलते पलक ने उस साल कई सार्वजनिक प्रदर्शनियों का आयोजन किया और 2.25 लाख रुपयो का चंदा ईकट्ठा किया जो बंगलौर और इंदौर के अस्पतालों में 5 बच्चो के दिल के ऑपरेशन के लिए खर्च किया गया। इस प्रयास में इंदौर के टी चोईथराम अस्पताल ने सहयोग करते हुए ऑपरेशन की फिस घटाकर 80,000 रुपयो से 40,000 रुपये कर दी और एक शल्यचिकित्सक धीरज गांधी नें ऑपरेशन कि फीस न लेने का फैसला किया।

सन 2000 से पलक ने अपने भाई पलाश के साथ चंदा ईकट्ठा करने हेतु देश-विदेश में कई प्रदर्शनियों का आयोजन किया है। अपने अभियान से संजोगता बनाते हुए उन्होंने अपनी प्रदर्शनी का नाम "दिल से दिल तक" रखा है। पलक अपने प्रदर्शनी में औसतन 40 गाने गाती हैं जिनमे हिन्दी फिल्मों के प्रसिद्द गाने, भजन तथा ग़ज़ल शामिल होते हैं।

सन 2001 में पलक ने गुज़रात के भूकंप पीड़ितों की सहायता के लिए 10 लाख रुपयो का चंदा ईकट्ठा किया। पलक की पीड़ित बच्चों के प्रति सहानुभुती सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है। जुलाई 2003 पलक ने पाकिस्तान की नागरिक बच्ची, जो ह्रदय रोग से पीड़ित थी और भारत में इलाज के लिए आई थी, उसके लिए वित्तीय सहायता की पेशकश की। दिसम्बर 2006 तक पलक ने अपने धर्माध संगठन पलक मुच्छल हार्ट फाऊंडेशन के लिए कुल 1.2 करोड़ रुपयों की राशि ईकट्ठा कि थी जिससे 234 बच्चों का ऑपरेशन किया गया। पैसों की कमी की वजह से किसी बच्चे का ऑपरेशन ना रुके, ये सुनिश्चीत करने के लिए पलक मुच्छल हार्ट फाऊंडेशन को दस लाख रुपये ओवरड्राफ्ट की अनुमती दी है।

जून 2009 तक पलक ने कुल 1.71 करोड रुपयों की राशि ईकट्ठा कि थी जिससे 338 बच्चो कि जान बचायी जा सकी। इस धर्मार्थ संगठन के पैसों से पलक या उनके परिवारवालों को कोई व्यक्तिगत लाभ नहीं होता। लाभार्थी बच्चों से पलक एक गुड़िया प्रतीक के रूप में स्वीकार करती है।

सन 2011 में पलक ने हिन्दी फिल्मों में पार्श्व गायिका के रूप में कदम रखा मगर उनका ह्रदय रोग पीड़ित बच्चों की मदद करने का अभियान अब भी जारी है। मई 2013 तक उन्होने पलक मुच्छल हार्ट फाऊंडेशन के लिए तकरीबन ढाई करोड़ रुपयों की राशि जमा की थी जिससे 572 बच्चो का ऑपरेशन हो सका और उनकी जान बचाई जा सकी। 621 ह्रदय रोग पीड़ित बच्चे अब भी उनकी इंतजार सूची में है जिनकी मदद के लिए पलक के प्रयास जारी है

मुच्छल बचपन से ही बॉलीवुड में पार्श्वगायिका बनाना चाहती थीं। उन्होंने अपने बचपन और किशोरावस्था के दिनों में छह गैर-फ़िल्मी संगीत एल्बम भी रिलीज़ की। 2001 में जब वे नौ साल की थीं, तब उनकी पहली एल्बम "चाइल्ड फॉर चिल्ड्रन" टिप्स म्यूजिक द्वारा रिलीज़ की गयी थी। 2003 में उनकी दूसरी एल्बम पलकें भी रिलीज़ हुई। बाद के वर्षों में उन्होंने अपनी बाकी एल्बम "आओ तुम्हे चाँद पर ले जाएँ", "बेटी हूँ महाकाल की", "दिल के लिए भी रिलीज़ की। 2011 में टी-सीरीज़ ने उनकी एल्बम "जय जय देव गणेश" रिलीज़ की। 2006 में अपने गायन व्यवसाय के लिए बॉलीवुड में अवसर प्राप्त करने के लिए वे इंदौर से मुम्बई चली गयीं। सन 2011 में पलक ने हिन्दी फिल्मों की दुनिया में पार्श्व गायिका के रूप में कदम रखा। उन्होंने अपने व्यावसायिक जीवन का पहला गाना सन 2011 की फिल्म दमादम के लिए गाया। उसके बाद उन्होंने ना जाने कबसे, एक था टाइगर, फ्रॉम सिडनी विथ लव, आशिकी 2 और बंगाली फिल्म रॉकी के लिए गाने गाये। एक था टाइगर का गाना "लापता" हिट हुआ और वे बॉलीवुड में सफल गायिका के तौर पर स्थापित हो गयीं। आशिक़ी 2 में उनके गाये गानों से वे सनसनी बन गयी। बॉलीवुड में अपने प्रवेश के बाद, उन्होंने हिमेश रेशमिया द्वारा संगीतबद्ध लगभग हर फिल्म में गाने गाये। 2014 में हिमेश के संगीत निर्देशन में उन्होंने मीका सिंह के साथ किक फ़िल्म के लिए "जुम्मे की रात" गाना गाया जो साल का सबसे बड़ा हिट गाना रहा। बाद में उहोने कई हिट गाने गाये। वे सलमान खान को बॉलीवुड में अपनी सफलता का श्रेय देती हैं।

बुधवार, 29 मार्च 2023

जगदीप

महान हास्य अभिनेता जगदीप उर्फ सैय्यद इश्तियाक अहमद जाफरी के जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धांजलि
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सैय्यद इश्तियाक अहमद जाफ़री  भारतीय सिनेमा के मशहूर हास्य अभिनेता थे। उन्होंने अपने हास्य अभिनय से दर्शकों में काफ़ी लोकप्रियता हासिल की। उन्होंने अपने कॅरियर की शुरुआत बाल कलाकार के रूप में फ़िल्म 'अफसाना' से की थी। जगदीप ने 400 से अधिक फ़िल्मों काम किया। उन्हें लोग उनके वास्तविक नाम से न जानकर 'जगदीप' नाम से जानते हैं। वे साल 1975 में आई मशहूर फिल्म 'शोले' में 'सूरमा भोपाली' के किरदार से काफी चर्चा बटोरने में कामयाब रहे थे।
परिचय

हिन्दी सिनेमा जगत् के प्रसिद्ध हास्य कलाकार जगदीप का जन्म 29 मार्च, 1939 को मध्य प्रदेश के दतिया ज़िले में हुआ। उनका पूरा नाम सैय्यद इश्तियाक अहमद जाफ़री है। उनको दो बेटे जावेद जाफ़री और नावेद जाफ़री भी हास्य कलाकार हैं, जिन्होंने ‘बूगी-बूगी’ जैसे लोकप्रिय कार्यक्रम को होस्ट किया था।

फ़िल्मी_कॅरियर

अपने हाव भाव से दर्शकों को हंसाने वाले जगदीप ने उस दौर में काम किया, जब फ़िल्म उद्योग में महमूद, जॉनी वॉकर, घूमल, केश्टो मुखर्जी जैसे हास्य कलाकार मौज़ूद थे। जगदीप ने अपने फ़िल्मी कॅरियर की शुरुआत बाल कलाकार के रूप में बी. आर. चोपड़ा की फ़िल्म अफसाना से की। इसके बाद चाइल्ड आर्टिस्ट के रूप में ही उन्होंने 'लैला मजनूं' में काम किया। उसके बाद उन्हें के. ए. अब्बास, विमल राय ने भी मौके दिए। जगदीप ने हास्य भूमिका विमल राय की फ़िल्म 'दो बीघा जमीन' से करने शुरू किए थे इस फ़िल्म ने उन्हें एक नई पहचान दी। इसके बाद उन्होंने बहुत सी कामयाब फ़िल्मों में काम किया। अपने हास्य अभिनय से उन्होंने दर्शकों के दिल में अपने लिए जगह बना ली और फ़िल्म जगत् में सफलता हासिल की।

प्रमुख_फ़िल्में

400 से भी ज़्यादा फ़िल्मों में काम कर चुके जगदीप ‘शोले’, फिर वही रात, कुरबानी, शहनशाह, अंदाज अपना-अपना जैसी फ़िल्मों में काम कर चुके हैं। साल 1957 में आयोजित ‘बाल फ़िल्म समारोह’ के अंतिम दौर के लिए चुनी गयीं 3 फ़िल्में ‘मुन्ना’ (1954), ‘अब दिल्ली दूर नहीं’ और ‘हम पंछी एक डाल के’ (1957) में जगदीप ने अहम भूमिका निभाई।

यादगार_भूमिका

जगदीप ने कई फ़िल्मों में हास्य किरदार निभाए। हालांकि, फ़िल्म 'शोले' में उनके किरदार 'सूरमा भोपाली' को दर्शकों ने इतना पसंद किया गया कि वे दर्शकों के बीच इसी नाम से लोकप्रिय हो गये। शोले का सूरमा भोपाली हमेशा से ही लोगों के जेहन में मौज़ूद रहने वाला चरित्र रहा है। आज भी अगर लोग उनको याद करते हैं तो शोले में निभाया गया यह किरदार कभी नहीं भूलते। सूरमा भोपाली का किरदार इतना चर्चित हुआ कि इसी नाम से जगदीप ने एक फ़िल्म का निर्देशन भी कर दिया था।

