शुक्रवार, 12 जनवरी 2024

अदिति गोवित्रिकर



अदिति गोवित्रिकर

जन्म तिथि: 21-मई -1974

जन्म स्थान: पनवेल, महाराष्ट्र, भारत

पेशा: अभिनेता, मॉडल, टेलीविजन अभिनेता, सौंदर्य प्रतियोगिता प्रतियोगी

राष्ट्रीयता: भारत

अदिति गोवित्रिकर (जन्म 14 मई 1972) एक भारतीय मॉडल, अभिनेत्री और डॉक्टर हैं।
1997 से 2004 तक, गोवित्रिकर चिकित्सा चिकित्सक और मनोवैज्ञानिक योग्यता दोनों के साथ एकमात्र भारतीय सुपरमॉडल बने रहे।
उन्हें हिंदुस्तान टाइम्स द्वारा "ब्यूटी विद ब्रेन" कहा गया है।
वह एक शाकाहारी और उत्साही विपश्यना व्यवसायी हैं।
वह 2009 में बिग बॉस की प्रतियोगी थीं। उन्होंने 1996 में ग्लैडरैग्स मेगामॉडल प्रतियोगिता जीती और ग्लैडरैग्स मिसेज इंडिया प्रतियोगिता जीती।
2000 में भारत, बाद में श्रीमती जीता।
2001 में विश्व प्रतियोगिता।
श्रीमती गोवित्रिकर पहली और एकमात्र भारतीय महिला हैं जिन्होंने मिसेज वर्ल्ड अवार्ड जीता है।
विश्व खिताब। गोवित्रिकर ने अभिनय में तब कदम रखा जब उन्होंने थम्मुडु (1999) में मुख्य भूमिका निभाई, जो एक हिट फिल्म थी।
उन्होंने पहेली (2005) सहित कई फिल्मों में अभिनय किया, जो 79 वें अकादमी पुरस्कारों में भारत की आधिकारिक प्रविष्टि और दे दना दन (2009) थी, जिसने अंतर्राष्ट्रीय भारतीय फिल्म अकादमी पुरस्कार जीता।
उन्होंने अदनान सामी और आशा भोसले (1997) द्वारा कभी तो नज़र मिलाओ और जगजीत सिंह (2000) द्वारा आइना जैसे कई सुपर हिट संगीत वीडियो में भी प्रमुख भूमिका निभाई। गोवित्रिकर ने भारत में PETA लॉन्च किया और कोका-कोला, चोपार्ड, फेंडी और हैरी विंस्टन जैसे शीर्ष स्तरीय अंतरराष्ट्रीय ब्रांडों का भी समर्थन किया।

🔛अदिति गोवित्रिकर (जन्म 14 मई 1972) एक भारतीय मॉडल, अभिनेत्री और डॉक्टर हैं।
1997 से 2004 तक, गोवित्रिकर चिकित्सा चिकित्सक और मनोवैज्ञानिक योग्यता दोनों के साथ एकमात्र भारतीय सुपरमॉडल बने रहे।
उन्हें हिंदुस्तान टाइम्स द्वारा "ब्यूटी विद ब्रेन" कहा गया है।
वह एक शाकाहारी और उत्साही विपश्यना व्यवसायी हैं।
वह 2009 में बिग बॉस की प्रतियोगी थीं। उन्होंने 1996 में ग्लैडरैग्स मेगामॉडल प्रतियोगिता जीती और ग्लैडरैग्स मिसेज इंडिया प्रतियोगिता जीती।
2000 में भारत, बाद में श्रीमती जीता।
2001 में विश्व प्रतियोगिता।
श्रीमती गोवित्रिकर पहली और एकमात्र भारतीय महिला हैं जिन्होंने मिसेज वर्ल्ड अवार्ड जीता है।
विश्व खिताब। गोवित्रिकर ने अभिनय में तब कदम रखा जब उन्होंने थम्मुडु (1999) में मुख्य भूमिका निभाई, जो एक हिट फिल्म थी।
उन्होंने पहेली (2005) सहित कई फिल्मों में अभिनय किया, जो 79 वें अकादमी पुरस्कारों में भारत की आधिकारिक प्रविष्टि और दे दना दन (2009) थी, जिसने अंतर्राष्ट्रीय भारतीय फिल्म अकादमी पुरस्कार जीता।
उन्होंने अदनान सामी और आशा भोसले (1997) द्वारा कभी तो नज़र मिलाओ और जगजीत सिंह (2000) द्वारा आइना जैसे कई सुपर हिट संगीत वीडियो में भी प्रमुख भूमिका निभाई। गोवित्रिकर ने भारत में PETA लॉन्च किया और कोका-कोला, चोपार्ड, फेंडी और हैरी विंस्टन जैसे शीर्ष स्तरीय अंतरराष्ट्रीय ब्रांडों का भी समर्थन किया।

🔛श्रीमती मधुलिका राज मैथ्यूज हिंदी
16 दिसंबर सोनल जोशी हिंदी
2003 बाज़: ए बर्ड इन डेंजर सौंदर्य प्रतियोगिता के विजेता हिंदी
धुंधः कोहरा सिमरन मल्होत्रा हिंदी
2005 पहेली कमली हिंदी [ उद्धरण वांछित ]
2006 मनोरंजन: मनोरंजन माया/सलमा हिंदी
2007 विक्टोरिया नंबर 203 बेबीजी हिंदी
कैसे कहें... नेहा सरल हिंदी
2009 दे दना दन पम्मी चड्डा हिंदी

2011 भेजा फ्राई 2 रवीना कपूर हिंदी
हम तुम शबाना न्यायाधीश हिंदी
2014 खुद घेंट अदिति (मासी) हिंदी
2017 मेरे पिता की पहली पत्नी कौन है स्वाति हिंदी
2021 कोई जाने ना सुहाना की मां हिंदी

गोपाल शर्मा


जन्म 30 दिसंबर
मृत्यु 22 मई
रेडियो सिलोन में 11 साल तक एनाउंसर रहे मशहूर एनाउंसर गोपाल शर्मा की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि
🔛

30 दिसंबर सन् 1931 में बिजनौर जनपद के चांदपुर नगर में जन्मे गोपाल शर्मा ने आवाज की दुनिया में वो नाम रोशन किया कि उनके समय का हर गायक और फिल्मी कलाकर उनका दीवाना रहा। हर गायक और कलाकर की तमन्ना होती कि गोपाल शर्मा उन पर नजरें करम कर दें और उनकी गाड़ी चल निकले। जानी-मानी गायिका आशा भोंसले ने तो उन्हें भाई बनाया था। गोपाल शर्मा के बेटे के जन्म पर वह चांदपुर आईं भी थीं।

टीवी से पहले रेडियो युग था। रेडियो कार्यक्रम सुनने के लिए उस समय लाइन लगती थी। आकाशवाणी दिल्ली से शाम को आने वाले किसान भाइयों के कार्यक्रम को सुनने के लिए चौपाल या रेडियो स्वामी के घर पर भीड़ एकत्र हो जाती थी।

सन् 1960 के आसपास रेडियो सिलोन भारत ही नहीं पूरी एशिया में मनोरंजन का सबसे लोकप्रिय कार्यक्रम प्रस्तुत करता था। विविध भारती शास्त्रीय संगीत पर आधारित कार्यक्रम पेश करता था।
उस पर बजने वाले फिल्मी गाने भी प्राय: शास्त्रीय संगीत पर आधारित होते थे। जबकि रेडियो सिलोन शुद्ध मनोरंजन के लिए कार्यक्रम प्रस्तुत करता था और उस पर भारतीय फिल्मों के सभी गाने बजते थे।

मनोरंजन के लिए फिल्मों के गाने बजने के कारण रेडियो सिलोन पूरे एशिया में भारतीयों का सबसे पंसदीदा था। गोपाल शर्मा 1956 से 24 अप्रैल 67 तक 11 साल लगातार इस स्टेशन के हिंदी कार्यक्रमों के अनाउंसर रहे।
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एक साल की उम्र में गोपाल शर्मा की माता का निधन हो गया। बिना माता की छत्र छाया में पले बढ़े गोपाल शर्मा ने आर्थिक समस्याओं से जूझते हुए मेरठ कॉलेज मेरठ से बीए की परीक्षा उतीर्ण की। बीए करने के बाद फिल्म इंडस्ट्री में भाग्य आजमाने मुंबई पहुंच गए। यहां कुछ बनने के लंबे और अथक संघर्ष में उनकी उस समय के प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता बलराज साहनी से मुलाकात हो गई।