मृत्यु

एक हास्य अभिनेता के रूप में प्रसिद्धि पा चुके जगदीप का निधन 81 साल की उम्र में 8 जुलाई, 2020 को हुआ। बढ़ती उम्र से होने वाली दिक्कतों के चलते उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए। रात 8.40 पर उनका निधन मुंबई स्थित अपने घर पर हुआ।

फ़िल्म निर्देशक उत्पल दत्त

महान अभिनेता एवम् फ़िल्म निर्देशक उत्पल दत्त के जन्मदिन पर हार्दिक श्रधांजलि
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उत्पल दत्त भारतीय सिनेमा के ऐसे प्रसिद्ध अभिनेता थे, जिन्होंने हिन्दी और बांग्ला फ़िल्मों में अपनी अमिट छाप
छोड़ी। एक अभिनेता के रूप में उत्पल दत्त ने लगभग हर किरदार को निभाया। हिन्दी पर्दे पर कभी पिता तो कभी चाचा ,कहीं डॉक्टर तो कहीं सेठ,कभी बुरे तो बहुधा अच्छे बने 'उत्पल दा' को दर्शक किसी भी रूप में नहीं भूल सकेंगे। उत्पल दत्त को अधिकतर एक हास्य अभिनेता के रूप में याद किया जाता है। वर्ष 1979 की सुपरहिट फ़िल्म 'गोलमाल' में उनके द्वारा निभाया गया 'भवानी शंकर' का शानदार हास्य अभिनय आज भी याद किया जाता है। उत्पल दत्त एक उच्च दर्जे के अभिनेता ही नहीं, एक कुशल निर्देशक और नाटककार भी थे।सीरियल से लेकर कॉमेडी तक के हर रोल को उन्होंने बड़ी संजीदगी से निभाया था।

उत्पल दत्त का जन्म 29 मार्च, 1929 को पूर्वी बंगाल (ब्रिटिश भारत) के बारीसाल में एक हिन्दू परिवार में हुआ था। इनके ‌ पिता का नाम गिरिजारंजन दत्त था,जिन्होंने अपने पुत्र को पढ़ाई के लिए कोलकाता (भूतपूर्व कलकत्ता) भेजा। उत्पल जी ने वर्ष 1945 में मेट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की और फिर 1949 में 'सेंट जेवियर कॉलेज', कोलकाता से अंग्रेज़ी साहित्य में स्नातक की डिग्री प्राप्त की।

वर्ष 1960 में उत्पल दत्त ने थिएटर और फ़िल्म एक्ट्रेस शोभा सेन से विवाह किया। डॉक्टर बिष्णुप्रिया उनकी एक मात्र संतान हैं।

1940 में उत्पल दत्त अंग्रेज़ी थिएटर से जुड़े और अभिनय की शुरूआत कर डाली। शेक्सपियर साहित्य से उत्पल जी का बेहद लगाव था। इस दौरान उन्होंने थिएटर कंपनी के साथ भारत और पाकिस्तान में कई नाटक मंचित किए। नाटक 'ओथेलो' से उन्हें काफ़ी वाहवाही मिली थी। बाद में उत्पल दत्त का रुझान अंग्रेज़ी से बंगाली नाटक की ओर गया। 1950 के बाद उन्होंने एक प्रोडक्शन कंपनी जॉइन कर ली और इस तरह उनका बंगाली फ़िल्मों से कैरियर शुरू हो गया। बंगाली फ़िल्मों के साथ उनका थिएटर से प्रेम भी जारी रहा। इस दौरान उन्होंने कई नाटकों को निर्देशन ही नहीं बल्कि लेखन कार्य भी किया। बंगाली राजनीति पर लिखे उनके नाटकों ने कई बार विवाद को भी जन्म दिया।

1950 में मशहूर फ़िल्मकार मधु बोस ने उन्हें अपनी फ़िल्म 'माइकल मधुसुधन' में लीड रोल दिया, जिसे काफ़ी सराहा गया।इसके बाद उत्पल दत्त ने सत्यजीत रे
की फ़िल्मों में भी काम किया।हिन्दी सिनेमा में उत्पल दत्त एक महान हास्य अभिनेता के रूप में जाने जाते थे। हालांकि उन्होंने बहुत कम फ़िल्मों में काम किया। 'गुड्डी', 'गोलमाल', 'नरम-गरम', 'रंग बिरंगी' और 'शौकीन'।
उत्पल दत्त हिन्दी सिनेमा में अत्यंत व्यस्त काफ़ी देर में हुए थे, वैसे बंगाली रंगमंच तथा सिनेमा में उनका बहुत नाम था। उन्होंने हिन्दी फ़िल्मों की अपनी लंबी सूची में बहुधा हास्य प्रधान भूमिकाएं की थीं। मगर अमिताभ बच्चन की प्रथम फ़िल्म 'सात हिन्दुस्तानी' में वे भी एक हिन्दुस्तानी थे। बल्कि एक तरह से देखा जाय तो उत्पल जी ही मुख्य भूमिका में थे और अमिताभ बच्चन समेत अन्य सभी कलाकार सहायक भूमिकाएं निभा रहे थे।उसी तरह से सत्तर के दशक में भारतीय समांतर सिनेमा की नींव जिन फ़िल्मों से रखी गई थी, उन प्रमुख कृतियों में 'भुवन शोम' भी थी और उसके नायक भी उत्पल दत्त थे। इस फ़िल्म के अभिनय के लिए उत्पल जी को वर्ष 1970 में श्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला था। मगर हिन्दी सिनेमा में उनको भरपूर प्रतिष्ठा और काम ऋषिकेश मुखर्जी की 'गोलमाल' से मिली, जो न आर्ट फ़िल्म बनाते थे और न ही कमर्शियल फ़ार्मुला फ़िल्म।
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फ़िल्म 'गोलमाल' में ऋषिदा (ऋषिकेश मुखर्जी) ने उत्पल दत्त की गंभीर छवि के विपरित 'भवानीशंकर' के एक ऐसे पात्र की भूमिका दी, जिन्हें मूछों से अधिक लगाव था। हीरो अमोल पालेकर से लेकर दीना पाठक तक के सभी अदाकारों का हास्य अभिनय आज भी एक मिसाल है। किंतु उत्पल दा गंभीर रहकर भी इतना हंसा गए थे कि उस वर्ष 'बेस्ट कमेडियन' का फ़िल्मफ़ेयर एवार्ड उन्हें मिला था। फ़िल्म 'गोलमाल' में उत्पल जी जिस अंदाज़ से 'अच्छाआ....' बोलते थे, वो उनका ट्रेड मार्क बन गया था।
आज भी मिमिक्री आर्टिस्ट उस तकिया कलाम को बोलते हैं, तो दर्शक समझ जाते हैं कि वह उत्पल दत्त की नकल कर रहे हैं। हिन्दी फ़िल्मों में फिर तो उनको हलकी-फुलकी भूमिकाएं मिलतीं गईं। तब ये कौन सोच सकता था कि बंगाली और हिन्दी मनोरंजन जगत के इस दिग्गज अभिनेता ने अपना करियर अंग्रेज़ी रंगमंच से प्रारम्भ किया था।

पुरस्कार व सम्मान

फ़िल्म 'गोलमाल' के लिए उत्पल दत्त को 'फ़िल्म फ़ेयर बेस्ट कॉमेडियन अवार्ड' से नवाजा गया था। बंगाली सिनेमा में फ़िल्म 'भुवन शोमे' के लिए उन्हें 'बेस्ट एक्टर' के तौर पर 'नेशनल फ़िल्म अवार्ड' दिया गया था। उत्पल जी के हास्य अभिनय को ऋषिकेश मुखर्जी से ज्यादा
शायद ही किसी अन्य निर्देशक ने काम में लिया होगा। 'गोलमाल' की तरह 'नरम गरम' में भी उनकी जोड़ी अमोल पालेकर के साथ थी और उस में भी उन्हें 'श्रेष्ठ हास्य अभिनेता' का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार प्राप्त हुआ था। ऋषिदा की ही 'रंगबिरंगी' ने भी उत्पल दत्त को वही एवार्ड फिर एक बार दिलवाया। किसी एक ही निर्देशक के निर्देशन में किसी एक विभाग में तीन ट्रॉफियाँ जीतने का यह कारनामा विरले ही दिखाई देता है।

उत्पल दत्त 20वीं शदी के प्रोग्रेसिव बंगाली थिएटर के महान नाटककार थे।हिन्दी सिनेमा में अपनी छाप छोड़ने के बावजूद भी उन्होंने नाटक से नाता नहीं तोड़ा। उत्पल जी बड़े मार्क्सवादी विचारों वाले व्यक्ति थे। वे अक्सर वामपंथी दलों के लिए क्रांतिकारी नाटक करते थे। इस कारण उन्हें कांग्रेस ने 1965 में जेल में भी डाल दिया था। 1970 में प्रतिबंध के बावजूद भी उनके तीन नाटकों- 'दुश्वापनेर नगरी', 'एबार राजर पाला' और 'बेरिकेड' के ‌लिए लोगों की बहुत बड़ी उमड़ी थी।

बाद के समय में उत्पल दत्त ने बहुत-सी फ़िल्मों का निर्देशन भी किया, जिनमें- 'मेघ', 'घूम भांगर गान', 'झार', 'बेखाखी मेघ', 'मा' और 'इंकलाब के बाद' आदि।