कुछ समय उनके ग्रुप में काम किया और बलराज साहनी की सलाह पर रेडियो की दुनिया में प्रवेश कर गए। रेडियो के कैजुअल आर्टिस्ट के रूप में काम करते समय रेडियो सिलौन के लिए चयन हो गया। रेडियो सिलोन में काम करने के दौरान मेरठ में उनका विवाह हुआ।

रेडियो सिलोन के लिए 11 साल लगातार काम कर गोपाल शर्मा ने एक रिकार्ड बनाया। भारत लौटकर गोपाल शर्मा ने आकाशवाणी के कैजुअल आर्टिस्ट के रूप में काम करने के साथ ही विभिन्न कंपनियों के लिए विज्ञापन बनाने और बड़े कार्यक्रम के संचालन का लंबे समय तक कार्य किया। रेडियो सिलोन से लौटकर गोपाल शर्मा मुंबई में बस गए थे

एक भेंट में अपनी कामयाबी का राज समय का पालन करना बताया था। वह कहते थे कि मैं प्रत्येक कार्यक्रम में निर्धारित समय से पहले पहुंचता रहा हूं। रेडियो सिलोन के 11 साल के कार्यकाल में एक दिन भी देर से नहीं पहुंचा।

अपनी आत्मकथा आवाज की दुनिया के दोस्तों में वह कहते हैं कि विविध भारती में चयन के लिए बुलाए जाने पर उन्होंने कार्य करने से इसलिए इंकार कर दिया कि उस पर सरकारी तंत्र हावी है। कुछ नया करने वालों की कोई कदर नहीं है। अपनी आत्मकथा में गोपाल शर्मा लिखा है कि रेडियो सिलोन पर कार्य करने के दौरान मैं भारत आया था।

एक कार्यक्रम में बीबीसी लंदन के रत्नाकर भारतीय जी से मुलाकात हो गई। उन्होंने तुरंत कहा, शर्मा जी आप कहां रेडियो सिलोन में पड़े हैं। आपका स्थान बीबीसी लंदन है। आप जब चाहें तब आपको बुलवा सकता हूं। मैंने कहा, भारतीय जी बीबीसी लंदन नंबर एक है। लेकिन मेरा मानना यह है कि आपके प्रोग्राम सुनने वाले भारत में गिने चुने हैं। जबकि मेरा प्रोग्राम सुनने वाले एशिया भर में करोड़ों हैं। मैं करोड़ों श्रोताओं का दिल नहीं दुखा सकता। रुपया कमाना मेरा लक्ष्य नहीं है।

गोपाल शर्मा अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि उन्होंने तीन अन्य साथियों के साथ फिल्म अधिकार के भजन माटी कहे कुम्हार में बाल साधु की भूमिका की। मैं सोचता था कि गाने के दो तीन मिनट में स्क्रीन पर मेरा चेहरा एक दो बार दिखाया गया होगा। फिल्म रिलीज हो गई किंतु जेब में इतने पैसे नहीं थे कि फिल्म देख पाते। रेडियो सिलोन पर जाने से पूर्व चांदपुर गया तो हमारे बहुत सीनियर और हाकी के बड़े खिलाड़ी कैलाश मित्तल मेरे से विशेष रूप से मिलने आए। उनका चांदपुर में सिनेमा हाल है। कहने लगे शर्मा जी आपकी फिल्म अधिकार की एंक्टिग से मुझे बहुत आमदनी हुई।

मैंने जगह - जगह आपके नाम का प्रचार कराया कि चांदपुर का तरुण कलाकार गुरू रघुनाथ प्रसाद का लड़का गोपाल शर्मा फिल्म में काम कर रहा है। इसका इतना असर हुआ कि अकेले चांदपुर में फिल्म अधिकार एक साल तक चली। बिजनौर जनपद में कई साल तक यह फिल्म चलाई और इतनी आमदनी हुई कि हमारा एक और सिनेमा हाल बन गया।

मोहम्मद रफी से मुलाकात गोपाल शर्मा लिखते हैं कि मै एक बार भारत आने पर ओपी नैय्यर साहब से मिलने गया। मुझे देखते ही नैय्यर साहब ने कहा कि विदेश जाने की सूचना तो रेडियो से दो ही व्यक्तियों के बारे में दी जाती है, एक तो भारत के प्रधानमंत्री और दूसरे रेडियो सिलोन के गोपाल शर्मा की।

बाते शुरू ही की थीं कि कुछ ही देर में फोन आ गया। नैय्यर साहब ने कहा आप जिनके बारे में पूछ रहें हैं, वे मेरे पास बैठे हैं। उन्होंने मुझे फोन दे दिया। फोन करने वाले मो. रफी थे। वे मुझसे मिलना चाहते थे।

मैंने नैय्यर साहब से आज्ञा ली और रफी साहब से मिलने चला गया।मिलते ही उन्होंने तुरंत मुझे सीने से लगा लिया। बोले जब मैं नया नया मुंबई आया था तो मेरे भाई हमीद साहब ने मेरे लिए खूब भागदौड़ की। मेरा अरमान था कि मुझे जनाब कुंदन लाल सहगल साहब केसाथ गाने का मौका मिले।

मौका मिला भी जूही, जूही, जूही..., मेरे सपनों की रानी..., वाले गीत में। इस गीत के अंत में सोलो लाइन दो बार मैने गाई। संगीत प्रेमियों को यह बात रेडियो सिलोन पर सबसे पहले गोपाल शर्मा जी आप ने ही बताई। महान गायक रफी साहब ही नहीं बल्कि उस समय का हर गायक गोपाल शर्मा से मिलने केलिए उत्सुक रहता था।

रेडियो सिलोन के लगातार 11 साल तक अनांउसर रहे गोपाल शर्मा की शादी मेरठ के पंडित शिव शंकर शर्मा की पुत्री शशि शर्मा से 13 अप्रैल 1964 को हुई। मेरठ का यह परिवार आर्य समाजी था। शशि शर्मा के दादा पंडित तुलसीराम वेदों के बड़े विद्वान थे। इन्होंने संस्कृत से वेदों का हिंदी में अनुवाद किया था। इस शादी की विशेषता यह थी कि इसमें मुंबई से गायक महेंद्र कपूर आए थे।

गोपाल शर्मा ने अपनी पुस्तक आवाज की दुनिया के दोस्तों में इस शादी के बारे में भी विस्तार से बताया है। वह कहते हैं कि शशि के दादाजी की तुलसी प्रेस थी। उस समय उनकी शादी का सब और चर्चा था। अखबारों में खबर छप रही थी। 13 अप्रैल को दो बसों से मेरठ बरात गई थी। इस शादी में गायक महेंद्र कपूर, एक करोड़पति श्रोता सुरेश चंद्र अग्रवाल, आशा भोंसले के सेकेटरी प्राण ऐरी, गुजराती अनाउंसर सहाग दीवान और हिंदी विभाग के वरिष्ठ उद्घोषक शील वर्मा समेत पांच व्यक्ति मुंबई से आए थे।

वे कहते है कि उनके ससुरालवालों को ये पता नहीं था कि उनका दामाद रेडियो सिलोन का प्रसिद्ध उद्घोषक गोपाल शर्मा हैं। महेंद्र कपूर ने14 अप्रैल को सुबह दो बजे से सवेरे छह बजे चार घंटे लगातार बरातियों और घरातियों का मनोरजन किया। महेंद्र कपूर के कार्यक्रम की मेरठ में खूब धूम रही।

14 की शाम को बरात विदा होकर चांदपुर आ गई। रेडियो सिलोन ने उनकी शादी की खुशी में सभी भाषाओं के प्रोग्राम में विशेष कार्यक्रम प्रस्तुत किए। वे कहते हैं कि उनकी शादी की दावत मुंबई के होटल नटराज में हुई थी। व्यवस्था गायक महेंद्र कपूर ने की थी। प्रसिद्ध पार्श्व गायिका आशा भोंसले ने उन्हें अपना भाई बनाया था। उनके बेटी के जन्म पर वे चांदपुर आई थीं और बेटी का नामकरण किया था। बेटी को नाम दिया था चेतना। बाद में परिवार वालों की सलाह के बाद उसका नाम महिमा कर दिया था।