हिन्दी तथा बांग्ला सिनेमा में विशिष्ट योगदन करने वाले प्रसिद्ध अभिनेता तथा निर्माता उत्पल दत्त जी का निधन 19 अगस्त , 1993 को हुआ।

धूमल

धूमल
प्रसिद्ध हास्य अभिनेता धूमाल के जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धांजलि
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अनंत बलवंत धूमल लोकप्रिय नाम धूमाल (29 मार्च 1914 - 13 फरवरी 1987) को बॉलीवुड फिल्मों में एक अभिनेता के रूप में जाना जाता था जो चरित्र भूमिकाएं निभाने के लिए जाने जाते थे।  उन्होंने कई फिल्मों में अभिनय किया और 1940 के दशक के मध्य से 1980 के दशक तक सक्रिय रहे।  उन्होंने अपने अभिनय करियर की शुरुआत मराठी थिएटर से की, जिसने मराठी सिनेमा के लिए मार्ग प्रशस्त किया और बाद में वे हिंदी सिनेमा में चले गए, जहाँ उन्होंने ज्यादातर कॉमेडी भूमिकाएँ निभाईं और बाद में अपने करियर में, चरित्र भूमिकाएँ। उन्होंने हावड़ा ब्रिज (1958), बॉम्बे का बाबू (1960), कश्मीर की कली (1964), गुमनाम (1965), दो बदन (1966), लव इन टोक्यो (1966)और बेनाम (1974) जैसी उल्लेखनीय फिल्मों में काम किया।

अभिनय में उनका करियर तब शुरू हुआ जब उन्होंने एक ड्रामा कंपनी ज्वाइन की, जहाँ उन्होंने ड्रिंक्स सर्व किया और बर्तन धोए।  ऐसे मौके आये जब छोटी भूमिकाएं निभाने वाले कलाकार नहीं आये  इससे स्पॉट बॉयज को उसको प्ले करने का मौका मिला इस तरह धूमाल नाटकों में छोटी भूमिकाओं के साथ उतरे

इस अवधि के दौरान, उन्होंने पी के अत्रे और नाना साहेब फाटक से मुलाकात की, वह दोनों नाटक जगत के बड़े नाम थे जल्द ही, उन्हें पहचाना जाने लगा और बड़ी भूमिकाएं उनको मिलने लगी हालाँकि वे अंततः फिल्मों में एक कॉमेडियन के रूप में प्रसिद्ध हो गए, उन्हें एक कॉमिक खलनायक के रूप में अधिक जाना जाता था।  उन्होंने लगना ची बेदी और घर बहार जैसे प्रसिद्ध नाटकों में प्रमुख भूमिकाएँ निभाईं।

मंच से, उन्होंने अपना ध्यान सिल्वर स्क्रीन पर स्थानांतरित कर दिया।  उन्होंने वो कौन थी आँखे गुमनाम आरज़ू और ससुराल जैसी बड़ी फिल्मों में काम किया।  उनकी पहली फिल्म एक मराठी फिल्म थी जिसका नाम पेडगाँवचे शेहेन (1952) था जिसमें उन्होंने एक दक्षिण भारतीय की भूमिका निभाई थी। 

उन्होंने कई हिंदी फिल्मों, जैसे ससुराल (1961) में साथी हास्य कलाकार महमूद और शोभा खोटे के साथ काम किया

13 फरवरी 1987 को दिल का दौरा पड़ने से धूमाल की मृत्यु हो गई।

https://youtu.be/f2_ThWMDSWk

शाम सुंदर कलानी

धारावाहिक रामायण में सुग्रीव की भूमिका निभाकर प्रसिद्ध हुए अभिनेता श्याम सुंदर कलानी की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि
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श्याम सुंदर कलानी जन्म- 1940, जबलपुर, मध्य प्रदेश; मृत्यु- 29 मार्च, 2020, पंचकुला, हरियाणा) छोटे पर्दे (टी.वी.) के अभिनेता थे। दूरदर्शन के प्रसिद्ध धारावाहिक 'रामायण' में उन्होंने सुग्रीव की भूमिका निभाई थी। इस एक भूमिका ने ही उन्हें पूरे भारत में पहचान दिला दी थी।

श्याम सुंदर कलानी का जन्म 1940 में मध्य प्रदेश के जबलपुर शहर में हुआ था।
अभिनय के क्षेत्र में उन्हें पहला अवसर रामानंद सागर की 'रामायण' से ही मिला था।
धारावाहिक 'रामायण' में श्याम सुंदर कलानी के द्वारा निभाये गए सुग्रीव के रोल को काफ़ी सराहा गया। सुग्रीव के रोल में वह घर-घर पहचाने जाने लगे थे। 'रामायण' में राम की भूमिका अरुण गोविल, लक्ष्मण की भूमिका सुनील लहरी और सीता की भूमिका दीपिका चिखालिया ने निभाई थी। जबकि हनुमान की भूमिका प्रसिद्ध भारतीय पहलान रहे दारा सिंह ने निभाई।
फ़िल्म जगत में श्याम सुंदर कलानी को ज़्यादा काम नहीं मिल सका। वह संवाद (डायलॉग) याद नहीं रख पाते थे, जिस कारण वे फ़िल्मी गलियारे में बड़ी पहचान बनाने में असफल रहे और फिर बाद में सब कुछ छोड़कर घर वापस लौट आए।
मृत्यु
श्याम सुंदर कलानी का निधन 29 मार्च, 2020 को हुआ।

राम की भूमिका करने वाले अरुण गोविल ने ट्वीट करते हुए सुग्रीव यानी श्याम सुंदर कलानी को श्रद्धांजलि दी। उन्होंने लिखा, "श्याम कलानी के निधन की खबर सुनकर बहुत दु:खी हूं, रामानंद सागर के रामायण में सुग्रीव का किरदार निभाने वाले श्याम कलानी बहुत अच्छी शख्सियत और सज्जन व्यक्ति थे। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे।"

लक्ष्मण बने सुनील लहरी ने भी ट्वीट कर श्याम कलानी को श्रद्धांजलि दी। उन्होंने लिखा, "रामायण में हमारे सहयोगी श्याम कालानी के आकस्मिक निधन को सुनकर बहुत दु:ख और खेद है। रामायण में बालि और सुग्रीव की भूमिका निभाने वाले श्याम कलानी की आत्मा को भगवान शांति दे, साथ ही इस दु:ख से निकलने में उनके परिवार को शक्ति दे।"

मंगलवार, 28 मार्च 2023

सुष्मिता सेन

सुष्मिता सेन (Sushmita Sen) एक भारतीय अभिनेत्री, मॉडल और सौंदर्य रानी हैं, जिन्हें 1994 में फेमिना मिस इंडिया यूनिवर्स का ताज पहनाया गया था और बाद में उन्होंने 18 साल की उम्र में मिस यूनिवर्स 1994 की प्रतियोगिता जीती थी। सुष्मिता प्रतियोगिता जीतने वाली पहली भारतीय महिला है। अपने करियर में, सुष्मिता हिंदी, तमिल और बंगाली जैसे विभिन्न भाषाओं की फिल्मों में दिखाई दी हैं।

सुष्मिता सेन बॉलीवुड की जानी-मानी भारतीय मॉडल और अभिनेत्री हैं. उनका जन्‍म 19 नवंबर 1975 को हैदराबाद में हुआ था. सुष्मिता सेन वायुसेना के सेवानिवृत विंग कमांडर सुबीर सेन और ज्वैलरी डिजाइनर सुभा सेन की बेटी हैं. सुष्मिता सेन पहली बार 1994 में मिस इंडिया का खिताब जीतने के बाद सुर्खियों में आईं. खास बात यह थी कि इस खिताब के लिए उनकी टक्कर ऐश्वर्या राय के साथ थी. उन्होंने ऐश्वर्या को पछाड़ते हुए मिस यूनिवर्स का खिताब हासिल किया. उसी साल ऐश्वर्या राय ने ‘मिस व‌र्ल्ड’ का खिताब जीता.

1997 में महेश भट्ट की फ़िल्म ‘दस्तक’ से सुष्मिता सेन ने फ़िल्मी दुनिया में कदम रखा. इस फिल्म में उन्होंने अपने ही चरित्र को जीया. हालांकि फिल्म को सफलता नहीं मिली. दूसरी फ़िल्म ‘जोर’ भी नहीं चली. उनको पहली सफलता फ़िल्म ‘सिर्फ तुम’ के ‘दिलबर दिलबर गाने’ में मिली, जिसमें उनकी अदाओं को दर्शकों ने पसंद किया. डेविड धवन की फ़िल्म ‘बीवी नंबर वन’ में सुष्मिता सेन ने बीवी नंबर टू का रोल किया और यह उनकी पहली हिट फ़िल्म साबित हुई. उनकी चर्चित फ़िल्मों में ‘आंखें’, ‘समय’, ‘मैं हूं ना’, ‘बेवफा’, ‘मैंने प्यार क्यों किया’, ‘चिंगारी’, ‘दस्तक’,‘सिर्फ तुम’, ‘बीवी नंबर वन’, ‘आगाज’, ‘फिजा’, ‘नो प्रॉब्लम’ जैसी फिल्में शामिल हैं.

फ़िल्मी कैरियर

1997 में महेश भट्ट की फ़िल्म 'दस्तक' से सुष्मिता सेन ने फ़िल्मी दुनिया में पर्दापण किया, जिसमें उन्होंने अपने ही चरित्र को जिया। फ़िल्म को सफलता नहीं मिली। दूसरी फ़िल्म 'जोर' भी नहीं चली। उनको पहली सफलता फ़िल्म 'सिर्फ तुम' के दिलबर दिलबर गाने में मिली, जिसमें उनकी अदाओं को दर्शकों ने पसंद किया। डेविड धवन की फ़िल्म 'बीवी नंबर वन' में सुष्मिता सेन ने बीवी नंबर टू का रोल किया और यह उनकी पहली हिट फ़िल्म साबित हुई। उनकी चर्चित फ़िल्मों में आंखें, समय, मैं हूं ना, बेवफा, मैंने प्यार क्यों किया और फ़िल्म 'चिंगारी' के नाम शामिल हैं।

प्रमुख फ़िल्में

दस्तक, ज़ोर ,सिर्फ तुम , बीवी नंबर वन , हिंदुस्तान की कसम,  आगाज , बस इतना सा ख्वाब है ,  क्योंकि मैं झूठ नहीं बोलता , फिलहाल , तुमको न भूल पाएंगे , आंखें , लीला , समय ,  पैसा वसूल , मैं हूं न , वास्तुशात्र ,  बेवफा , मैं ऐसा ही हूं ,  मैंने प्यार क्यों किया ,  चिंगारी ,  राम गोपाल वर्मा की आग ,  डू नॉट डिस्टर्ब ,  दूल्हा मिल गया ,  नो प्रॉब्लम

मॉडलिंग कैरियर

फेमिना मिस इंडिया

1994 में, किशोरी के रूप में, सुष्मिता ने फेमिना मिस इंडिया प्रतियोगिता में भाग लिया। उन्होंने मिस यूनिवर्स 1994 प्रतियोगिता में प्रतिस्पर्धा करते हुए ‘फेमिना मिस इंडिया यूनिवर्स’ का शीर्षक जीता।

मिस यूनीवर्स

मिस यूनिवर्स प्रतियोगिता में, सुष्मिता प्रारंभ में तीसरे स्थान पर रही। सुष्मिता बाद के राउंड में दूसरे, पांचवें और तीसरे स्थान पर रही और आखिर में मिस यूनिवर्स 1994 का खिताब और ताज जीता। वह खिताब जीतने वाली पहली भारतीय थी।

मिस यूनिवर्स 2016

पेजेंट जीतने के 23 साल बाद 65 वें मिस यूनिवर्स 2016 सौंदर्य पृष्ठ के जज में वह एक के रूप में थी। पेजेंट 30 जनवरी, 2017 को फिलीपींस के मेट्रो मनीला के मॉल ऑफ एशिया एरेना, पासय में हुआ था।

सम्मान और पुरस्कार

o   वर्ष 1994 में सुष्मिता सेन ने मिस इंडिया व मिस यूनिवर्स का ख़िताब जीता ।

o   उन्हें राजीव गांधी पुरस्कार, आईआईएफए (IIFA) पुरस्कार, दो फिल्मफेयर पुरस्कार, स्टार स्क्रीन अवार्ड्स और तीन ज़ी सिने इत्यादि विभिन्न पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है ।

o   1994 में मिस इण्डिया का ख़िताब जितने के बाद इन्होंने ऐश्वर्या रॉय को बैकस्टेज में धकेल दिया था । जिसकी वजह से इनकी आलोचना भी हुई थी ।

o   वर्ष 2012 में एथेंस हवाई अड्डे पर इनका पर्स चोरी हो गया था । उसमे इनका डेविट कार्ड और पासपोर्ट भी था । इस वजह से इन्हें एयरपोर्ट पर अपनी पहचान साबित करने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा था ।

रोचक जानकारियां

o   इनका वास्तविक नाम सुष्मिता सेन है ।

o   इन्हें दो उपनामों सुश और टीटू से भी जाना जाता है ।

o   ये मुख्य रूप से सिनेमा जगत में अभिनेत्री का काम करती हैं ।

o   इनका जन्म 19 नवम्बर 1975 को हुआ था ।

o   इनका जन्म तेलंगाना के हैदराबाद में हुआ था ।

o   ये मूल रूप से कोलकाता की रहने वाली हैं ।

o   इनकी माता का नाम सुभ्रा सेन तथा पिता का नाम सुबीर सेन है ।

o   एबकि माता आभूषण डिजाइनर हैं ।

o   इनके पिता एयर फ़ोर्स में अधिकारी हैं ।

o   इनके भाई का नाम राजीव सेन है ।

o   इनकी बहन का नाम नीलम सेन है ।

o   इन्हें कविता और गद्य लिखने का शौक है ।

o   इनके घर का पता 6 वीं मंजिल, बीच क्वीन, यारी रोड, वर्सोवा, अंधेरी पश्चिम, मुंबई है ।

o   इन्होंने की सारी फिल्मों में काम किया है ।

एस एन त्रिपाठी

प्रसिद्ध संगीतकाऱ एस एन त्रिपाठी की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि
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आज हम एक ऐसे बिसरा दिए गए संगीतकार की यादों को लेकर आपसे मुखातिब हैं जिन्होंने पिछली सदी के पाँचवें और छठवें दशक में अपनी कुछ बेहद सुरीली धुनों से फ़िल्म संगीत प्रेमियों के दिलों में एक स्थाई जगह बनाई हुई थी.
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एस एन त्रिपाठी, का जन्म 14 मार्च 1913 में  वाराणसी, उत्तर प्रदेश में हुआ था।  उनके पिता, दामोदर दत्त ठाकुर, एक स्कूल प्रिंसिपल थे इलाहाबाद से बीएससी करने के बाद, त्रिपाठी ने लखनऊ के पंडित वी एन भातखंडे की मॉरिस कॉलेज ऑफ़ म्यूज़िक से शास्त्रीय संगीत में प्रशिक्षण प्राप्त किया।
उन्होंने मशहूर महिला संगीतकार सरस्वती देवी के सहायक के रूप में भी एक समय काम किया था. यह एस. एन. त्रिपाठी ही थे जिन्होंने अशोक कुमार और देविका रानी को 'मैं बन की चिड़िया' जैसे अमर गीत को गाने का अभ्यास करवाया था.
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हिन्दी फ़िल्म संगीत के क्षेत्र में एक संगीत निर्देशक के तौर पर एस. एन. त्रिपाठी जी की मान्यता धार्मिक और पौराणिक फ़िल्मों के संगीतकार के रूप में ही होती है.
उनके खाते में दर्ज़ दर्जनों फ़िल्में ऐसी हैं जिनके नाम सुनकर एक बात का अन्दाज़ा लगता है कि त्रिपाठी जी किस तरह 'बी' और 'सी' ग्रेड की ढेरों धार्मिक फ़िल्मों के लिए अपने हुनर को धुनों के माध्यम से व्यक्त कर रहे थे.
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ऐतिहासिक_फ़िल्में
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'हनुमान पाताल विजय', 'दुर्गा पूजा', 'राम हनुमान युद्ध', 'सती नाग कन्या', 'लक्ष्मी-नारायण', 'बजरंगबली', 'रामलीला', 'श्री गणेश महिमा' और 'उत्तरा अभिमन्यु' ऐसे कुछ उदाहरण हैं जिन फ़िल्मों में त्रिपाठी जी के गीत गूँजे.
धार्मिक फ़िल्मों की ज़मीन से अलग, स्तरीय ढंग की कुछ बेहद कर्णप्रिय धुनों को एस. एन. त्रिपाठी ने ऐतिहासिक फ़िल्मों के माध्यम से भी रचा था. यह कहा जा सकता है कि यही वे फ़िल्में हैं जिनके कारण उनकी एक संगीतकार की हैसियत से एक प्रमुख उपस्थिति हिन्दी फ़िल्म संगीत की दुनिया में आज तक कायम है.
'लाल किला', 'कवि कालिदास', रानी रूपमती', 'नादिरशाह', 'जय चितौड़', 'दिल्ली दरबार' और 'संगीत सम्राट तानसेन' जैसी फ़िल्मों के गीतों के कारण आज भी त्रिपाठी जी को बहुत आदर से याद किया जाता है.
त्रिपाठी जी की संगीत के प्रति धैर्य और साधना की युक्तियों को उतने ही सरस ढंग से उनकी धुनों में टटोलना चाहिए जिसे उनके संगीतकार को आज तक संगीत प्रेमी भूल नहीं पाए हैं.
'शाम भई घनश्याम न आए', 'सखी कैसे धरूँ मैं धीर', 'रात सुहानी झूमे जवानी', 'नैनों से नैनों की बात हुई' और 'जरा सामने तो आओ छलिये' ऐसे ही श्रुति-मधुर गीत हैं.
इन गीतों से अलग एस. एन. त्रिपाठी की एक बड़ी खासियत उनके द्वारा कम्पोज़ की गई शास्त्रीय बन्दिशों जैसी धुनों को लेकर भी रही है जिसमें उन्हें महारत हासिल है.
ऐसे गीतों को सुनकर यह बात सहज ही समझ में आती है कि पिछले दौर में जिसे फ़िल्म संगीत का सुनहरा दौर भी कहा जाता है, वह बहुत कुछ ऐसे ही गीतों के कारण भी सम्भव हुआ होगा.
एक-दो उदाहरणों से इस बात को देख सकते हैं- 'बाट चलत नई चुनरी रंग डारी' (रानी रूपमती) और 'साँझ हो गई प्रभु तुम्हीं प्रकाश दो' (जय चित्तौड़) ऐसे ही उज्ज्वल उदहारण हैं.
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दर्द_भरे_गीत
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त्रिपाठी जी ने कुछ बेहद सुन्दर गीत लता मंगेशकर और मुकेश की आवाज़ों में भी संभव किए थे, जो विरह या दर्द-भरे गीतों के अप्रतिम मिसाल माने जाते हैं.
इन गीतों में स्वरों का लगाव, शास्त्रीय ढंग से बोलों को बरतने की कोशिश, ऑर्केस्ट्रेशन का बहुत हल्का-सा मन्थर प्रवाह अद्भुत ढंग से व्यक्त हुआ है, जो इन गीतों को किसी भी बड़े से बड़े संगीतकार के दर्द-भरे गीतों की श्रेणी में बराबर से स्थान देने लायक बना गया है.
इन्हें सुनकर आप सहज की एस. एन. त्रिपाठी की प्रतिभा को एस. डी. बर्मन, जयदेव, मदन मोहन और नौशाद के गीतों के बरक्स रखकर देख सकते हैं. ऐसे में मुकेश का गाया 'झूमती चली हवा याद आ गया कोई' (संगीत सम्राट तानसेन) मिसाल के तौर पर याद किया जाने वाला आदर्श गीत होगा.
एस. एन. त्रिपाठी का संगीत धार्मिक, पौराणिक और ऐतिहासिक फ़िल्मों के माध्यम से एक बिल्कुल अलग धरातल पर खड़ा नज़र आता है जिसमें फ़िल्मों के कथानक और परिवेश के अनुकूल ही पार्श्व ध्वनियों के साथ धुनों में लालित्य पैदा किया गया है.
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शास्त्रीय_और_लोक_रंग
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कई मर्तबा ऑर्केस्ट्रेशन संयोजन से, तो कई बार इसे उपयुक्त रागों के सुरों को लेकर रचा गया है, जिनमें दरबारी, मालकौंस, दरबारी कान्हड़ा, शिवरंजनी, हेमन्त और खमाज जैसे रागों की प्रधानता रही है.
एस. एन. त्रिपाठी ने राजस्थानी शैली का एक बेहद सुन्दर युगल-गीत 'थाने काजलियो बना लूँ' फ़िल्म 'वीर दुर्गादास' के लिए कम्पोज़ किया था, जो आज भी उतना ही लोकप्रिय है.
इसी तरह उन्होंने कुछ भोजपुरी फिल्मों में भी संगीत दिया, जिसमें 'बिदेसिया' की चर्चा बहुत सम्मान से आज भी होती है.
इतनी विविधता से भरा हुआ संगीत का कोमल और मर्मस्पर्शी संसार, एस. एन. त्रिपाठी जी की देन रहा है, जिन्होंने शास्त्रीय और लोक रंग के सारे सुन्दर सुर चुनकर हिन्दी और भोजपुरी फ़िल्मों को उपलब्ध कराए.
आज भी उनकी संगीतकार के रूप में उपस्थिति उतनी ही सदाबहार और नवोन्मेषी लगती है, जितनी कि पिछली शताब्दी के पाँचवें और छठे दशक में शिखर पर चमक रही थी.