मुम्बई  में 22 मई 2020 को उन्होंने आखिरी सांस ली। वे 88 साल के थे।

जगजीत कोर

जगजीत कौर
🎂जन्म की तारीख और समय: मई 1930, ब्रिटिश राज
⚰️मृत्यु की जगह और तारीख: 15 अगस्त 2021, जुहू, मुम्बई
पति: मोहम्मद ज़हुर खय्याम (विवा. 1954–2019)
जगजीत कौर हिंदी फिल्म जगत के मशहूर संगीतकार ख़य्याम की पत्नी और ख़ुद एक मशहूर पार्श्व गायिका थीं। स्वाधीनता दिवस 15 अगस्त 2021 की सुबह 5.30 बजे उनका निधन हो गया। मुंबई में जुहू के दक्षिणा पार्क स्थित उनके निवास से उनकी अंतिम यात्रा निकली, जहां 'दिल तो पागल है' व 'गदर' फैम विख्यात संगीतकार उत्तम सिंह, अभिनेत्री पद्मिनी कपिला एवं राजनीतिक विश्लेषक निरंजन परिहार सहित कई प्रमुख लोगों ने उनको अंतिम विदाई दी। पवनहंस श्मशान गृह पर प्रसिद्ध गायक अनूप जलोटा के कुछ फिल्मी हस्तियों की उपस्थिति में उनकी पार्थिव देह का अग्नि संस्कार हुआ। जगजीत कौर ख़य्याम द्वारा संगीतबद्ध किये गए लोकगीतों, शास्त्रीय संगीत और ग़ज़लों के लिये आवाज़ देने के लिए जानी जाती हैं। 1950 के दशक में उन्होंने फिल्मों के लिए गाना शुरू किया और 1980 तक लगातार सिने जगत से जुड़ी रहीं। ख़य्याम द्वारा संगीतबद्ध किया फ़िल्म शगुन का मशहूर गीत- तुम अपना रंज़ो ग़म अपनी परेशानी मुझे दे दो जगजीत कौर द्वारा गाये गए शानदार गानों मे से एक है। जगजीत कौर द्वारा गाये गए ज़्यादातर गीत लोकसंगीत पर आधारित थे जो आज भी सुनने वालों की यादों में बस जाते हैं।
जगजीत कौर का जन्म 1930-31 के आसपास चंडीगढ़ (पंजाब) के एक रसूख़दार परिवार में हुआ। फिल्मों में प्लेबैक सिंगर बनने का ख़्वाब लिए जगजीत कौर मुम्बई आ गईं। ये 1954 की बात है एक दिन मुम्बई के दादर स्टेशन के ओवर ब्रिज़ के ऊपर जगजीत कौर को लगा कि कोई उनका पीछा कर रहा है, वे सतर्क होकर अलार्म बजाना ही चाह रही थीं कि उस शख़्स ने आकर अपना परिचय फिल्मों के संगीतकार के रूप में दिया। वो शख़्स थे मशहूर संगीतकार मो. ज़हूर ख़य्याम जिन्हें आज दुनिया ख़य्याम साहब के नाम से जानती है। दोनों की ये मुलाक़ात दोस्ती में बदली और जगजीत कौर के पिता के विरोध के बाद भी दोनों ने विवाह कर लिया। कहा जाता है कि इन दोनों का विवाह भारतीय फ़िल्म जगत का पहला अंतरजातीय विवाह था। 1954 में शुरू हुई ये प्रेम कहानी (19 अगस्त 2019) ख़य्याम साहब के फना होते तक बदस्तूर ज़ारी रही, और 15 अगस्त 2021 को जगजीत कौर भी दुनिया को अलविदा कह गईं।

कुणाल खेमू


कुणाल खेमू 
(जन्म 25 मई 1983) 

एक भारतीय अभिनेता है जो हिन्दी फ़िल्मों में कार्यरत है। उनका जन्म 25 मई 1983 को श्रीनगर, जम्मू और कश्मीर, भारत में हुआ था

कुणाल खेमू जीवनी
कुणाल खेमू एक भारतीय अभिनेता हैं। वह हिंदी सिनेमा में अपनी बेहतरीन फिल्मों ट्रैफिक सिग्नल, गोलमाल 3 और गो गोआ गोन के लिए प्रसिद्ध हैं। 

पृष्ठभूमि 
कुणाल खेमू का जन्म कश्मीरी पंडित परिवार में अभिनेता रवि और ज्योति के घर 25 मई 1983 को हुआ था।  

पढ़ाई 
कुणाल ने अपनी शुरआती पढ़ाई निरंजनलाल डालमिया हाईस्कूल से संपन की है।  उन्होंने अपनी स्नातक की पढ़ाई मुंबई की एमिटी यूनिवर्सिटी से की है।  

शादी 
कुणाल खेमू की शादी अभिनेत्री सोहा अली खान से हुई हैं। 

करियर 
कुणाल ने अपने करियर की शुरुआत बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट दूरदर्शन के वेद रही निर्देशित शो गुल गुलशन थी। उन्होंने अपने फ़िल्मी करियर का डेब्यू महेश भट्ट की फिल्म सिर से किया था। वह इस फिल्म में बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट नजर आए थे। इस फिल्म के बाद वह राजा हिन्दुस्तानी, ज़ख्म,भाई हम हैं रही प्यार के में भी बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट नजर आ चुके हैं। 

इसके बाद साल 2005 में उन्होंने फिल्म कलयुग से बॉलीवुड में बतौर लिड अभिनेता डेब्यू किया। इस फिल्म का निर्देशन मोहित सूरी ने किया था। इसी साल खेमू मधुर भंडारकर की पहली फिल्म ट्रैफिक सिग्नल का हिस्सा बनें। इस फिल्म में उन्होंने अच्छे स्मार्ट मनी लेन्द्र की भूमिका अदा की थी। इस फिल्म ने टिकेट खिड़की की औसत कमाई की थी। इसके बाद वह फिल्म ढोल में बतौर अभिनेता नजर आये। उसके बाद वह ढूँढ़ते रह जाओगे और जय वीरू जैसी फिल्मों में नजर आये। उनकी यह सभी फ़िल्में बॉक्स-ऑफिस पर कुछ खास सफल फ़िल्में साबित नहीं हुई। वर्ष 2010 में वह निर्देशक रोहित शेट्टी की गोलमाल सीरीज के तीसरे भाग गोलमाल 3 में नजर आए। इस फिल्म उनके अलावा अजय देवगन, शरमन जोशी,करीना कपूर मुख्य भूमिका में नजर आये थे। इस फिल्म ने बॉक्स-ऑफिस पर करोड़ो का व्यापर किया था। और साल की सुपरहिट फिल्म साबित हुई थी। 

साल 2012 में खेमू एक बार फिर मुकेश भट्ट की फिल्म ब्लड मनी में मुख्य भूमिका में नजर आए। इस फिल्म में वह बेहद मेहनती और एक पारिवारिक मर्द के रूप दर्शाये गए थे। जो अपने बॉस के द्वारा गलत रास्तो की ओर भटका दिया जाता है।  फिल्म ने बॉक्स-ऑफिस पर अच्छा-खासा व्यापार किया था। फिल्म के गाने भी लोगों को बेहद पसंद आये थे। आलोचकों ने भी कुणाल खेमू के किरदार को अपनी मिली-जुली प्रतिक्रिया दी थी। वह सैफ अली खान के प्रोडक्शन की फिल्म गो गोआ गोन में नजर आये। जो बुरी तरह बॉक्स-ऑफिस पर फ्लॉप साबित हुई थी।
एक्टर कुणाल खेमू और सोहा अली खान ने बेहद निजी समारोह में ब्याह रचाया।अभिनेता कुणाल खेमू वर्ष 1993 की फिल्म 'हम हैं राही प्यार के' में नजर आ चुके है।
कुणाल खेमू उन गिने चुने कलाकरों में आते हैं, जिन्होंने बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट तो खूब नाम कमाया, लेकिन बड़े होकर वो कमाल नहीं दिखा पाए। खेमू साल 2020 में फिल्म मलंग का हिस्सा थे। पिक्चर में वे निगेटिव शेड का रोल प्ले करते नजर आए थे। इसके अलावा वे ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज हुई फिल्म 'लूटकेस' का भी हिस्सा रहे थे।वहीं, कुणाल मीडिया में भी बने रहते हैं। आये दिन वो पत्नी सोहा और बेटी इनाया के साथ नजर आ जाते हैं।