28 मार्च 1988 को त्रिपाठी का मुम्बई, महाराष्ट्र में 75 वर्ष की आयु में निधन हो गया
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लक्ष्मीक कांत प्यारे लाल

संगीतकार लक्ष्मीकांत प्यारेलाल जोड़ी के प्यारेलाल के छोटे भाई संगीतकार गणेश की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि
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गणेश रामप्रसाद शर्मा "गणेश गणेश एक लोकप्रिय (14 जनवरी 1945 को जन्म 28 मार्च 2000) संगीतकार थे उनका जन्म 14 जनवरी 1945 में हुआ था वह संगीतकार लक्ष्मीकांत प्यारेलाल जोड़ी के प्यारेलाल के छोटे भाई थे, गणेश ने अपने संगीत जीवन की शुरुआत 1966 में युगल संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के सहायक के रूप में की थी

गणेश एक प्रसिद्ध trumpeter पंडित रामप्रसाद शर्मा (जिन्हें बाबाजी के नाम से जाना जाता है) के पुत्र थे, जिन्होंने उन्हें संगीत की मूल बातें सिखाईं।  गणेश प्यारेलाल, नरेश शर्मा, गोरख शर्मा, आनंद शर्मा और महेश शर्मा आपस मे भाई हैं 

गणेश हिंदी फिल्म संगीत के एक बेहतरीन संगीतकार थे  60 के दशक के गाने हम तेरे बिन जी ना सकेंगे ..., दिल ने प्यार किया है एक बेवफा से ..., बिछुआ ने डंक मारा ..., जाम से पीना बुरा है।  .., मान गए ये तराना... आज भी लोकप्रिय सबसे लोकप्रिय गाने हैं।

गणेश रामप्रसाद शर्मा का 28 मार्च 2000 को दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। वह 58 वर्ष के थे और उनके परिवार में एक पत्नी और दो बच्चे हैं।

गणेश द्वारा संगीतबद्ध फिल्में

दोज़ख (1987)
बदनाम (1976)
धमकी (1973)
चालाक (1973)
एक नारी दो रूप (1973)
शरारत (1972)
कुंदन (1972)
सा रे गा मा पा (1972)
कहीं आर कहीं पार (1971)
एक नन्ही मुन्नी लड़की थी (1970)
अंजाम (1968)
सब का उस्ताद (1967)
स्मगलर (1967)
ठाकुर जरनैल सिंह (1966)
हुस्न और इश्क (1966)
शेरा डाकू (1966)

गणेश द्वारा संगीतबद्ध चुनिंदा गीत 

दिल का सुना साज़ तराना ढूढ़ेगा ... फ़िल्म एक नारी दो रूप (1973)
कल रात सपने में आए थे तुम...फ़िल्म शरारत (1972)
एक नन्ही मुन्नी लड़की थी... फ़िल्म एक नन्ही मुन्नी लड़की (1970)
मैं जो गले लग जाऊंगी मैं... फ़िल्म अंजाम (1968)
दिल का नज़राना ले.... फ़िल्म चालाक (1973)
दिल का लगाना इस दुनिया में... फ़िल्म स्मगलर(1967)
ऐ मेरे दिल तेरी मंजिल अभी आने वाली है ... फ़िल्म हुस्न और इश्क (1966)
हम तेरे बिन जी ना सकेंगे...फ़िल्म ठाकुर जनरैल सिंह (1966)
ऐ दिलरुबा कल की बात कल के साथ गई ...फ़िल्म अंजाम (1968)
बांका सिपाही आया मेरी गलियां... फ़िल्म कुंदन (1972)
कैसे कैसे काम करें... फ़िल्म स्मगलर(1966)
नदी का किनारा मेंढ़क...फ़िल्म शरारत (1972)
हम तो कोई भी नहीं ...फ़िल्म शरारत (1972)
दिल ने प्यार किया है ...फ़िल्म शरारत (1972)
तू प्यार मांगे प्यार दे दूं...फ़िल्म सा-रे-गा-मा-पा (1972)
तुम ऐसे बसे मोरे नैन...फ़िल्म सा-रे-गा-मा-पा (1972)
दिल देके दर्द-ए-मोहब्बत...फ़िल्म शेरा डाकू(1966)
मजा बरसात का चाहो तो...फ़िल्म हुस्न और इश्क (1966)
दिल की फरियाद से डर... फ़िल्म हुस्न और इश्क(1966)
ये जलते हुए लब... फ़िल्म एक नन्ही मुन्नी लड़की थी (1970)
हम ही जाने एक तोरे मनवा की पीर...फ़िल्म  एक नारी दो रूप (1973)
यारो मुझे पीने दो... फ़िल्म धमकी (1973)

और भी कई यादगार गाने गणेश ने कंपोज़ किये है

मुनमुन सेन

प्रसिद्ध अभिनेत्री मुनमुन सेन के जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनाएं

मुनमुन सेन (जन्म 28 मार्च 1954)एक भारतीय फिल्म अभिनेत्री हैं, जिन्हें हिंदी, बंगाली, मलयालम, कन्नड़, तेलुगु, तमिल और मराठी फिल्मों में उनके कामों के लिए जाना जाता है।  उन्होंने अंततः बॉलीवुड फिल्मों में अभिनय किया।  वह 60 फिल्मों और 40 टेलीविजन श्रृंखलाओं में दिखाई दी हैं।  फिल्म सिरिवेनेला में उनकी भूमिका के लिए उन्हें 1987 में सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री के लिए आंध्र प्रदेश राज्य नंदी पुरस्कार मिला।

मुनमुन सेन का जन्म कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) में लोकप्रिय बंगाली अभिनेत्री सुचित्रा सेन और दिबानाथ सेन के यहाँ हुआ था। उनके पिता दीनानाथ सेन बल्लीगंज प्लेस कोलकाता के सबसे धनी व्यापारियों में से एक थे उनके दादा आदिनाथ सेन  त्रिपुरा के महाराजा के दीवान या मंत्री थे।

उनकी शिक्षा लोरेटो कॉन्वेंट, शिलांग और लोरेटो हाउस, कलकत्ता में हुई थी।  उन्होंने सोमरविले कॉलेज, ऑक्सफोर्ड से स्नातक की पढ़ाई पूरी की और जाधवपुर विश्वविद्यालय, कलकत्ता से तुलनात्मक साहित्य में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की।