रविवार, 7 जनवरी 2024

धर्मेंद्र


धर्मेंद्र
*🎂जन्म तिथि :- 8 दिसंबर*
जन्म नाम :- धरम सिंह देओल
निक नेम :- धरमिंदर
जन्म तिथि :- 8 दिसंबर 1935
ऊंचाई :- 1.73 मी
जीवनसाथी :- अर्रे
ट्रेड मार्क :- मस्कुलर फिजीक और बेहतरीन लुक का अनोखा कॉम्बिनेशन।
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धर्मेंद्र भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े सितारों में से एक हैं। धर्मेंद्र देओल ने 1960-1968 तक महिला केंद्रित फिल्मों में रोमांटिक हीरो की भूमिका निभाई और 1968-69 तक रोमांटिक हीरो बने और 1971-1997 तक एक्शन हीरो की भूमिका निभाई। धर्मेंद्र 306 फिल्मों में नजर आ चुके हैं। उन्हें बॉलीवुड में 'गरम' धरम के नाम से जाना जाता है। एक असली सज्जन व्यक्ति की शक्ल थी, एक आदमी का मर्दाना शरीर और जब उनकी फिल्मों की बात आती थी, तो उनकी डायलॉग-डिलीवरी और टाइमिंग में बहुत ही विनोदी स्पर्श था। धर्मेंद्र का मूल नाम धरम सिंह देओल है। उनका जन्म भारतीय राज्य पंजाब में कपूरथला जिले के फगवाड़ा में एक जाट सिख परिवार में केवल किशन सिंह देओल और सतवंत कौर के घर हुआ था। उन्होंने अपना प्रारंभिक जीवन साहनेवाल गांव में बिताया और लुधियाना के लालटन कलां में सरकारी वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय में अध्ययन किया। उन्होंने 1952 में रामगढ़िया कॉलेज, फगवाड़ा से इंटरमीडिएट किया। फूल और पत्थर (1966), जुगनू (1973), राजा जानी (1972) और लोफर (1973) जैसी उनकी फिल्मों की वीरता काफी उल्लेखनीय और अविस्मरणीय है। उन्हें अपने करियर में 4 बार फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के लिए नामांकित किया गया था, हालांकि उन्हें एक नहीं मिला, लेकिन 1997 में फिल्मफेयर से उनकी उपलब्धियों, उनके समय के दौरान शानदार प्रदर्शन और बॉलीवुड में शानदार करियर के लिए "द लाइफ टाइम अचीवमेंट" पुरस्कार मिला। धर्मेंद्र को छोटी उम्र से ही फिल्मों का शौक था। उन्होंने फिल्मफेयर नई प्रतिभा प्रतियोगिता में भाग लिया, जिसे उन्होंने जीता और काम की तलाश में पंजाब से मुंबई आ गए। उन्होंने अर्जुन हिंगोरानी की दिल भी तेरा हम भी तेरे (1960) से अपनी शुरुआत की। जिसके बाद उन्हें फिल्म बॉय फ्रेंड (1961) में सहायक भूमिकाएँ मिलीं और 1960-1967 तक कई महिला प्रधान फिल्मों में रोमांटिक रुचि के रूप में काम किया गया, जहाँ कहानी नायिका के इर्द-गिर्द घूमती थी। के चरित्र और, उन्हें आमतौर पर उस समय की वरिष्ठ स्थापित अग्रणी अभिनेत्री के विपरीत एक रोमांटिक नायक के रूप में और बाद में, 1974 के बाद से, एक एक्शन हीरो के रूप में लिया गया। उनकी प्रमुख सफलता आई मिलन की बेला में नायक राजेंद्र कुमार की सहायक भूमिका निभा रही थी, जहां उनका चरित्र देशभक्ति फिल्म हकीकत (1964) में नकारात्मक और सहायक भूमिका थी और 1960-1967 तक महिला उन्मुख फिल्मों में रोमांटिक रुचि निभा रही थी और बलराज की सहायक भूमिका निभा रही थी। 1960-67 की कुछ फिल्मों जैसे सूरत और सीरत, बंदिनी, ममता, घर का चिराग में साहनी, अशोक कुमार, बिस्वजीत। उनके संवेदनशील पक्ष को ऋषिकेश मुखर्जी ने अनुपमा (1966) और सत्यकाम (1969) में खोजा था, उत्तरार्द्ध को एक माना जाता है। उनके करियर के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शनों में से। उन्हें ब्लॉकबस्टर, फूल और पत्थर (1966) के साथ एकल हीरो स्टारडम मिला, जो उनकी पहली एक्शन फिल्म थी लेकिन वह 1971 की फिल्म मेरा गांव मेरा देश से स्थापित एक्शन हीरो बन गए। उन्होंने प्यार ही प्यार, आया सावन झूम के, मेरे हमदम मेरे दोस्त और आए दिन बहार के जैसी फिल्मों के साथ खुद को रोमांटिक हीरो के रूप में पेश किया। उन्होंने सीता और गीता (1972), राजा जानी (1972), जुगनू (1973), कहानी किस्मत की और यादों की बारात (1973) जैसी सफल फिल्मों के साथ एक्शन हीरो के रूप में अपनी छवि को मजबूत किया। धर्मेंद्र ने हेमा मालिनी के साथ एक लोकप्रिय ऑनस्क्रीन जोड़ी बनाई जो बाद में उनकी दूसरी पत्नी बनीं। हेमा मालिनी 1970 के दशक की सबसे बड़ी महिला स्टार थीं और उन्होंने तुम हसीन में जवान, शराफत (1970), सीता और गीता (1972), राजा जानी (1972), जुगनू (1973), प्रतिज्ञा (1975) जैसी हिट फिल्मों में अभिनय किया। ), शोले (1975), चरस (1976), आज़ाद (1977), दिल्लगी (1978), कई अन्य फिल्मों में शामिल हैं। प्रतिज्ञा के जरिए धर्मेंद्र ने साबित की अपनी बहुमुखी प्रतिभा और कॉमिक टाइमिंग चुपके चुपके और शोले। रमेश सिप्पी की शोले (1975) में उन्होंने अमिताभ बच्चन, संजीव कुमार और अमजद खान के साथ स्क्रीन स्पेस साझा किया और उन्हें वीरू के अपने अद्वितीय चित्रण के लिए आज भी याद किया जाता है। उनकी सर्वश्रेष्ठ रोमांटिक जोड़ी अभिनेत्री आशा पारेख के साथ थी, जिनके साथ उन्होंने 5 हिट फ़िल्में दीं - शिखर, आया सावन झूम के, आए दिन बहार के, समाधि और मेरा गाँव मेरा देश। उनकी अगली सबसे अच्छी जोड़ी हेमा मालिनी के साथ थी, जिनके साथ उन्होंने 35 फिल्में कीं जिनमें से 31 में उनकी प्रमुख रोमांटिक जोड़ी थी और धरम हेमा की 20 हिट और 15 फ्लॉप थीं। धर्म हेमा ने 1980 में शादी की और धर्म-हेमा के 2 बच्चे हैं, ईशा और अहाना और उनके दो बेटे हैं, प्रकाश कौर के साथ पिछली शादी से सनी देओल और बॉबी देओल। महिला उन्मुख फिल्में जहां महिला नायक ' मीना कुमारी, नूतन, माला सिन्हा, शर्मिला टैगोर के साथ धरम ने इन फिल्मों में केवल सहायक भूमिका निभाई। फूल और पथ्थर उनके करियर का महत्वपूर्ण मोड़ था और उन्हें एक एक्शन हीरो और एक सोलो लीड हीरो के रूप में स्थापित किया। कलात्मक और लोकप्रियता के लिहाज से उनकी चरम अवधि 1971-1979 थी, जहां उन्होंने मल्टी स्टार के साथ-साथ एक्शन में सोलो हीरो फिल्में कीं और हास्य शैली और जब उनके प्रदर्शन को समीक्षकों के साथ-साथ दर्शकों ने भी सराहा। समीक्षकों द्वारा प्रशंसित फिल्मों बर्निंग ट्रेन, अली बाबा और 40 चोर, झूठा सच, धर्म और कानून, राजपूत और गुलामी को छोड़कर आलोचकों ने 1985-2002 तक उनकी हर फिल्म की आलोचना की। वह 1976-1982 तक हिंदी फिल्मों में विनोद खन्ना के साथ दूसरे सबसे अधिक भुगतान पाने वाले अभिनेता थे और धरम अकेले 1987-1993 तक ए ग्रेड हिंदी फिल्मों में तीसरे सबसे अधिक भुगतान पाने वाले हिंदी अभिनेता थे। 70 के दशक की शुरुआत में, धर्मेंद्र दुनिया के सबसे हैंडसम पुरुषों में वोट पाने वाले पहले भारतीय अभिनेता बन गए। 70 और 80 के दशक के दौरान, धर्मेंद्र ने बिमल रॉय, यश चोपड़ा, राज खोसला, रमेश सिप्पी, राजकुमार संतोषी, हृषिकेश मुखर्जी और बासु चटर्जी जैसे कुछ बड़े नामों के साथ काम किया। 1983 में, धर्मेंद्र ने उत्पादन में विविधता लाई और अपने बड़े बेटे सनी को 'बेताब' में लॉन्च किया, जो उनके बैनर विजयता फिल्म्स द्वारा निर्मित थी और एक बड़ी हिट थी। 1990 में, उन्होंने सनी देओल अभिनीत घायल का निर्माण किया। यह फिल्म साल की दूसरी सबसे बड़ी हिट थी और इसने सर्वश्रेष्ठ फिल्म पुरस्कार सहित 7 फिल्मफेयर पुरस्कार जीते और संपूर्ण मनोरंजन प्रदान करने वाली सर्वश्रेष्ठ लोकप्रिय फिल्म के लिए प्रतिष्ठित राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीता। बाद में उन्होंने 'बरसात' (1995) में अपने छोटे बेटे बॉबी और 'बरसात' (1995) में भतीजे अभय देओल के सफल करियर की शुरुआत की। सोचा ना था' (2005) के बैनर तले। उन्होंने समय-समय पर पंजाबी की अपनी मूल भाषा में फिल्में भी बनाईं, जिसमें कंकन दे ओले (विशेष उपस्थिति) (1970), दो शेर (1974), दुख भंजन तेरा नाम (1974), तेरी मेरी एक जिंदरी (1975), पुट जट्टान में अभिनय किया। डे (1982) और कुर्बानी जट्ट दी (1990)। 1981 की उनकी व्यावसायिक हिट फिल्मों में राम बलराम, प्रोफेसर प्यारेलाल, कातिलों के कातिल, नौकरी बीवी का, जानी दोस्त, सम्राट, भागवत, राज तिलक, जागीर, कयामत, इंसाफ कौन करेगा, शामिल हैं। इंसानियत के दुश्मन, लोहा, सोने पे सुहागा, मर्दो वाली बात, खतरों के खिलाड़ी, नफ़रत की आनंदी, बटवारा और एलान ए जंग। 1987 में आई उनकी फिल्म हुकुमत उस साल की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म थी। वह 1990 के दशक में सनी देओल, संजय दत्त और जैकी श्रॉफ से भी मजबूत एक्शन हीरो के रूप में मजबूत बने रहे। 1990 के दशक में उनकी व्यावसायिक हिट फिल्मों में वीरू दादा, नाका बंदी, फरिश्ते, तहलका, क्षत्रिय, मैदान ई जंग और धर्म कर्मा। कांति शाह जैसे लोगों द्वारा निर्देशित कम भौंह वाली एक्शन फिल्मों ने 90 के दशक के अंत में उनके एक्शन करियर को नुकसान पहुंचाया। फिल्मफेयर अवार्ड्स में धर्मेंद्र को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के पुरस्कार के लिए 4 बार नामांकित किया गया था लेकिन कभी जीता नहीं। उन्हें 1997 में फिल्मफेयर द्वारा लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित किया गया था। उन्होंने प्यार किया तो डरना क्या (1998) में एक भूमिका के साथ ए ग्रेड फिल्मों में वापसी की। वह राजनीति में शामिल हो गए और 2004 के आम चुनावों में राजस्थान के बीकानेर से भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर सांसद चुने गए। उन्होंने 2007 में फिल्मों लाइफ इन ए... मेट्रो और अपने के साथ अभिनय में वापसी की और प्रशंसित और सफल रहीं। बाद में वह अपने दोनों बेटों सनी और बॉबी के साथ पहली बार नजर आते हैं। उनकी दूसरी रिलीज़ जॉनी गद्दार थी, जिसमें उन्होंने एक खलनायक की भूमिका निभाई थी। 2011 में, उन्होंने 14 जनवरी 2011 को रिलीज़ हुई यमला पगला दीवाना में फिर से अपने बेटों के साथ अभिनय किया और यह सफल रही। एक सीक्वल यमला पगला दीवाना 2 2013 में रिलीज़ हुई थी। उन्होंने 2011 में अपनी पत्नी हेमा मालिनी के निर्देशन में बनी फ़िल्म टेल मी ओ ख़ुदा में अपनी बेटी ईशा के साथ अभिनय किया। इंडियाज गॉट टैलेंट दिखाएं। धर्मेंद्र की पहली शादी 1954 में 19 साल की उम्र में प्रकाश कौर से हुई थी। उनकी पहली शादी से उनके दो बेटे हैं, सनी देओल और बॉबी देओल दोनों सफल अभिनेता हैं, और दो बेटियां विजीता देओल और अजिता देओल हैं। उनके करण, राजवीर, आर्यमन और धरम नाम के 4 पोते हैं। शोले की शूटिंग के दौरान धर्मेंद्र को हेमा मालिनी से प्यार हो गया था। उसने अंततः 1980 में उससे शादी कर ली। जैसा कि हिंदू विवाह अधिनियम ने बहुविवाह को मना किया था, उन्होंने विरोध से बचने और अपनी दूसरी शादी को वैधता देने के लिए 1979 में इस्लाम धर्म अपना लिया। इस कपल की दो बेटियां ईशा देओल और अहाना देओल हैं। ईशा एक्ट्रेस हैं और अहाना डांसर हैं। धर्मेंद्र को सिनेमा में उनके योगदान के लिए कई सम्मान मिले हैं और 2012 में भारत सरकार द्वारा भारत के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था।




मेरी इवान्स या मेरी इवान्स वाडिया या फ़ीयरलेस नाडिया


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मेरी इवान्स या मेरी इवान्स वाडिया या फ़ीयरलेस नाडिया 

🎂जन्म- 08 जनवरी, 1908, ऑस्ट्रेलिया;
⚰️मृत्यु- 10 जनवरी, 1996, मुम्बई

 भारतीय सिनेमा की ख्यातिप्राप्त अभिनेत्रियों में से एक थीं। सिर्फ़ हिन्दी ही नहीं, किसी भी भारतीय भाषा के सिनेमा के इतिहास में इतनी दबंग, निर्भीक, बहादुर, स्टंटबाज, टारजन या रॉबिनहुड स्टॉइल की नायिका आज तक दूसरी नहीं हुई। नाडिया ने हिन्दुस्तानी सिनेमा के तीस और चालीस के दशक में एक दिलेर-जांबाज अभिनेत्री के रूप में ऐसा जीवटभरा प्रदर्शन किया कि उसने पारम्परिक भारतीय समाज की अनेक मान्यताओं को ध्वस्त कर दिया। अपने समय में नाडिया बहुत बड़ी स्टार थीं। उन्होंने अपने बलबूते पर कई हिट फ़िल्में दी थीं। किंतु नाडिया को वह मान-सम्मान नहीं मिल सका, जिसकी वह हकदार थीं।
नाडिया का जन्म 8 जनवरी, सन 1908 को पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के 'पर्थ' शहर में हुआ था। उनके पिता का नाम हर्बर्ट इवान्स था, जो ब्रिटिश सेना में सैनिक थे। माता का नाम ग्रीक मार्गरेट था। पहले नाडिया का नाम 'मेरी इवान्स' रखा गया था, किंतु एक अमेरिकी ज्योतिष की सलाह पर वह 'मेरी इवान्स' से 'नाडिया' हो गईं।