बचपन में मुनमुन सेन ने भारत के महान कलाकारों में से एक, जैमिनी रॉय से ड्राइंग सीखी  उसे पेंटिंग करना और प्राचीन वस्तुओं का संग्रह करना पसंद है।  2000 में एक साक्षात्कार में, उसने कहा कि उसने एक साल के लिए बैलीगंज गवर्नमेंट हाई स्कूल में पढ़ाया  और फिर फिल्म की तकनीक सिखाने वाली स्कूल चित्राणी में ग्राफिक्स पढ़ाया।  वह सामाजिक कार्यों में भी सक्रिय थी और उसने शादी से पहले भी एक बच्चा गोद लेने के बारे में सोचा था। मुनमुन सेन ने फिल्मों में आने से पहले कोलकाता के एक जाने-माने बॉयज़ स्कूल (बैलीगंज गवर्नमेंट हाई स्कूल) में अंग्रेज़ी पढ़ाई।

मून मून सेन ने शादी और मातृत्व के बाद फिल्मों और टेलीविजन में अपना कैरियर शुरू किया।  उन्होंने फ़िल्म अंदर बाहर (1984) से अपनी कैरियर की शुरुआत की। उस फिल्म में उनकी साहसी भूमिका ने जाहिर तौर पर विवादों की आंधी पैदा कर दी।

उन्होंने माधुरी दीक्षित के साथ एक सस्पेंस थ्रिलर 100 डेज़ में अभिनय किया था।  ज़ख्मी दिल (1994) के बाद वह 2003 तक फिल्मों में नहीं दिखीं जब उन्होंने असफल थ्रिलर कुछ तो है में अभिनय किया।  वह अपनी मां की सफलता का मुकाबला नहीं कर सकी।  वह प्रसिद्ध तेलुगु निर्देशक के। विश्वनाथ द्वारा निर्देशित एक तेलुगु फिल्म सिरिवेनेला में अभिनय किया

फिल्म उद्योग में प्रवेश करने से पहले और बाद में, वह कुछ मॉडलिंग असाइनमेंट में अकेली (या अपनी बेटियों के साथ) दिखाई दीं।  उन्होंने साबुन के विज्ञापनों के लिए विशेष रूप से मॉडलिंग की जो 1980 के दशक में काफी विवादास्पद थे।  कुछ टेलीविज़न धारावाहिक करने के अलावा, उन्होंने कुछ बंगाली टेली-फ़िल्में भी कीं।

कोरक डे द्वारा निर्देशित उनकी फिल्म माई कर्मा (2004) ने उनको अंतर्राष्ट्रीय पहचान दिलाई फिल्म में उन्होंने एक "कठिन और प्यारी भारतीय पत्नी की भूमिका निभाई जो अपने पति के पीछे एक चट्टान की तरह खड़ी रहती है इस फ़िल्म ने उनको अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार दिलाया

वह अब कम फिल्में ही कर रही हैं। वह बंगाली में एक रसोई की किताब भी लिख रही है, जिसे प्रकाशित किया जाना बाकी है।

मुनमुन सेन ने 1978 में त्रिपुरा राज्य के पूर्ववर्ती शाही परिवार के वंशज से शादी की।  उनकी दो बेटियाँ, अभिनेत्रियाँ राइमा सेन और रिया सेन हैं। अपने पेशेवर अभिनय कैरियर के लगातार समर्थन के लिए, उनके दिल मे अपने पति के लिए  बहुत सम्मान है।

उनकी दिवंगत सास, इंदिरा राजे की बेटी इला देवी, कूच बिहार की राजकुमारी और जयपुर की महारानी गायत्री देवी की बड़ी बहन थीं।

प्रसिद्ध फिल्में

2003 कुछ तो है 
2003 लव एट टाइम्स स्क्वैर 
2001 12 बी 
1994 ज़ख्मी दिल माला 
1992 वक्त का बादशाह 
1991 इरादा 
1991 विषकन्या 
1991 100 डेज़ रमा 
1990 पत्थर के इंसान 
1990 जीवन एक संघर्ष 
1990 लेकिन 
1989 तेरे बिना क्या जीना 
1989 मिल गयी मंज़िल मुझे 
1987 प्यार की जीत 
1986 शीशा
1986 मुसाफ़िर 
1986 जाल 
1984 अंदर बाहर

अक्षय खन्ना

अभिनेता अक्षय खन्ना के जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनाएं

अक्षय खन्ना एक हिन्दी फिल्म अभिनेता हैं। अक्षय खन्ना का जन्म 28 मार्च 1975 में मुंबई में हुआ था। वह सत्तर–अस्सी के दशक के मशहूर अभिनेता विनोद खन्ना के पुत्र हैं और इनके बड़े भाई राहुल भी एक बॉलीवुड अभिनेता हैं।
अक्षय खन्ना ने अपनी शुरुआती पढ़ाई मुंबई से संपन्न की है। पिता के अभिनेता होने के कारण वह भी अभिनय में दिलचस्पी लेने लगे। इसके लिए उन्होंने नमित कपूर एक्टिंग स्कूल से अभिनय की बारीकियां भी सीखी।

अक्षय ने हिंदी सिनेमा में फिल्म हिमालय पुत्र से डेब्यू किया था। इस फिल्म को उनके पिता विनोद खन्ना ने प्रोड्यूस किया था। हालांकि इस फिल्म को बॉक्स-ऑफिस पर ज्यादा अच्छा रिस्‍पांस नहीं मिला था। उसके बाद वह मल्टीस्टारर फिल्म बॉर्डर में नजर आये। उनकी एक्टिंग को आलोचकों द्वारा काफी सराहा गया। इस फिल्म में उन्हें उनके बेहतरीन प्रदर्शन के लिए उन्हें उनका पहला फिल्मफेयर का सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का नामंकन भी मिला था। इसके बाद उन्होंने कई फिल्मों में काम किया जो दर्शकों को अपनी और खीचने में खासा कामयाब नहीं हो सकीं।  

वर्ष 1999 में आई फिल्म आ लौट चलें और फिल्म ताल उनके करियर की अच्छी फिल्मों से एक हैं। इन दोनों ही फिल्मों में वह ऐश्वर्या रॉय बच्चन के अपोजिट नजर आये थे। दोनों ही फिल्मों ने बॉक्स-ऑफिस पर काफी अच्छा व्यापार भी किया था। 

इसके बाद वह फरहान अख्तर की निर्देशन डेब्यू फिल्म 'दिल चाहता है' में नजर आये। यह फिल्म बॉक्स-ऑफिस पर सेमी-हिट रही थी। इस फिल्म को आलोचकों द्वारा भी काफी अच्छी प्रतिक्रिया मिली थी। उन्होंने बड़े पर्दे पर सिर्फ पॉज़िटिव ही नहीं निगटिव किरदार भी उम्दा तरीके से निभाए हैं। वह फिल्म 'हमराज' में नजर आये थे। जिसे दर्शकों द्वारा बेहद पसंद भी किया गया था। इसके लिए उन्हें फिल्मफेयर में नेगेटिव रोल के लिये नामांकित भी किया गया था। 

इसके बाद वह कॉमेडी फिल्म हंगामा और एक्शन-रोमांस में नजर आये। दोनों ही फिल्मों ने बॉक्स-ऑफिस पर काफी अच्छा व्यापार किया। इसके बाद वह कई सारी फिल्मों में दिखे जैसे- नो प्रॉब्लम,तीसमार खान,शादी से पहले, मेरे बाप पहले आप लेकिन यह सभी फिल्में दर्शकों को सिनेमाघरों तक नहीं खींच सकीं।  

पांच साल के लम्बे ब्रेक के बाद 2016 में अक्षय खन्ना ने फिल्म ढिशूम से हिंदी सिनेमा में अपनी वापसी की इस फिल्म में उनके अलावा जॉन अब्राहम, वरुण धवन, आलिया भट्ट, और जैकलीन फर्नांडिस भी नजर आए।

सोमवार, 27 मार्च 2023

प्रिया राजवंश

फ़िल्म अभिनेत्री प्रिया राजवंश की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि
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प्रिया राजवंश  भारतीय हिंदी सिनेमा की अभिनेत्री थी। इन्होंने सिर्फ चेतन आनन्द की बनाई फ़िल्मों में ही अभिनय किया था। उनकी कुछ उल्लेखनीय फ़िल्म हकीकत (1964), हीर राँझा (1970) तथा हँसते ज़ख़्म (1973) हैं।

संक्षिप्त परिचय

प्रिया राजवंश का जन्म 1937 को शिमला, हिमाचल प्रदेश में हुआ था। इनका पुरा नाम वेरा सुन्दर सिंह था। प्रिया की शुरूआती पढ़ाई शिमला में ही हुई। उन्हें बचपन से ही कला में रुचि थी। यही वजह थी कि उन्होंने पढ़ाई के दौरान कई नाटकों में हिस्सा लिया। इनके पिता सुन्दर सिंह वन विभाग में संरक्षक थे। पिता को संयुक्त राष्ट्र संघ की तरफ से ब्रिटेन भेजा गया। उनके साथ प्रिया भी लंदन पहुंच गईं। प्रिया ने वहाँ पहुंचते ही फेमस इंस्टीट्यूट रॉयल एकेडमी ऑफ ड्रामेटिक आर्ट्स में एडमिशन लिया।

फ़िल्मी सफ़र

मुख्य लेख : प्रिया राजवंश का फ़िल्मी सफ़र
प्रिया राजवंश जब नाटकों में काम करती थीं, तभी एक फोटोग्राफर ने उनकी फोटोज खींची। चेतन आनंद ने अपने एक दोस्त के घर यह तस्वीर देखी तो वह प्रिया राजवंश की खूबसूरती के क़ायल हो गए। उन दिनों चेतन आनंद को अपनी नई फ़िल्म के लिए नए चेहरे की तलाश थी। 20 अक्टूबर, 1962 को चीन ने देश पर हमला कर दिया था। हिंदुस्तानी फौज को भारी नुक़सान हुआ था और फौज को पीछे हटना पड़ा। इस थीम पर चेतन आनंद हक़ीक़त नाम से फ़िल्म बनाना चाहते थे। उन्होंने प्रिया राजवंश से संपर्क किया और उन्हें फ़िल्म की नायिका के लिए चुन लिया गया।