भारत आगमन
जब नाडिया केवल पाँच साल की थीं, तब उनके पिता का तबादला बम्बई (वर्तमान मुम्बई) हो गया, और पूरा परिवार भारत आ गया। प्रथम विश्वयुद्ध में उन्हें फ़्राँस के मोर्चे पर भेजा गया था, जहाँ वे मारे गए। पिता की मृत्यु के बाद नाडिया की माँ बम्बई में ही बस गईं।
जब नाडिया ने होश संभाला तो माँ की मदद के लिए नौसेना के स्टोर्स में सेल्स गर्ल बन गईं। फिर सेक्रेटरी का दायित्व निभाया। इसी दौरान रशियन बैले नर्तकी मैडम एस्ट्रोव से उनकी मुलाकात हुई। बैले सीखने के लिए नाडिया ने अपन वजन भी घटाया। कुछ समय 'झाको रशियन सर्कस' में भी काम किया और अपनी कलाबाजियाँ दिखाईं। वे ब्रिटिश-भारतीय दर्शकों का मनोरंजन बैले के प्रदर्शन से करने लगीं। इसी दौरान एक शो में होमी वाडिया ने नाडिया को देखा तो उन पर मंत्रमुग्ध हो गए। स्क्रीन टेस्ट के बाद 'वाडिया मूवीटोन' के लिए नाडिया ऐसे अनुबंधित हुईं कि होमी वाडिया के 'होम' की मालकिन बनीं।
अभिनय
नाडिया ने सन 1933 में पहली बार हिन्दी फ़िल्म 'लाल ए यमन' में अभिनय किया था, जिसका निर्माण 'वाडिया मूवीटोन' के जेबीएच वाडिया ने किया था। भारत में 'हंटरवाली' के नाम से मशहूर हुई नाडिया ने 1930 और 1940 के दशक में 35 से भी अधिक फ़िल्मों में काम किया। पूरी ऊँची और गोरी-चिट्टी नाडिया के लिए नायक ढूँढना मुश्किल काम था। 'ऑल इण्डिया बॉडी ब्यूटीफुल कॉम्पिटिशन' के विजेता जॉन कावस का व्यक्तित्व शानदार था। वे हट्टे-कट्टे कदकाठी के कद्दावर व्यक्ति थे। इसलिए उन्हें नाडिया का हीरो बना दिया गया। नाडिया की सफलता के पीछे जॉन कावस का बहुत बड़ा योगदान था।
आरंभिक दो-तीन फ़िल्मों में छोटे रोल करने के बाद जेबीएच वाडिया ने सन 1935 में फ़िल्म "हंटरवाली" की पटकथा लिखी। इस दौर में गूंगा सिनेमा अपने धार्मिक, पौराणिक और ऐतिहासिक गुफ़ाओं से बाहर आ रहा था। प्रभात फ़िल्म कंपनी, न्यू थिएटर्स, बाम्बे टॉकिज अपने स्टाइल की फ़िल्में बना रहे थे। वाडिया भाइयों ने अपना अलग चलन शुरू किया। यह अमेरिकन टार्जन मूवीज, वेस्टनर्स, काऊबॉय स्टाइल से प्रेरित था। नाडिया को स्टंट फ़िल्मों का ऑफ़र दिया गया।

'हंटरवाली' नायिका प्रधान फ़िल्म थी। उन दिनों साठ हज़ार रुपयों में फ़िल्म बन जाया करती थी। जेबीएच वाडिया ने 'हंटरवाली' का बजट अस्सी हज़ार किया। जब वितरकों ने फ़िल्म देखी, तो हिरोइन के हाथों में हंटर और तलवार देखकर पीछे हट गए। मजबूर होकर वाडिया भाइयों ने अपने दोस्त बिलिमोरिया की भागीदारी में 'हंटरवाली' फ़िल्म रिलीज की। दर्शकों ने अब तक या तो स्वर्ग की अप्सराओं या देवियों को फूल बरसाते देखा था या फिर घरों में कैद हमेशा रोने-धोने-कलपने वाली औरत को देखा था। इतनी दिलेर स्त्री को परदे पर हैरतअंगेज करतब करते देख वे चकित रह गए। फ़िल्म 'हंटरवाली' ने बॉक्स ऑफ़िस पर ऐसा धमाल किया कि नाडिया रातोंरात सुपर स्टार बन गईं। इस प्रकार स्टंट फ़िल्मों का कारवाँ चल पड़ा।
नाडिया सचमुच में एक बहादुर स्त्री थीं। इसका प्रमाण फ़िल्म "जंगल प्रिंसेस" से मिलता है। इस फ़िल्म के एक दृश्य में नाडिया चार शेरों से लड़ती हैं। हिन्दी उच्चारण ठीक नहीं होने के बावजूद भी फ़िल्म "पहाड़ी कन्या" में नाडिया ने लम्बे संवाद बोले थे। मारधाड़ में माहिर नाडिया ने कई भावुक दृश्य भी बड़ी खूबी के साथ दिए थे। फ़िल्म "मौज" में भावना प्रधान संवाद बोलकर उन्होंने दर्शकों को रुला दिया था।

उस समय तकनीक इतनी उन्नत नहीं थी कि स्टंट वाले दृश्य आसानी से किए जा सकते। स्टंट दृश्य करने में जान का जोखिम बना रहता था। नाडिया स्टंट करने में पारंगत थीं। उनकी कई बार हड्डियाँ भी टूटीं, लेकिन वह हमेशा अपने स्टंट खुद करती थीं। उनके स्टंट दृश्य देखकर दर्शक चकरा जाते थे। आज के स्पाइडरमैन और सुपरमैन की तरह नाडिया की भी एक छवि थी। परदे पर वह बहादुर और सच्चाई की राह पर चलने वाली महिला का किरदार निभाती थीं। नकाबपोश, हाथ में हंटर और पैरों में लम्बे जूते पहने जब वह दुश्मनों को सबक सिखाती थीं तो सिनेमा हॉल दर्शकों की तालियों और सीटियों से गूँज उठता था। फ़िल्मों में घोड़ा और कुत्ता नाडिया के साथी थे। कुश्ती, तलवारबाजी, घुड़सवारी, कहीं से भी छलाँग लगाना, चलती ट्रेन पर लड़ाई करना, ट्रेन से घोड़े पर बैठ जाना जैसे स्टंट करना नाडिया को बेहद पसंद थे। नाडिया और जॉन कावस को चलती ट्रेन पर स्टंट करने का शौक़ था। इसलिए ट्रेन फ़िल्मों की सीक्वल बनाई गईं, जिनके नाम थे- फ्रंटियर मेल, 'पंजाब मेल' और 'दिल्ली एक्सप्रेस'।
अन्तिम फ़िल्म
उनकी आखिरी स्टंट फ़िल्म "सरकस क्वीन" थी। सन 1959 में उन्होंने अपने निर्माता-निर्देशक होमी वाडिया से विवाह कर फ़िल्मों से सन्न्यास ले लिया। 1968 में "खिलाड़ी" फ़िल्म में छोटी भूमिका में वह आखिरी वार परदे पर आई थीं। सिनेमा हॉल में जो लोग आगे बैठते थे, उन्हें उस समय 'चवन्नी क्लास' कहा जाता था। नाडिया के वे दीवाने थे। नाडिया के हैरतअंगेज करतब देखने में उन्हें खूब आनंद आता था। उस जमाने में जब नारी हमेशा पुरुषों के पीछे ही खड़ी होती थी। उसे अत्यंत कमज़ोर माना जाता था, नाडिया की सफलता वास्तव में आश्चर्यचकित कर देने वाली थी।
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प्रमुख फ़िल्में
नाडिया की कुछ मुख्य फ़िल्मों के नाम इस प्रकार हैं[2]-

लाल ए यमन - 1933
हंटरवाली - 1935
मिस फ्रंटियर मेल - 1936
पंजाब मेल - 1939
डायमंड क्वीन - 1940
हंटरवाली की बेटी - 1943
स्टंट क्वीन - 1945
हिम्मतवाली - 1945
लेडी रॉबिनहुड - 1946
तूफान क्वीन - 1947
दिल्ली एक्सप्रेस - 1949
कार्निवल क्वीन - 1955
सर्कस क्वीन - 1959
खिलाड़ी - 1968
⚰️निधन
सन 1935 से 1968 तक नाडिया ने कुल 42 फ़िल्मों में काम किया। 10 जनवरी, 1996 को मुम्बई, भारत में उनका देहांत हुआ।