हत्या

प्रिया राजवंश की ज़िंदगी में अकेलापन और परेशानियां उस वक्त आईं, जब 6 फरवरी , 1997 को चेतन आनंद का देहांत हो गया। प्रिया राजवंश अकेली रह गईं। वह जिस बंगले में रहती थीं, उसकी क़ीमत दिनोदिन ब़ढती जा रही थी। चेतन के बेटे केतन आनंद और विवेक आनंद प्रिया राजवंश को इस बंगले से निकाल देना चाहते थे, लेकिन जब वे इसमें कामयाब नहीं हो पाए तो उन्होंने नौकरानी माला चौधरी और अशोक स्वामी के साथ मिलकर 27 मार्च, 2000 को प्रिया राजवंश का बेहरहमी से क़त्ल कर दिया। मुंबई की एक अदालत ने प्रिया राजवंश हत्याकांड में 31 जुलाई, 2002 को केतन आनंद और विवेक आनंद तथा उनके सहयोगियों नौकरानी माला चौधरी और अशोक स्वामी को उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई।

शनिवार, 25 मार्च 2023

नंदा फिल्म अभिनेत्री

नाम :- नंदा
जन्म नाम :- नंदिनी विनायक कर्नाटकी
निक नेम :- नना
जन्म तिथि :- 8 जनवरी 1941
जन्म स्थान :- मुंबई, महाराष्ट्र, भारत
ऊंचाई :- 1.61 मी
मिनी बायो:- 1940 से 1980 के दशक तक फैले एक फिल्म कैरियर, नंदा का जन्म 8 जनवरी, 1941 को बॉम्बे, भारत में एक शो-बिजनेस मराठी परिवार में हुआ था। उनके पिता अभिनेता मास्टर विनायक थे, और उनकी माँ सुशीला थीं। नंदा सात भाई-बहनों में तीसरे नंबर की थीं। जब वह सिर्फ 5 साल की थीं, तब उनके पिता उन्हें अपनी फिल्म "मंदिर" (1948) में लेना चाहते थे। वह ऐसा नहीं करना चाहती थी, लेकिन उसकी मां ने उसे इसमें फंसा लिया। उसने फिल्म में एक लड़के की भूमिका निभाई, एक ऐसी भूमिका जो उसके भाइयों द्वारा आसानी से निभाई जा सकती थी। लेकिन नंदा हमेशा मानती थीं कि उनके माता-पिता ने उन्हें फिल्म में इसलिए लिया क्योंकि वह उनकी पसंदीदा संतान थी। यह "मंदिर" के फिल्मांकन के दौरान था कि उसके पिता की अचानक मृत्यु हो गई। फिल्म को अंततः दिनकर पाटिल ने पूरा किया। नंदा बाल कलाकार बन गईं, जहां उन्हें "जैसी फिल्मों में बेबी नंदा के रूप में श्रेय दिया गया" यह देखते हुए कि वह अभी भी एक किशोरी थी। उन्होंने देव आनंद को प्रभावित किया जब उन्होंने "काला बाज़ार" में उनकी बहन की भूमिका निभाई और उनकी नायिका वहीदा रहमान को भी प्रभावित किया जो अगले 55 वर्षों के लिए उनकी करीबी दोस्त बन गईं। आनंद ने उनसे वादा किया कि वह उन्हें अपनी अगली फिल्म "हम दोनों" (1961) में अपनी नायिका के रूप में स्नातक करेंगे, और जब फिल्म हिट हो गई, तो उन्हें और अधिक नायिका की भूमिका की पेशकश की गई। "चार दीवारी" (1961) में तत्कालीन अज्ञात शशि कपूर के साथ अभिनय करने के लिए सहमत होने पर उन्हें एक उदार और दयालु अभिनेत्री माना जाता था। भले ही फिल्म फ्लॉप हो गई, उन्होंने सात और फिल्में साइन कीं, जिसके लिए कपूर हमेशा उनकी आभारी रहे, उन्हें अपनी पसंदीदा अभिनेत्री कहा। उनकी सबसे बड़ी हिट "जब जब फूल खिले" (1965) थी, जिसमें नंदा ने कपूर द्वारा निभाई गई एक देशी कश्मीरी के प्यार में एक ग्लैमरस, पश्चिमी महिला की भूमिका निभाई थी। इस फिल्म ने उनके करियर को पूरी तरह से एक ट्रैजेडीएन से एक ट्रेंडी फैशनेबल स्टार में बदल दिया। उसी साल उन्हें एक और बड़ी हिट मिली, मर्डर मिस्ट्री "गुमनाम" (1965), जिसने उन्हें नायिकाओं की शीर्ष लीग में डाल दिया। वह अगले नौ वर्षों तक नायिका की भूमिकाओं में बनी रहीं, फिर से "इत्तेफाक" (1969) में एक अच्छी लड़की से एक व्यभिचारिणी/हत्यारा के रूप में अपनी छवि को काफी हद तक बदल दिया, जिसने उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के रूप में फिल्मफेयर नामांकन अर्जित किया। उन्होंने 1970 के दशक में "शोर" (1972) में अपने यादगार कैमियो के साथ अपने करियर की शुरुआत की। उन्होंने "नया नशा" (1974) के साथ एक नायिका के रूप में अपने करियर का अंत किया, एक ड्रग एडिक्ट की भूमिका निभाते हुए, एक ऐसी साहसी भूमिका जिसे अन्य अभिनेत्रियाँ निभाने से डरती थीं। फिर, वह कई वर्षों के लिए पर्दे से गायब हो गईं और 1982 में 3 फिल्मों में फिर से दिखाई दीं: 'मजदूर', 'आहिस्ता आहिस्ता', और ' प्रेम रोग', बाद के दो ने सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री के रूप में उन्हें बैक-टू-बैक फिल्मफेयर नामांकन अर्जित किया। सभी 3 फिल्मों में उन्होंने संयोग से अभिनेत्री पद्मिनी कोल्हापुरे की माँ की भूमिका निभाई। फिर, वह स्थायी रूप से फिल्मों से सेवानिवृत्त हो गईं। बहुत शर्मीली और अंतर्मुखी, नंदा अपने आप में रहती थी, परिवार और दोस्तों के करीब रहती थी। एक अधेड़ उम्र की नंदा आखिरकार फिल्म-निर्माता मनमोहन देसाई से शादी करने के लिए राजी हो गई, 1992 में सगाई हो गई, लेकिन शादी होने से पहले, मनमोहन की एक इमारत से गिरने से मौत हो गई। उस मौत ने, उसकी माँ और भाई की मौत के साथ, उसे और भी अधिक सुर्खियों में ला दिया। वह अपनी सहेलियों, वहीदा रहमान, साधना, आशा पारेख, शम्मी, हेलेन और सायरा बानो के साथ लगभग अपने मरने के दिन तक संपर्क में रहीं। 25 मार्च 2014 को अचानक दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया। फिल्म उद्योग में एक सार्वजनिक अंतिम संस्कार हुआ, अपने प्रिय स्टार, एक पुरस्कार विजेता अभिनेत्री, जो अपनी प्रतिभा, बहुमुखी प्रतिभा और अपने करियर की लंबी उम्र के लिए सम्मानित थी, के खोने का दुख। उसके परिवार और दोस्तों को दुख हुआ कि उन्होंने एक प्यारी, अद्भुत महिला को खो दिया। 



बुधवार, 8 मार्च 2023

जय मुखर जी

प्रसिद्ध अभिनेता जॉय मुखर्जी की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रधांजलि
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जॉय मुखर्जी हिन्दी फ़िल्मों के आकर्षक अभिनेताओं में से एक थे। वे उन अभिनेताओं में से एक थे, जिन्होंने भारतीय दर्शकों के दिलों पर बहुत लम्बे समय तक राज किया था। उन्होंने 'एक मुसाफ़िर एक हसीना', 'फिर वही दिल लाया हूँ', 'लव इन टोक्यो' और 'शागिर्द' जैसी यादगार फ़िल्में दी थीं। जॉय मुखर्जी पर फ़िल्मांकित और मोहम्मद रफ़ी के द्वारा गाये गए कई गीत आज भी लोगों की ज़ुबाँ पर हैं, जैसे- 'फिर वही दिल लाया हूँ', 'बहुत शुक्रिया बड़ी मेहरबानी', 'ले गई दिल गुड़िया जापान की', 'दुनिया पागल है या फिर मैं दीवाना' और 'बड़े मियाँ दीवाने ऐसे ना बनो' आदि। जॉय मुखर्जी के परिवार का फ़िल्मों से काफ़ी पुराना रिश्ता रहा है। वे स्वयं मशहूर अभिनेता अशोक कुमार के भांजे थे।

जॉय मुखर्जी का जन्म 24 फ़रवरी, 1939 को झाँसी में हुआ था। उनके पिता का नाम शशिधर मुखर्जी और माता सती देवी थीं, जो कि हिन्दी फ़िल्मों के मशहूर अभिनेता अशोक कुमार की बहन थीं। जॉय मुखर्जी के पिता भी फ़िल्मों से जुड़े हुए थे। वे मशहूर 'फ़िल्मालय स्टूडियो' के सह सस्थापक थे। जॉय मुखर्जी के भाई सोमू मुखर्जी प्रसिद्ध अभिनेत्री तनूजा के पति थे। तनूजा की पुत्रियाँ काजोल और तनीषा भी अभिनेत्रियाँ हैं। जॉय मुखर्जी की पत्नी का नाम नीलम है। वे दो पुत्रों और एक पुत्री के पिता थे।

फ़िल्म सूत्रों के आदिगुरु कहे जाने वाले शशिधर मुखर्जी का पूरा परिवार फ़िल्मी रहा, किंतु उनके बेटे जॉय मुखर्जी को फ़िल्म अभिनेता बनना क़तई पसंद नहीं था। अपने पिता के आस- पास मौजूद रहकर उनकी फ़िल्मी गतिविधियों को बालक जॉय मुखर्जी नजदीक से देखा करते थे। शूटिंग के तमाम दृश्य उन्हें किसी तमाशे के समान लगते थे। जॉय मुखर्जी का इरादा टेनिस खिलाड़ी बनकर अंतरराष्ट्रीय प्रसिद्धि प्राप्त करने का था। जब वह बी.ए. की पढ़ाई कर रहे थे, तभी एक दिन उनके पिता ने पूछ लिया कि आखिर वह अपनी ज़िंदगी में करना क्या चाहता हैं? इस सवाल के साथ ही उन्होंने फ़िल्म "हम हिंदुस्तानी" का कांट्रेक्ट भी जॉय के सामने रख दिया। जॉय ने अनमने भाव से फ़िल्म यह सोचकर साइन कर ली कि चलो पॉकेटमनी के लिए अच्छी रकम मिल जाएगी। जब फ़िल्म का ट्रायल शो हुआ, तो प्रिव्यू थियेटर से वह भागकर घर आ गये। परदे पर अपने अभिनय तथा
लुक को वह बर्दाश्त नहीं कर पाये थे। जॉय मुखर्जी की किस्मत में टेनिस खिलाड़ी बनने की लकीरें नहीं थीं। उन्हें दो-तीन फ़िल्मों के और प्रस्ताव मिले। शुरू-शुरू में उन्हें झिझक रही।धीरे-धीरे उनकी फ़िल्मों में दिलचस्पी बढ़ती चली गई। इसका परिणाम भी सामने आ गया। वे अपनी बी.ए. की पढ़ाई में पिछड़ गए और तृतीय श्रेणी में उत्तीर्ण हुए। उन्हीं दिनों फ़िल्मकार बिमल राय फ़िल्म 'परख' बनाने जा रहे थे। उन्होंने जॉय की कुछ फ़िल्में देखीं और 'परख' के लिए नायक की भूमिका उनके सामने रखी। अपनी जरुरत से ज़्यादा व्यस्तता के चलते जॉय ने मना कर दिया। बिमल राय ने बसंत चौधरी को लेकर वह फ़िल्म पूरी की

जॉय मुखर्जी की दूसरी फ़िल्म थी 'लव इन शिमला'। इसे नए डायरेक्टर आर. के. नय्यर निर्देशित कर रहे थे। एक सिंधी फ़िल्म में काम कर चुकी अभिनेत्री साधना को नायिका के तौर पर लिया गया था। इस फ़िल्म की अधिकांश शूटिंग शिमला में हुई थी। शूटिंग के दौरान आस-पास के दर्शकों की जमा भीड़ में से कुछ तानाकशी की आवाज़ें जॉय मुखर्जी के कानों में गूँजती थीं- "ये क्या हीरो बनेगा? ये क्या एक्टिंग करेगा? आइने में इसने अपनी सूरत देखी है?" यह सब सुनकर जॉय चुप रहते थे, क्योंकि जवाब के लिए कोई सुपरहिट फ़िल्म उनके पास नहीं थी। 'लव इन शिमला' फ़िल्म सुपरहिट साबित हुई। जॉय को स्टार का दर्जा मिल गया। साधना ने बालों की नई स्टाइल इजाद की, जो लड़कियों में 'साधना कट' नाम से लोकप्रिय हुई। 'लव इन शिमला' के दौरान ही आर. के. नय्यर और साधना को भी प्यार हो गया और उन्होंने विवाह कर लिया। सन 1963 में बनी फ़िल्म फिर 'वहीं दिल लाया हूँ' जॉय मुखर्जी के कॅरिअर की उल्लेखनीय फ़िल्म रही, जिसमें उन्होंने अपने कॅरिअर की सबसे यादगार भूमिका निभायी। देखते-ही-देखते जॉय  की बुलंदियों पर पहुँच गए।

'लव इन शिमला' के बाद इसे महज संयोग ही मानना होगा कि जॉय मुखर्जी को लगातार रोमांटिक फ़िल्में करना पड़ीं, जैसे- 'लव इन टोकियो', आशा पारेख के साथ; 'शागिर्द', सायरा बानो के साथ; 'एक मुसाफिर एक हसीना' और 'एक बार मुस्करा दो'। 'शागिर्द' फ़िल्म के तमाम गाने शिमला में फ़िल्माए जाने थे। लगातार बारह दिनों तक पूरी यूनिट के लोग प्रातः जल्दी से तैयार होकर बर्फीले पहाड़ों पर पहुँचते, लेकिन बादलों की लुकाछिपी में सूर्य डूबता-तैरता चलता था और शूटिंग का सारा समय बरबाद हो गया। यूनिट को इस बहाने इस ख़ूबसूरत शहर में ठहरने और पिकनिक मनाने का मौका मिल गया। जॉय मुखर्जी की अधिकांश फ़िल्मों की कहानी प्रेम पर आधारित थी। इसलिए तमाम फ़िल्मों को कश्मीर के सुंदर लोकेशन पर फ़िल्माया गया

जॉय मुखर्जी ने अपनी समकालीन जिन तारिकाओं के साथ काम किया, उनमें वैजयंती माला के प्रति हमेशा उनके मन में हमेशा आदर भाव रहा। माला सिन्हा , शर्मिला टैगोर , आशा पारेख और सायरा बानो सबसे उनके अच्छे संबंध रहे। विदेशी कलाकारों में जॉय को ग्रेगरी पैक ने आकर्षित किया। देव आनंद जिस तरह ग्रेगरी को कॉपी करते थे और अपनी हेअर स्टाइल भी वैसी ही रखते थे, कुछ इस तरह के रोल मॉडल का भाव जॉय के मन में बराबर बना रहा। अपने प्रशंसकों से लगातार मिलना या हाथ मिलाना अथवा ऑटोग्राफ़ देना जॉय मुखर्जी को पसंद नहीं था। उनका मानना था कि दो- चार प्रशंसकों से तो हाथ मिलाया जा सकता है, लेकिन सौ-दो सौ के साथ कोई कलाकार ऐसा नहीं कर सकता। प्रेस से भी जॉय ने दूरी बनाए रखी। वे अभिनेता नहीं बनना चाहते थे, मगर बना दिए गए। इसलिए ग्लैमर वर्ल्ड के लटकों-झटकों से अनजान थे।

समय व्यतीत होता गया और धर्मेन्द्र , जितेंद्र, राजेश खन्ना जैसे अन्य अभिनेताओं के उभरने से जॉय मुखर्जी की छवि धूमिल होने लगी। अपनी गिरती लोकप्रियता के मद्देनजर जॉय चुनींदा फ़िल्में ही करने लगे। प्रकृति के सुंदर दृश्य तो जॉय मुखर्जी को आनंद से भर देते थे, मगर बार-बार और हर बार हीरोइन को देख नकली मुस्कराहटें चेहरे पर लाना। गाने गाना। पेड़ों के इर्दगिर्द घूमकर नाचना उन्हें क़तई रास नहीं आता था। वे ज़िंदगी का ट्रेक बदलना चाहते थे। उन्होंने फ़िल्म 'हमसाया' का निर्देशन किया, लेकिन फ़िल्म फ्लॉप हो गई। इस पर जॉय का सोचना था कि यह उनका ग़लत समय में लिया गया ग़लत फैसला था। उन्होंने 'हमसाया' के बाद राजेश खन्ना और जीनत अमान को लेकर उन्होंने 'छैला बाबू' फ़िल्म भी निर्देशित की, किंतु इस बार भी नाकामयाबी हाथ लगी। माता- पिता की मौत से जॉय मुखर्जी को ज़िंदगी का नया चेहरा देखने को मिला

हिन्दी फ़िल्मों के इस मशहूर अभिनेता का 9 मार्च, 2012 को मुम्बई में निधन हुआ। एक लम्बी बीमारी के बाद उन्हें मुम्बई के लीलावती अस्पताल में भर्ती कराया गया था। मार्च, 2012 की सुबह 9:30 बजे उनका निधन हुआ। उनके फेफड़े काम नहीं कर रहे थे और वह साँस नहीं ले
पा रहे थे। यद्यपि जॉय मुखर्जी हिन्दी फ़िल्मों के बेहद सफल अभिनेताओं की सूची में शामिल नहीं हो पाए थे, फिर भी वे कला के प्रति समर्पित थे और दर्शकों पर उनकी छाप थी। फ़िल्मी बाज़ार में सौदेबाजी करने से वे हमेशा ही दूर रहे, किंतु सिल्वर स्क्रीन के इस रोमांटिक अभिनेता पर फ़िल्माए गए सुरीले और मधुर गीत आज भी उनके प्रशंसकों के दिलों में गूँजते हैं।

प्रीति गांगुली

●▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬●   ꧁ *जन्म की तारीख और समय: 17 मई 1953, मुम्बई* *मृत्यु की जगह और तारीख: 2 दिसंबर 2012, मुम्बई* *भाई: भारती जाफ़री, ...