नंदा

#08jan
#25march 
नन्दा 

🎂08 जनवरी 1939 
 ⚰️25 मार्च 2014

 हिन्दी फ़िल्मों की एक अभिनेत्री थीं।
नन्दा के पिता का नाम विनायक दामोदर था, जो मराठी फ़िल्मों के एक सफल अभिनेता और निर्देशक थे। विनायक दामोदर 'मास्टर विनायक' के नाम से अधिक प्रसिद्ध थे। नन्दा अपने घर में सात भाई-बहनों में सबसे छोटी थीं। उनको अपने पिता का प्यार अधिक समय तक नहीं मिल सका। उनकी बाल्यावस्था में ही पिता का देहांत हो गया था। इसके बाद नन्दा के परिवार ने बड़ा कठिन समय व्यतीत किया। 1992 में अपने साथियों के कहने पर उन्होंने फ़िल्म निर्माता मनमोहन देसाई से सगाई की लेकिन दुर्भाग्य से शादी से पहले ही मनमोहन देसाई छत से नीचे गिर गए और उनकी मौत हो गयी
परिवार की जिम्मेदारी उठाने के चलते अपना घर बसाना भूल गई थीं नंदा।
नंदा अपने दौर की बेहद खूबसूरत और बेहतरीन हीरोइन थीं। जब बॉलीवुड में नंदा ने काम करना शुरू किया था तो उनकी छवि 'छोटी बहन' की बन गई थी। क्योंकि पांच साल की उम्र में उन्होंने काम करना शुरू कर दिया था। उस दौरान वो लीड एक्टर की छोटी बहन का किरदार निभाया करती थी.
10 साल की उम्र में ही हीरोइन बन गईं। लेकिन हिन्दी सिनेमा की नहीं बल्कि मराठी सिनेमा की। दिनकर पाटिल की निर्देशित फिल्म ‘कुलदेवता’ के लिये नंदा को पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने विशेष पुरस्कार से नवाजा था। नंदा ने कुल 8 गुजराती फिल्मों में काम किया। हिंदी में नंदा ने बतौर हीरोइन 1957 में अपने चाचा वी शांता राम की फिल्म 'तूफान और दिया' में काम किया था।
परिवार की जिम्मेदारियां उठाने में उन्हें अपने बारे में सोचने का कभी मौका ही नहीं मिला। डायरेक्टर मनमोहन देसाई से वो बेइंतहां मोहब्बत करती थीं। देसाई भी उन्हें चाहते थे। लेकिन बेहद शर्मीली नंदा ने मनमोहन को कभी अपने प्यार का इजहार करने का मौका ही नहीं दिया और उन्होंने शादी कर ली। खुद सारी उम्र क्वारी ही रह गई.
📽️
1995 दिया और तू्फान 
1982 प्रेम रोग 
1981 आहिस्ता आहिस्ता 
1977 प्रायश्चित 
1973 छलिया
1972 जोरू का गुलाम
1971 अधिकार 
1969 धरती कहे पुकार के 
1969 बड़ी दीदी 
1968 परिवार
1966 पति पत्नी 
1966 नींद हमारी ख़्वाब तुम्हारे
1965 गुमनाम
1965 तीन देवियाँ 
1965 बेदाग 
1965 आकाशदीप 
1964 कैसे कहूँ 
1964 मेरा कसूर क्या है
1963 नर्तकी 
1963 आज और कल
1962 मेहेंदी लगी मेरे हाथ 
1962 आशिक 
1962 उम्मीद 
1961 हम दोनों 
1960 आँचल 
1960 उसने कहा था 
1960 काला बाज़ार
1960 कानून 
1960 अपना घर 
1959 धूल का फूल
1957 भाभी 
1957 बंदी 
1956 शतरंज 
1954 जाग्रति

शनिवार, 6 जनवरी 2024

श्याम रामसे


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जन्म

श्याम रामसे का 🎂जन्म 17 मई 1952 को बॉम्बे, बॉम्बे स्टेट, भारत में हुआ था। उनके पिता का नाम F.U. रामसे था। उनकी बेटी का नाम साशा रामसे है। उनके भाईयों का नाम तुलसी रामसे ( 13 दिसंबर 2018 को मृत्यु), किरण रामसे, केशू रामसे, कुमार रामसे, अर्जुन रामसे है।꧂●▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬●

पुरानी हवेली' और 'तहखाना' जैसी हॉरर फिल्मों के लिए चर्चित सात 'रामसे ब्रदर्स' में से एक निर्देशक श्याम रामसे का बुधवार को मुंबई के एक अस्पताल में सुबह निधन हो गया। 67 वर्षीय श्याम रामसे न्यूमोनिया से पीड़ित थे। श्याम रामसे के एक रिश्तेदार ने बताया कि 'स्वास्थ्य ठीक न होने की वजह से उन्हें आज सुबह ही अस्पताल में भर्ती कराया गया था। न्यूमोनिया से उनका अस्पताल में निधन हो गया।'

श्याम रामसे के परिवार में उनकी दो बेटियां साशा और नम्रता हैं।

श्याम भारतीय सिनेमा में हॉरर फिल्मों की वजह से लंबे समय तक एक खास जगह रखने वाले रामसे ब्रदर्स में से एक थे। रामसे ब्रदर्स ने 1970 और 1980 के दशक में कम बजट में हॉरर फिल्में बनाईं जिन्हें दर्शकों ने खूब सराहा। माना जाता है कि इन हॉरर फिल्मों के पीछे असली सोच श्याम रामसे की होती थी। उन्होंने 'दो गज जमीन के नीचे', 'और कौन', 'अंधेरा', 'घूंघरू की आवाज', 'दरवाजा', पुराना मंदिर' और 'वीराना' जैसी फिल्मों का निर्देशन किया था। 

1980 में उनकी लोकप्रियता कम होगी जब उन्हों ने जी टीवी में जी हॉरर शो जैसे पकड़ लिए आदि जैसे कई निजी चैनलों के कारण मांग में था, जो भारत में नब्बे के दशक की शुरुआत में लॉन्च किए गए थे। . Zee  के लिए भारत की पहली हॉरर टीवी श्रृंखला शुरू की । यह एक बड़ी हिट थी और इसकी लोकप्रियता फेसबुक और ऑर्कुट जैसे सोशल नेटवर्किंग समुदायों पर इसकी स्मृति में बनाए गए विभिन्न समुदायों द्वारा अपने प्रशंसकों द्वारा साबित की जाती है।

इसके बाद बाद , उन्होंने ज़ी टीवी के लिए , सेटरडे सस्पेंस   एक्स ज़ोन और नागिन के कुछ एपिसोड बनाए । 2008 में, उन्होंने अपनी बेटी साशा रामसे के साथ सहारा वन के लिए इच्छाधारी मादा नागिन की अवधारणा पर आधारित एक अलौकिक श्रृंखला का निर्देशन किया, जिसे  नीली आंखे कहा जाता है ।

  2000 में फिर फीचर फिल्मों में आकर उन्हों ने धुंध the फॉग का निर्माण शुरू किया, जो 21 फरवरी 2003 को रिलीज़ हुई थी। फिर उन्होंने 2007 में घुटन 2010 में एक कॉमेडी हॉरर फिल्म, बचाओ बनाई। उनकी नवीनतम रिलीज़ नेबर्स रिलीज़ हुई। जनवरी, 2014 में।


उन्हों ने फिल्मे लिखी
इंस्पेक्टर धनुष(1991) (कहानी) (तुलसी-श्याम के रूप में)
  •   बंद दरवाजा     (1990) (पटकथा)
  •     विराना(1988) (पटकथा)
  •  बूढ़ा मिल गया (1971) (कहानी) (श्याम के रूप में)

करियर

उन्होंने अपने करियर के दौरान पुराना मंदिर (1984), अंधेरा (1975), सबूत (1980), पुरानी हवेली (1989), धुंध: द फॉग (2003) और कोई है जैसी कई फिल्में बनाई हैं. श्यामा रामसे के अलावा उनके भाई तुलसी ने वीराना फिल्म बनाई थी।

फिल्में

  • कोई है – 2017
  • पड़ोसी – 2014
  • बाचाओ – इनसाइड भूत है …  – 2010
  • घुतन  – 2007
  • धुंड: द फॉग  – 2003
  • तलाशी – 2000
  • नागिन  – 1999  (टीवी शो )
  • ऐनोनी  – 1998  (टीवी शो )
  • द जी हॉरर शो  – 1993-97  (टीवी शो)
  • महाकाल – 1993
  • पुलिस मथु दादा  – 1991
  • इंस्पेक्टर धनुष  – 1991
  • अजूबा कुदरत का  – 1991
  • बंध दरवाजा – 1990
  • पुरानी हवेली – 1989
  • वीराना – 1988
  • तहखाना – 1986
  • टेलीफोन – 1985
  • 3 डी सामरी – 1985
  • पुराण मंदिर – 1984
  • घुंघरू की आवाज़ – 1981
  • होटल – 1981
  • सन्नता – 1981
  • दहशत  – 1981
  • सबूत – 1980
  • गेस्ट हाउस – 1980 फ़िल्म
  • और कौन?  – 1979
  • दरवाजा  – 1978
  • अन्धेरा – 1975
  • दो गज़ ज़मीन के नीचे  – 1972
  • नकुली शान – 1971

गुरुवार, 4 जनवरी 2024

विजय तेंदुलकर

🎂जन्म 06 जनवरी, 1928 

🕯️मृत्यु 19 मई
नाटककार पटकथा लेखक रंगमंच के विकास में अग्रणी भूमिका निभाने वाले विजय तेंदुलकर की पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रधांजलि

विजय तेंदुलकर का नाम आधुनिक भारतीय नाटक और रंगमंच के विकास में अग्रणी है। पांच दशक से ज़्यादा समय तक सक्रिय रहे तेंदुलकर ने रंमगंच और फ़िल्मों के लिए लिखने के अलावा कहानियाँ और उपन्यास भी लिखे।

महाराष्ट्र के कोल्हापुर में 6 जनवरी, 1928 को एक ब्राह्मण परिवार में पैदा हुए विजय ढोंडोपंत तेंदुलकर ने महज़ छह साल की उम्र में अपनी पहली कहानी लिखी थी। उनके पिता नौकरी के साथ ही प्रकाशन का भी छोटा-मोटा व्यवसाय करते थे इसलिए पढ़ने-लिखने का माहौल उन्हें घर में ही मिल गया। पश्चिमी नाटकों को देखते हुए बड़े हुए विजय ने मात्र 11 साल की उम्र में पहला नाटक लिखा, उसमें काम किया और उसे निर्देशित भी किया। उन्हें मानव स्वभाव की गहरी समझ थी। शुरुआती दिनों में विजय ने अख़बारों में काम किया था। बाद में भी वे अख़बारों के लिए लिखते रहे सन बयालिस के दौर में उन्होंने पढ़ाई छोड़ कर आजादी के आंदोलन में कूदने का फैसला किया। वास्तव में उनके लेखन की शुरूआत अखबारों के लिए लिखने से हुई। बीस साल की उम्र में उन्होंने दो नाटक लिखे, ‘अमायाचार कोन प्रेम करेन’ (हमें कौन प्यार करेगा) एवं ‘गृहस्थ’। लेकिन इन नाटकों को कोई सफलता नहीं मिली। इससे युवा तेंदुलकर का उत्साह टूट गया और उन्होंने नाटक नहीं लिखने का फैसला किया। लेकिन उनकी लेखनी ने एक बार फिर जोर मारा और सन 1956 में उन्‍होंने ‘श्रीमंत टक’ लिखा। इस नाटक में एक बिन ब्याही माँ के अमीर पिता के मना करने के बावजूद अपने बच्चे को जन्म देने के फैसले को दर्शाया गया था। नाटक जगत में इसे खूब सराहा गया। इस नाटक की तत्कालीन रूढिवादियों ने कड़ी आलोचना की, लेकिन तेंदुलकर पर इसका कोई असर नहीं हुआ।

मराठी की पत्रकारिता से सक्रिय जीवन शुरू करने के बाद सातवें दशक के उत्तरार्ध में भारतीय रंगमंच पर एक धूमकेतु की भाँति उनका उदय हुआ। उनका नाटक शांतता कोर्ट चालू आहे अपनी क्रान्तिकारी वस्तु और संरचना के कारण इतना लोकप्रिय हुआ, कि देखते-देखते अनेक भाषाओं में उसके अनुवाद हुए और देश-विदेश में शताधिक उसकी प्रस्तुतियाँ हो चुकी हैं। 'शांताता! कोर्ट चालू आहे', 'घासीराम कोतवाल' और 'सखाराम बाइंडर' उनके लिखे बहुचर्चित नाटक हैं। सत्तर के दशक में उनके कुछ नाटकों को विरोध भी झेलना पड़ा लेकिन वास्तविकता से जुड़े इन नाटकों का मंचन आज भी होना उनकी स्वीकार्यता का प्रमाण है।

विजय तेंदुलकर ने अपने थियेटर समूह ‘रंगायन’ के जरिये नाटकों में नए प्रयोग करने शुरू किए। इस काम में उन्हें सहयोग मिला श्रीराम लागू, मोहन अगाशे और सुलभा देशपांडे से। इन नए कलाकारों ने तेंदुलकर की रचनाओं को रंगमंचीय स्‍वरूप प्रदान किया।
सन 1961 में उन्‍होंने ‘गिद्वे-गिद्व’ नाटक लिखा, लेकिन इस नाटक के एकदम नए विषय होने की वजह से इसका प्रदर्शन नौ साल बाद सन 1970 में संभव हो सका। इस नाटक में नैतिक रूप से परिवार के टूटते ढांचे और हिंसा के छिपे हुए स्वरूपों को रंग की भाषा में दिखाया गया। तेंदुलकर ने इस नाटक में घरेलू लिंग आधारित सांप्रदायिक और राजनीतिक हिंसा को नए तरह से परिभाषित किया। इस नाटक ने उन्हें रंग जगत में ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया।
ड्रिग ड्यूरमर की लघु कहानी ‘ ट्रैप्स’ को आधार बना कर उन्होंने एक नाटक लिखा ‘शांतता कोर्ट चालू आहे' (खामोश अदालत जारी है)। सन 1967 में लिखे और खेले गए इस नाटक ने नाट्यजगत में धूम मचा दी और उन्हें एक सिद्धहस्त लेखक के रूप में स्थापित कर दिया। इस नाटक की लोकप्रियता आज चालीस साल बाद भी उतनी ही बनी हुई है। आज भी इसके मंचन में लोगो की भारी भीड़ इस बात को साबित करती है।
सन 1972 में तेंदुलकर की कलम से एक और नाटक आया ‘सखाराम बाइंडर’। नैतिकता और मूल्यों के द्वन्द्वों को उभारता यह नाटक आलोचको के साथ-साथ दर्शकों को भी काफ़ी पसंद आया। लेकिन इसी साल उन्होंने एक और नाटक लिखा ‘घासीराम कोतवाल’। अठारवीं सदी के मराठा शासन में आई कमज़ोरियों को दर्शाता यह नाटक अमरता का तत्व लिए हुए था

तेंडुलकर के ‘गिधाड़े’, ‘कमला’, ‘कन्यादान’, आदि नाटक भी बहुचर्चित हुए। विजय तेंदुलकर ने पचास से भी अधिक नाटकों की रचना की है। हिंदी में उनके तीस नाटकों का अनुवाद और मंचन किया जा चुका है। वर्ष 2007 में ‘भूत’ और वर्ष 2008 में ‘विट्ठला’ और ‘एक जिद्दी लड़की’ का हिंदी अनुवाद भी प्रकाशित हो गया है। ‘खामोश अदालत जारी है’, ’ गिद्ध’ ‘,सखाराम बाइंडर’ ,‘जाति ही पूछो साधु की’,‘ घासीराम कोतवाल’,‘ कन्यादान’,‘ कमला’ आदि नाटकों के जरिए तेंदुलकर की जो छवि नाट्य जगत में स्वीकृत हुई वह मराठी नाटककार की सीमा में बंधकर नहीं रह सकी

उनके बहुचर्चित नाटक 'घासीराम कोतवाल' का छह हज़ार से ज़्यादा बार मंचन हो चुका है। इतनी बड़ी संख्या में किसी और भारतीय नाटक का अभी तक मंचन नहीं हो सका है। उनके लिखे कई नाटकों का अंग्रेज़ी समेत दूसरी भाषाओं में अनुवाद और मंचन हुआ है।

‘निशान्त’ आदि कई, ‘समांतर सिनेमा’ आन्दोलन से जुड़ी, फ़िल्मों की पटकथा उन्होंने लिखीं। महाराष्ट्र के सांस्कृतिक जीवन में उनका व्यक्तित्व अलग से पहचाना जाता है।

उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, कालिदास सम्मान तथा पद्मभूषण आदि कई पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है। पद्मभूषण से सम्मानित तेंदुलकर को श्याम बेनेगल की फ़िल्म 'मंथन' की पटकथा के लिए वर्ष 1977 में राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला था। बचपन से ही रंगमंच से जुड़े रहे तेंदुलकर को मराठी और हिंदी में अपने लेखन के लिए 'संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप', 'महाराष्ट्र गौरव पुरस्कार' जैसे सम्मान भी मिले। अपने जीवनकाल में विजय तेंडुलकर ने पद्मभूषण (1984), महाराष्ट्र राज्य सरकार सम्मान (1956, 69, 72), संगीत नाटक अकादमी अवॉर्ड (1971), 'फिल्म फेयर अवॉर्ड (1980, 1999) एवं महाराष्ट्र गौरव (1999) जैसे सम्मानजनक पुरस्कार प्राप्त किए थे

19 मई, 2008 को परम्परावादी मराठी थियेटर के पुरोधा विजय तेंदुलकर का निधन हो गया। महाराष्ट्र के पुणे शहर के एक अस्पताल में उन्होंने अंतिम साँस ली।

प्रीति गांगुली

●▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬●   ꧁ *जन्म की तारीख और समय: 17 मई 1953, मुम्बई* *मृत्यु की जगह और तारीख: 2 दिसंबर 2012, मुम्बई* *भाई: भारती जाफ़री, ...